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राजनीतिः फसल बीमा योजना की हकीकत

किसान संगठनों का आरोप है कि फसल बीमा योजना का लाभ सरकारी बीमा कंपनियों के बजाय निजी बीमा कंपनियों को मिल रहा है। इस महत्त्वाकांक्षी योजना के पहले चरण में सरकारी बीमा कंपनी की उपस्थिति नाममात्र की है। दिलचस्प है कि भारत में बीमा क्षेत्र में भारी योगदान दे रही चार प्रमुख सरकारी कंपनियों को फसल बीमा योजना से नहीं जोड़ा गया।
Author October 20, 2016 01:37 am

एक टीवी चैनल द्वारा पंजाब में हाल में कराए गए सर्वेक्षण के मुताबिक किसानों का एक बड़ा तबका फसल बीमा योजना से नाराज है। सर्वेक्षण में जितने प्रतिभागियों ने भाग लिया, उनमें से पैंसठ प्रतिशत ने फसल बीमा योजना को लेकर असंतोष जताया। पंजाब उन राज्यों में है, जहां प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू नहीं की गई है। जबकि पंजाब देश का एक बड़ा कृषि प्रधानराज्य है। पंजाब को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की कुछ शर्तों पर आपत्ति थी। उसे यह भी आशंका थी कि इससे किसानों को कम, बीमा कंपनियों को लाभ ज्यादा मिलेगा। इसी साल देश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू की गई है।
हालांकि पुरानी योजनाओं की खामियां दूर करते हुए नई योजना लागू की गई है। मगर इस पर शुरू में ही सवाल उठने लगे हैं। कई राज्यों में इस योजना के प्रति उत्साह नहीं है। देश के कई हिस्सों में किसान नेताओं ने इस योजना को बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली बताया। उनका आरोप था कि इस योजना से किसानों को नफा के बजाए नुकसान होगा। हालांकि फिलहाल ऐसा आरोप लगाना जल्दबाजी होगी, लेकिन कई जगहों पर किसानों ने योजना का विरोध किया। बिहार जैसे राज्य में तो सरकार ने ही इस योजना का विरोध किया था। हरियाणा में किसानों का आरोप था कि उनके खातों से जबर्दस्ती बीमा की प्रीमियम राशि काटी गई।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को लेकर सरकार उत्साहित है, क्योंकि यूपीए सरकार के समय तीन फसल बीमा योजनाएं लागू थीं और उनसे किसानों को अक्सर शिकायत रही। उस समय भी शिकायत थी कि बीमा कंपनियों ने भारी प्रीमियम राशि इकट्ठा की, लेकिन किसानों को मुआवजा देने के वक्त हेराफेरी की गई। कई किसान संगठनों ने इस पर सवाल उठाया है। हालांकि इस पर तुरंत सवाल उठाना उचित नहीं है। क्योंकि योजना के फायदे और नुकसान का पता एक-दो साल बाद ही चलेगा। किसान संगठनों का आरोप है कि 2016 के खरीफ सीजन से लागू इस योजना में किसानों को जितना मुआवजा नहीं मिलेगा, उससे कई गुना ज्यादा राशि बतौर प्रीमियम बीमा कंपनियों को मिलेगी।
किसान संगठनों का एक आरोप यह भी है कि फसल बीमा योजना का लाभ सरकारी बीमा कंपनियों के बजाय निजी बीमा कंपनियों को मिल रहा है। इस महत्त्वाकांक्षी योजना के पहले चरण में जुड़ी बीमा कंपनियों में सरकारी बीमा कंपनी की उपस्थिति नाममात्र की है। सरकारी क्षेत्र की एग्रीकल्चर इन्श्योरेंस कंपनी आॅफ इंडिया लिमिटेड को इस योजना से जोड़ा गया है। एक और कंपनी एसबीआइ जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड आंशिक सरकारी कंपनी है, क्योंकि इसमें भारतीय स्टेट बैंक की हिस्सेदारी चौहत्तर फीसद है। जबकि इस योजना से जुड़ी आइसीआइसीआइ लोंबार्ड, एचडीएफसी अर्गो, इफ्को टोकियो, चोलामंडलम एमएस, बजाज अलियांज, फ्यूचर जेनराली, रिलायंस जनरल इंश्योरेंस, टाटा एआइजी आदि निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियां हैं। दिलचस्प है कि भारत में बीमा क्षेत्र में भारी योगदान दे रही चार प्रमुख सरकारी कंपनियों- नेशनल इंश्योरेंस कंपनी, न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को फसल बीमा योजना से नहीं जोड़ा गया।
बताया जाता है कि सरकारी बीमा कंपनियों ने इस योजना में शामिल होने के लिए काफी जोर लगाया लेकिन उनकी कोशिशें नाकाम हो गर्इं। सरकारी बीमा कंपनियों के पास योजना में शामिल होने के मजबूत तर्क थे क्योंकि इनका नेटवर्क देश में सबसे ज्यादा है। पूरे देश में इनके पास हजारों कार्यालय हैं। लाखों बीमा एजेंट हैं। पंजाब ने इस योजना को लागू नहीं किया। उधर हरियाणा के किसान योजना लागू किए जाने से नाराज हो गए। हरियाणा में लगभग सोलह लाख किसानों को इससे जोड़े जाने की योजना थी। लेकिन लगभग छह लाख किसान ही इस योजना से जुड़ पाए।
कई जगहों पर तो राजनीतिक दलों और किसान संगठनों ने इस योजना का विरोध किया। उनका विरोध प्रीमियम राशि को लेकर था। किसानों के बैंक खातों से जबर्दस्ती प्रीमियम राशि काटे जाने के कारण भी उनमें भारी रोष था। किसानों का आरोप था कि फसल बीमा योजना में धोखाधड़ी हो रही है। उनकी खाली पड़ी जमीन का भी बीमा कर प्रीमियम की राशि काट ली गई। जबकि कई जगहों पर आरोप लगाया कि उनके खेत में ज्वार की फसल को धान की फसल दिखा कर प्रीमियम काट लिया गया। हरियाणा में बीमा योजना की सफलता के लिए राज्य सरकार के मंत्रियों ने किसानों के बीच जागरूकता यात्रा भी निकाली थी। किसान संगठनों का कहना था कि फसल बीमा योजना आकर्षक होती, तो किसान खुद आगे आते, मंत्रियों को पदयात्रा की जरूरत नहीं पड़ती।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर बिहार ने भी सवाल खड़ा किया था। बिहार के मुख्यमंत्री ने फसल बीमा योजना में नब्बे प्रतिशत केद्रांश की मांग की थी। उनका आरोप था कि अगर राज्य को भी केंद्र के बराबर प्रीमियम राशि देनी होगी तो योजना का नाम भी बदला जाए। उनका आरोप पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के मुकाबले बिहार के साथ होने वाले भेदभाव से भी था। उत्तर प्रदेश के मुकाबले बिहार में प्रीमियम राशि ज्यादा तय की गई थी। यही नहीं, बिहार में फसल बीमा योजना में भाग लेने वाली छह कंपनियों में मात्र एक सरकारी कंपनी थी, बाकी सभी निजी क्षेत्र की थीं। वैसे भी फसल बीमा के क्षेत्र में बिहार पहले से कमजोर राज्य है। यहां कुल डेढ़ करोड़ किसानों में से मात्र सोलह लाख किसान फसल बीमा योजना का लाभ उठाते हैं।
हालांकि सरकार देश में अभी तक लागू की गई फसल बीमा योजनाओं की आॅडिट की तैयारी कर रही है। यह स्वागत योग्य कदम है। आॅडिट में जो खामियां सामने आएंगी उनके आधार पर आगे फसल बीमा योजनाओं में सुधार किया जा सकता है। रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने देश के सारे बैंकों को इस संबंध में दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा है। शुरू में देश के नौ राज्यों- आंध्र प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, तेलंगाना और महाराष्ट्र में फसल बीमा योजनाओं का आॅडिट कराने की योजना है। गौरतलब है कि इनमें कुछ राज्य किसानों की दुर्दशा के लिए जाने जाते हैं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और हरियाणा में किसानों की आत्महत्याओं की खबरें लगातार आ रही हैं। खेती की बढ़ती लागत ने जहां किसानों को परेशान किया है, वहीं बाढ़, बेमौसमी बरसात और सूखे ने खेती बर्बाद कर दी है। फसल खराब होने के बाद कर्ज में डूबे किसानों के पास आत्महत्या के सिवा कोई चारा नहीं होता।
किसानों को राहत देने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू होने से पहले देश के अलग-अलग राज्यों में फसल बीमा योजना लागू थी। लेकिन लगातार यही आरोप लगते रहे कि इसमें किसानों के साथ छल किया गया। किसानों से प्रीमियम तो वसूला किया, लेकिन मुआवजे के नाम पर कंपनियां और सरकार धोखाधड़ी करती रही हैं। इन शिकायतों के बाद पूरे देश में एक ही फसल बीमा योजना- प्रधानमंत्री मंत्री फसल बीमा योजना- लागू की गई। पहले लागू हर फसल बीमा योजना में किसानों की एक आम शिकायत आ रही है कि बीमा कंपनियां प्रीमियम तो मोटा ले रही हैं, लेकिन मुआवजे के नाम पर पंद्रह रुपए से हजार रुपए तक पकड़ा रही हैं। किसान को नहीं, गांव को इकाई बनाया गया। अगर पूरे गांव में कम से कम पचहत्तर प्रतिशत फसल बर्बाद होगी, तो मुआवजा मिलेगा। इसका आकलन बीमा कंपनियों के साथ सरकारी पदाधिकारी करेंगे। फसल ऋण लेने वाले किसान के खाते से प्रीमियम की राशि जबर्दस्ती काटे जाने पर भी किसानों को आपत्ति है।

यूपीए के समय में लागू फसल बीमा योजना के प्रति किसानों का आरोप था कि प्रीमियम राशि तो कंपनियां जबर्दस्ती ले लेती हैं, लेकिन मुआवजा देते वक्त हेराफेरी करती हैं। यही नहीं, जिस जमीन पर खेती नहीं की गई, उस जमीन का भी फसल बीमा कर कंपनियों ने भारी हेराफेरी की है। 2014 और 2015 में बीमा कंपनियों की हेराफेरी के मामले छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों में सामने आए। लोगों का आरोप था कि फसल बीमा योजना लूट का माध्यम बन गई है। छत्तीसगढ़ में किसानों ने आरोप लगाया कि उस जमीन पर भी प्रीमियम वसूल लिया गया है, जिस पर किसानों ने खेती ही नहीं की। यह हेराफेरी किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से की गई। छत्तीसगढ़ के लगभग दस लाख किसानों को चूना लगाया गया।

दरअसल, किसानों के क्रेडिट कार्ड में किसानों की पूरी जमीन दर्ज है। जब किसानों ने खाद और बीज के लिए कर्ज लिया, तो उनके क्रेडिट कार्ड से बीमे का प्रीमियम वसूल लिया गया। लेकिन हद तो तब हो गई जब किसान क्रेडिट कार्ड के बहाने किसानों की खाली पड़ी जमीन का भी फसल बीमा कंपनियों ने कर दिया। कोरिया जिले के एक किसान पार्वती का आरोप था कि उससे तेईस हेक्टेयर जमीन की प्रीमियम राशि वसूल की गई, जबकि उसने मात्र बारह हेक्टेयर जमीन पर धान की खेती की थी। एक और किसान बैजनाथ के अनुसार उसने सिर्फ डेढ़ हेक्टेयर जमीन पर धान की रोपाई की, लेकिन उससे चौबीस हजार रुपए प्रीमियम वसूला गया। राजस्थान में भी किसानों को छला गया था। सीकर में किसानों को तेरह रुपए से लेकर बीस रुपए तक मुआवजा दिया गया। गिरदावरी रिपोर्ट के मुताबिक जिन्हें मुआवजा मिलना चाहिए था, उन्हें नहीं मिला, जबकि किसानों ने पांच सौ से सात सौ रुपए तक प्रीमियम दिया। लेकिन पूरी फसल खराब होने के बाद उन्हें तेरह से बीस रुपए तक मुआवजा मिला।

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