December 03, 2016

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राजनीतिः यातना विरोधी कानून की जरूरत

यातना-विरोधी विशिष्ट कानून न होने से, झूठे मुकदमे और फर्जी मुठभेड़ें भी सामान्य कानूनों के दायरे में ही न्यायिक परख से गुजर पाती हैं। लिहाजा, बहुत थोड़े मामलों में ही राज्य को जिम्मेवार ठहराना संभव हो पाता है। लिखित संहिता के अभाव में, क्या मध्यप्रदेश की ताजातरीन पुलिस मुठभेड़ की जांच को भी इसी न्यायिक भूल-भुलैया में गुम हो जाना है?

भारत में अपराध-न्याय व्यवस्था को आप कितने ही स्तरों पर काम करते देख सकते हैं। रातों-रात न्याय ‘खरीदा’ जा सकता है जबकि बरसों-बरस निर्दोष जेलों में सड़ते मिल सकते हैं; सामान्य अदालतों में मुकदमों के ढेर के ढेर लगे रहते हैं और लोक अदालतों के नाम पर हजारों मामलों का एक साथ ‘निपटारा’ संभव हो जाता है। एक ओर पेचीदगियों से भरी कानूनी प्रक्रियाएं हैं और यहां तक कि आम जन के लिए पुलिस थानों में शिकायत दर्ज करा पाना तक दूभर हो जाता है। दूसरी ओर, समाज को स्वीकार्य हैं, प्राकृतिक न्याय (कॉमन लॉ) की नैतिकता के जमाने के ठौर पर हिसाब-किताब चुकता करते सक्रिय विजिलैंट दस्ते और आरोपी को कानून के हवाले करने के बजाय मार डालने वाली भीड़ (लिंच मॉब)। यहां तक कि, जैसा कि हाल में भोपाल में जेल से फरार सिमी के आठ निहत्थे आरोपियों को तुरत-फुरत मौत के घाट उतारने के प्रसंग में दिखा, ‘लिंच मॉब’ की भूमिका में स्वयं पुलिस का विशिष्ट दस्ता भी हो सकता है। लिखित प्रावधानों पर आधारित किसी भी भारतीय अपराध-दंड संहिता में कानून से भागते हुए व्यक्ति को जान से मारने की व्यवस्था नहीं है। नैतिक पुलिसिंग पर आधारित कॉमन लॉ के दौर में इस सुविधा का इस्तेमाल भले ‘स्वाभाविक’ रहा होगा। दरअसल, देश में आतंकवाद को लेकर कानूनी कोड न होने से कॉमन लॉ पर आधारित अपराध-न्याय व्यवस्था की वकालत करने वालों को आज ऐसा करना कहीं अधिक सामान्य लग रहा है। उन्हें इसमें कोई विसंगति नजर नहीं आती कि संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित ‘कानून का शासन’, सिमी के जेल से फरार हुए आतंकियों के विरुद्ध मध्यप्रदेश एसटीएफ की लिंच मॉब आचार संहिता को रोकने में असमर्थ सिद्ध हुआ। घिरे हुए आठ के आठ निहत्थे सिमी सदस्य एसटीएफ की गोलियों का शिकार बने, जबकि वे गिरफ्तार किए जाने चाहिए थे। तो भी इस लिंच न्याय के प्रति राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक समर्थन की भी कमी नहीं है। सौभाग्य से इस प्रवृत्ति का पुरजोर विरोध करने वाले भी कम नहीं हैं।

 
जेल रक्षक की हत्या कर फरार हुए इन कैदियों की पुलिस मुठभेड़ पर, लिहाजा, तरह-तरह की अटकलबाजियां सामने आना स्वाभाविक है। राजनीतिक मंशा से लेकर मुसलिमों के प्रति पूर्वग्रह तक के आरोप हवा में हैं। एक तर्क है कि इन कैदियों का आतंकवादी होना ही उन्हें मार देने को न्यायोचित ठहराने के लिए काफी है, और इसके समानांतर तर्क दिया जा रहा है कि वे मुसलमान होने के नाते मार दिए गए। ये तर्क बेबुनियाद भी नहीं हैं। वैश्विक और पाकिस्तानी दोनों ब्रांड के आतंकवाद की मार से देश को लगातार दो-चार होना पड़ रहा है। राजनीतिकों की प्रतियोगी जुमलेबाजी और अदालतों में होने वाली देरी के बीच विवश भारतीयों के धैर्य की परीक्षा भी चलती रहती है। साथ ही, कितने ही ऐसे आतंकी मामले सामने आए हैं जिनमें युवा मुसलिमों को बरसों झूठे मुकदमों का सामना करना पड़ा है। मौजूदा मामले में ही, झूठे आतंकी मुकदमों को अदालतों में चुनौती देने वाले संगठन, रिहाई मंच के लखनऊ में प्रदर्शन पर पुलिस ने जमकर लाठियां भांजीं। अपने पुलिस जीवन के अनुभव से, सार्वजनिक हुए आधिकारिक बयानों और घटना-स्थल के उपलब्ध वीडियो के आधार पर, मैं इन अटकलबाजियों के संदर्भ में भोपाल मुठभेड़ के संभावित घटनाक्रम पर अपनी टिप्पणी इस तरह रखना चाहूंगा-
इन विचाराधीन कैदियों के आपराधिक इतिहास को देखते हुए इन्हें आतंकवादी कहा जाना ही ठीक है, उसी तरह जैसे समझौता, मालेगांव आदि मामलों में न्यायिक कार्यवाही का सामना कर रहे असीमानंद, प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित भी हैं। ध्यान रहे कि मारे गए आठ सिमी सदस्यों में से तीन पहले भी एक अन्य जेल से एक और जेल रक्षक की हत्या कर इसी तरीके से फरार हुए थे। थाली, चम्मच से धारदार हथियार बनाना जेल-जीवन में आम है, कोई अजूबा नहीं। लकड़ी की चाभी भी। कंबलों व चादरों की मदद से दीवार फांदना भी। विचाराधीन कैदी जेल में अपने कपड़े पहनने को स्वतंत्र हैं, न कि जेल की निश्चित पोशाक। मुठभेड़ के समय उनके स्पोर्ट्स जूतों और जीन्स में होने से उनकी जेल से भागने की मंशा और योजना साफ दिखती है। जाहिर है कि जेल की सुरक्षा-व्यवस्था में गंभीर लापरवाही रही होगी, जिसका लाभ इन कैदियों ने उठाया। जेल रक्षक यादव की हत्या भी इन्होंने की होगी, अन्यथा वे यादव से चाभियां हथिया कर गुपचुप नहीं निकल सकते थे। यह भी कहने की जरूरत नहीं कि यादव उस जेल में अकेले सिपाही नहीं थे, हां मौके पर जरूर अकेले रहे होंगे और तभी आतंकियों के हाथों मारे गए।

यह भी स्पष्ट है कि गांववालों ने फरार होते कैदियों को देख लिया होगा और एसटीएफ को इससे उन्हें घेरने में मदद मिली। कैदियों के पास पिस्तौल वगैरह मारक हथियार नहीं हो सकते थे। तभी उन्होंने घिरने पर आक्रमण के लिए पत्थर का इस्तेमाल किया। एसटीएफ का उन्हें गोलियों के आदान-प्रदान में मार गिराना प्रथम दृष्टया एक गढ़ी हुई कहानी लगती है। भगोड़े कैदी हर तरफ से घिर गए थे, अन्यथा सभी नहीं मारे जाते, कुछ भाग भी निकल सकते थे। ऐसे स्थिति में उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था। भारत में कानून से भागते हुओं को जान से मारने की व्यवस्था नहीं है। अब तक का सरकारी रवैया लीपा-पोती का है और इससे देश की अपराध-न्याय व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगता है। आतंकवाद के नाम पर की जा रही राजनीति भी कठघरे में है। इस बीच चौतरफा प्रश्नों से घिरी मध्यप्रदेश सरकार ने अपने एसटीएफ प्रमुख को बदल दिया है, हालांकि आश्चर्यजनक रूप से, मुठभेड़ को वे फिर भी सही ठहराते आ रहे हैं। सरकार ने एक ओर उच्च न्यायालय के एक अवकाश-प्राप्त जज की जांच का एलान किया है, और दूसरी ओर, मुठभेड़ में शरीक पुलिसकर्मियों को दो लाख के पुरस्कार का भी।

राजनीतिक दलों और मीडिया की विभाजित प्रतिक्रिया से लगता है जैसे भोपाल मुठभेड़ से प्राकृतिक न्याय (कॉमन लॉ) के ‘नैतिक’ प्रतिशोध को कम से कम इन दायरों में एक कारगर मुकाम मिल गया हो। बेशक कानूनी दायरे, लिखित कोड से ही संचालित होते रहेंगे, लेकिन तदनुसार उन्हें अमली जमा पहना पाने की क्षमता और पहल उच्च/सर्वोच्च न्यायालयों और मानवाधिकार संगठनों में कम ही नजर आती है। बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं, पिछले साल अप्रैल में ही तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की प्रथमदृष्टया दो फर्जी पुलिस मुठभेड़ों का औपचारिक संज्ञान हैदराबाद स्थित उच्च न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने लिया था।
तेलंगाना पुलिस ने सिमी के चार हथकड़ी लगे विचाराधीन आतंकी मामलों के कैदियों को अदालत में पेशी के लिए ले जाते हुए यह कह कर मार दिया कि उन्होंने सुरक्षाकर्मियों के हथियार छीन कर भागने के लिए हमला किया था। यह सिमी के पुलिसकर्मियों पर होने वाले छिटपुट हमलों का प्रत्युत्तर था। आंध्र पुलिस ने अवैध चंदन व्यापार में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चलते तमिलनाडु के बीस लकड़हारों को चंदन तस्कर बता कर गोलियों से उड़ा दिया। स्वाभाविक ही था कि इन लकड़हारों के पास हथियार के नाम पर लकड़ी काटने की कुल्हाड़ियां मिलतीं। संबंधित संवैधानिक संस्थाएं अगर इन जैसे साफतौर पर फर्जी मुठभेड़ मामलों की नियमित खोज-खबर रख सकें तो भोपाल जैसी एक और पुलिस मुठभेड़ में अपराध, दंड और कानूनी प्रक्रिया के अधिनियमों को शर्मसार न होना पड़े।

फर्जी पुलिस मुठभेड़ें, पुलिस यातनाओं का सर्वाधिक विकृत रूप हैं। दरअसल, पुलिस यातनाओं की परंपरा जितनी पुरानी है उतना ही पुराना है राज्य का उन्हें प्रश्रय देने का इतिहास। सिद्धांतत: लगेगा कि अपराध-न्याय व्यवस्था में लिखित कोड का चलन आ जाने से प्राकृतिक न्याय (कॉमन लॉ) के नाम पर होने वाली न्यायिक मनमानी पर रोक लग जानी चाहिए थी। न्यायिक मनमानी, सामाजिक दमन का ही नहीं, राजकीय दमन का भी एक अंतरंग पक्ष बनी रही है। औपनिवेशिक शासन में, व्यवहार में, मुख्यत: पुलिस यातनाओं के दम पर ही राज्य की मनमानी का यह आयाम बना रहा। स्वतंत्र भारत की भी विडंबना है कि आज तक पुलिस यातनाओं के विरुद्ध कोई कानून नहीं बन सका है, जबकि भारत ने 1997 में ही यूएन कन्वेंशन अगेंस्ट टार्चर को अनुमोदित कर दिया था। 2010 में, जल्दबाजी में लोकसभा में एक दिखावे का यातना निरोधक विधेयक (एंटी टार्चर बिल) पास हुआ जिसे हर ओर से विरोध के बाद 2011 में राज्यसभा से वापस ले लिया गया। तब से यह ठंडे बस्ते में है।

ऐसे में सरकारी आंकड़ों में पुलिस यातना का सही ग्राफ दिखने का अवसर आता ही नहीं। तो भी, खासतौर पर 1990 के बाद से, उच्च/सर्वोच्च न्यायालयों व मानवाधिकार आयोगों ने पुलिस यातना के कितने ही मामलों का संज्ञान लिया है। कितनी ही मार्गदर्शक निर्देशिकाएं जारी की गई हैं। हालांकि, यातना-विरोधी विशिष्ट कानून न होने से, झूठे मुकदमे और फर्जी मुठभेड़ें भी सामान्य कानूनों के दायरे में ही न्यायिक परख से गुजर पाती हैं। लिहाजा, बहुत थोड़े-से मामलों में ही राज्य को जिम्मेवार ठहराना संभव हो पाता है। यहां भी रुझान पीड़ित को हर्जाना दिलाने का रहता है, न कि दोषियों को सजा देने का। लिखित संहिता के अभाव में, क्या मध्यप्रदेश की ताजातरीन पुलिस मुठभेड़ की जांच को भी इसी न्यायिक भूल-भुलैया में गुम हो जाना है?

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First Published on November 11, 2016 2:04 am

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