June 26, 2017

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विचार: राजनीति में आंबेडकर पर्व

जब-जब भी पंचवर्षीय राजनैतिक त्योहार मनाए जाते हैं तब-तब बाबासाहेब डॉ आंबेडकर के नाम पर इतनी धूल उड़ाई जाती है कि स्वयं आकाश उस धूल से आछादित हो उठता है।

Author April 14, 2017 13:56 pm
बाबासाहेब आंबेडकर

मोहनदास नैमिशराय

भारत उत्सवधर्मी देश है। सदियों से समाज में उत्सव मनाने की परंपरा चली जा रही है। वह बात अलग है कि पहले उत्सव के स्वभाव और तौर-तरीके सामाजिक संरचना में गुंथे हुए थे जबकि नई शताब्दी में वे नए रंगों में तेजी के साथ रंगने आरंभ हो गए हैं। उनमें राजनीति का रंग सबसे गहरा रहा है। उसकी पकड़ भी लोगों पर मजबूती से बढ़ी है। यह उनके अनुयायियों से लेकर मतदाताओं ने भी इस दौर में अच्छी तरह से महसूस कर लिया है। यह उत्सव संत-महात्माओं का हो, या फिर महापुरुषों का, बात एक ही है। अधिकतर राजनीतिकों को उन संत-महात्माओं और महापुरुषों को राजनीति के रंग में रंगने की आदत-सी पड़ गई है। इसे बदलते समय की मांग भी कहा जा सकता है। जब किसी भी संदर्भ में मांग बढ़ेगी तो राजनीति के उद्योग में बदलते हुए ताने-बाने से बुनावट भी वैसी ही होगी। कहना न होगा कि धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक उत्सव मनाते-मनाते स्वयं राजनैतिक उत्सवों ने भी भारतीय समाज, जातियों, उप-जातियों, वर्गों, नस्लों के बीच इतनी जड़ पकड़ ली है कि उनसे पीछा छुड़ाना अब मुश्किल-सा हो गया है।

इधर जब-जब भी पंचवर्षीय राजनैतिक त्योहार मनाए जाते हैं तब-तब बाबासाहेब डॉ आंबेडकर के नाम पर इतनी धूल उड़ाई जाती है कि स्वयं आकाश उस धूल से आछादित हो उठता है। और उस गर्द-गुबार को बैठने में महीनों ही नहीं, बरसों लग जाते हैं। कभी-कभी इससे समाज में असंतोष हो जाता है। जातियों के बीच मनमुटाव भी होता है। देश की तरक्की हो न हो, समाज में कुछ नेता नाम अवश्य ही कमा लेते हैं। हालांकि देखा जाए तो राजनैतिक उत्सवों के नजदीक आने पर पिछली शताब्दी में भी ऐसे खेल-तमाशे होते रहे थे, लेकिन उन दिनों उनका ताप उतना नहीं था। न ही उतने जोर-शोर से घोषणाएं होती थीं और न बड़े बजट के विज्ञापन ही छपते थे। यह भी सच है कि नई शताब्दी आने तक भाजपा के शीर्ष नेताओं में आंबेडकर के करीब आने में हिचकिचाहट थी। उसका दूसरा कारण यह भी रहा कि बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस की पकड़ आंबेडकर पर बहुत अधिक थी। उस पकड़ के पीछे यथार्थ भले कुछ भी रहा हो, लेकिन इन दोनों पार्टियों में दलित नेताओं की अच्छी-खासी चहल-पहल देखी जा सकती थी।

एक जमाना था जब दक्षिण से शंकरानंद, महाराष्ट्र से शिंदे, गुजरात से योगेंद्र मकवाना, उत्तर प्रदेश से बीपी मौर्य, हरियाणा से चांदराम, बिहार से बाबू जगजीवन राम, पंजाब से सरदार बूटा सिंह आदि दिग्गज नेताओं की कांग्रेस में भरमार थी। कहना न होगा कि राज्य सरकारों से लेकर केंद्र सरकार में कुछ को मंत्रिपद से भी नवाजा जाता था। कुछ दलित नेताओं को पेट्रोल पम्प, गैस की एजेंसी देकर खुश कर दिया जाता था। कुछ को विधान परिषद तथा राज्यसभा में भी प्रवेश करा दिया जाता था। आखिर दलित वोट तो उनके चेहरे दिखलाकर ही प्राप्त किए जा सकते थे। बरसों नहीं बल्कि दशकों तक यही सब खेल-तमाशे चलते रहे। दलित मतदाताओं को लुभाया तथा भरमाया जाता रहा।

अस्सी के दशक तक दलितों और आंबेडकर के नाम पर यह सब होता रहा। नब्बे के दशक से देश भर में जैसे-जैसे राजनीति के भूगोल में परिवर्तन होता गया वैसे-वैसे सत्ता की शतरंज पर प्यादे और घोड़ों में भी बदलाव होते गए। तब शतरंज के खिलाड़ियों को भी इस बात का अहसास होने लगा था कि उनकी जरा-सी चूक से वे बाजी हार सकते हैं। भाजपा हाइकमान की यहीं से आंबेडकर में रुचि होने लगी थी। निश्चित ही इतिहास का वह महत्त्वपूर्ण मोड़ था और एक समय ऐसा आया जब भाजपा के पास भले ही दिग्गज दलित नेता न थे, पर राज्यसभा में दलित प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ने लगी थी। दो-तीन राज्यों में दलित राज्यपाल भी बनाए गए। कहना न होगा कि देश भर में आरएसएस, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद तथा भाजपा के द्वारा समरसता के कार्यक्रम चलाए गए। गांव-कस्बा स्तर से लेकर शहरों तक में रहने वाले दलितों को जोड़ने के प्रयास किए गए। यहां तक कि राम जन्मभूमि पर राम मंदिर का शिलान्यास एक दलित के हाथों कराया गया। नब्बे के दशक में ही मायावती को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनाया गया।

आज भले मायावती या उनके अनुयायी अपने बचाव के लिए भाजपा से किनारा करते हुए लाख तरह की बात करें, उस समय की परिस्थितियों की बात करें, समाजवादियों को दोष दें, लेकिन उस समय मदद के लिए एक दलित नेत्री की तरफ हाथ बढ़ाने का संदेश तो दूर-दूर गया ही था। न केवल मायावती को बल्कि उस दौर के कुछ दलित नेताओं को सत्ता के साथ-सुविधाएं तो मिली ही थीं, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ राजनीति के बाजार में भाजपा जैसी ‘अछूत’ पार्टी को भी दलित मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाने के सुनहरे अवसर मिले थे। वहीं से भाजपा को उपलब्धियां मिलनी शुरू हुई थीं। एक राज्य से दूसरे राज्य में भगवा दर्शन का प्रचार-प्रसार हुआ। बाबासाहेब आंबेडकर की जयंती (14 अप्रैल) को भव्य तरीके से मनाने की पहल भी हुई।

कहना न होगा कि जहां दलित मतदाताओं में भाजपा का ग्राफ बढ़ने लगा वहीं उनमें अन्य पार्टियों के ग्राफ घटने लगे; बावजूद इसके कि दलित समाज के लोग एक समय भाजपा को ‘ब्राह्मण पार्टी’ मानते रहे थे, और उस पार्टी तथा पार्टी के लोगों से किनारा करते रहे थे। पिछली शताब्दी तक यही हुआ। उसके बाद दलित राजनीति का भूगोल ही नहीं बदला बल्कि इतिहास भी बदलता गया। भाजपा के नेताओं ने दलित समाज में दखल बढ़ाया। आरएसएस की शाखाओं में भी दलितों का प्रवेश होने लगा। पिछली शताब्दी में ही भाजपा के कुछ नेताओं ने नागपुर स्थित दीक्षाभूमि पर दस्तक देने की भी हिमाकत की थी। हालांकि दीक्षाभूमि में भाजपा नेताओं का प्रवेश कराने के लिए कुछ दलित नेता भी जिम्मेवार थे। उसकी चर्चा महाराष्ट्र की दलित राजनीति में अच्छी-खासी हुई थी। इसलिए कि स्वयं दलित समाज के लोग नहीं चाहते थे कि भाजपा का कोई भी आदमी दीक्षाभूमि आए। याद रहे कि 14 अक्टूबर, 1956 को बाबासाहेब डॉ आंबेडकर ने नागपुर की दीक्षाभूमि में कई लाख दलितों के साथ बौद्धधर्म की दीक्षा ली थी।

इसे भाजपा की एक पहल भी कहा जा सकता है। पर भाजपा यहीं तक नहीं रुकी, मध्यप्रदेश के महू में भी जोर-शोर से आंबेडकर जयंती मनाने का कार्यक्रम पार्टी के तहत होने लगा। वैसे दिग्विजय सिंह के मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री रहने तक भाजपा ने प्रदेश में अच्छी-खासी ऊर्जा इकट्ठा कर ली थी। जिसका परिणाम तो होना ही था। अंतत: वही हुआ, प्रदेश में कांग्रेस की सरकार का जाना और भाजपा का आना। मुझे अच्छी तरह से याद है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में एक महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ। वह था 26 अलीपुर रोड में बाबासाहेब जिस बंगले में रहते थे, उसे सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा खरीद कर वहां आंबेडकर संग्रहालय की स्थापना करना। यह कार्य कांग्रेस सरकार के तहत दशकों से अटका था। इस तरह डॉ आंबेडकर प्रतिष्ठान के तहत कार्यक्रमों तथा योजनाओं को जोर-शोर से आगे बढ़ाया गया। उस समय सत्यनारायण जटिया केंद्रीय मंत्री थे। हाल ही में मोदी सरकार ने फैसला लिया कि जनपथ स्थित चार-पांच बंगलों की खाली कराकर वहां बाबासाहेब के नाम पर नए भवन का निर्माण कराया जाए। कहना न होगा कि भाजपा की राजनीति के रंग में आंबेडकर को तो रंगा ही गया, साथ ही दलित मतदाता भी अच्छे-खासे प्रभावित हुए।

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First Published on April 14, 2017 3:10 am

  1. A
    Aakash hiwale
    Apr 14, 2017 at 2:37 pm
    Remembering Bharat Ratna Dr B.R. Ambedkar, the Father of the Indian Cons ution on his 126th Birth Anniversary. महामानवाला विनम्र अभिवादन,
    Reply
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