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ऐसी सहायता पर मुग्ध मत होइए

नेपाल में पुनर्निर्माण के लिए कितनी धनराशि चाहिए? अमेरिका के कोलराडो स्थित संस्था ‘आइएचएस’ के एशिया-प्रशांत मामलों के मुख्य आर्थिक सलाहकार राजीव विश्वास का आकलन है कि इसके लिए कम से कम पांच अरब डॉलर की आवश्यकता होगी। लेकिन नेपाल के दुर्गम गांवों से लेकर राजधानी काठमांडो तक तबाही की सही तस्वीर जैसे-जैसे सामने आएगी, […]
Author April 29, 2015 09:17 am
नेपाल में आए भूकंप में मृतकों के पहचान के लिए उन्हें नंबर दिया गया है। (फ़ोटो-रॉयटर्स)

नेपाल में पुनर्निर्माण के लिए कितनी धनराशि चाहिए? अमेरिका के कोलराडो स्थित संस्था ‘आइएचएस’ के एशिया-प्रशांत मामलों के मुख्य आर्थिक सलाहकार राजीव विश्वास का आकलन है कि इसके लिए कम से कम पांच अरब डॉलर की आवश्यकता होगी। लेकिन नेपाल के दुर्गम गांवों से लेकर राजधानी काठमांडो तक तबाही की सही तस्वीर जैसे-जैसे सामने आएगी, पांच अरब की राशि भी कम पड़ने लगेगी। 1832 में बने धरहरा टॉवर के बस निशान बाकी हैं। किसी ने सोचा न था कि 1934 के बाद एक बार फिर प्रकृति का कहर इस पर टूटेगा, और इसके नौ मंजिल वाले मलबे के नीचे एक सौ अस्सी लाशें मिलेंगी। काठमांडो में अधिकतर नौ मंजिली इमारतें धराशायी हुई हैं, यह भी एक संयोग है। काठमांडो के सुंधारा मार्ग स्थित नौ मंजिला धरहरा टॉवर के अलावा, नयां बस पार्क का एक नौ मंजिला गेस्ट हाउस और नौ मंजिला बसंतपुर दरबार स्क्वायर चंद उदाहरण हैं।

यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत घोषित की गई सदियों पुरानी दूसरी इमारतों को दोबारा उनकी पुरानी हालत में लाना, दुनिया भर के पुरातत्त्वविदों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। इनमें सोलहवीं सदी का काष्ठमंडप, जिसकी वजह से काठमांडो नाम पड़ा, पंचताले मंदिर, कुमारी मंदिर, तेलुजू भवानी, ‘स्वयंभूनाथ-महाबौद्ध और पशुपतिनाथ’ इन तीनों के बाहरी हिस्से, रत्ना मंदिर, बौद्धनाथ स्तूप, रानी पोखरी, दरबार हाई स्कूल, दशावतार मंदिर, कृष्णा मंदिर, गौशाला स्थित जय बागेश्वरी मंदिर, गोरखा दरबार, मनोकामना मंदिर ऐसे स्थल हैं, जिन्हें देखने के वास्ते दुनिया भर के पर्यटक नेपाल आते थे। इस समय नेपाल के पर्यटन उद्योग का लगभग सत्यानाश हो चुका है।

जो ऐतिहासिक धरोहरें भूकम्प में बर्बाद हुर्इं, वहां पर लावारिस पड़ी सदियों पुरानी मूर्तियां क्या सुरक्षित हंै? सच तो यह है कि आपदा की अफरातफरी में ऐसे असामाजिक तत्त्व मौके की ताक में रहते हैं। देश से बाहर जमीनी मार्ग से जो लोग निकलते हैं, उनकी सुरक्षा-जांच भूकम्प के भौकाल के कारण सख्ती से नहीं होती। इसलिए निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि नेपाल की विरासत सौ फीसद सुरक्षित है। ललितपुर स्थित ‘यूनेस्को नेपाल’ की ओर से ऐसा कोई बयान नहीं आया है, जिसके बिना पर हम मान लें कि जो मूर्तियां, प्राचीन कलाकृतियां सड़कों पर बिखरी हैं, वे सहेज ली गई हैं। यूनेस्को-नेपाल ने कभी इस पर आपत्ति नहीं दर्ज कराई कि विश्व -विरासत के रूप में घोषित इमारतों के इर्दगिर्द बहुमंजिला इमारतें क्यों बन रही हैं। लेकिन भूगर्भशास्त्री भी स्वीकार करते रहे हैं कि प्राचीन इमारतों के इर्दगिर्द बनी अट्टालिकाएं आपदा के समय सबसे अधिक खतरनाक साबित होती हैं।

इस समय नेपाल हिंदू राष्ट्र नहीं है। यह भी लोग जानते हैं कि प्राकृतिक आपदाएं मंदिर, मस्जिद, चर्च चुन-चुन कर धराशायी नहीं करतीं। न ही ये आपदाएं धर्म के आधार पर इंसानों में भेद करती हंै। लेकिन भाजपा के आनुषंगिक संगठनों के नेता आपदा में भी राजनीति करने पर आमादा दिखते हैं। बिहार के गोपालगंज में सोमवार को विराट हिंदू समागम था, जहां विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया पधारे हुए थे। तोगड़िया ने बयान दिया कि नेपाल में सबसे अधिक हिंदुओं का घर उजड़ा है, इसलिए धन संग्रह करें और नेपाल भेजें। तोगड़िया ने एलान किया कि भूकम्प में मृत हिंदुओं के बच्चों को विश्व हिंदू परिषद अपनी शरण में लेगी और उनकी मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था करेगी। ऐसा ही बयान किसी मुसलमान देश का कठोरपंथी नेता दे, तब क्या होगा, या वैटिकन की ओर से सिर्फ नेपाल के ईसाइयों के लिए सहायता की घोषणा हो, तो कैसा लगेगा? अभी ब्रिटेन की ‘क्रिश्चियन एड’ नामक संस्था दस लाख पौंड की मदद नेपाल भेजेगी, लेकिन उसके आयोजकों ने यह नहीं कहा कि यह राशि सिर्फ नेपाली ईसाइयों के लिए है।

अशोक सिंघल के समय से ही विहिप, ‘हिंदू राष्ट्र नेपाल’ घोषित किए जाने के पुराने एजेंडे पर काम कर रही है। पर यह दुखद है कि विहिप नेता अंतरराष्ट्रीय त्रासदी को भी धर्म के चश्मे से देख रहे हैं। सवाल यह है कि प्रवीण तोगड़िया ने जो कुछ नेपाल के बारे में कहा, उससे क्या आम हिंदुस्तानी सहमत हैं? शायद यही वजह है कि अभी बाबा रामदेव जिस सेवाभाव से काठमांडो में टिके हुए थे, पांच सौ बच्चों को गोद लेने का एलान किया, उससे उनकी मंशा को सर्व धर्म समभाव वाले शक की नजर से देख रहे थे।

नेपाल में ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ (एचएसएस), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे पर काम कर रहा है। लोगबाग नेपाल में गठित ‘एचएसएस’ को ‘आरएसएस’ की फोटोकॉपी ही मानते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले, कई सारे कार्यकर्ताओं के साथ नेपाल पहुंच चुके हैं और भूकम्प पीड़ितों की सहायता कर रहे हैं।

यहां तक तो ठीक है। लेकिन जिस तरह से चैनलों और सोशल मीडिया पर भाजपा के कुछ नेता इसे ‘विजय अभियान’ के रूप में भुनाने लगे हैं, उससे सारे किए पर पानी फिरने का खतरा बना हुआ है। यह सब देख कर बाबा राम-रहीम इंसा का ‘सेवा भाव’ भी हिलोरें मार रहा है। उन्होंने अदालत से पासपोर्ट देने और नेपाल जाने की अनुमति मांगी है, ताकि भूकम्प पीड़ितों की मदद कर सकें। अभी कई साध्वियां और बाबा हिमालय की ओर कूच करेंगे। लेकिन ये लोग सचमुच मदद के भाव से जाएं तो यह मानवता के लिए बहुत सराहनीय कार्य होगा, लेकिन उनके द्वारा ‘कूटनीतिक लक्ष्मण रेखा’ पार किए जाने का डर बराबर बना रहेगा। नेपाल के प्रतिक्रियावादी ऐसे ही अवसर की तलाश में हैं कि जरा-सी राजनीति हो, फिर भारत के विरुद्ध झंडा और डंडा लेकर निकला जाए। पता नहीं मोदीजी इसकी गंभीरता से कितना वाकिफ हैं।

प्रधानमंत्री मोदी इस समय ‘मुग्धम भाव’ से गुजर रहे हैं। पूरी संसद अगर ‘वाह मोदीजी’ के समवेत स्वर के साथ खड़ी हो, देश के गृहमंत्री प्रशंसा के पुष्प बरसा रहे हों, तो ऐसे में भूमि अधिग्रहण विधेयक पर चारों ओर से समर्थन दिखने लगता है। इस आह और वाह के शोर में विदेशमंत्री सुषमा स्वराज नजर नहीं आ रही हैं। पड़ोसी देश में चल रही राहत-व्यवस्था में क्या विदेशमंत्री की भूमिका नेपथ्य में रहनी चाहिए? संसद में सपा सांसद रामगोपाल यादव काठमांडो स्थित भारतीय दूतावास की भूमिका को लेकर सवाल खड़े कर रहे थे, तो उसका बेहतर जवाब विदेशमंत्री ही दे सकती थीं। नेपाल में घायलों की संख्या दस हजार से कम नहीं है। दुर्गम क्षेत्र के लोगों को चिकित्सा मुहैया कराना, मलबे में दबे लोगों को निकालना, मृतकों की अंत्येष्टि, किसी तरह की महामारी पर रोक, सबसे बड़ी चुनौती है। भारतीय सेना, वायु सेना और राष्ट्रीय आपदा कार्रवाई बल (एनडीआरएफ) के जवान सलाम के लायक हैं, जो नेपाल में मदद के लिए उतरे हैं।

हमारे जवान, नेपाली सेना के एक लाख सैनिकों के साथ तालमेल कर रहे हैं, उससे हर भारतीय को गर्व होता है। सहायता कार्य में समन्वय के लिए विदेश सचिव एस. जयशंकर, गृह सचिव एलसी गोयल, रक्षा सचिव आरके माथुर मीडिया ब्रीफिंग में जिस तरह से उपलब्ध दिख रहे हैं, उससे नौकरशाही में चुस्ती का समां बंध रहा है, और ‘आपदा कूटनीति’ के नए आयाम दिख रहे हैं। मोदीजी के चाहने वालों ने इसे नए ब्रांड से पहचाना है, और नाम दिया है- ‘आपदा कूटनीति!’ इसकी शुरुआत यमन से हो गई थी। जिसका डर था, वही हुआ। चीन को यह बात चुभ गई है।

चीन ने नेपाल सरकार से शिकायत की है कि सहायता के नाम पर भारत को दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच का अवसर ज्यादा दिया जा रहा है। चीन को लगता है कि भारतीय सैनिक खुफिया एजेंसियों ने तिब्बत सीमाओं तक की ‘रेकी’ कर ली है। चीनी सहायता दल नेपाल में तुर्की और पाकिस्तानी टीम से तालमेल कर कार्य कर रहा है, इसमें भी एक ‘नेक्सस’ बनाए जाने की बू आ रही है। इस साल चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग को नेपाल आना है, इसलिए चीन को अपने प्रभामंडल के क्षीण होने का डर भी सता रहा है।

‘एनएसए’ की पूर्व उप प्रमुख लीला के पोनप्पा मानती हैं कि इस बार सरकार ज्यादा ‘आर्गेनाइज्ड’ है। पोनप्पा कहती हैं, ‘2004 में सुनामी के समय हम तेजी से सहायता के लिए आगे बढ़े थे। 2008 में नरगिस तूफान के समय भारत ने म्यांमा की ऐसी ही मदद की थी, और 1998 में बांग्लादेश में बाढ़ के दौरान भारत ने बीस हजार टन चावल भेजे थे।’ लेकिन तब और अब में फर्क यही है कि नेतृत्व के स्तर पर पड़ोस में सहायता के लिए श्रेय लेने की कोशिश नहीं हुई थी।

मोदीजी के नेतृत्व में भारतीय सहायता की गगनभेदी गूंज के आगे हम देखने-सुनने की स्थिति में नहीं हैं कि नेपाल में दूसरी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां सहायता कार्यों में लगी हुई हैं। नेपाल में रेडक्रॉस के पंद्रह सौ कार्यकर्ता और तीन सौ अधिकारी भूकम्प प्रभावित इलाकों में फैले हुए हैं। कोका कोला, पेप्सी जैसी कंपनियां पीने का पानी उपलब्ध कराने का जिम्मा ले चुकी हैं। फूड कंपनी ‘केलौंग’ ने बीस लाख डॉलर की सहायता विश्व खाद्य कार्यक्रम के माध्यम से नेपाल को भेजी है। टोयटा ने चौरासी हजार डॉलर नेपाल को भेजे हैं। गूगल और फेसबुक लोगों की तलाश में अपने ‘टूल’ का इस्तेमाल कर रही हैं।

चीन आपदा के दूसरे दिन बासठ सदस्यों के दल और श्वान-दस्ते को नेपाल में उतार चुका था। चीन बत्तीस लाख डॉलर की आर्थिक सहायता नेपाल भेज रहा है। अंतरराष्ट्रीय रेडक्रॉस और रेड क्रीसेंट सोसाइटी 3 करोड़ 52 लाख डॉलर की सहायता नेपाल को देगी। अमेरिका ने एक करोड़ डॉलर की मदद की घोषणा की है। ब्रिटेन से नेपाल को छिहत्तर लाख डॉलर की रकम मिलेगी। कनाडा ने इकतालीस लाख डॉलर, नार्वे ने चालीस लाख डॉलर, आस्ट्रेलिया ने भी इतनी ही रकम भेजने की घोषणा की है। यूरोपीय संघ से तैंतीस लाख डॉलर की मदद नेपाल ने प्राप्त कर ली है।

इतनी रकम से नेपाल में सहायता का काम तो चल जाना चाहिए। लेकिन ध्वस्त प्राचीन इमारतों को वापस वैसा ही बनाने और उजड़े लोगों को बसाने के वास्ते एक अंतरराष्ट्रीय कोष की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में काम होना चाहिए। यह इसलिए जरूरी है कि सहायता के नाम पर बड़े स्तर पर घोटाले का अंदेशा बना रहता है। राजनीति होती है, सो अलग।

नेपाल में शांति प्रक्रिया के दौरान माओवादी नेतृत्व पर संयुक्त राष्ट्र सहयोग संस्था (अनमिन) के करोड़ों डॉलर डकार लिए जाने के आरोप लगे थे। आपदा राहत के समय विदेशी सैलानियों का सहयोग देख कर उनसे बहुत कुछ आत्मसात करने की प्रेरणा मिलती है। कल तक जो पश्चिमी पर्यटक नेपाल के पांचसितारा होटलों और रिसॉर्ट में थे, वे फावड़ा, कुदाल, और टोकरी लेकर मलबा हटा रहे थे। उनका आशियाना इन दिनों खुला आसमान, या फिर रस्सियों के सहारे तनीं प्लास्टिक शीट्स हैं!

 

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  1. S
    Sandeep K
    Apr 29, 2015 at 11:49 am
    China ko bat chubh gyi hai to tum itna kyu ghabra rhe ho. Jab China kasmir mai ghusta hai me sath tb tmhe kuch nhi chubhta.Just shame on you. Support Bhartiya government, its doing very good work for Nepal.
    (0)(0)
    Reply