ताज़ा खबर
 

तीरंदाजः राजनीति की कोठरी

हर तरह की राजनीतिक व्यवस्था में शरीक नेतृत्व किसी न किसी हद तक दागदार होता है। पर अच्छी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था वह है, जो इन दागों को कम से कम पड़ने दे और पड़ते ही धुलाई का चौकस इंतजाम रखे।
Author July 30, 2017 02:42 am
कैबिनेट विस्‍तार के दौरान बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार व उपमुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी। (Source: PTI)

अश्वनी भटनागर

बिहार में पिछले दिनों हुए घटना क्रम ने फिर राजनीति में सिद्धांत, नैतिकता और भ्रष्टाचार के वे सवाल उठाए हैं, जिनसे हम पीढ़ियों से जूझते आ रहे हैं। चर्चा आम है कि किस तरह से किसने, किसको दबाव में रखा और किसने अपनी राजनीतिक निष्ठा को रातोंरात बदल दिया था। कुछ लोग इस घटना से अपने को स्तब्ध बता रहे हैं और बहुतेरे आश्चर्य की भाव भंगिमा बनाए हुए हैं।
वास्तव में सब इस सत्य से भलीभांति परिचित हैं कि राजनीति समाज सेवा के लिए नहीं, बल्कि सत्ता के लिए होती है। सत्ता पाने के लिए बल चाहिए। बल को साहस चाहिए, साहस को लक्ष्य और राजनीतिक लक्ष्य शील का मोहताज नहीं होता है। दरअसल, शीलहरण ही राजनीति का पहला महत्त्वपूर्ण चरण है, जिससे नेतृत्व अपने साहस और बल की पहचान बनाता है और सत्ता तक बलात पहुंचता है। यह प्रक्रिया पुश्तों से चली आ रही है और उस पर आश्चर्यचकित होना बालपन का नमूना पेश करना है।

हम सब जानते हैं कि राजनीतिक प्रक्रिया- चाहे लोकतांत्रिक व्यवस्था की हो, साम्राज्यवाद की या फिर कबीलाई तानाशाही की- एक जैसी होती है। दंद, फंद, षड्यंत्र उसकी मूलभूत जरूरतें हैं। पूर्व में चाणक्य और पश्चिम के मैकियावली जैसे राजनीति शास्त्र के सभी विद्वानों ने इसलिए सत्ता की होड़ को नैतिकता की चाह से दूर रखा है। उनका मानना था की सत्ता तक पहुंचने और फिर उस पर बने रहने के लिए नित्य वे उपाय करने जरूरी हैं, जिनसे शील भाव की अपेक्षा करना बेतुकी बात करने जैसा है।

इतिहास हमें बताता है कि राजनीति एक सरल से विचार से शुरू होती है। पुरातन काल में सिर्फ शारीरिक बल के बूते किसी समूह का नेतृत्व हथिया लिया जाता था। लोग नेता का कहा इसलिए मानते थे, क्योंकि वह ज्यादा भारी-भरकम, बलिष्ठ होता था और उसको चित नहीं किया जा सकता था। इसी बल के प्रयोग से सेनाएं बनाई गर्इं और उनका संचालन करने के लिए बुद्धि को बल से जोड़ा गया। धीरे-धीरे छोटे राज्य कायम हुए, जिनको संगठित रखने के लिए क्षेत्रीय पहचान, भाषा, संस्कृति और धर्म से संबद्ध किया गया था।

दुनिया का कोई भी ऐसा भूभाग नहीं है, जिसमें राजनीतिक बलिष्ठता हासिल करने के लिए इन सभी मुद्दों का भरपूर उपयोग न किया गया हो। हर जगह धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान को लेकर सत्तारूढ़ नेतृत्व या नए उभरते नेतृत्व ने भीषण युद्ध किए हैं। अपने समूह को उन्माद की स्थिति में रखने के लिए उन्होंने इन मुद्दों पर भरपूर राजनीति भी की है। अगर देखा जाए तो धर्म किसी राजनीतिक सोच रखने वाले चतुर सेनानायक का अविष्कार है, क्योंकि धर्म के नाम पर फौज जमा करना सबसे असान और सबसे सस्ता तरीका है।
आधुनिक युग में स्वाधीनता, समानता, बंधुता जैसे विचार उपजे हैं, जिनकी नीव पर लोकतांत्रिक व्यवस्था गढ़ी गई है। आर्थिक विचारात्मक एकता ने समाज को धर्म क्षेत्र से अलहदा नई पहचान दी है। पूंजीवाद और मार्क्सवाद के आधार पर अर्थनीति के जरिए राजनीति होने लगी है। पूंजीवाद लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थक है और मार्क्सवाद सर्वाधिकारी व्यवस्था का। दोनों ही पूर्ण लोकहित की बात करते हैं, पर उनके रास्ते अलग-अलग हैं।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी, संपत्ति का अधिकार आदि विचार लोकतांत्रिक व्यवस्था ने स्थापित किए हैं और इन्हीं के जरिए हम अपने सार्वजनिक जीवन की सेहत को आकते हैं। दूसरे शब्दों में, एक वैचारिक व्यवस्था अपनाने के बाद नेतृत्व को उसमें व्यापक छेड़छाड़ करने की इजाजत नहीं है।
पर लोकतंत्र की राजनीति भी सत्ता की राजनीति है। ऐसी स्थिति में नेताओं से यह अपेक्षा रखना कि वे नैतिकता और शुचिता के रास्ते पर ही चलेंगे, गलत होगा। सत्ता में आने के लिए या दूसरे को सत्ता से हटाने के लिए वे उन सब तंत्रों-मंत्रों का उपयोग करेंगे, जिनको हम अनैतिक और भ्रष्ट कहते हैं। साम, दाम, दंड, भेद का उपयोग सत्ता की राजनीति का अभिन्न अंग है। इनको कभी खत्म नहीं किया जा सकता है।

ऐसी स्थिति में हर तरह की राजनीतिक व्यवस्था में शरीक नेतृत्व किसी न किसी हद तक दागदार होता है। पर अच्छी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था वह है, जो इन दागों को कम से कम पड़ने दे और पड़ते ही धुलाई का चौकस इंतजाम रखे। सर्वाधिकार तंत्र में एक ही व्यक्ति या छोटा-सा गुट हर मसले का अंतिम निर्णायक होता है। उसके फैसले पर कोई और संस्था जांच नहीं कर सकती है। ऐसे में देश और उसके वासी भारी नुकसान उठाते हैं। भ्रष्ट तौर-तरीके पनपते रहते हैं और उनका पता तभी चलता है जब बहुत देर हो चुकी होती है।
दूसरी ओर, लोकतंत्र में अलग-अलग संस्थाओं की व्यवस्था की गई है, जो अपने अधिकार क्षेत्र में पूरी स्वतंत्रा से काम कर सकती है। एक तरफ अगर राजनीतिक प्रक्रिया है, तो दूसरी तरफ विधि व्यवस्था है। इसी तरह अगर नौकरशाही है, तो उसके साथ प्रेस का अंकुश भी है। ऐसा ढांचा बनाने का प्रयास किया गया है, जिसमें हर प्रतिनिधि को अपने दायरे में रह कर पूरी निष्ठा से कर्तव्य निर्वाह करना उसकी मजबूरी बन जाती है।
वास्तव में राजनेताओं से नैतिकता के सवाल उठाने ही नहीं चाहिए। सत्ता की होड़ नैतिकता नहीं पनापने देती। उसकी आशा करना व्यर्थ है। नैतिकता की जगह समाज को अचार संहिता की लक्ष्मणरेखा पर जोर देना चाहिए, उसको विधि-व्यवस्था के जरिए लगातार मजबूत करते रहना चाहिए और विधि और विधान पर नजर रखने के लिए प्रेस की भूमिका पर अतिक्रमण से सावधान रहना चाहिए।

लोकतंत्र का केंद्रबिंदु राजनीतिक व्यक्ति नहीं, बल्कि उसका नागरिक है। उसी की वजह से और उसी के नाम पर नुमाइंदगी होती है। सार्वजनिक जीवन में आने के बाद पथभ्रष्ट हो जाने के अनेक अवसर आते हैं और नागरिक के रूप में हमको जीवंत अहसास होना चाहिए कि राजनेता चीनी की बोरी में सेंध जरूर लगाएगा। राजनीति का चरित्र ही ऐसा है कि वह नजर हटते ही बोरी में हाथ डालेगी। इसीलिए हमको उन सब विधि और विधानों का निरंतर निर्माण करते रहना है, जिससे इसकी संभावना कम से कम होती जाए।
लोकतंत्र का फोकस वस्तुत: नेतृत्व नहीं, बल्कि नागरिक पर है। यह उसकी जिम्मेदारी है कि वह उन व्यवस्थओं को मजबूत करे, जो राजनेताओं को आचार संहिता पर चलने के लिए बाध्य कर दे। बहुत सारे उपाय हमारे पास आज भी हैं, पर बदलते वक्त के साथ हमें नए तरीके तलाशने हैं, जिनसे लोकतंत्र का ढाचा और सशक्त तरीके से राजनीतिक चतुराई से लोहा ले सके।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग