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राजनीतिः खाइयां नहीं पुल बनाएं

कई बार यह सवाल उठता है कि बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा भी शामिल की जाए। पर नैतिक शिक्षा का मतलब किसी धर्म या समुदाय विशेष की कुछ परंपरागत बातें और रूढ़ियां सिखाना नहीं हो सकता। सही मायने में नैतिक शिक्षा तो वही कही जाएगी जिसमें समूचे समाज और सारी मानवता के प्रति बच्चों में संवेदनशीलता विकसित हो।
Author January 24, 2017 02:40 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

तनवीर जाफरी

भारत दुनिया का एक ऐसा देश है जहां धर्म और अध्यात्म पर सबसे अधिक चर्चा की जाती है। जितने अधिक धर्मगुरु, उपदेशक, धर्म प्रचारक, धर्म-स्थान आदि हमारे देश में पाए जाते हैं, विश्व में कहीं भी नहीं पाए जाते। मजे की बात तो यह है कि इन धर्मोपदेशकों व प्रवचनकर्ताओं में सभी एक ही धर्म या समुदाय के सदस्य नहीं हैं बल्कि भारत में जिस प्रकार विभिन्न धर्मों व जातियों के लोग होने के बावजूद यहां अनेकता में एकता के दर्शन होते हैं उसी प्रकार लगभग प्रत्येक धर्म व जाति के धर्मगुरु, उपदेशक अथवा प्रवचनकर्ता भी अलग-अलग समुदायों से संबंध रखते हैं और अपने-अपने अनुयायियों के मध्य होने वाले समागमों में अपने-अपने ईष्ट अथवा आराध्य की चर्चा तथा उनका महिमामंडन करते हैं। यह स्वाभाविक भी है। निश्चित रूप से ऐसा करने से प्रत्येक वर्ग के अनुयायियों के दिलों में उनके अपने ईष्ट या आराध्य के प्रति प्रेम व आस्था और प्रगाढ़ होती है।

लेकिन इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू यह भी है कि अलग-अलग वर्गों या समुदायों के इस प्रकार के होने वाले समागम अपने-अपने वर्ग विशेष के लोगों के प्रति आस्था तथा विश्वास के साथ-साथ रूढ़िवादिता का भी संचार करते हैं। ऐसे समागम दूसरे समुदाय के ईष्ट अथवा आराध्य देवी-देवताओं या महापुरुषों की चर्चा या उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना अपने-अपने समागम में मुनासिब नहीं समझते। संभवत: यही वजह है कि आम आदमी जहां अपने-अपने ईष्ट देवताओं अथवा महापुरुषों के अनेक कार्यकलापों तथा उनकी-गाथा से परिचित रहता है वहीं दूसरे वर्ग के महापुरुषों के विषय में वह कुछ भी नहीं जानता। जाहिर है, जब वह किसी दूसरे महापुरुष के बारे में जानता ही नहीं, तो फिर वह उनके प्रति श्रद्धा-भाव भी कैसे रख सकता है?

यही वह बुनियादी वजह है जो हमारे समाज में विभिन्न समुदायों, विभिन्न धर्मावलंबियों तथा विभिन्न जातियों के बीच नफरत पैदा कर रही है। और बावजूद इसके कि पूरा देश व्यापारिक व सामाजिक ताने-बाने के तहत एक-दूसरे से शत-प्रतिशत जुड़ा हुआ है, जब इसी समाज का कोई सदस्य अपनी अंतिम यात्रा पर जाता है तो उस समय आमतौर पर शमशान घाट में केवल हिंदू नजर आते हैं और कब्रिस्तान में केवल मुसलमानों का मजमा दिखाई देता है। आखिर ऐसा क्यों?
यहां बात सिर्फ हिंदू व मुसलमान के मध्य फासले की नहीं है। हिंदू समुदाय में कई प्रवचनकर्ता, उपदेशक अथवा धर्मगुरु ऐसे हैं जो भगवान राम की कथा में पारंगत हैं। जाहिर है, स्वयं को रामभक्त मानने वाला समाज ऐसे प्रवचनकर्ताओं के समागम में बढ़-चढ़ कर भाग लेता है। इसी प्रकार भगवान कृष्ण का गुणगान करने वाले कुछ विशेष उपदेशक हैं। भगवान कृष्ण के भक्त इन्हीं के प्रवचन सुनना पसंद करते हैं। हद तो यह है कि कई राम मंदिरों में रामायण व रामचरित मानस तो मिलेगी, पर गीता नहीं। इसी तरह भगवान कृष्ण से संबंधित स्थानों में गीता उपलब्ध हो जाएगी, पर रामायण या रामचरितमानस नहीं। इसी तरह संत रविदास, वाल्मीकि जैसे अनेक महापुरुष ऐसे थे जिनकी चर्चा करने वाले अलग-अलग उपदेशक हंै और वे अपने अलग-अलग धर्मग्रंथों के हवाले से अपने-अपने आराध्य का स्तुतिगान किया करते हैं।

समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने धर्म व समुदाय से जुड़े महापुरुषों के बारे में जाने, उनके बताए हुए मार्ग पर चले, यह बेशक बहुत अच्छी बात है। पर इसी के साथ-साथ यदि उसी व्यक्ति को दूसरे धर्मों व समुदायों की आस्था के प्रतीक महापुरुषों के जीवनचरित की भी जानकारी हो तो, निश्चित रूप से दूसरे धर्मों या समुदायों के महापुरुषों के प्रति भी उसमे रुचि पैदा होगी। वह उन्हें श्रद्धा व सम्मान की नजरों से देखेगा तथा आगे चल कर यही स्थिति उनके अनुयायियों के साथ सद्भाव का वातावरण बनाने में सहायक होगी। इसलिए धर्म व जाति के आधार पर समाज में फैलते जा रहे तनावपूर्ण वातावरण के बीच आज जरूरत इस बात की है कि देश में जगह-जगह ऐसे समागमों का आयोजन किया जाए जिनमें सभी धर्मों व जातियों के प्रतिनिधि एक ही मंच पर बैठ कर समाज के सभी वर्गों को समान रूप संबोधित करें। एक ही समागम में विभिन्न धर्मों के महापुरुषों तथा देवी-देवताओं की चर्चा की जाए ताकि वहां शिरकत करने वाले सभी लोगों के अलग-अलग वर्गों के महापुरुषों के विषय में जानकारी हासिल हो सके और यह भी पता चल सके कि कौन-सा धर्म अथवा वर्ग समाज को सदाचार तथा समाज कल्याण के कौन-कौन से मार्ग दिखाता है।

कई बार यह सवाल उठता है कि बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा भी शामिल की जाए। पर नैतिक शिक्षा का मतलब किसी धर्म या समुदाय विशेष की कुछ परंपरागत बातें और रूढ़ियां सिखाना नहीं हो सकता। सही मायने में नैतिक शिक्षा तो वही कही जाएगी जिसमें समूचे समाज और सारी मानवता के प्रति बच्चों में संवेदनशीलता विकसित हो। मिसाल के तौर पर, हमारे देश के प्रख्यात प्रवचनकर्ता मुरारी बापू हिंदू धर्म से संबंध रखने वाले एक ऐसे धर्मोपदेशक हैं जिनसे दूसरे धर्मों के लोग खासतौर पर मुसलिम भी काफी लगाव महसूस करते हैं। अरब देशों में भी कई अरब शासक मुरारी बापू के समागम में न केवल शरीक हुए, बल्कि उन्हें पूरी श्रद्धा के साथ ‘जय सियाराम’ का संबोधन करते भी देखा गया। भारत में भी उनके कई समागमों में डॉ कल्बे सादिक जैसे जाने-माने मुसलिम विद्वानों की शिरकत देखी गई। उसी मंच से डॉ कल्बे सादिक व मुरारी बापू का एक साथ संबोधन सुना गया। जहां मुरारी बापू ‘दमादम मस्त कलंदर अली का पहला नंबर’ जैसी इस्लाम से जुड़ी कव्वाली पर झूमते व हजरत मोहम्मद की शान में बातें करते देखे जा सकते हैं वहीं डॉ कल्बे सादिक बड़े गर्व के साथ यह बताते हैं कि वे गीता का अध्ययन करते हैं और ऐसा करने से हिंदू धर्म के प्रति उनका लगाव व आकर्षण बढ़ा है। कभी देश के एक और प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरुश्रीश्री रविशंकर करबला में हजरत इमाम हुसैन के रौजे पर जाकर अपना शीश झुकाते दिखाई देते हैं तो कभी उदारवादी स्वामिनारायण समुदाय को दिल्ली के विशाल अक्षरधाम मंदिर का उद्घाटन डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के कर-कमलों से कराने में संकोच नहीं हुआ था।

वास्तव में यह हमारे समाज में कोई नई या अटपटी लगने वाली बात नहीं है। हमारी प्राचीन संस्कृति ही हमें यह सीख देती आ रही है कि भारतीय एक-दूसरे के धर्मों व समुदायों का तथा एक-दूसरे के देवी-देवताओं का आदर व सम्मान करें। रहीम, जायसी, रसखान जैसे महाकवि हमारी साझी संस्कृति के स्तंभ हैं। बावजूद इसके कि हमारे देश में समाज को बांटने वाली तथा धर्म व संप्रदाय के आधार पर नफरत फैलाने वाली शक्तियां अपने सत्ता-स्वार्थ के लिए काफी सक्रिय हैं, आज भी हमारे देश में नकोदर (पंजाब) व रामदरबार (चंडीगढ़) जैसी जगहों पर अनेक ऐसे सर्वधर्म समागम आयोजित होते हैं जहां एक ही जगह पर सभी धर्मों के लोग इकट्ठा होकर अपने-अपने धर्म व धर्मग्रंथ में उल्लिखित अच्छी बातों का जिक्र करते हैं तथा ज्ञान का आदान-प्रदान करते हैं।
विभाजक प्रवृत्ति रखने वाली शक्तियों की हमेशा यही कोशिश होती है कि समाज को धर्म व जाति के नाम पर बांट कर रखा जाए ताकि अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति का अनुसरण किया जा सके। पर देश की एकता तथा मानवता का यही तकाजा है कि देश में बड़े पैमाने पर ऐसे धार्मिक व सामुदायिक समागम हों जिनमें विभिन्न धर्मों के लोग बिना किसी भेदभाव के शिरकत करें ताकि समाज में एकता, सद्भाव व भाईचारा मजबूत हो।

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