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राजनीतिः गैस सबसिडी के बगैर

 गरीबों की अनदेखी करना एक कल्याणकारी राष्ट्र का चरित्र नहीं होता। धीरे-धीरे सबसिडी खत्म करने के तरीके को आर्थिक विशेषज्ञ भले यह कह कर उचित ठहराएं कि इससे एक बार में उपभोक्ता पर अधिक बोझ नहीं पड़ेगा। मगर इस तरीके से सरकार की यह मंशा भी जाहिर होती है कि वह धीरे-धीरे आम आदमी को महंगाई के प्रति अभ्यस्त बना देना चाहती है।
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

लोकसभा में रसोई गैस कनेक्शनों की अनियमितताओं से संबंधित एक प्रश्न का उत्तर देते हुए पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने बताया कि बीते एक जून से सरकार रसोई गैस सिलेंडरों की कीमतों में प्रतिमाह चार रुपए की बढ़ोतरी का आदेश तेल कंपनियों को दे चुकी है। इस आदेश के पीछे सरकार की योजना 31 मार्च, 2018 तक रसोई गैस सिलेंडरों से सबसिडी को पूरी तरह से खत्म कर देने की है। यदि मार्च तक सबसिडी समाप्त नहीं हुई तो इस मूल्यवृद्धि को आगे भी जारी रखा जा सकता है। इसके अलावा मंत्री महोदय ने यह जानकारी भी दी कि सबसिडी खत्म करने की दिशा में पिछले साल एक जुलाई से रसोई गैस सिलेंडरों पर प्रतिमाह दो रुपए की बढ़ोतरी की जा रही थी। इस दौरान यह बढ़ोतरी लगभग दस बार हुई। यह भी उल्लेखनीय है कि जीएसटी लागू होने के बाद, 11 जुलाई को भी सरकार ने सबसिडी वाले गैस सिलेंडरों पर बत्तीस रुपए की वृद्धि की थी।
इन सब तथ्यों को देखते हुए समझा जा सकता है कि सरकार बेहद चतुराई से रसोई गैस पर सबसिडी खत्म करने की दिशा में बढ़ रही है। यह ऐसी चतुराई है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। यानी कि सबसिडी खत्म भी हो जाए और जनता में कोई विशेष प्रतिक्रिया भी न हो। पेट्रोलियम मंत्री के बताने से पूर्व, यह बात देश में कम ही लोगों को ज्ञात रही होगी कि बीते एक वर्ष से हर महीने उनकी सबसिडी में से दो रुपए की कटौती हो रही थी। दरअसल, सबसिडी मिलने की मौजूदा प्रक्रिया ऐसी है कि कटौती का उपभोक्ता को कोई पता ही नहीं चल पाता होगा।

प्रक्रिया के अनुसार, पहले उपभोक्ता को सबसिडी-रहित मूल्य में सिलेंडर लेना होता है और फिर सबसिडी की रकम उसके खाते में पहुंचती है। सबसिडी-रहित सिलेंडरों के दामों में आए दिन कमी और वृद्धि होती रहती है, जिससे सबसिडी-युक्त सिलेंडरों की सबसिडी भी प्रभावित होती है। इस प्रकार उपभोक्ता को कभी थोड़ी अधिक तो कभी कुछ कम सबसिडी मिलती है। यानी कि सबसिडी की रकम में प्राय: अस्थिरता रहती है। ऐसी अस्थिरता के बीच यदि प्रतिमाह सबसिडी में दो रुपए की कटौती होती रही हो तो आम आदमी को उसका पता चलने की संभावना कम ही है। यहां दोष विपक्ष का भी है कि पूरे वर्ष सबसिडी में दो रुपए की कटौती होती रही और वह इस पर खामोश रहा। यह तो शुक्र है कि फिलहाल सदन में प्रश्नोत्तर के माध्यम से चार रुपए की कटौती संबंधी जानकारी खबरों में आ गई, वरना संभव है कि गैस उपभोक्ताओं की गैरजानकारी में यह कटौती भी होती रहती।

दरअसल, सबसिडी खत्म करने की यह तरीका सरकार को पिछले साल की शुरुआत में कुछ अर्थशास्त्रियों ने सुझाया था। अर्थव्यवस्था को उच्च आर्थिक वृद्धि दर के मार्ग पर लाने के लिए अर्थशास्त्रियों ने आम बजट 2016-17 में कुछ अलोकप्रिय कदम उठाने और कठोर राजकोषीय अनुशासन में ढिलाई बरतने का सुझाव दिया था। अर्थशास्त्रियों का कहना था कि सरकार को रसोई गैस सबसिडी को खत्म कर देना चाहिए। इसके बाद ही सरकार ने पिछले वर्ष से सबसिडी में प्रतिमाह दो रुपए की कटौती की योजना पर अमल शुरू किया था।
बहरहाल, अब सवाल यह उठता है कि सरकार का सबसिडी खत्म करने का यह कदम कितना उचित है? यह ठीक है कि भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था और राजकोषीय घाटे से जूझ रहे देश के लिए सबसिडी कोई अच्छी चीज नहीं कही जा सकती। पर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि संवैधानिक रूप से भारत एक कल्याणकारी राज्य है, अत: सरकार का दायित्व बनता है कि वह समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से संसाधनों का वितरण सुनिश्चित करे।

अर्थव्यवस्था की मजबूती के महत्त्वाकांक्षी मोह में गरीबों की अनदेखी करना एक कल्याणकारी राष्ट्र का चरित्र नहीं होता। दूसरी बात कि सरकार का सबसिडी खत्म करने का यह तरीका भी बेहद गलत है। धीरे-धीरे सबसिडी खत्म करने के इस तरीके को आर्थिक विशेषज्ञ भले यह कहकर उचित ठहराएं कि इससे एक बार में उपभोक्ता पर अधिक बोझ नहीं पड़ेगा। मगर इस तरीके से सरकार की यह मंशा भी प्रतीत होती है कि वह धीरे-धीरे आम आदमी को महंगाई के प्रति अभ्यस्त बना देना चाहती है।
गौर करें तो अभी सरकार द्वारा निर्धारित बत्तीस रुपए प्रतिव्यक्ति दैनिक आय के गरीबी रेखा निर्धारित करने वाले अनुचित मानक के बावजूद आधिकारिक तौर पर देश की लगभग 22 फीसद आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रही है। इस आबादी की आर्थिक दशा यह है कि सबसिडी के बावजूद रसोई गैस का नियमित रूप से उपयोग कर पाना इसके लिए संभव नहीं है। ऐसे में, रसोई गैस पर से सबसिडी समाप्त कर देना, इस आबादी की मुश्किलें और बढ़ाने वाला कदम ही कहा जाएगा। रसोई गैस भोजन जैसी जीवन की एक बुनियादी जरूरत से संबंधित संसाधन है, अत: देश की गरीब जनता के लिए उसके उपयोग को और महंगा बनाना उचित नहीं कहा जा सकता।

इस संदर्भ में यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने 1 मई, 2016 को प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत की, जिसके तहत देश के पांच करोड़ गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन वितरित करने का लक्ष्य रखा गया था। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, अब तक इस योजना के तहत दो करोड़ चौंसठ लाख से अधिक गैस कनेक्शन वितरित किए जा चुके हैं। अब सरकार को बताना चाहिए कि जिन गरीब परिवारों की आर्थिक दशा ऐसी भी नहीं थी कि कुछ हजार रुपए जुटा कर एक अदद गैस कनेक्शन ले सकें, वे परिवार क्या सबसिडी समाप्त होने के बाद महंगी दरों पर उज्ज्वला योजना के तहत मिले गैस सिलेंडर का नियमित उपयोग कर पाएंगे? प्रधानमंत्री कहते हैं कि इस योजना के जरिये वे माताओं-बहनों को धुएं से मुक्ति दिलाना चाहते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या रसोई गैस सबसिडी खत्म करके खुद सरकार अपनी इस योजना के लक्ष्यों की मिट्टी पलीद नहीं कर रही? एक आंकड़े के मुताबिक अभी देश में साढ़े उन्नीस करोड़ से अधिक एलपीजी कनेक्शन हैं।

सरकार ने 2019 तक देश की पंचानवे प्रतिशत आबादी को रसोई गैस उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है। संभव है सरकार अपने इस लक्ष्य में कामयाब भी हो जाए। मगर गैस भरवाना महंगा होने पर इसमें से बहुतायत गरीब लोग, गैस सिलेंडर होते हुए भी, लकड़ी-चूल्हे का रुख कर लेंगे। ऐसे में घर-घर में रसोई गैस सिलेंडर पहुंचाने के सरकार के लक्ष्य का क्या अर्थ रह जाएगा? घर में गैस सिलेंडर होने के बावजूद लोग लकड़ी के चूल्हे का रुख कर धुएं से जूझने को मजबूर होंगे। जरूरत है कि सरकार इस स्थिति को समझे और फिलहाल रसोई गैस सबसिडी समाप्त करने के अपने इरादे पर विराम लगाए। भोजन जैसी बुनियादी जरूरत से जुड़े संसाधन (रसोई गैस) की सबसिडी तब तक जारी रखना हमारा दायित्व है, जब तक हम देश के गरीब तबके की प्रतिव्यक्ति आय को एक उचित स्तर तक पहुंचाने में कामयाब नहीं हो जाते।
अब रही बात राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए खर्चों में कटौती की, तो सरकार उसके लिए केंद्रीय वेतन आयोगों समेत अन्य सरकारी खर्चों में कटौती करने जैसे अन्य विकल्पों पर विचार कर सकती है। लेकिन रसोई गैस से सबसिडी खत्म करना इसका उचित विकल्प नहीं है।

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