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राजनीतिः आमदनी, अठन्नी खर्चा रुपैया

उत्तर प्रदेश प्राकृतिक और खनिज संसाधनों की दृष्टि से कोई पिछड़ा राज्य नहीं है, लेकिन इसकी गिनती आज देश के पिछड़े राज्यों में होती है। पिछड़ेपन और भ्रष्टाचार के मामले में बिहार के बाद उत्तर प्रदेश का ही नाम आता है। प्रदेश के कृषि, औद्योगिक और आर्थिक विकास के सारे कार्यक्रम लगभग ठप्प हो गए हैं। किसानों को खेती का लागत मूल्य भी नहीं मिल रहा है।

उत्तर प्रदेश आज जिस गहरे राजनीतिक और आर्थिक संकट में फंसा हुआ है उसमें से उसे बाहर निकालना आसान नहीं है। राजनीतिक दृष्टि से यह प्रदेश जिस तरह विभिन्न जातियों और वर्गों में बंटा हुआ है, उसे और बढ़ा कर प्रदेश के राजनेता अपनी राजनीति चमका रहे हैं। प्रदेश के विकास और जनता को न्याय दिलाने में राज्य सरकारें विफल साबित हो रही हैं। राज्य की आर्थिक बदहाली गहरे संकट का संकेत दे रही है। उस पर इस साल के अंत तक 37 खरब, 50 अरब, 50 करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज हो जाएगा, जो प्रदेश के कुल वार्षिक बजट से भी ज्यादा होगा। राज्य में गैर-योजनागत कार्यों पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद का साठ प्रतिशत तक पहुंच गया है और विकास कार्यों पर चालीस फीसद धनराशि भी नहीं खर्च हो रही है। राजस्व घाटा लगातार बढ़ रहा है।

सरकार पर हर साल हजारों करोड़ रुपए का बोझ बढ़ रहा है। राज्य को हर महीने वेतन, पेंशन और ब्याज की अदायगी के लिए जितनी रकम चाहिए उसकी आधी रकम भी प्रदेश में राजस्व वसूली से प्राप्त नहीं हो रही है। केंद्र सरकार से जिस दिन उत्तर प्रदेश को ओवर ड्राफ्ट मिलना बंद हो जाएगा, उस दिन प्रदेश सरकार के सामने अपने कर्मचारियों को वेतन देने की भी समस्या पैदा हो जाएगी। प्रदेश की नौकरशाही राज्य पर बोझ बन चुकी है और राजनीतिक लोकतंत्र का तब तक कोई मतलब नहीं होता जब तक उसमें आर्थिक लोकतंत्र को स्थापित करने की क्षमता न हो। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में ऐसी राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पैदा हो गई है, जो हमारे राजनेताओं के नैतिकता विहीन आचरण के कारण भयानक परिणाम के संकेत दे रही है।

बिगड़ती कानून व्यवस्था, बिजली-पानी का संकट, प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की बदहाली को सुधारने की कोई इच्छाशक्ति प्रदेश के राजनेताओं में दिखाई नहीं दे रही है। कोई भी लोकतांत्रिक सरकार अगर आम जनजीवन के हितों को केंद्र में रख कर काम नहीं करती तो केवल वादों, नारों और दोषारोपण से प्रदेश को नहीं चलाया जा सकता है। हमारे राजनीतिक दलों ने प्रदेश को जिस तरह जातियों और धर्मों में खंडित-विखंडित किया है, उसकी मिसाल खोजनी मुश्किल है। उससे समूची लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही प्रदेश की जनता का विश्वास उठता जा रहा है। उत्तर प्रदेश को आर्थिक बदहाली के इस मुकाम पर हमारे राजनेताओं ने ही पहुंचाया है। यहां के युवक रोजी-रोजगार के लिए दूसरे प्रदेशों में भटकते रहते हैं।

उत्तर प्रदेश प्राकृतिक और खनिज संसाधनों की दृष्टि से कोई पिछड़ा राज्य नहीं है, लेकिन इसकी गिनती आज देश के पिछड़े राज्यों में होती है। पिछड़ेपन और भ्रष्टाचार के मामले में बिहार के बाद उत्तर प्रदेश का ही नाम आता है। प्रदेश के कृषि, औद्योगिक और आर्थिक विकास के सारे कार्यक्रम लगभग ठप्प हो गए हैं। किसानों को खेती का लागत मूल्य भी नहीं मिल रहा है। उधर पुराने उद्योग-धंधे एक-एक करके बंद हो रहे हैं और नए उद्योग-धंधे भी नहीं खुल रहे हैं। सरकारी सेवाओं में बहाली लगभग रुक गई है और निजी हलकों में भी रोजगार के नए अवसर नहीं पैदा हो रहे हैं। उधर हर साल लाखों लोग रोजगार की तलाश में और जुड़ जाते हैं।

प्रदेश के आर्थिक, सामाजिक विकास का किसी भी दल के पास कोई कार्यक्रम नहीं है। सभी राजनीतिक दलों के लिए सत्ता सरकारी धन की लूट का माध्यम बन चुकी है। राजनीतिक दलों ने सत्ता पाने के लिए हर तरह के छल-बल को अपना हथियार बना लिया है। इस होड़ में पंचायत चुनावों से लेकर संसदीय चुनाव तक पूरी लोकतांत्रिक प्रणाली पर हर जाति के बाहुबलियों और धनपतियों ने कब्जा कर लिया है। इसलिए ग्राम पंचायतें पंचायतों के विकास का माध्यम बनने के बजाय जातीय संघर्ष का अखाड़ा बन गई हैं। विधानसभा के भीतर भी हिंसक शक्ति प्रदर्शन हो चुके हैं। राजनीतिक दलों ने राज्य की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है।

किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विभिन्न जातियों और वर्गों की अधिक से अधिक भागीदारी की आकांक्षा लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत कही जा सकती है। लोकतंत्र की इस ताकत का इस्तेमाल अगर जाति और वर्गों के विकास और बदलाव के लिए किया जाए, तो उससे समाज और देश मजबूत होता है। इस दृष्टि से किसी राजनेता का अपनी जाति और समाज के उत्थान के लिए काम करना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन अगर वह जातीय या वर्गीय तनाव पैदा करके सत्ता प्राप्त करता और उसके जरिए सिर्फ अपना घर भरता है तो उसका काम उसके और उसकी जाति के लिए आत्मघाती होगा। विभिन्न जातियों के नेता आज अपनी जातीय ताकत का गलत इस्तेमाल करके अपनी जाति, समाज और देश को जो क्षति पहुंचा रहे हैं उसकी भरपाई संभव नहीं लगती है। इसलिए अब जातीय समाज की यह जिम्मेदारी है कि वह अपनी जाति के गुंडों, बदमाशों की जगह योग्य और चरित्रवान व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुने।

उत्तर प्रदेश में अगर हम किसी भी जाति के राजनेता के क्रिया-कलापों का सामाजिक और आर्थिक कसौटी पर विवेचन करें तो बड़ी भयानक तस्वीर सामने आती है। वह अपनी जातीय आबादी के लिए भी रोजी, रोजगार के साधन जुटाने और उनकी गरीबी दूर करने में विफल रहा है। उसके लिए पेयजल, भोजन, वस्त्र, आवास और चिकित्सा के साथ-साथ स्कूल की सुविधा जुटा पाने में भी विफल रहा है। इसके विपरीत जातीय उन्माद भड़का कर उनके वोट से उनके प्रतिनिधि तो बन जाते हैं, पर अपनी जाति के सामूहिक हितों के लिए कोई काम नहीं करते हैं।

अनेक जातियों के नेता जातीय ताकत के बल पर अपनी राजनीति तो चमकाते हैं और मालामाल भी हो जाते हैं, लेकिन अपनी जाति के लिए कुछ नहीं करते। आज राजनीतिक सत्ता को सरकारी धन की लूट का जिस तरह से माध्यम बना दिया गया है उससे किसी जाति या समाज का उद्धार नहीं हो सकता। सभी जातियों के जागरूक लोगों के लिए यह विचार का विषय है। हमारी जातीय विविधता का अर्थ विषमता नहीं है और न कोई विशेषाधिकार। हर विशेष अधिकार प्राप्त संप्रदाय जाति का घातक है। वह जाति नहीं है। जाति को स्वतंत्रता दो, उसकी राह में रुकावटें हटा दो तो देश और प्रदेश का उत्थान होगा। स्वामी विवेकानंद के अनुसार पुरोहित-प्रपंच ही भारत की अधोगति का कारण है।

उत्तर प्रदेश में आज हम विचारधारा के भंवर में फंस गए हैं। उसके चारों ओर बहुत-सी अनुकूल-प्रतिकूल धाराएं बह रही हैं। इस शोरगुल की दशा में साधारण व्यक्ति अच्छाई-बुराई, न्याय-अन्याय के बीच लकीर खींच नहीं पाते। पर अगर आज राष्ट्र या इस प्रदेश की विलुप्त शक्ति लौटा कर उसे दिशा देनी है तो हमारा लक्ष्य क्या हो और किस प्रकार उस लक्ष्य तक पहुंचा जा सके, इस विषय पर स्पष्ट मत स्थिर करना होगा। जिस जातीय और वर्गीय संघर्ष की अंधी गली में हम घुसते जा रहे हैं उससे यह सवाल पैदा हो गया है कि क्या यह प्रदेश नष्ट हो जाएगा या जातीय ताकत का इस्तेमाल करके हम नए समृद्ध समाज, प्रदेश और देश की रचना करेंगे। इस प्रश्न के उत्तर से ही हम अपने प्रदेशवासियों को सलाह दे सकेंगे कि उन्नतशील, शक्तिशाली जाति की उत्पत्ति के लिए हमें कौन-सा मार्ग चुनना है। हमारी जातीय अवनति का भी मूल कारण परिश्रम की अवहेलना और ज्ञान-विज्ञान के विकास का रुक जाना ही है। कुछ स्वयंभू विशेषाधिकार प्राप्त जातियों ने मुफ्तखोरी को अपना पेशा बना लिया है। इससे काम करने वाले व्यक्ति हीन समझे जाने लगे और हमारा पतन हुआ।

हमारे जातीय नेता निजी हितों के लिए अपनी-अपनी जातियों को उज्ज्वल भविष्य के सपने तो दिखाते हैं, लेकिन सत्ता पाने के बाद अपनी जाति को भी भूल जाते हैं। इसलिए इस अंतर को समझना होगा। जातीय आधार पर मठाधीशी की राजनीति सपा, बसपा, भाजपा या कोई भी करे, उससे किसी भी जाति का भला नहीं होने वाला है। पूर्ण साम्यवाद के आधार पर नए समाज का निर्माण करना होगा। जाति भेद के स्थायी ढांचे को बिल्कुल तोड़ देना होगा। आर्थिक विषमता दूर करनी ही होगी और वर्ण, धर्म के भेदभाव को भूल कर सभी को शिक्षा का समान अवसर देना होगा। जाति के रूप में बड़ा होने के लिए और संसार की सभ्य जातियों में गौरवपूर्ण स्थान पाने के लिए यही एक तरीका है। जो जाति उन्नति करना नहीं चाहती, विश्व रंगमंच पर विशिष्टिता प्राप्त करना नहीं चाहती, उसको जीवित रहने का अधिकार नहीं है। इसलिए हर जाति का विकसित होना एक खुशहाल समाज के लिए जरूरी है।

हमारे जातीय नेता अगर अपनी-अपनी जातियों में यह अथक कर्म प्रेरणा जाग्रत कर सकें तो वे उसका कल्याण करेंगे। इस सोई हुई जातीय शक्ति को जगाने और उसका रचनात्मक उपयोग करने पर यह देश पश्चिमी मुल्कों को भी पीछे छोड़ सकता है। हमारे देश में व्यक्ति और जाति के जीवन में प्रेरणा या इनीशिएटिव की कमी है। हम बिना बाध्यता के या बिना सिर पर पड़े कुछ करना ही नहीं चाहते हैं। प्रेरणा या इनीशिएटिव के अभाव में व्यक्ति, जाति और राष्ट्र की शक्ति क्षीण हो जाती है। इसलिए अगर हमारे देश और प्रदेश में जातीय नेता अपनी-अपनी जातियों की इच्छा शक्ति को जाग्रत कर सकें और उसका इस प्रदेश और राष्ट्र के लिए रचनात्मक उपयोग कर सकें तो इस प्रदेश और देश का भविष्य गौरवशाली होगा।

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