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राजनीतिः आपसी सहयोग के रास्ते

दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और भारत सहित दक्षिण एशिया के तमाम देश इस परिधि में आते हैं।
Author September 29, 2017 02:44 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

उषा महाजन

विकासशील देशों के आपसी सहयोग के चलते, विकसित देशों से मिलने वाली सहायता पर उनकी निर्भरता कम हो गई है। दानकर्ता विकसित देशों के मार्गदर्शन के बजाय, अब वे अपनी प्राथमिकताएं खुद तय करते हैं। आपसी सहयोग से अपने मुद्दे हल कर रहे हैं। विश्व पटल पर ये देश अब अधिक मुखर हुए हैं, अत: सत्ता का अंतरराष्ट्रीय संतुलन भी बदल रहा है।

विकासशील देश कौन हैं? क्या चीन भी विकासशील देश है?
दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और भारत सहित दक्षिण एशिया के तमाम देश इस परिधि में आते हैं। अपनी तमाम आर्थिक उपलब्धियों के बावजूद चीन भी विकासशील देशों की ही श्रेणी में सम्मिलित है। जी-77 के नाम से जाने जानेवाले देशों में आज 131 देश सम्मिलित हैं।
साठ और सत्तर के दशकों तक विश्व के इन दक्षिणी देशों को, अमेरिका व यूरोप के विकसित देशों से, अपने विकास के लिए दान के रूप में सहयोग मिला करता था। लेकिन 1978 में संयुक्त राष्ट्र के तहत ‘साउथ-साउथ कोआॅपरेशन’ (दक्षिण-दक्षिण सहयोग) नाम की एक इकाई बनाई गई, ताकि अपनी स्वतंत्रता, प्रभुसत्ता, सांस्कृतिक विभिन्नता और स्थानीयता को बरकरार रखते हुए ये देश आपस में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय स्तर पर अपने ज्ञान और स्रोतों को साझा कर सकें। बहरहाल, इन विकासशील देशों के बीच सहयोग और आदान-प्रदान द्वारा विकास का सिलसिला व्यावहारिक रूप से नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध से शुरू हुआ। ‘दक्षिण दक्षिण सहयोग’ (साउथ साउथ कोआॅपरेशन) कहे जाने वाले इस सहयोग की सफलता यह रही कि इससे विकसित देशों से मिलने वाले अनुदान पर विकासशील देशों की निर्भरता कम हुई और फलत: सत्ता का अंतरराष्ट्रीय संतुलन परिवर्तित हो गया। भारत ने तो 2003 में ही विकसित देशों से मदद लेनी बंद कर दी थी और कहा कि यह उन देशों को जानी चाहिए जिन्हें अभी इसकी जरूरत है। इसने एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था की शुरुआत की, जिसने विकसित देशों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व को मंदा कर दिया। परिदृश्य यह है कि जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विकास के लिए धन की उपलब्धता, सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति आदि मुद््दों पर विकासशील देशों के बीच अब एकजुटता और सहभागिता निरंतर बढ़ रही है।

इनका यह आपसी सहयोग विभिन्न देशों के बीच रोजगार पैदा करने में, खाद्य सुरक्षा और व्यापार बढ़ाने में, इन्फ्रास्ट्रक्चर और प्रौद्योगिकी के विकास में प्रभावी साबित हुआ है। ग्रामीण विकास के क्षेत्र में ये देश एक-दूसरे को अपने आजमाए हुए तरीकों का लाभ दे रहे हैं, जो दाता (दानकर्ता) और प्राप्तकर्ता के बीच के पुराने समीकरणों को ध्वस्त करता है। ब्राजील, चीन, मोरक्को, नाइजीरिया आदि से खाद्य और कृषि को लेकर बहुत कुछ सीखा जा सकता है। घाना अपने पड़ोसी देशों के साथ ग्रामीण गरीबी दूर करने के ज्ञान को साझा कर रहा है। जापान और स्पेन भी अपने विशेष कौशल और विशेषज्ञताओं को इन देशों के साथ साझा कर रहे हैं। भारत द्वारा अफगानिस्तान और अफ्रीकी देशों में बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी और सेवाओं के क्षेत्र में मदद दी जा रही है। अफ्रीकी देशों में सार्वजनिक उपयोग की आम वस्तुएं बनाने में भारतीय कंपनियां अफ्रीकी क्षेत्रीय निकायों के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र के तत्त्वावधान में, विश्व नेताओं ने वर्ष 2000 में, विकासशील देशों की प्रगति की खातिर अगले पंद्रह वर्षों के लिए आठ ‘सहस्राब्दी विकास लक्ष्य’ (मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स) तय किए थे- विश्व से अति गरीबी और भूख की समाप्ति, सभी के लिए प्राथमिक शिक्षा, लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण, शिशु मृत्यु दर में कमी, मातृत्व स्वास्थ्य सुधार, एचआइवी-एड्स, मलेरिया आदि बीमारियों का उन्मूलन, पर्यावरण की रक्षा और विकास के लिए वैश्विक भागीदारी। वर्ष 2015 तक इन्हें पूरा करने का लक्ष्य रखा गया। इनके जरिए विकासशील देशों में करोड़ों लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला गया। समय-सीमा के पूरा होते ही अगले पंद्रह वर्षों, अर्थात 2030 तक के लिए 17 ‘सतत विकास लक्ष्य’ (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स) तय किए गए, जिनके दायरे में जलवायु परिवर्तन, धरती की रक्षा, देशों और लोगों के बीच आर्थिक असमानता को दूर करना, शांति और समृद्धि आदि कई और लक्ष्यों को जोड़ा गया।

पिछले दिनों, विकासशील देशों की अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली तथा उसकी सहयोगी संस्थाओं द्वारा, दिल्ली में इन्हीं सब मुद्दों पर व्यापक बहस करने और विकास की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें चीन सहित न केवल विश्व के अनेक विकासशील देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया, बल्कि न्यूयार्क से संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों, विकसित देशों के प्रतिनिधियों और अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़े विचारकों ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन में उभरती वैश्विक व्यवस्था के मुताबिक प्रभावी संस्थागत ढांचे गढ़ने की जरूरत पर बल दिया गया। सुझाव आए कि ऐसी वैश्विक व्यवस्था की नींव डाली जाए, जिसमें विकासशील देशों में विकास की प्रक्रिया में योगदान देने में सरकारों, निजी क्षेत्र व गैर-सरकारी संगठनों- सभी की भागीदारी हो।

‘दक्षिण-दक्षिण सहयोग’ विकासशील देशों को सस्ती प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने का महत्त्वपूर्ण जरिया हो सकता है। सभी विकासशील देशों की सामान्य स्थितियां लगभग एक-सी हैं, अत: वे अपने अनुभवों को साझा कर एक दूसरे को लाभान्वित कर सकते हैं। परंपरागत व्यापार तथा निवेश के मुद््दों के साथ-साथ देशों में आपस में शांति और सौहार्द का वातावरण बनाने पर जोर दिया गया। सभी देश अपने यहां के ज्ञान को आपस में बांटें। पिछले दशक से आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में एशिया के देशों का वैश्विक प्रभाव बढ़ा है। चीन के उदय और ‘ब्रिक्स देशों’ का संगठन बनने से विकसित देशों का प्रभुत्व तो वैसे ही कम हो गया है।

विकासशील देशों के आपसी सहयोग के चलते, विकसित देशों से मिलने वाली सहायता (एड) पर उनकी निर्भरता कम हो गई है। दानकर्ता विकसित देशों के मार्गदर्शन के बजाय, अब वे अपनी प्राथमिकताएं खुद तय करते हैं। अपनी व्यावहारिक तकलीफों का हल वे स्वयं ढूंढ़ रहे हैं या आपसी सहयोग से अपने मुद््दे हल कर रहे हैं। विश्व पटल पर ये देश अब अधिक मुखर हुए हैं, अत: सत्ता का अंतरराष्ट्रीय संतुलन भी बदल रहा है। विश्व व्यापार, विनिवेश और वैश्विक जीडीपी में विकासशील देशों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।

बहरहाल, विकासशील देशों को अपनी मानव-पूंजी व शिक्षा पर अधिक निवेश करना होगा, अपनी ‘इनोवेशन’ (नवाचार) की क्षमता बढ़ाने के लिए सार्थक वातावरण बनाना होगा और उत्पादकों की संस्थाओं को अधिक सशक्त बनाना होगा तथा सार्वजनिक व निजी क्षेत्र की साझेदारी (पीपीपी) को बढ़ावा देना होगा। विकासशील देशों में, पिछले दो दशक में पीपीपी का सर्वाधिक हिस्सा ब्राजील (बीस फीसद) में था; भारत में पंद्रह फीसद और इसी के आसपास रूस, चीन, मेक्सिको, अर्जेंटीना और तुर्की में रहा। इन देशों में विकास योजनाओं के वित्तपोषण में ब्रिक्स देशों द्वारा 2015 में बनाए गए ‘नए विकास बैंक’ और ‘एशियाई इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड’ की भी अहम भूमिकाएं हैं। भारत का कॉरपोरेट जगत विदेशों तक विस्तृत हो रहा है, मसलन ‘इंडिया अफ्रीका प्रोजेक्ट पार्टनरशिप फोरम’।

बहरहाल, विकसित देशों के अवदान को भी नकारा नहीं जा सकता। जैसे, स्वीडन की स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट कोआॅपरेशन एजेंसी दुनिया में गरीबी कम करने के लिए दशकों से काम कर रही है; डेनमार्क द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही विकासशील देशों को वित्तीय सहायता दे रहा है।
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए विकासशील देशों को प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान करना होगा। समुद्र की नवीकरणीय ऊर्जा से लाभ उठाने के लिए ब्लू इकोनॉमी यानी नीली अर्थव्यवस्था (मत्स्य पालन, हाइड्रोकार्बन, समुद्री खनिज खनन, बंदरगाह व शिपिंग, पर्यटन आदि) का महत्त्व भी समझना होगा, जो गरीबी दूर करने, रोजगार और खाद्य सुरक्षा का अहम जरिया हो सकती है। विश्व भर की नजर उस भविष्य पर केंद्रित है, जब दुनिया के हर देश से भूख, कुपोषण, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और लैंगिक असमानता को मिटाया जा सकेगा।

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