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राजनीतिक हिंसा का अखाड़ा बनता केरल

राजेश के दोनों हाथ काटे गए और उनके शरीर पर तिरासी घातक निशान मिले। इससे पहले भी जो हत्याएं हुर्इं, उनमें भी ऐसी ही क्रूरता थी।
Author August 10, 2017 05:16 am
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की प्रतीकात्मक तस्वीर

राकेश सिन्हा  

केरल में राजनीतिक हिंसा की घटना ने पहली बार राष्ट्रीय विमर्श को जन्म दिया है क्योंकि संघ के चौंतीस वर्षीय कार्यकर्ता एसएल राजेश की हत्या का सीधा आरोप मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं पर है। इस घटना के साथ कई पहलू जुड़ गए हैं। राजनीतिक हिंसा की जो घटनाएं 1969 से शुरू हुई थीं, यह हत्या उसी की एक कड़ी है। पिछले बारह महीने में आरएसएस से जुड़े तेरह कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। इसका दूसरा आयाम हत्या के प्रकार से जुड़ा हुआ है। राजेश के दोनों हाथ काटे गए और उनके शरीर पर तिरासी घातक निशान मिले। इससे पहले भी जो हत्याएं हुर्इं, उनमें भी ऐसी ही क्रूरता थी। 1999 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष जयकृष्णन की सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने बेरहमी से तब हत्या कर दी थी, जब वे छठी कक्षा के छात्रों को स्कूल में पढ़ा रहे थे। इस बर्बरता का प्रदर्शन मासूम बच्चों के सामने हुआ था। पिछले विधानसभा चुनाव में कुथुपारंबा विधानसभा सीट से सी सदानंदन मास्टर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार थे। 1994 में उनके दोनों पैरों को काट दिया गया था। इस प्रकार की बर्बरता नक्सलियों द्वारा अंजाम दी गई हिंसा में भी नहीं दिखाई पड़ती। पहले जो हिंसा कन्नूर और उसके आसपास के जिलों में सिमटी हुई थी वह राजधानी तिरुवनंतपुरम तक पहुंच गई है।

देश में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तब बुद्धिजीवियों के एक तबके ने देश के किसी भी कोने में हुई हिंसात्मक घटनाओं को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया। अखलाक और जुनैद की दुर्भाग्यपूर्ण हत्याओं का रोष पूरे देश में देखा गया, लेकिन बुद्धिजीवियों ने इसे विचारधारा का आयाम देकर ‘अवार्ड वापसी’ और ‘नाट इन माइ नेम’ जैसे अभियानों के द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय खबर बना दिया। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस देश में हिंसा और अपराध पर भी राजनीतिक और बौद्धिक ध्रुवीकरण होने लगा है। दो साल पहले जब सुजीत की हत्या केरल में उनके वृद्ध माता-पिता के सामने की गई और अब जब राजेश की हत्या हुई तब असहिष्णुता की आवाज उठाने वाले लोग इन घटनाओं पर अलग-अलग सिद्धांत गढ़ने लगे या चुप्पी साधे रहे। यह किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए घातक है कि बुद्धिजीवी चयनित संवेदनशीलता का परिचय दें और चयनित घटनाओं पर ही आवाज उठाएं। इससे यह भी जाहिर है कि बौद्धिक वर्ग में स्वायत्तता का अभाव है और बौद्धिकता की आड़ में उनके मन-मस्तिष्क में राजनीतिक विचारधारा हावी है। आखिर केरल में 1969 से लगातार राजनीतिक कारणों से हत्याएं हो रही हैं। माकपा तथा संघ के बीच इस तनाव का कारण क्या है? इसे भी समझने की जरूरत है। केरल में संघ ने अपना कार्य आजादी से पहले ही शुरू कर दिया था और कम्युनिस्ट पार्टी का दबदबा इस राज्य में तीस के दशक से ही रहा है। हालांकि, यहां आजादी से पूर्व सोशलिस्ट विचारधारा और संगठन का प्रभाव था लेकिन मार्क्सवादी नेता ईएमएस नंबूदरीपाद ने अपने व्यक्तित्व और प्रभाव से समाजवादियों को मार्क्सवादी पार्टी का हिस्सा बना दिया। दूसरे शब्दों में सोशलिस्ट पार्टी को खोखला कर दिया। 1948 में संघ के द्वितीय सरसंघचालक गोलवलकर की एक सभा के दौरान मंच पर हमला हुआ था, लेकिन 1969 तक यह सिलसिला छिटपुट घटनाओं का था। 1969 में संघ के कार्यकर्ता वाडिकल रामकृष्णन की हत्या हुई। वे पेशे से हलवाई थे। इस हत्या का आरोप मुख्यमंत्री पी विजयन और माकपा के प्रदेश सचिव कोदियेरी बालाकृष्णन पर लगा था। तब से यह सिलसिला जारी है। हिंसात्मक घटनाएं 1977 के बाद और भी तेज हो गर्इं। उसका एक अहम कारण आपातकाल के दौरान संघ द्वारा चलाए गए भूमिगत आंदोलन में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं का सहयोग और उससे उनका संघ के प्रति बढ़ा हुआ आकर्षण था। कन्नूर, अलाप्पुझा और थ्रिसूर, इन तीन जिलों के अनेक कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर संघ में शामिल हुए।

अस्सी के दशक में हिंसा अक्सर उनके विरुद्ध की गई, जो सीपीएम छोड़ कर संघ में शामिल हुए थे। लेकिन बाद में हत्या की प्रकृति में बदलाव आया और संघ के सक्रिय कार्यकताओं को निशाना बनाया जाने लगा। जो कार्यकर्ता अस्सी के दशक से लगातार मारे गए उनमें पंद्रह वर्षीय प्रदीप से लेकर चौंतीस वर्षीय राजेश तक शामिल हैं। संघ का सामाजिक आधार राज्य में उन वर्गों तक पहुंचा है, जो सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से अंतिम पायदान पर हैं, जिन्हें मार्क्सवादी सर्वहारा कहते हैं। चाहे पालक्काड़ के रामकृष्णन हों या थ्रिसूर के शंकर नारायणन, कन्नूर के जयकृष्णन हों या स्वयं राजेश- ये सभी अति सामान्य परिवार के लोग रहे हैं। माकपा की तकलीफ उन लोगों से नहीं है जो आर्थिक दृष्टि से संपन्न व्यवसायी और उद्योगपति हैं और जो संघ के निकट आ रहे हैं। उन्हें पीड़ा उन लोगों से है जिन पर वे अपना एकाधिकार समझते रहे हैं। उदाहरण के लिए राजेश पुलाया जाति के थे, जो कि दलित समाज का हिस्सा है। केरल में 9.8 प्रतिशत दलित हैं, उनमें से अधिकांश परंपरागत रूप से माकपा के समर्थक रहे हैं। दलित वर्ग का संघ के पास आना सीपीएम को रास नहीं आ रहा है और अब तक संघ से जुड़े हुए चार दलित कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद जो राजनीतिक सरगरमी हुई थी और मनुवाद विरोध के नाम पर जो लोग सक्रिय हुए थे, वे भी राजेश के नाम पर मौनव्रत में हैं।

माकपा के कार्यकर्ताओं में हिंसात्मक रुझान का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। कम्युनिस्ट पार्टियों में प्रशिक्षण और स्वाध्याय पर जोर दिया जाता है तथा अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के उदाहरणों के आधार पर उन्हें वर्ग संघर्ष के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाता है। हालांकि सीपीएम ने सैद्धांतिक तौर पर वर्ग संघर्ष का रास्ता छोड़ दिया है और अपने आप को संसदीय जनतंत्र का हिस्सा बना लिया है, लेकिन यह मात्र उसका संसदीय अवसरवाद है। पार्टी के कार्यकर्ताओं को जो साहित्य दिया जाता है वह उन्हें अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति क्रूर और असंवेदनशील बना देता है। सोवियत संघ के पूर्वराष्ट्रपति स्टालिन की मृत्यु के बाद पूरी दुनिया के कम्युनिस्टों ने उसकी भर्त्सना की थी। स्वयं सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने उसकी क्रूरता पर 1956 की पार्टी कांग्रेस ने ‘द क्राइम्स आॅफ स्टालिन एरा’ नाम से दस्तावेज जारी किया। स्टालिन की क्रूरता चरम पर कैसे थी, उसका भी एक उदाहरण है। सोवियत संघ के पार्टी की केंद्रीय समिति में 1934 में जो 134 सदस्य चुने गए थे, उनमें 98 की हत्या स्टालिन ने कर दी। उसकी बर्बरता के शिकार हजारों निर्दोष कम्युनिस्ट कार्यकर्ता हुए। हजारों लोगों को उसने निर्वासित जीवन जीने के लिए बाध्य किया और हजारों को साइबेरिया के शिविरों में भेजा। यह सब जानते हुए अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘न्यू एज’ ने मार्च 1953 के अंक में स्टालिन को मार्क्सवाद का सबसे ‘नेक प्रतिनिधि’ घोषित किया था और 11 साल बाद इसी पत्र ने 15 जुलाई,1964 के अंक में उसे दुनिया के सर्वहारा आंदोलन का सबसे महान नेता बताया था। इतना ही नहीं, भारत के कम्युनिस्टों ने सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति इस बात के लिए रोष दिखाया कि वह स्टालिन का गलत मूल्यांकन कर रही है।

पार्टी में विभाजन के बाद जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने स्टालिन के प्रति अपनी दृष्टि बदली, वहीं माकपा जस की तस बनी रही। सीपीएम के मुखपत्र ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ ने 17 दिसंबर,1978 के अंक में अपने संपादकीय में ख्रुश्चेव को स्टालिन का गलत मूल्यांकन करने के लिए जिम्मेदार ठहराया और मार्क्सवाद-लेनिनवाद पर इसे आघात माना। नंबूदरीबाद ने जून 1990 में पार्टी के दस्तावेज में स्टालिन का महिमामंडन किया था। जब 1989 में चीन के थ्येन आन मन चौक पर हजारों निर्दोष छात्रों को लोकतांत्रिक आवाज उठाने के लिए चीनी सेना ने मार डाला था, तब ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ ने 11 जनवरी, 1989 के अंक में अपने संपादकीय में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को ‘प्रतिक्रांतिकारियों’ को मारने के लिए साधुवाद दिया था।
इस प्रकार पार्टी का प्रशिक्षण और साहित्य कार्यकताओं को संसदीय जनतंत्र की तुलना में हिंसात्मक राजनीतिक संघर्ष के लिए अधिक प्रवृत्त करता है। केरल का कन्नूर जिला मार्क्सवादी हिंसा की प्रयोगशाला बन गया है।
(लेखक संघ विचारक हैं)

 

 

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