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राजनीतिः बड़ी त्रासद को न्योता

वह दुनिया का सबसे बड़ा निवेश बैंक था जो केवल उच्च वर्ग और धनी लोगों के वित्तीय पोर्टफोलियो का प्रबंधन करता था।
Author September 15, 2017 01:32 am
वित्तीय जगत में लंबे समय तक लेहमैन ब्रदर्स की वही हैसियत थी जो आज इंटरनेट की दुनिया में गूगल की है। जब लेहमैन ब्रदर्स ढहा तो उसके मलबे में सिटी बैंक, मैरिल लिंच, अमेरिकन एक्सप्रेस ग्रुप, बार्कलेज और मॉर्गन स्टेनले जैसे कई बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान ताश के पत्तों की तरह बिखर गए।

अरविंद कुमार सैन

जब एक वित्तीय संस्थान या बैंक दिवालिया होता है तो उसके साथ ही कई दूसरे संस्थानों को भी देर-सबेर दिवालिया होना पड़ता है क्योंकि आज के वैश्वीकृत युग में बड़े बैंकों के असफल होने से वित्त संस्थानों के बारे में लोगों के मन में एक नकारात्मक धारणा पैदा होती है और वित्त संस्थानों से उनका भरोसा उठ जाता है। लोग सोचते हैं कि जब इतना बड़ा बैंक दिवालिया हो गया है तो बाकी बचे संस्थानों का भी असफल होना तय है। लोगों का भरोसा खत्म हो  जाना बहुत बड़ा खतरा है।

वह दुनिया का सबसे बड़ा निवेश बैंक था जो केवल उच्च वर्ग और धनी लोगों के वित्तीय पोर्टफोलियो का प्रबंधन करता था। आर्थिक क्षेत्र की नामी-गिरामी प्रतिभाएं उसमें काम करती थीं या काम करने को लालायित रहती थीं। वह संस्थान वित्तीय वैश्वीकरण का पर्याय बन चुका था और दुनिया के बाकी देश भी अपने-अपने वित्तीय संस्थानों का विलय और अधिग्रहण करके उसी तर्ज पर संस्थान बनाने की होड़ में जुटे थे। फिर एक मोड़ पर कर्ज के सहारे वित्तीय परिसंपत्तियां खड़ी करने का वह गोरखधंधा बुलबुले की तरह फूट गया। उस वित्तीय संस्थान का नाम था लेहमैन ब्रदर्स और यह 2008 का बरस था। वित्तीय जगत में लंबे समय तक लेहमैन ब्रदर्स की वही हैसियत थी जो आज इंटरनेट की दुनिया में गूगल की है। जब लेहमैन ब्रदर्स ढहा तो उसके मलबे में सिटी बैंक, मैरिल लिंच, अमेरिकन एक्सप्रेस ग्रुप, बार्कलेज और मॉर्गन स्टेनले जैसे कई बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान ताश के पत्तों की तरह बिखर गए। ये सभी वित्तीय संस्थान वैश्विक स्तर पर परिचालन कर रहे थे और बाजार पूंजीकरण के लिहाज से बहुत बड़े संस्थान थे। रैंकिंग के दीवानों की भाषा में कहें तो इनमें से सारे नाम दुनिया के आला 10 बैंकों और वित्तीय संस्थानों में शुमार होते हैं। इसके बाद की कहानी अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। 2008 की आर्थिक मंदी आधुनिक वक्त की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है और इसके कुप्रभाव दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं अब तक भुगत रही हैं।

यह कहानी फिलवक्तफिर से प्रासंगिक हो चली है क्योंकि अब हमारे देश में बैंकों का विलय करके तथाकथित बड़े वैश्विक बैंक बनाने का अभियान जोर-शोर से परवान चढ़ाने की तैयारियां हो रही हैं। सरकार ने सरकारी क्षेत्र के बैंकों के सालाना सम्मेलन ‘ज्ञानसंगम’ में इस बात को पुरजोर तरीके से आगे बढ़ाया कि छोटे बैंकों का किसी मझोले आकार के बैंक में विलय करके बड़े बैंक बनाए जाएंगे। सरकारी बैंकों के पुनर्गठन के लिए चलाए जा रहे ‘इंद्रधनुष’ कार्यक्रम का भी एक प्रमुख लक्ष्य सरकारी क्षेत्र के बैंकों का आपस में विलय करना है। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए सरकार ने भारतीय स्टेट बैंक के छह सहयोगी बैंकों (स्टेट बैंक आॅफ मैसूर, इंदौर, पटियाला, त्रावणकोर, हैदराबाद, बीकानेर एंड जयपुर) और भारतीय महिला बैंक का भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) में विलय कर दिया है।

एसबीआई को छोड़ कर इस समय देश में सरकारी क्षेत्र के 19 वाणिज्यिक बैंक और 219 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक काम कर रहे हैं। सरकार की योजना है 19 बैंकों को मिलाकर पांच-छह बैंक बना दिए जाएं और उनमें ही क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का विलय कर दिया जाए। विलय करके तथाकथित बड़े बैंक बनाने के पीछे सरकार के तर्क हैं कि इससे वैश्विक स्तर के विशाल बैंक बनेंगे जो दुनिया के चोटी के 50 बैंकों में शुमार हो सकेंगे, फंसे हुए बैंक ऋणों (एनपीए) की समस्या को सुलझाया जा सकेगा, बड़े आकार के बैंकों का बाजार पूंजीकरण ज्यादा होगा जिससे वे बड़े निवेश की जरूरत वाली बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का वित्तपोषण कर सकेंगे और बड़े बैंक देश के बैंकिंग सुविधाओं से महरूम इलाकों में बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार करके वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दे सकेंगे। वक्त का तकाजा है कि इन दावों को हकीकत की तराजू पर तौला जाए ताकि सही फैसले पर पहुंचने में आसानी हो।

2008 की आर्थिक मंदी के बाद वैश्विक स्तर पर हुए आर्थिक आत्मावलोकन और विचार-विमर्श का सबसे बड़ा सबक था-‘बड़े बैंक असफल होने के लिहाज से बहुत बड़े होते हैं (टू बिग टू फेल)।’ जब एक वित्तीय संस्थान या बैंक दिवालिया होता है तो उसके साथ ही कई दूसरे संस्थानों को भी देर-सबेर दिवालिया होना पड़ता है क्योंकि आज के वैश्वीकृत युग में सभी वित्तीय संस्थान एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। बड़े बैंक के देनदार और लेनदार खुद भी बड़े या मझोले आकार के होते हैं और उन पर निर्भर अर्थव्यवस्था के बाकी हिस्से भी उनके साथ ही ढह जाते हैं। बड़े बैंकों के असफल होने से वित्त संस्थानों के बारे में लोगों के मन में एक नकारात्मक धारणा (आर्थिक शब्दावली में इसे मॉरल हजार्ड कहा जाता है) पैदा होती है और वित्त संस्थानों से उनका भरोसा उठ जाता है। लोग सोचते हैं कि जब इतना बड़ा बैंक दिवालिया हो गया है तो बाकी बचे संस्थानों का भी असफल होना तय है। लोगों का भरोसा खत्म हो जाना बहुत बड़ा खतरा है क्योंकि वित्त और बैंकिंग का लोगों के बीच पूरा कारोबार ही साख के सहारे चलता है।

2008 की आर्थिक मंदी की भयावहता ने अमेरिका, ब्रिटेन और जापान जैसी विशाल अर्थव्यवस्थाओं की जड़ों को गहरे तक खोद डाला, क्योंकि इनके बैंक और वित्तीय संस्थान आकार में बहुत बड़े थे। यही कारण है कि इस अभूतपूर्व आर्थिक मंदी के बाद हुए आर्थिक मंथन में जोसेफ स्टिग्लिट्ज और पॉल क्रुगमैन जैसे दुनिया के नामी अर्थशास्त्रियों ने बड़े बैंकों की मुखालफत की। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष रहे एलान ग्रीनस्पान जैसे बड़े अर्थशास्त्रियों के एक समूह ने तो अमेरिका सहित दुनिया के बाकी प्रमुख देशों को सलाह दी कि अगर 2008 की त्रासदी की पुनरावृत्ति रोकनी है तो विशाल बैंकों और बड़े वित्तीय संस्थानों को व्यवस्थित तरीके से तोड़कर छोटे-छोटे बैंकों और वित्तीय संस्थानों में बदला जाए। ऐसे में नामी वैश्विक अर्थशास्त्रियों की राय के विपरीत बड़े बैंक खड़े करने की हमारी सरकार की सनक समझ से परे है।

भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में एनपीए की समस्या बेहद विकराल हो चुकी है और पूरे बैंकिंग तंत्र के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। लेकिन बैंकों का विलय करने से इस समस्या का समाधान कैसे होगा, इसे समझना मुश्किल है। दो बुरे आपस में मिलकर अच्छे कैसे हो सकते हैं? सरकार को जहां बकाया कर्जदारों के खिलाफ नीलामी और मुकदमे जैसे कदम और इन फंसे कर्जों का वितरण करने वाले बैंक अधिकारियों के खिलाफ कड़ी प्रशासनिक एवं कानूनी कार्रवाइयां करनी चाहिए थीं, उसकी बजाए वह विपरीत व्यवहार कर रही है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि छोटे-छोटे बैंकों के फंसे हुए कर्जों के फोड़ों को मिलाकर हम एक बड़ा मर्ज पैदा करने जा रहे हैं, जो लाइलाज होगा। बल्कि बुरे बैंक का संक्रमण आने से थोड़ी-बहुत बेहतर हालत वाला बैंक भी इसी बीमारी की चपेट में आ जाएगा और उसकी वित्तीय आस्तियों की गुणवत्ता भी बिगड़ जाएगी।

वित्तीय समावेशन यानी गरीबों तक वित्त सुविधाएं पहुंचाना एक ऐसा काम है जिसके नाम पर इस देश में हर जायज-नाजायज वित्तीय फैसले को जन स्वीकृति का जामा पहनाया जाता है, चाहे वह विमुद्रीकरण हो या जनधन योजना। आखिर देशभर में फैले क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और 19 वाणिज्यिक बैंक मिलकर बैंकिंग सुविधाएं देश के कोने-कोने में क्यों नहीं पहुंचा सकते हैं? भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में वित्तीय समावेशन के लिए मजबूत क्षेत्रीय पहचान, उपस्थिति और स्वस्थ पूंजीकरण वाले कई सारे बैंकों की जरूरत है, न कि महानगरों में बड़े पूंजीपतियों की ऋण जरूरतों को पूरा करने वाले कुछेक बड़े बैंकों की। वास्तविक लड़ाई बैंकों के फंसे कर्जों यानी एनपीए के खिलाफ छेड़ी जानी चाहिए थी, लेकिन सरकार ने उसकी जगह विलय के जरिए विशाल बैंकों के नाम पर रूई का दुश्मन खड़ा करके वास्तविक मसले पर से ध्यान हटा दिया है।

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