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राजनीतिः ताकि चुनाव में भरोसा बना रहे

चुनाव व्यवस्था पर उठे संदेह को दूर करने के लिए वीवीपैट वाली ईवीएम मशीनों का इस्तेमाल निश्चित ही भविष्य में लाभकारी साबित होगा। जनता बिना किसी दुविधा के वोट डालने में समर्थ होगी। इस तरह चुनाव आयोग जनता के समक्ष चुनाव की पारदर्शिता को साबित करने में सफल हो सकेगा। उम्मीद की जा सकती है कि आयोग की होने जा रही बैठक के कुछ अच्छे परिणाम आएंगे।
Author May 13, 2017 02:02 am
ईवीएम की फाइल फोटो। (Source: PIB)

स्मृति मिश्रा

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां पर जनता को वोट डाल कर अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार प्राप्त है। किसी भी चुनाव के बाद जनता को पूरा विश्वास होता है कि विजेता घोषित किया गया उम्मीदवार स्वयं उनका चुना हुआ है। लेकिन राजनीतिक पार्टियां अपने फायदे के लिए या अपनी कमजोरी को ढांपने के लिए जनता के इस विश्वास से खिलवाड़ करने से बाज नहीं आ रहीं। चुनाव आयोग ईवीएम पर बढ़े संदेह को दूर करने के लिए बैठक बुला चुका था। बैठक की तारीख तय हो जाने के बावजूद आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ईवीएम में गड़बड़ी का मुद््दा फिर से उठा दिया। क्या इसी के लिए दिल्ली विधानसभा का एक दिन का विशेष सत्र बुलाया गया था! यह बात समझ से परे है कि उन्होंने चुनाव आयोग की बैठक होने तक इंतजार क्यों नहीं किया।

हालांकि ईवीएम के खिलाफ बोलने का मतलब तब होता जब चुनाव आयोग आपत्तियों का संज्ञान न ले रहा होता। वह न केवल उनका संज्ञान ले रहा है बल्कि भविष्य में ईवीएम के साथ छेड़छाड़ न हो सके इसकी बची-खुची आशंकाओं को भी दूर करने के प्रयास कर रहा है। आयोग ने लोगों में ईवीएम को लेकर बढ़ती शंकाएं दूर करने के लिए ईवीएम में वीवीपैट (वोटर वेरिफाइड पेपर आॅडिट ट्रेल) मशीन लगाने का निर्णय लिया है। वीवीपैट मशीन के जरिए मतदान करते ही मतदाता के सामने मशीन पर उस चुनाव निशान का फोटो आ जाता है जिसे उसने वोट दिया है। सात सेकंड बाद वीवीपैट से उसकी पर्ची एक बक्से में गिर जाती है। इस तरह से मतदाता जान पाएगा कि उसका वोट किसे मिला है। इसका फायदा यह होगा कि यदि बाद में कोई चुनाव नतीजे को लेकर संदेह जताता है तो पर्चियों की गिनती कर सारे विवाद को खत्म किया जा सकता है।

भविष्य में वीवीपैट मशीनों के जरिए चुनाव में पारदर्शिता की गारंटी देना संभव है। सरकार ने 2019 के लोकसभा चुनाव में वीवीपैट वाली ईवीएम मशीन का इस्तेमाल करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। सरकार ने वीवीपैट लगाने के लिए 3173 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इस राशि से 16 लाख 15 हजार वीवीपैट मशीनें खरीदी जाएंगी। हालांकि ऐसी सोलह लाख मशीनें बनने में लगभग तीस माह लगते हैं। लेकिन चुनाव आयोग के आग्रह पर कंपनी अठारह माह के भीतर मशीनें उपलब्ध कराने को राजी हुई है। इससे उम्मीद है कि इस साल के आखीर में होने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में वीवीपैट वाली ईवीएम मशीनों के जरिए वोट डाले जाएंगे। चुनाव आयोग के इस ठोस कदम से आने वाले चुनावों में जनता का भरोसा बढ़ेगा। चुनाव प्रक्रिया पर अविश्वास देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी एक प्रश्नचिह्न छोड़ जाता है। इन मशीनों के इस्तेमाल से, भावी चुनावों को विवाद से बचाया जा सकता है। इस बार के चुनाव के बाद जिन लोगों के मन में कुछ शंकाएं उत्पन्न हुई थीं, इन मशीनों के जरिए आने वाले चुनावों में उनका निराकरण किया जा सकेगा।

हालांकि ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल पहली बार नहीं उठे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी 2009 के चुनाव से पहले इस तरह के सवाल उठा चुके थे। फिर, ईवीएम में वीवीपैट मशीन लगाने की बात 2010 में भी उठी थी। सुब्रमण्यम स्वामी ने न्यायालय में इसके लिए याचिका दी थी। स्वामी की याचिका पर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने ईवीएम में वीवीपैट लगाने का निर्देश दे दिया था। स्वामी अब भाजपा के सांसद हैं। चुनाव आयोग ने निर्देश आते ही 2013 में 20,300 मशीनें खरीद ली थीं। उसने 2015 में 67,000 मशीनों का आॅर्डर दिया था, जिनमें से 33,500 मशीनें आयोग को उपलब्ध हो चुकी हैं। हालांकि पिछले दिनों इस मामले पर गंभीरता से विचार किया गया, क्योंकि पांच राज्यों खासकर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कुछ राजनीतिक दलों ने ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप बार-बार लगाए।

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत से अन्य पार्टियां बौखला गर्इं। वे अपनी हार का जिम्मा ईवीएम पर मढ़ने लगीं। इन पार्टियों का कहना था कि ईवीएम में गड़बड़ी की गई इसलिए उनकी हार हुई। ईवीएम में गड़बड़ी की बात सबसे पहले बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने कही थी। उनका कहना था कि भाजपा सरकार ने ईवीएम में गड़बड़ी कर बसपा को जाने वाले वोट भी भाजपा की ओर डलवा दिए। वहीं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कहा कि अगर मायावतीजी कुछ कह रही हैं तो उनकी बात पर गौर किया जाना चाहिए; चुनाव आयोग को ईवीएम की जांच करानी चाहिए। इनको भी 2012 में भारी बहुमत प्राप्त हुआ था तब इस गड़बड़ी का अंदाजा नहीं हुआ। अखिलेश यादव ने यहां तक कहा कि अगर खराब मशीनों को ठीक किया जा सकता है, तो ठीक मशीनों को खराब भी किया जा सकता है।

ईवीएम पर इतने सवाल उठने के बाद चुनाव आयोग से ईवीएम की जांच कराने की मांग की गई। पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद विपक्ष ने एक तरह से ईवीएम के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। विपक्ष की जांच की मांग के जवाब में चुनाव आयोग ने कहा कि जिन्हें ईवीएम पर संदेह हो वे पहले खुद ईवीएम में गड़बड़ी करके दिखाएं। हालांकि आयोग के इस एलान पर किसी की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। तो क्या ईवीएम पर संदेह जताना सिर्फ उनकी हार का नतीजा था? क्योंकि वे भी जानते थे कि ईवीएम में गड़बड़ी करना इतना आसान नहीं है।

मगर ईवीएम पर आरोप का सिलसिला थमा नहीं। दिल्ली में एमसीडी के चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) ने अपनी हार के बाद एक बार फिर ईवीएम पर निशाना साधा। हालांकि इस बात को लेकर पूरी पार्टी में बहुत हद तक मतभेद भी रहा। पार्टी के कुछ सदस्य हार को स्वीकार करते हुए मान रहे थे कि इस बार वे जनता के साथ संपर्क कायम करने में विफल रहे हैं, जिसकी वजह से जनता ने उनका साथ नहीं दिया। विपक्ष ने ईवीएम को लेकर कई अभियान चलाए। जनता में उसका विश्वास कम करने की कोशिश की। न्यायालय में ईवीएम की जांच कराने की याचिका भी दायर की। लेकिन उनकी सारी कोशिशें बेअसर साबित हुर्इं।

न्यायालय ने उनकी याचिका को रद््द करते हुए ईवीएम में गड़बड़ी को नकार दिया। ईवीएम संबंधी बहस के दौरान, छिटपुट तौर पर ही सही, कई बार यह मांग भी उठाई गई है कि मतदान पुरानी पद्धति यानी बैलेट पेपर वाली पद्धति से हो। लेकिन यह मांग बेतुकी तो है ही, एक कड़वे अनुभव की याद दिलाती है। सब जानते हैं कि बैलेट पेपर से मतदान के जमाने में बूथ-कब्जे की कितनी घटनाएं होती थीं, और इससे कमजोर तबकों का ही लोकतांत्रिक हक मारा जाता था। ईवीएम ने उस बीमारी से निजात दिलाई। इसलिए जरूरत ईवीएम को हटाने की नहीं, उसे संदेह से परे बनाने की है। देश में चुनाव व्यवस्था पर जनता का विश्वास बनाए रखने की जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टियों की होती है। लेकिन राजनीतिक पार्टियों की यह फितरत होती है कि जीत होने पर तो उन्हें सब कुछ ठीक नजर आता है, हार होने पर वे उसे आसानी से पचा नहीं पाती हैं। वे यह भी नहीं देखती हैं कि उनकी कोई प्रतिक्रिया किस कदर जनता को प्रभावित कर सकती है।

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