April 29, 2017

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राजनीतिः इस्लामिक बैंक की इजाजत क्यों

चूंकि इस्लामिक बैंक में जमा पर आम बैंकों की तरह सूद नहीं मिलता है, मुनाफा और घाटा दोनों साझा करने की बात होती है, लिहाजा इसका असर यही होगा कि मुसलिम आबादी का जो हिस्सा अन्य बैंकों के बजाय इनमें निवेश करेगा, उसे अपनी मेहनत की कमाई में वाजिब बढ़ोतरी का लाभ नहीं मिल पाएगा। फिर, ऐसी योजना धर्मनिरपेक्षता से विचलन ही होगी।

Author November 26, 2016 02:26 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

सूचना अधिकार कानून के तहत मांगी गई जानकारी के अनुसार रिजर्व बैंक ने इस्लामिक बैंकिंग के प्रस्ताव पर हामी भर दी है। उसका प्रस्ताव है कि परंपरागत बैंकों में रफ्ता-रफ्ता इस्लामी बैंक सुविधा प्रदान की जाए। इसके पीछे उसका मुख्य तर्क यही दिखता है कि जो लोग या तबके धार्मिक कारणों से परंपरागत बैकिंग से दूर हैं उन्हें समाविष्ट करने के लिए ऐसे कदम की जरूरत है। अलबत्ता इस्लामी वित्तीय कारोबार की जटिलताओं के बारे में अनुभव न होने के चलते वह इस दिशा में धीरे-धीरे कदम उठाने का हिमायती है। गौरतलब है कि रिजर्व बैंक द्वारा इस मामले में दी गई हरी झंडी दरअसल केंद्र सरकार के अंतर-विभागीय समूह की सिफारिश पर आधारित है, जिसने इस मामले में कानूनी, तकनीकी तथा नियामकीय मुद््दों की जांच-परख की है।

निश्चित ही यह पहली दफा नहीं है जब इस बात का खुलासा हुआ है। दरअसल दिसंबर 2015 में ही रिजर्व बैंक की एक समिति- ‘कमेटी आॅन मीडियम टर्म पाथ फॉर फाइनेंशियल इन्क्लुजन’ (जिसकी अगुआई दीपक मोहंती कर रहे थे)- ने बैंकों में ‘सूद -रहित खिड़कियां’ खोलने को लेकर अपनी सिफारिश दी थी और रिजर्व बैंक ने इसके लिए अनुमति प्रदान की थी। समिति का कहना था कि वित्तीय संकट के बाद वैश्विक स्तर पर सूद-रहित बैंकिंग, जिसे इस्लामिक बैंंिकंग के नाम से भी जाना जाता है, उसमें काफी बढ़ोतरी हुई है। इस्लामिक वित्तीय परिसंपत्तियों में एक दशक में दस गुना बढ़ोतरी हुई है और आज वह दो खरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंची है। उसने ‘सूदरहित बैंकिंग और वित्त की केंद्रीय अवधारणा और न्याय के तौर पर वित्त’ को स्पष्ट किया था, जिसे मुख्यत: ‘जोखिम को साझा करके’ हासिल किया जाता है। इसके अंतर्गत अलग-अलग भागीदार (स्टेकहोल्डर्स) नफा-नुकसान को साझा करते हैं और सूद लेने पर पाबंदी होती है।

याद कर सकते हैं कि भारत में सूद-रहित बैंकिंग को लेकर हमेशा एक संयत प्रतिक्रिया देखने को मिलती रही है। यूपीए सरकार के दिनों में रिजर्व बैंक ने इस मसले पर कदम बढ़ाने से इनकार किया था। वर्ष 2007 में, तत्कालीन कार्यकारी निदेशक आनंद सिन्हा की अगुआई में बने रिजर्व बैंक के वर्किंग ग्रुप ने सिफारिश की थी कि भारत को चाहिए कि वह देश में इस्लामिक बैंकिंग की इजाजत न दे। उसने इस बात पर जोर दिया था कि मौजूदा नियम इस मॉडल की इजाजत नहीं देते हैं। वे कौन-से प्रावधान हैं जो इस्लामिक बैंकिंग की स्थापना में बाधक बनते रहे हैं? बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 में यह प्रावधान है कि बैंक का कामकाज नफा-नुकसान के आधार पर संचालित नहीं किया जा सकता; वह ‘मुराबाहा’ अर्थात सामानों की खरीद, बिक्री या उनके विनिमय पर भी पाबंदी लगाता है; ‘इजारा’ पर भी रोक लगाता है या अचल संपत्ति को सात साल तक अपने यहां रखने को भी प्रतिबंधित करता है; और सूद देने को अनिवार्य बनाता है।

इस्लामिक बैंकिंग की शुरुआत करने के विचार को नई गति तब मिली जब राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने, अपने तत्कालीन अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्ला की अगुआई में वित्त मंत्रालय को इस मसले पर पुनर्विचार करने को कहा। यह अलग बात है कि रिजर्व बैंक ने, जब वहां गवर्नर के पद पर डी सुब्बाराव थे, फिर एक बार इस प्रस्ताव से इनकार किया और बताया कि भारत में बैंकिंग के नियम सूद-रहित बैंकिंग की इजाजत नहीं देते हैं। यूपीए सरकार के अंतिम दिनों में स्थिति थोड़ी बदलने लगी और रिजर्व बैंक ने केरल की एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी को अपने कामकाज को शरीआ अनुकूल ढांचे में करने की इजाजत दी।
लेकिन केरल उच्च न्यायालय में एक याचिका के जरिए इस वित्तीय कंपनी के कामकाज को चुनौती दी गई। याचिका में कहा गया था कि ‘सरकारी सहभागिता से बनी एक वित्तीय सेवा कंपनी अगर किसी विशिष्ट धर्म के ग्रंथों का अनुसरण कर रही है तो इसका मतलब यही है कि सरकार विशिष्ट धर्म के प्रति पक्षपाती है।’ इसके जवाब में तर्क दिया गया कि ऐसी संस्था की स्थापना ‘केरल के औद्योगिक विकास से जुड़ी हुई है।’ इसमें इस बात की भी चर्चा थी कि इसका मकसद खाड़ी देशों में पड़े उस पैसे को इस्तेमाल में लाना है जिसे किसी शरीआ अनुकूल बैंक में ही निवेश किया जा सकता है। हालांकि शुरू में उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमति जताते हुए सरकार के कदम पर स्थगन आदेश दिया, मगर अपने अंतिम निर्णय में उसने याचिका खारिज कर दी और कहा कि ‘हालांकि यह प्रणाली धार्मिक सिद्धांत पर खड़ी है, मगर उसका मकसद किसी धर्म-विशेष का प्रसार करना नहीं है और उसमें राज्य की सहभागिता विशुद्ध व्यापारिक पहलुओं पर आधारित है।’
प्रश्न उठता है कि अन्य बैंकों से इस्लामिक बैंक किस मामले में अलग समझे जाते हैं? दरअसल, इस्लामिक बैंक जो वित्तीय उत्पाद पेश करते हैं- जैसे सुकूक बांड या इक्विटी फंड- उनमें सूद नहीं लिया जाता, क्योंकि इस्लाम में सूदखोरी पर प्रतिबंध है। निवेश पर आधारित परिसंपत्तियों के कार्य-निष्पादन के आधार पर ही उनका निपटारा किया जाता है, जिसमें मुनाफा और घाटा, दोनों साझा किया जाता है। ऐसी आर्थिक गतिविधि जो ‘पाप’ समझी जाती है- जैसे सट्टेबाजी या शराब तथा अन्य नशीली चीजों में, उसमें इस पैसे का निवेश नहीं किया जाता है।
अंगरेजों के आगमन के बाद जब आधुनिक बैंकिंग प्रणाली की नींव पड़ी, भारतीय उपमहाद्वीप का उलेमा समुदाय भी इसी नजरिये का था कि बैंक से दिए जाने वाला सूद और कुरान में वर्णित ‘रिबा’ अर्थात बड़े महाजनों द्वारा वसूले जाने वाले भारी-भरकम सूद में कोई संबंध नहीं है। आप इसे इस्लाम में हावी होती रूढ़िवादी धारा का परिणाम कह सकते हैं कि विगत दो-तीन दशकों से फिजां बदली है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अधिकतर मुसलिम-बहुल देशों में भी- भले इस प्रणाली को प्रतीकात्मक तौर पर शुरू किया गया हो- बैंकिंग प्रणाली की मुख्यधारा बैंकिंग के आम नियमों से ही संचालित होती है। सऊदी अरब के बैंक भी सूद लेने-देने से ही संचालित होते हैं। पाकिस्तान में जब अस्सी के दशक में इस्लामीकरण की बढ़ती प्रक्रिया में सूद आधारित बैंकिंगप्रणाली की जगह शरीआ आधारित बैंकिंगप्रणाली लागू करने की मांग उठी, तब वहां के सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर शरीआ आधारित बैंकों को बढ़ावा दिया गया तो देश की अर्थव्यवस्था के पास अपने कर्जे चुकाने के लिए पैसे नहीं होंगे।
प्रश्न उठता है कि एक ऐसी योजना, जिस पर खुद इस्लामीदेशों में सवाल खड़े किए गए हों, उसकी नए सिरे से पड़ताल की आवश्यकता है या नहीं? बेशक है। एक ऐसे मुल्क में जहां गैर-मुस्लिमों का बहुमत है, जहां मुसलमानों की माली हालत एक समुदाय के तौर पर बहुत खराब है, जो अपने से किसी बैंकिंग प्रणाली को मजबूत आधार नहीं दे सकते, वहां ऐसी कोई भी योजना पहले से बेगानेपन का दंश झेल रहे अल्पसंख्यक समुदाय को और कमजोर ही करेगी।
दूसरे, चूंकि इस्लामिक बैंक में जमा पर आम बैंकों की तरह सूद नहीं मिलता है, मुनाफा और घाटा दोनों साझा करने की बात होती है, लिहाजा इसका असर यही होगा कि मुसलिम आबादी का जोहिस्सा अन्य बैंकों के बजाय इनमें निवेश करेगा, उसे अपनी मेहनत की कमाई में वाजिब बढ़ोतरी का लाभ नहीं मिल पाएगा। तीसरे, ऐसी कोई योजना जो किसी खास संप्रदाय की आस्था संबंधी मान्यताओं की बुनियाद पर शुरू की जा रही हो, वह धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी मूल्यों से विचलन ही होगी।

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First Published on November 26, 2016 2:24 am

  1. A
    A.latif
    Nov 27, 2016 at 3:05 pm
    आर्टीकिल के ७वें सातवे पैरा मै जिक्र किया है कि अग्रेजों के बाद ऩई बैकिंग प्रणाली के समय उलेमाऔं की राय ली गई ली गई जिस मै उनहौंने राय दी कि महाजनो के सूद और बैंक सूद का कोई सम्बंथ नही है.क्रपा कर उन उलेमाऔ की " राय ै की details मिले तो शायद समाज का फायदा होगाा.
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