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राजनीतिः किसान मदद के मोहताज क्यों हैं

खेती-किसानी का संकट किसी राहत पैकेज या कर्जमाफी से दूर होने वाला नहीं है। इसके बावजूद कर्जमाफी के जरिए किसानों को राहत दिलाने की मांग बढ़ती जा रही है। किसानों के चुनावी रहनुमा यह नहीं देख रहे हैं कि खेती-किसानी की बदहाली बढ़ती लागत और कुदरती अनिश्चितता समेत कई कारणों से है। कुल मिलाकर, खेती घाटे का धंधा बन गई है।
कर्ज माफी की मांग को लेकर तमिलनाडु के किसान का धरना

तमिलनाडु के कावेरी बेसिन के सूखा-पीड़ित किसान पिछले तीन हफ्तों से इंसानी खोपड़ियों के साथ दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं ताकि दिल्ली के हुक्मरानों को अपनी आवाज सुना सकें। इनका दावा है कि ये खोपड़ियां उन किसानों की हैं जिन्होंने कर्ज के दुश्चक्र में फंस कर आत्महत्या कर ली या भूख ने जिनकी जान ले ली। एक नई प्रवृत्ति यह है कि यहां के लोग आत्महत्या करने वाले किसानों के शवों को जलाने के बजाय दफना रहे हैं ताकि भविष्य में उनके अवशेषों को दिखा सकें। धीरे-धीरे प्रदर्शनकारी किसानों के समर्थन में नेताओं की आवाजाही शुरू हुई और किसानों को राहत पैकेज देने की मांग जोर पकड़ने लगी है। इस बीच मद्रास हाइकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों के कर्ज माफ करने का आदेश दिया। इसके साथ ही अदालत ने सहकारी समितियों और बैंकों से कहा है कि वे बकाया वसूली करने से बचें।

इसी दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य मंत्रिमंडल की पहली बैठक में सूबे के दो करोड़ से अधिक छोटे व सीमांत किसानों के कुल 36,359 करोड़ रुपए के फसली कर्ज माफ कर दिए। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिए केंद्र से मदद की बाट जोहने के बजाय किसान राहत बांड जारी करने का फैसला किया है ताकि दूसरे राज्य उत्तर प्रदेश का उदाहरण देकर केंद्र पर कर्जमाफी के लिए दबाव न बनाएं। इसके बावजूद महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तराखंड से कर्जमाफी की आवाज उठने लगी है। आने वाले दिनों में कई और राज्यों से कर्जमाफी की मांग उठने लगे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

पर दुर्भाग्यवश कोई राजनेता उन कारणों को दूर करने का उपाय नहीं सुझा रहा है जिनके चलते खेती-किसानी बदहाल है। यहां तमिलनाडु का उदाहरण प्रासंगिक है। बारिश की कमी, सिंचाई के पुख्ता इंतजाम न होने, जल-स्तर नीचे जाने से कावेरी नदी के डेल्टाई इलाकों (कावेरी बेसिन) में डेढ़ सौ साल का सबसे भीषण सूखा पड़ा है। तमिलनाडु के कावेरी बेसिन का इलाका चोलमंडलम के नाम से जाना था। इसकी गिनती देश के सबसे उपजाऊ इलाकों में की जाती है, जहां साल में दो-तीन फसलें ली जाती रही हैं। कावेरी बेसिन की उर्वरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दस साल पहले तक इलाके में जब किसी के यहां शानदार वैवाहिक समारोह होता था तो लोग अपने आप मान लेते थे कि यह घर किसान का होगा। लेकिन आज उसी इलाके में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। मानसून की बढ़ती अनिश्चितता, कावेरी नदी से पानी मिलने में कर्नाटक के साथ होने वाली राजनीति, गिरता भूजल स्तर और बढ़ती लागत के चलते अब किसान साल में मुश्किल से एक फसल उगा पाते हैं। इस साल तो उसकी भी उम्मीद नहीं है।

जो हालत तमिलनाडु के कावेरी बेसिन की है वही कमोबेश पूरे देश की होती जा रही है। जो किसान आत्महत्याएं कभी पश्चिमी और दक्षिणी भारत के नकदी खेती वाले इलाकों तक सिमटी थीं उनका दायरा अब समूचे देश में फैलता जा रहा है। मौसम की बढ़ती अनिश्चितता, कुदरती आपदाओं में इजाफा, बढ़ती लागत आदि के चलते खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। फलस्वरूप किसानों की ऋणग्रस्तता बढ़ती जा रही है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक देश के नौ करोड़ कृषि परिवारों में से 52 फीसद परिवारों ने खेती-किसानी के लिए कर्ज लिया हुआ है। फसल बरबाद होने पर यही कर्ज किसानों को आत्महत्या के फंदे तक पहुंचा देता है।

ऐसा नहीं है कि पानी की कमी केवल भारत में है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक छत्तीस देश गंभीर जल संकट से जूझ रहे हैं। आज दुनिया की दो-तिहाई आबादी उन इलाकों में रह रही है जो साल में कम से कम एक महीना पानी की कमी से जूझते हैं। बढ़ता तापमान, बर्फ का पिघलना, समुद्री जल स्तर में बढ़ोतरी, सूखा-बाढ़ की आवृत्ति में इजाफा आदि के चलते पानी की उपलब्धता व गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। दूसरी ओर शहरीकरण, औद्योगीकरण के चलते न केवल पानी की मांग बढ़ती जा रही है बल्कि पानी का प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है। 2050 तक दुनिया की आबादी 9.7 अरब हो जाएगी जिसके लिए खाद्यान्न उत्पादन में साठ फीसद बढ़ोतरी करनी होगी। इसमें मुख्य चुनौती एशिया महाद्वीप से आएगी, जहां की 5.27 अरब आबादी के लिए सौ फीसद ज्यादा खाद्य पदार्थों की जरूरत होगी। जाहिर है, ये खाद्य पदार्थ पानी के बिना तो पैदा होंगे नहीं। यही कारण है कि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि एशिया में पानी की समस्या कुछ ज्यादा ही गंभीर रूप लेने वाली है। विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन के मुताबिक दुनिया का सत्तर फीसद भूजल एशिया में खींचा जाता है जिनमें भारत, चीन, पाकिस्तान अग्रणी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इन देशों में भूजल दोहन के लिए कोई कायदा-कानून नहीं है। यही कारण है कि इन देशों में भूजल लगातार नीचे जा रहा है और पानी को लेकर हिंसक संघर्ष बढ़ते जा रहे हैं।

खेती-किसानी का संकट किसी राहत पैकेज या कर्जमाफी से दूर होने वाला नहीं है। इसके बावजूद कर्जमाफी के जरिए किसानों को राहत दिलाने की मांग बढ़ती जा रही है। किसानों के चुनावी रहनुमा यह नहीं देख रहे हैं कि खेती-किसानी की बदहाली बढ़ती लागत और कुदरती अनिश्चितता समेत कई कारणों से है। कुल मिलाकर, खेती घाटे का धंधा बन गई है। दुनिया भर में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी घटने के साथ उस पर निर्भर लोगों की तादाद भी घटी, लेकिन भारत में इसका उल्टा हुआ। 1950-51 में खेती पर निर्भर लोगों की तादाद 24 करोड़ थी जो अब तीन गुना बढ़ कर 72 करोड़ हो गई है। यही कारण है कि खेती पर निर्भर लोगों की आमदनी घटती जा रही है। बढ़ते जनभार के साथ-साथ चुनिंदा फसलों की खेती, लागत में बढ़ोतरी, कृषि उपजों की खरीद-बिक्री नेटवर्क की कमजोरी, बढ़ती कुदरती आपदाएं भी खेती के संकट को बढ़ा रही हैं। दूसरी ओर सरकारी उपाय राहत-पैकेज, कर्जमाफी जैसे तात्कालिक उपायों से आगे नहीं बढ़ पाते हैं।

खेती तभी फायदे का सौदा बनेगी जब हम उपर्युक्त खामियों को दूर करने का टिकाऊ उपाय करें। सबसे पहला काम है पानी की कीमत पहचान कर क्षेत्र विशेष की पारिस्थतिक दशाओं के अनुरूप फसलें उगाई जाएं। इसके अलावा किसानों को सिंचाई की उन्नत तकनीक से लैस किया जाए ताकि कम पानी से ज्यादा पैदावार हासिल की जा सके। दूसरे, कृषि पैदावार के साथ-साथ बागवानी, पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए। इससे न सिर्फ किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी बल्कि मिट्टी व पानी पर दबाव भी कम होगा। केंद्र सरकार ने जहां सिंचाई-सुविधा बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री सिंचाई योजना शुरू की है वहीं कृषि उपजों के बेहतर दाम दिलाने के लिए देश भर की मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार (नाम) से जोड़ा जा रहा है। किसानों को संकट में सहारा देने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा शुरू की गई है। नीम कोटेड यूरिया से जहां उर्वरकों की कालाबाजारी दूर हुई वहीं सरकार मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड जारी कर रही है ताकि किसान जरूरत के मुताबिक ही उर्वरकों का इस्तेमाल करें। 2018 तक देश के सभी गांवों तक बिजली पहुंचाने के लक्ष्य के साथ-साथ किसानों को सिंचाई के उन्नत साधनों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि अधिक पैदावार हासिल की जा सके। यदि इन योजनाओं का कार्यान्वयन ठीक से हुआ तो 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी करने का लक्ष्य हासिल करना संभव हो सकेगा।

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