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डिजिटल माया में सिकुड़ता समाज

समाज के प्रारंभ में अंधविश्वास का चरण था जिसमें तर्कहीनता और अनुकरण की प्रवृत्ति थी। फिर वैज्ञानिक चरण आया जिसमें बुद्धिवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विश्लेषण और तर्क का रुझान समाज में प्रबल हुआ। अब ऐसा लगता है कि हम फिर से अनुकरण और तर्कहीनता की ओर जा रहे हैं। विडंबना यह है कि यह टेक्नोलॉजी-जनित तर्कहीनता है।
Author July 17, 2017 03:25 am
सोशल मीडिया।

आज यह माना जा रहा है कि डिजिटल टेक्नोलॉजी हमारी हर समस्या का समाधान है। अब टेक्नोलॉजी हमारे जीवन के सभी पक्षों को निर्धारित करती है। लेकिन इस टेक्नोलॉजी निर्देशित ज्ञान ने विचार, नवाचार, कल्पना तथा सृजनात्मकता को गायब कर दिया है, या कह सकते हैं कि अब इन्हें चुनौती मिल रही है। साथ ही इसने अनुकरण करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है और तर्क करने की क्षमता को समाप्तप्राय कर दिया है।डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया ने परिवार को भी विस्थापित कर दिया है, अर्थात प्राथमिक समाजीकरण जो पहले परिवार का दायित्व था, वह अब डिजिटल मीडिया करने लगा है, इसलिए अब इनके द्वारा उत्पन्न विचारों/सूचनाओं को हम बिना संदेह के विश्वसनीय और प्रामाणिक मानने लगे हैं। परिणामस्वरूप बच्चे ‘बंधक मस्तिष्क’ और ‘सीमित व्यक्तित्व’ बनते जा रहे हैं। नील पोस्टमैन के अनुसार ‘आज की पीढ़ी विचारहीन विचारों से भरी नकलची पीढ़ी है, उसके पास केवल फंडे हैं/जुमले हैं, विचारधारात्मक चिंतन नहीं है, अर्थात उसमें चिंतनशील भाषा का अभाव है। कहा जा रहा है कि हम ‘ज्ञानात्मक समाज’ की ओर अग्रसर हैं, पर ‘विचारशून्यता’ के साथ क्या यह संभव है? मीडिया/डिजिटल टेक्नोलॉजी ने बच्चों को ‘सीमित व्यक्तित्व’ बनाया है; उन्हें एक तरफ तो ज्ञान और सूचना के विश्व से जोड़ दिया है, दूसरी तरफ परिवार और अनौपचारिक विश्व से अलग कर दिया है। सामाजिक संबंधों में व्यक्तिवादिता उभर रही है अर्थात हमारी सोच अपने तक सीमित होती जा रही है।
डिजिटल टेक्नोलॉजी ने हमें ‘भीड़ में अकेला’ कर दिया है। यह संभव है कि वर्चुअल सोसाइटी/इमेजिंड कम्युनिटी (आभासी समाज/काल्पनिक समुदाय) पर लाखों फालोवर्स, फ्रेंड्स, शेयर, लाइक्स हों, पर वास्तविक जीवन में एक भी न हों या बहुत कम हों। यह अलगाव का चरम स्तर कहा जा सकता है। ऐसे में समाज के विकास की दिशा क्या होगी? क्या इसे ‘समाज का अंत’/ ‘सामाजिक संबंधों का अंत’/ ‘सामूहिकता का अंत’ कहा जा सकता है?

आज की पीढ़ी के बच्चों ने अपने बचपन को जिया ही नहीं, इनकी मासूमियत जल्दी ही परिपक्वता में बदल गई, टेक्नोलॉजी तथा मीडिया सोसाइटी ने उम्र व समय से पहले ही इनका बचपन छीन लिया। प्रत्यक्ष अनुभव, वयस्क पीढ़ी के साथ अंत:क्रिया के अवसर, सृजनशील होना, कल्पनाशीलता आदि के गुण अब नष्ट हो रहे हैं। टेक्नोलॉजी ने आउटडोर गेम्स (घर के बाहर खेले जाने वाले खेल) को इंडोर गेम्स (घर के अंदर खेले जाने वाले खेल) से विस्थापित कर दिया है। परिणामस्वरूप टीमवर्क का क्षय, नेतृत्व-विहीनता, स्वास्थ्य समस्याएं, सामाजिकता का क्षय, व्यक्तिवादिता में वृद्धि, चुनौतियों से भागना, आत्महत्या आदि में वृद्धि हुई है।कहीं पढ़ा था कि जिंदगी फेसबुक की तरह है, लोग आपकी परेशानियों को पढेंÞगे, उन्हें लाइक करेंगे, शेयर करेंगे,उन पर कमेंट करेंगे ओर निकल लेंगे। कोई भी आपकी समस्या का हल नहीं बताएगा क्योंकि सब अपनी परेशानियों को अपडेट करने में लगे हैं। कहा जाता है कि ‘समाज’ सामाजिक संबंधों के नेटवर्क से निर्मित होता है, सूचना क्रांति के बाद से ‘डिजिटल नेटवर्क’ महत्त्वपूर्ण हो गया है। वास्तविक समुदायों का स्थान ‘आभासी समुदायों/काल्पनिक समुदायों’ ने ले लिया है। पीढ़ी अंतराल का स्थान ‘डिजिटल अंतराल’ ने ले लिया है, सामाजिक विभाजन का स्थान ‘डिजिटल विभाजन’ ने ले लिया है, और परिणामत: वास्तविक विश्व का स्थान ‘डिजिटल विश्व’ (डिज्नी वर्ल्ड) ने ले लिया है जहां सब कुछ आभासी या काल्पनिक है, यथार्थ से परे अति-यथार्थ की अभिव्यक्ति करता नजर आता है। एक ऐसा विश्व जहां केवल मस्ती है, एंजोयमेंट है, फन है, और जहां दुख, परेशानी, संघर्ष, अभाव का नामोनिशान नहीं होता। जहां कोई काम नहीं करना पड़ता, कोई किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। पैसा देकर सब कुछ आसानी से मिल जाता है, वो भी मनचाहा। सोचिए फिर क्यों कोई वास्तविक विश्व में रहना चाहेगा? आज का युवा वर्चुअल/आभासी विश्व के माध्यम से अपने ऐसे सपनों को पूरा करना चाहता है या करने की कोशिश कर रहा है जो शायद वास्तविक जीवन में पूरी नहीं कर सकता। पूर्व में समाज विज्ञानों में अंतर्मुखी और बहिर्मुखी व्यक्तित्व की चर्चा की जाती थी, पर अब ‘आॅफलाइन व्यक्तित्व’ तथा ‘आॅनलाइन व्यक्तित्व’ की बातें होती हैं। सवाल है कि हम टेक्नोलॉजी को नियंत्रित कर रहे हैं, या टेक्नोलॉजी हमें नियंत्रित कर रही है?

यह सच है कि डिजिटल क्रांति ने ऐसे सूचना समाज को विकसित किया जहां सूचनाओं की भरमार है, पर सामाजिक संबंधों में संवादहीनता व संवेदनहीनता की स्थिति है। यह पीढ़ी/डिजिटल पीढ़ी डिजिटल डिवाइस के माध्यम से लाइक, शेयर, स्टेटस अपडेट, पिक्चर अपलोड करके वर्चुअल/आभासी समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के प्रति ज्यादा चिंतित हैं और वास्तविक समाज या आमने-सामने के सामाजिक संबंधों के प्रति उनमें उपेक्षा का भाव है। सबसे ज्यादा जो हमने खोया है वह है वास्तविक विश्व में व्यक्तिगत संपर्क। यह एक विरोधाभास ही तो है कि एक तरफ व्यक्ति सोशल नेटवर्किंग के माध्यम से दूरी पर स्थित मित्रों/संबंधियों के साथ संबंधों को मजबूती देता है, पर अपने निकट के संबंधों या सामने उपस्थित संबंधों के बीच दूरी बढ़ा रहा है क्योंकि आॅनलाइन रहना परिवार के साथ बिताने वाले समय को नष्ट कर देता है।यहां एक और खतरा पैदा हुआ है- कमजोर व्यक्तित्व के लोग टेक्नोलॉजी के माध्यम से खुद को शक्तिशाली, कुशल, योग्य मानने लगे हैं जो उन्हें न केवल मानसिक रूप से बल्कि शारीरिक रूप से भी बीमार करता है। चूंकि हर व्यक्ति की ‘विशिष्ट बन्ने की इच्छा’ होती है, इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए, जो वास्तविक विश्व में संभव न हो पाती थी उसे वर्चुअल/आभासी विश्व में पूरा करने की कोशिश करते हैं। नेट पर वह दूसरों के लिए अपरिचित है इसलिए वह कुछ भी कहने/करने की स्वतंत्रता महसूस करता है। डोना हार्वे के अनुसार प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों ने मनुष्य और मशीन के बीच अंतर को समाप्त कर दिया है। कह सकते हैं कि मनुष्य मशीन की तरह काम करने के लिए बाध्य है, दूसरी तरफ मनुष्य मशीन (रोबोट) में ही भावनाएं तलाश रहा है।

समाज के प्रारंभ में अंधविश्वास का चरण था जिसमें तर्कहीनता और अनुकरण की प्रवृत्ति थी। फिर वैज्ञानिक चरण आया जिसमें बुद्धिवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विश्लेषण और तर्क का रुझान प्रबल हुआ। ऐसा लगता है कि अब हम पुन: अनुकरण और तर्कहीनता की ओर जा रहे हैं। विडंबना यह है कि यह टेक्नोलॉजी-जनित तर्कहीनता है। उदहारण के लिए डिजिटल डिवाइस पर धार्मिक वीडियो/संदेश आना। ऐसा करो/लाइक करो/जय…लिखो, दस लोगों को यह संदेश भेजो… तुरंत शुभ समाचार मिलेगा/ या लाभ होगा और ऐसा नहीं करने पर अशुभ होगा आदि। आज भी धर्म का पालन व्यक्ति ‘भय के मनोविज्ञान’ से प्रेरित होकर करता है। संभवत: यही उत्तर-प्रत्यक्षवाद का चरण है जहां भावनाओं और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मिश्रित रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। या कहें कि भावनाओं को वैज्ञानिक तरीके से खरीदा-बेचा जा रहा है।यह भी एक तथ्य है कि स्टेटस अपडेट करने से अपराधों में वृद्धि हुई है (लोगों को पता चल जाता है कि घर के सभी सदस्य बाहर गए हैं और घर खाली है)। सेल्फी लेने व उसे तुरंत फेसबुक/सोशल मीडिया पर अपलोड करने की आदत ने भी अनेक दुर्घटनाओं को न्योता दिया है। देखा जाए तो मीडिया ने उन मूल्यों और छवियों को निर्मित किया है जिनकी बाजार में कीमत है। फलस्वरूप उपभोक्ता समाज उत्पन्न हुआ और दिखावे का उपभोग बढ़ने लगा। अब आवश्यकता आधारित उत्पादन नहीं होता बल्कि ‘उत्पादन/उत्पाद’ आवश्यकताओं को उत्पन्न करने लगे हैं। यानी पहले ‘आवश्यकता’ अविष्कार की जननी थी और अब ‘आविष्कार’ आवश्यकता का स्रोत बन गया है। सवाल है कि सोशल डिजिटलीकरण समाज में चेतना पैदा करने के लिए है, या शोषण का एक उपकरण?

 

 

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First Published on July 17, 2017 3:25 am

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