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बेबाक बोलः राज और समाज- अमरनाथ से आगे

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले पर ‘कड़ी निंदा’ की जगह तारीफ कर बैठते हैं। वे कश्मीरियत की बात करते हुए कश्मीरी आवाम को सलाम करते हैं।
कश्मीर में बूढ़ा अमरनाथ की यात्रा पर जा रहे लोगों की बस पर ग्रेनेड से हमला हुआ था। (ANI Photo)

किसी भी सरकार के लिए इससे सुविधाजनक स्थिति और क्या हो सकती है कि वह बस कश्मीरियत को सलाम कर अपने धुरविरोधी वाम का सलाम भी ले जाए और अमरनाथ यात्रियों पर आतंकवादी हमले का जिम्मेदार कौन है, इसका जवाब देने से भी बच जाए। यह स्थिति इसलिए है कि आज पहचानों में बंटी जनता ही जनता के सामने है। जुनैद की पहचान के बरक्स जनता का एक वर्ग तो अमरनाथ यात्रियों की पहचान के साथ खड़ा जनता का दूसरा वर्ग। पहचान के नाम पर बांटी गई जनता एक-दूसरे से लड़ रही है और भीड़ द्वारा हत्या से लेकर अमरनाथ आतंकी हमले जैसे मामलों तक सरकार बेफिक्र होकर चुप खड़ी है। राज और समाज के इस नए पाठ पर बेबाक बोल।

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले पर ‘कड़ी निंदा’ की जगह तारीफ कर बैठते हैं। वे कश्मीरियत की बात करते हुए कश्मीरी आवाम को सलाम करते हैं। और, इसके साथ ही माहौल बदल जाता है। अब तक मोदी सरकार के ‘भक्त’ स्तर के समर्थक सोशल मीडिया पर उन्हें अपशब्द कहने लगते हैं। सरकार के भक्त और हिंदूवादी रक्षकों की भीड़ सोशल मीडिया पर उनकी ऐसी नोच-खसोट करती है जो अभी तक उदारवादी तबके की करती आ रही है। और, धुरविरोधी वाम उदारवादी इस नए अंदाज पर उनके कसीदे पढ़ रहे थे।
जब राजनाथ ने ‘राजधर्म’ की तरह की बात बोली तो वे अपने ही प्रशंसकों के बीच अस्वीकार्य साबित किए जाने लगे। यह उस विभाजनकारी राजनीति का असर है कि आज भाजपा और उससे जुड़े अन्य संगठनों के समर्थक इस स्तर पर आ गए कि वाजपेयी की कश्मीरियत भी उन्हें गवारा नहीं। यह असर है उस भीड़तंत्र का, जो आपने तीन साल में पैदा की है। सरकार की प्रचार शाखाएं यही बताती हैं कि अमेरिका से लेकर अमेठी तक भीड़ ने किस तरह मोदी-मोदी के नारे लगाए। यह बताते वक्त वे भूल जाते हैं कि किसी खास कारणों से निकल रही यह आवाज जनता नहीं, भीड़ की है। और भीड़ सिर्फ नारे लगाती है, तर्क नहीं सुनती है। तो आज आपके द्वारा खड़ी की गई भीड़ आपके तर्क भी नहीं सुनेगी।

इसके साथ ही आम तौर पर ‘सांप्रदायिक’ और ‘अभिव्यक्ति’ के मुद्दों पर बोलने वाले उदारवादी धड़े ने इस आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की और वह इसके खिलाफ सड़कों पर उतरा। पिछले कुछ समय से इस धड़े पर आरोप लग रहे थे कि ये सिर्फ अल्पसंख्यकों या आतंकवाद के आरोपियों के ही मानवाधिकार पर बोलते हैं। इन पर भी मुद्दों को चुनिंदा तरीके से लेने का आरोप था। और, इस बार इस धड़े ने अपनी चुनिंदा पहचान के खांचे से बाहर निकलने की कोशिश की है तो वह भी आज के समाज का नया पाठ है।

राजनाथ सिंह का कहना कि हर कश्मीरी आतंकवादी नहीं होता और दूसरी तरफ उदारवादियों का आतंकवादी घटना के विरोध में मोमबत्ती जुलूस निकालना – इन दो नए पाठ के साथ जरा हरियाणा के हिसार की तस्वीर भी देख लें। हरियाणा में अमरनाथ आतंकी हमले के खिलाफ हिंदूवादी गुटों ने कई प्रदर्शन किए। और, आरोप है कि इस प्रदर्शन के दौरान एक मुसलिम की पिटाई कर दी गई क्योंकि वह वंदेमातरम और भारत माता की जय के नारे नहीं लगा रहा था। तो अमरनाथ पर आतंकी हमले का बदला हिसार के एक मुसलिम से लिए जाने की कोशिश हुई। आखिर क्यों?

राजनाथ सिंह के ‘राजधर्म’ वाले बयान को हम भी सलाम करते हैं। हम आज भी वाजपेयी के ‘राजधर्म’ की बात करते हैं। लेकिन अब जरा राजधर्म के साथ राजकाज की बात भी उठाई जाए। अमरनाथ का गुस्सा हिसार के एक मुसलिम पर फट पड़ता है। वह इसलिए कि आपने अपनी राजनीति से जनता का विभाजन कर दिया है। एक खास पहचान के लोगों पर किसी तरह की आंच आती है तो वे इसका ठीकरा दूसरी पहचान के लोगों पर फोड़ने लगते हैं। और ऐसा करते वक्त ये जनता से हटकर एक खास पहचान बन गए हैं। जनता दूसरी पहचान की जनता के बरक्स खड़ी हो जाती है।

दक्षिणपंथी धड़ा हो या वामपंथी – दोनों इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रया दे रहे हैं। लेकिन दोनों की प्रतिक्रिया से राजधर्म, राजकाज और सरकार गायब है। जरा याद करें, मुंबई पर आतंकवादी हमले का वह समय। ऐसे दुखद समय में मीडिया के सामने अलग-अलग कपड़ों में आने वाले तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटील पर जनता का गुस्सा कैसा उतरा था। इस मुद्दे पर जनता का गुस्सा ऐसा फूटा कि यूपीए सरकार को अपना गृहमंत्री बदलना पड़ा। देश की सरहदों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार पर थी और सरकार के गृहमंत्री ही संवेदनशील नहीं दिखे तो जनता ने सवाल पूछा और सरकार ने गृहमंत्री बदला। पाटील ने सुरक्षा की जिम्मेदारी में चूक होने की बात कह अपना इस्तीफा सौंप दिया।

उड़ी हो या पठानकोट या फिर अमरनाथ यात्रियों पर आतंकवादी हमला। सेना और सरहद का सरगम गाने वाली इस सरकार ने सुरक्षा एजंसियों की चूक पर किसी तरह की कार्रवाई की हो – यह हमारे सामने नहीं हैं। पठानकोट में तो आरोप लगे कि आपने पाकिस्तानी खुफिया एजंसी से जुड़े लोगों को अपने संवेदनशील इलाके में आकर जांच करने की इजाजत दे दी। लेकिन जनता ने सवाल नहीं पूछा कि ऐसा क्यों हुआ। अमरनाथ यात्रा को लेकर सुरक्षा एजंसियों की सख्त चेतावनी आ चुकी थी, लेकिन यह हमला हो गया। और ऐसा दावा करने की खबरें भी आर्इं कि आतंकवादियों का निशाना पुलिस का कैंप था। बस के पंजीकृत न होने की दलीलों को परे रखें तो सुरक्षा एजंसियों की इतनी बड़ी नाकामयाबी पर पुरजोर सवाल उठना चाहिए।
इन दिनों शिवसेना नेता का वह दहाड़ वाला संवाद ज्यादा गूंज रहा है कि अगर अमरनाथ यात्रा में रुकावट आई तो मुंबई से सबसे ज्यादा हज यात्री जाते हैं। लोग पोस्टर लेकर निकले कि अमरनाथ यात्रा सुरक्षित नहीं तो हजयात्रा भी महफूज नहीं रहने देंगे। सुरक्षा की खामियों पर बात करने के बजाए आभासी से लेकर जमीनी दुनिया में तीर्थयात्री बनाम हजयात्री को मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है?

एक बात तो स्पष्ट हो रही है कि कश्मीर का राग अलाप कर हिंदुस्तान की केंद्रीय सत्ता में आई राजग सरकार की रुचि कश्मीर समस्या का समाधान करने में दिख ही नहीं रही है। बस कश्मीर मांगा तो सीना चीर देंगे वाली भावना से देश की जनता को आपस में बांट दिया गया है। कश्मीर में संवाद की दिशा में प्रक्रिया शुरू हुई थी। तीन-चार प्रतिनिधिमंडल भी भेजे गए। लेकिन इन सबको विमर्श में आने ही नहीं दिया जा रहा है। अब तो साफ दिख रहा है कि राजग सरकार की नीतियों ने कश्मीर की हालत अब और ज्यादा खराब कर दी है। इसके बाद अब वह इस जलते कश्मीर पर बात ही नहीं करना चाहती है। ऐसा लग रहा है कि अशांत कश्मीर के सहारे ही वह अपनी सारी नाकामियां छुपा लेना चाहती है।
आपने कांग्रेस के खिलाफ वोट मांगे सेना, सरहद और कश्मीर के नाम पर। आप अचानक से देश की 86 फीसद मुद्रा का विमुद्रीकरण कर देते हैं सेना और कश्मीर के नाम पर। उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार की नाकामी पर बोलने के बजाए आप कश्मीर का राग आलापने लगते हैं। लेकिन आप कश्मीर और सरहद की सुरक्षा के लिए देश को एक पूर्णकालिक रक्षा मंत्री नहीं दे रहे हैं। वहीं, नफरत की आग में झुलस रही जनता सरकार से यह सवाल नहीं करती है कि सरहद की सुरक्षा छोड़ कर मनोहर पर्रीकर को गोवा क्यों भेज दिया गया।

लेकिन पहचानों में बांट दी गई जनता सरकार से पूछने के बदले एक-दूसरे पर हमला करती है कि तुम इस पर बोले, उस पर क्यों नहीं बोले। जुनैद पर बोलते हो, कश्मीरी पंडितों पर चुप क्यों हो? कश्मीर में मानव ढाल बनाए गए कश्मीरी पर तो खूब बोले लेकिन मरते हुए सैनिकों पर क्यों नहीं बोलते?
तो अमरनाथ की घटना से आगे का सवाल यह है कि जनता सरकार से सवाल क्यों नहीं पूछना चाहती और सरकार कश्मीर की आग को क्यों नहीं बुझने देना चाहती? आदर्श लोकतंत्र में सरकार बनाम जनता रहती है और सरकार को जनता के सवालों के प्रति जिम्मेदार होना पड़ता है। लेकिन यहां सरकार बेपरवाह है और जनता बनाम जनता का संघर्ष शुरू हो गया है। सरकार परेशान होती है तो उसके दुश्मन के रूप में भी जनता खड़ी कर दी जाती है और जनता की परेशानी के सामने भी जनता ही खड़ी कर दी जा रही है। तो सरकार के लिए ऐसी सुविधाजनक स्थिति है कि वे बस कश्मीरियत को सलाम कर वाम का सलाम भी ले गए और इस आतंकी हमले का जिम्मेदार कौन, इसका जवाब देने से भी बच गए। यह बचना शब्द भी गलत है, क्योंकि उनसे सवाल भी तो कोई नहीं कर रहा है। देखते हैं कि कश्मीरियत और अमरनाथ से आगे बात होगी भी की नहीं।

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