ताज़ा खबर
 

राजनीतिः छोटी नदियों को भी बचाना होगा

होना तो यह चाहिए था कि इन सभी छोटी नदियों के अस्तित्व की शुचिता का सम्मान किया जाता लेकिन नदियों के पेटे में बना दी गई बस्तियों ने नदियों का जीना दूभर कर दिया।
Author September 2, 2017 02:52 am
मुंबईकरों का जैसा हाल कर दिया, वह बताता है कि देश का सबसे जीवंत शहर होने के बावजूद मुंबई देश का सबसे व्यवस्थित और सबसे नियोजित शहर नहीं हो पाया है।

अतुल कनक

राष्ट्रीय पर्यावरण संस्थान, नागपुर की एक रिपोर्ट के अनुसार गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी सहित जिन चौदह प्रमुख नदियों में देश का पचासी प्रतिशत पानी बहता है उनमें प्रदूषण की मात्रा इतनी है कि वे देश की छासठ प्रतिशत बीमारियों का कारण हैं। इन बीमारियों के इलाज पर हर सालअरबों रुपए खर्च होते हैं।

मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है। वह देश के सर्वाधिक सुविधा संपन्न शहरों में एक है। स्वाभाविक रूप से उसे देश के सबसे नियोजित शहरों में भी होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से अगस्त के अंतिम दिनों में सामान्य से कुछ अधिक हुई वर्षा ने मुंबईकरों का जैसा हाल कर दिया, वह बताता है कि देश का सबसे जीवंत शहर होने के बावजूद मुंबई देश का सबसे व्यवस्थित और सबसे नियोजित शहर नहीं हो पाया है। पुरानी कहावत है कि आग, पानी, राजा और सांप अपना स्वभाव कभी नहीं बदलते। मुंबई शहर की बसावट कभी ज्वालामुखी से बने सात द्वीपों के अवगुंठन से हुई है। इन्हीं द्वीपों के मध्य कुछ छोटी प्राकृतिक नदियों और झीलों का निर्माण भी हुआ। रिहायशी बस्तियों के लिए बढ़ती जमीन की जरूरत और सतत अनदेखी ने मुंबई की उल्हास, दहिसर, पोइसर, ओशीवाड़ा जैसी नदियों को हाशिये पर धकेल दिया।

होना तो यह चाहिए था कि इन सभी छोटी नदियों के अस्तित्व की शुचिता का सम्मान किया जाता लेकिन नदियों के पेटे में बना दी गई बस्तियों ने नदियों का जीना दूभर कर दिया। कुल मिलाकर नदियों की उपेक्षा के खिलाफ जैसे पानी का पूरा कुनबा अव्यवस्थाओं को सबक सिखाने पर आमादा हो गया। नदियों के साथ सौतेला बर्ताव केवल मुंबई की कहानी नहीं है। सारे देश में छोटी-बड़ी नदियां या तो उपेक्षा के चलते नालों में तब्दील हो गई हैं या प्रदूषण का शिकार हो रही हैं। राजस्थान के जयपुर शहर की द्रव्यवती नदी अब अमानीशाह नाले में बदल गई है। अपने कोचिंग संस्थानों के लिए मशहूर राजस्थान के ही कोटा नगर की मंदाकिनी नदी अब केवल एक कारखाने के अपशिष्ट पदार्थों को लेकर बहने वाला नाला है।राष्ट्रीय पर्यावरण संस्थान, नागपुर की एक रिपोर्ट के अनुसार गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी सहित जिन चौदह प्रमुख नदियों में देश का पचासी प्रतिशत पानी बहता है उनमें प्रदूषण की मात्रा इतनी है कि वे देश की छासठ प्रतिशत बीमारियों का कारण हैं। इन बीमारियों के इलाज पर हर साल
अरबों रुपए खर्च होते हैं।

मध्यप्रदेश में छोटी बड़ी तीन सौ नदियां सूख चुकी हैं। चंबल, बेतवा, क्षिप्रा, जामनी, धसान प्रदूषण से जूझ रही हैं तो ओमती, खंदारी, परियर, हिरण नदी लुप्त होने की कगार पर हैं। झारखंड के पाकुड़ जिले की बांसलोई नदी में पानी ही नहीं है क्योंकि खनन माफियाओं ने नदी में से बालू रेत का अंधाधुंध दोहन कर उसका गला घोंट दिया है। इससे महेशपुर, चंदालमारा, लखिपुर, रामपुर सहित दर्जनों शहरों और उनके आसपास के किसान प्रभावित हो रहे हैं। मेघालय में लुनार नदी के उद्गम स्थल नुतुंगा पर ही कोयले की खदानें हैं। फिर सीमेंट के कारखानों और सल्फेट ने इस नदी के पानी की हालत यह कर दी है कि इसे पीने वाले लोगों में से एक बड़ा हिस्सा पेट के कैंसर से पीड़ित हो गया है। यही नदी मेघालय की प्रमुख नदियों में एक लुका की प्रमुख सहायक नदी के रूप में मिलती है। लुका के जल की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं रह गई है। लुका और लुनार ही क्या मिंतदु, आसरवेरवी, कुपली जैसी नदियां भी प्रदूषण की मार झेल रही हैं जबकि गनोल, उमियाम, मिनगौत, मिखेम, दोरंग, मावपा, खरी, कालू, रिंग्गी, दारिंग, सांदा, सिमसांग, इंदादु, दिगारू, उमखरी, किनचियांग जैसी छोटी नदियां तो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती प्रतीत होती हैं।

जब पहाड़ी क्षेत्र की नदियों का यह हाल है तो मैदानी इलाकों में नदियों की दुर्दशा का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। गुजरात की अमलाखेड़ी और खारी, हरियाणा की मारकंड, मध्यप्रदेश की खान, उत्तर प्रदेश की काली, हिंडन और केन, आंध्रप्रदेश की मुंसी, महाराष्ट्र की भीमा जैसी नदियां अपनी उपेक्षा की कहानी कह रही हैं। बनारस की जिन दो नदियों के नाम पर वाराणसी नाम पड़ा- वे नदियां वरुणा और असी, अंबेडकर नगर में तमसा, लखनऊ में कोशी और गोमती, कानपुर में पांडु, गाजियाबाद में हिंडन, जौनपुर में गोमती और पीली, गाजीपुर में मगई सहित गडई, तमसा, चंद्रप्रभा, विषही, सोन नदियां अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाती दिखती हैं। बिहार के मिथिला क्षेत्र को नदियों का मायका कहा जाता है। वहां की कमला नदी को लोग गंगा का दर्जा देते थे। उन दिनों यह नदी सत्ताईस उपधाराओं में बहकर इलाके को सरसब्ज करती थी लेकिन आज यह सूख कर एक नाले में बदल गई है। जीवछ, बागमती, गोरा, धनहा जैसी नदियां या तो काल के गाल में समा गई हैं या अंतिम सांसें गिन रही हैं। हरदा, कोसी, गंडगौला, मसौहा, वरुणा, ढौंक, डेकन, डागरा, रमजान, सुवर्णरेखा, रामगंगा, गौला, सरसिया,पुनपुन, बूढ़ी गंडक और कमला नदी भी दुर्दशा पर आंसू बहा रही हैं। गंगा की सहायक नदियां कर्मनाशा, नीलांजना, पंचानन, किउल, मोरहर, कोयल का अस्तित्व भी खतरे में है। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में तो लोग मड़हा नदी में लोग खेती करने लगे हैं। रामचरित मानस में वर्णित तमसा नदी और मिर्जापुर की खजूरी नदी भी अपनी अंतिम सांसें ले रही हैं। गंगा जैसी नदी तक मई 2016 में प्रयाग में इतनी सूख जाती है कि लोग उसके तलस्थल (रिवरबेड) पर चलने लगते हैं।

छोड़िए छोटी नदियों की बात, बड़ी नदियां ही कौन से सुख में हैं? राष्ट्रीय पर्यावरण संस्थान, नागपुर की एक रिपोर्ट के अनुसार गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी सहित जिन चौदह प्रमुख नदियों में देश का पचासी प्रतिशत पानी बहता है उनमें प्रदूषण की मात्रा इतनी है कि वे देश की छासठ प्रतिशत बीमारियों का कारण हैं। इन बीमारियों के इलाज पर हर साल अरबों रुपए खर्च होते हैं। एक और रिपोर्ट बताती है कि गंगा विश्व की सबसे संकटग्रस्त नदियों में एक है। नदियों की दुर्दशा की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो जीना लगातार मुश्किल होता जाएगा। अभी तो नदियां उफन रही हैं लेकिन नदियां लुप्त होने लगीं तो जीवन कितना मुश्किल हो जाएगा? नदियां अपनी दुर्दशा के कारण लुप्त हो सकती हैं। सरस्वती का उदाहरण हमारे सामने है। क्या अन्य नदियां भी सरस्वती का अनुसरण करने पर विवश होंगी?

भारत का कुल क्षेत्रफल 30.85 लाख वर्ग कलोमीटर है और सभी नदियों का सम्मिलित जल ग्रहण क्षेत्र 30.50 लाख वर्ग किलोमीटर। इस लिहाज से भारत में पानी की प्रचुर उपलब्धता है। भारतीय नदियों में हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है जो दुनिया का 4.4 प्रतिशत है लेकिन नदियों में बहने वाले संपूर्ण पानी का 85 प्रतिशत हिस्सा बारिश के मौसम में ही समुद्र में जा बहता है। उधर नागरिकों के उपेक्षा भाव ने नदियों में प्रदूषण बढ़ा दिया और नदियों के प्रदूषण ने नागरिकों के लिए अनेक मुसीबतें खड़ी कर दीं। नदियों की गंदगी का तीन चौथाई हिस्सा घरेलू गंदगी के कारण है। दुनिया में स्वच्छ जलापूर्ति लगभग 45 हजार लीटर प्रतिव्यक्ति है। उपलब्ध जल की यह मात्रा कम नहीं है लेकिन इसका वितरण असमान है और दुनिया में आज भी करीब सौ करोड़ लोगों को पीने के लिए शुद्धजल उपलब्ध नहीं है।

भले ही बोतल बंद पानी का व्यापार अरबों रुपयों का हो चुका हो लेकिन 2025 तक दुनिया की आधी आबादी जलसंकट झेलती दिखेगी। हालात कितने भयावह हो सकते हैं इसका अनुमान पश्चिमी राजस्थान के कुछ स्थानों की महिलाओं की जीवनचर्या को देख कर लगाया जा सकता है, जहां आज भी महिलाओं को अपने परिवार की जरूरत भर पानी जुटाने के लिए चार-चार घंटे चलकर किसी जलस्रोत तक पहुंचना होता है। फिर भी पश्चिमी राजस्थान ने जिस तरह परंपरागत जलस्रोतों के माध्यम से बारिश के पानी को बचाने का एक पूरा सिस्टम तैयार किया है, वह किसी भी समाज के लिए उदाहरण का काम कर सकता है।
छोटी नदियों को नहीं बचाया गया तो न केवल वर्षा जल संग्रहण का काम मुश्किल हो जाएगा बल्कि वर्षा जल शहरों की मुसीबतें भी बढ़ाता रहेगा। और इन नदियों को बचाना बहुत मुश्किल नहीं है। थोड़ी इच्छाशक्ति जगाई जाए तो नदियों का उद्धार वैसे ही किया जा सकता है जैसे पंजाब के संत हरचरणसिंह लोगोंवाल ने कालीबेई नदी का किया था। गुरुनानक देव के जीवन से संबद्ध रही यह नदी एक नाले में तब्दील हो चुकी थी। संत हरचरण सिंह लोंगोवाल ने इसकी सफाई का बीड़ा उठाया और उनकी लगन देखकर उन्हें सहयोगी मिलते गए। आखिरकार नदी के वैभव भरे दिन लौट आएं। आओ, दुआ करें कि सब नदियों के सुख के दिन लौटें।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग