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पुरानी राजनीति की लू में झुलसी बासंती बयार

देश की राजनीति में आम आदमी पार्टी का आगमन एक ताजा हवा के झोंके की तरह हुआ था।
Author April 22, 2017 02:46 am
दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल

देश की राजनीति में आम आदमी पार्टी का आगमन एक ताजा हवा के झोंके की तरह हुआ था। लेकिन यह बासंती बयार भी उसी पुरानी राजनीती की लू में खो गई लगती है जिसका विकल्प बनने का दावा था। निस्संदेह ‘आप’ पर उम्मीदों का बोझ ज्यादा था। परंतु उसका भार निर्वहन करने में जिस तरह की असंवेदनशीलता दिखाई गई वह निराशाजनक है। ईमानदार राजनीति के स्वघोषित झंडाबरदार केजरीवाल जी को यह नहीं भूलना चाहिए कि नैतिकता सापेक्ष नहीं बल्कि निरपेक्ष होती है। यदि एक व्यक्ति दस रुपए की चोरी करता है और दूसरा पांच रुपए की तो इसका अर्थ यह नहीं है कि रुपए की चोरी करने वाला व्यक्ति चोर नहीं ईमानदार है।
आप के साथ सकारात्मक पक्ष इसकी युवाशक्ति है। लेकिन यही ताकत अब अनुभवहीनता की वजह से कमजोरी जैसी भी लगनी लगी है। ज्यादातर ‘आप’ विधायक राजनीति की नई पौध का हिस्सा थे जिन्हें न ही स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास करने दिया गया और न ही खुद विधायकों द्वारा सकारात्मक राजनीतिक अभिवृत्ति (एटिट्यूड) के उपार्जन का यथेष्ट उदाहरण दिखता है।
ऐसा भी नहीं है कि तस्वीर पूरी काली है। केजरीवाल सरकार ने कई मोर्चों पर अच्छा काम भी किया है। मोहल्ला क्लीनिक एवं समितियां प्रशंसनीय योजनाएं हैं। लेकिन इनकी प्रासंगिकता भी सफल प्रशासन पर ही निर्भर करती है।
आप की कथनी एवं करनी के इस अंतर से उम्मीद क्षीण हुई है पर खत्म नहीं। अभी भी आम आदमी के एक बड़े तबके की उम्मीदें मफलर लपेटे अपने से लगने वाले उसी आदमी से जुड़ी हुई है। जरूरत है कि केजरीवाल साहब ट्विटर की रुमानी दुनिया से निकल जमीनी हकीकत से वाकिफ हों।
यह उपचुनाव कथनी एवं करनी के इस अंतर पर आप एवं उसके निजामों के लिए जनता की ओर से गुजारिश के साथ चेतावनी भी है। अपने वादे के अनुसार भ्रष्टाचार एवं कुशासन पर झाड़ू फिराइए, जनता की उम्मीदों पर नहीं।
– विकल्प सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय।
कहां खो गए अण्णा के एकलव्य
आंदोलनों से राजनीतिक पार्टी के जन्म का मामला कोई नया नहीं हैं। जेपी आंदोलन हो या लोहिया का आंदोलन या 2011 का अण्णा का आंदोलन। हर बार लोगों ने आंखें मूंद कर इन से निकले दलों में आस्था दिखाई है। दिल्ली के रामलीला मैदान से अण्णा के एकलव्य अरविंद केजरीवाल गुरु दक्षिणा देने के बजाए आंदोलन की छाती पर पैर रख भारत की दलगत राजनीति में कूद पड़े। जिस कांग्रेस के भ्रष्टाचार का हवाला देकर ‘आप’ ने 28 सीटें जीतीं फिर उसी कांग्रेस से हाथ मिला सरकार बनाई, फिर बड़े नाटकीय ढंग से मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। यह जनता के भरोसे को पहली ठेस थी। लेकिन लोगों की आस्था तो तब भी ज्यों की त्यों रही जब 70 में से 67 सीटों की अविश्वसनीय जीत ‘आप’ के पास थी। लेकिन तब तक प्रचंड जीत का सुरूर सिर चढ़ चुका था। फिर नीली वैगनार छोड़ लाल बत्ती वाली सरकारी गाड़ी से लेकर, सरकारी बंगला हो या अपने विधायकों की वेतन बढ़ोतरी। विवादों से ‘आप’ का नाता तब गहरा गया जब आंतरिक लोकतंत्र का गला घोट योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण जैसे मुख्य नेताओं को महज इसलिए बाहर कर दिया गया कि उन्होंने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की कार्यशैली पर सवाल खड़ा किया। जिस ‘जनलोकपाल’ की बदौलत ‘आप’ अस्तित्व में आई थी आज वह ठंडे बस्ते में है। शुगंलू समिती की रिपोर्ट में मोहल्ला क्लीनिक में स्वास्थ-मंत्री की पुत्री की नियुक्ति को अवैध करार दिया है। वही विज्ञापनों पर 29 करोड़ के खर्च मामले में सीएजी सरकार को चेतावनी दे चुका है। भारत ने जिस तीसरे विकल्प की तलाश की थी आज वह भी ‘सत्ता लोभी’ और ‘सुखभोगी’ बन कर रह गया है।
-गौरव सागवाल कौल, (छात्र) कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय।
विकासवादी बनना चाहिए
हमें जाति, धर्म को छोड़कर  राष्ट्रवादी के साथ विकासवादी बनना चाहिए ।
-मनीष प्रजापति

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