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मानक समय की उलझनें

बीजू जनता दल (बीजेडी) के सांसद भतृहरि महताब ने लोकसभा में मुद्दा उठाया कि देश के पूर्वी और पश्चिमी छोर के समय में लगभग दो घंटे का अंतर है।
Author August 3, 2017 05:48 am
सांकेतिक फोटो

बीजू जनता दल (बीजेडी) के सांसद भतृहरि महताब ने लोकसभा में मुद्दा उठाया कि देश के पूर्वी और पश्चिमी छोर के समय में लगभग दो घंटे का अंतर है। ऐसे में अलग मानक समय (टाइम जोन) होने की स्थिति में मानव श्रम के साथ अरबों यूनिट बिजली भी बचाई जा सकती है। जब भारत के बाकी हिस्सों में साल के सबसे लंबे दिन का सूरज उगता है तब यहां के उत्तर-पूर्वी हिस्से का काफी दिन गुजर चुका होता है। देश के इस हिस्से में सूरज काफी जल्दी उग आता है लेकिन इनकी दिनचर्या भारत के बाकी हिस्से की तरह ही चलती है यानी दफ्तर दस बजे और स्कूल आठ बजे ही खुलते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि दिल्ली में रहने वाला व्यक्ति तरोताजा होकर दफ्तर पहुंचता है, वहीं उत्तर-पूर्वी राज्यों में रहने वाले शख्स का दिन दफ्तर पहुंचने तक काफी कुछ गुजर चुका होता है। वह काम से लौटते हुए नहीं, जाते वक्त भी थका हुआ होता है। संसदीय मामलों के मंत्री अनंत कुमार का कहना था कि यह मुद्दा बेहद अहम और संवेदनशील है और सरकार इस पर गंभीरता से विचार कर रही है।

‘मानक समय’ है क्या? अठारहवीं सदी से पहले दुनिया भर में सूर्य घड़ी से समय देखा और मिलाया जाता था, लेकिन सर सैंडफोर्ड फ्लेमिंग ने 1884 में मानक समय का सिद्धांत विकसित किया, जिससे दुनिया भर के समय को सही दिशा मिली। मानक समय या टाइम जोन को क्षेत्रीय समय के नाम जाना जाता है। यह 1884 में 13 अक्तूबर के ही दिन ग्रीनविच मीन टाइम तय किया गया था और दुनिया भर की घड़ियों का समय इसी मानक समय से तय किया जाता है। लेकिन आखिर इस मानक समय को निर्धारित करने की क्या जरूरत है! असल में जब सूर्योदय होता है तो एक समय में पृथ्वी के किसी हिस्से में तिरछी किरणें पड़ती हैं तो कहीं सीधी किरणें। इसीलिए जब कहीं दोपहर होती है तो कहीं शाम और कहीं रात। अगर सारी दुनिया की घड़ियां एक साथ मिला दी जाएं तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। जैसे कहीं पांच बजे सुबह होगी तो कहीं पांच बजे बजे दोपहर तो कहीं शाम।
इस समस्या को हल करने के लिए देशांश रेखाओं के आधार पर क्षेत्रीय समय बनाया गया है। पूरी दुनिया के नक्शे को देशांश रेखाओं के आधार पर प्रत्येक पंद्रह अंश के अंतर पर 24 बराबर-बराबर के काल्पनिक हिस्सों में बांट दिया गया है और इसकी शुरुआत (शून्य अंश) से होती है। यह शून्य अंश वाली रेखा इंग्लैंड के ग्रीनविच में स्थित वेधशाला से शुरू होती है। समय की गणना यहीं से आरंभ होती है। इसे अंतरराष्ट्रीय मानक समय (ग्रीनविच मीन टाइम) के नाम से जाना जाता है। ग्रीनविच रेखा से दाहिनी ओर के देशों का समय आगे होता है और बार्इं ओर के देशों का समय पीछे होता है।

इसी प्रकार हर देश का अपना मानक समय है। भारत में यह रेखा जो कि इलाहाबाद के निकट नैनी से गुजरती है, से भारत का राष्ट्रीय मानक समय तय होता है। भारत का मानक समय ग्रीनविच रेखा से 82.5 अंश दाहिनी ओर है, जिसका अर्थ है कि यहां का मानक समय ग्रीनविच के मानक समय से साढ़े पांच घंटे आगे है। यानी जब ग्रीनविच रेखा के पास रात के 12 बजेंगे तब यहां सुबह के 5.30 बजेंगे। पूर्वोत्तर भारत के कई संगठन समय-समय पर अपने इलाके के लिए अलग मानक समय की मांग उठाते रहे हैं। अब पहली बार केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार-विमर्श शुरू किया है। सांसद महताब का सुझाव था कि पश्चिम बंगाल-असम सीमा से दूसरा मानक समय शुरू हो सकता है। उनकी दलील है कि अरुणाचल प्रदेश में सूरज तो सुबह चार बजे ही उगता है, लेकिन दफ्तर दस बजे खुलते हैं। देश के पूर्वी और पश्चिमी छोर के बीच समय में दो घंटे का अंतर रहता है। केंद्रीय विज्ञान और तकनीक मंत्रालय ने इसका पता लगाने के लिए एक अध्ययन किया था कि दो अलग-अलग मानक समय होने की स्थिति में कितनी ऊर्जा बचाई जा सकती है। उन्होंने केंद्र से इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और इसे शीघ्र लागू करने की मांग की है।

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान देश में तीन अलग-अलग मानक समय थे। बांबे मानक समय, कलकत्ता मानक समय और बागान मानक समय। पूरे देश के चाय बागान मजदूर इसी बागान मानक समय के हिसाब से काम करते थे। असम के चाय बागानों में यह मानक समय अब भी लागू है। एक संगठन की ओर से हाल में गुवाहाटी हाईकोर्ट में याचिका दायर कर केंद्र को अलग मानक समय बनाने का निर्देश देने की अपील की गई थी। लेकिन अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि इससे कई तरह की दिक्कतें सामने आ सकती हैं। देश में अब भी हस्तचालित तरीके से ही ट्रेनों की पटरियां बदली जाती हैं। अलग मानक समय होने की स्थिति में भ्रामक स्थिति पैदा होगी और रेल हादसे बढ़ सकते हैं।
पूर्वोत्तर में लंबे अरसे से अलग मानक समय की मांग करने वाले संगठनों की दलील है कि अगर इलाके में घड़ी की सुइयों को महज आधे घंटे पहले कर दिया जाए तो 2.7 अरब यूनिट बिजली बचाई जा सकती है। केंद्रीय विज्ञान व तकनीक मंत्रालय ने कोई एक दशक पहले इस मुद्दे के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन किया था। तब देश में दो अलग-अलग मानक समय के विकल्प पर गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया था। इनको ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी) से क्रमश: पांच और छह घंटे आगे होना था। लेकिन समिति ने अपने अध्ययन के बाद कहा कि एअरलाइंस, रेडियो, टेलीविजन और समय से जुड़ी दूसरी सेवाओं को ध्यान में रखते हुए दो अलग-अलग मानक समय बनाना उचित नहीं होगा।

मंत्रालय ने 2007 में संसद को बताया था कि दो अलग-अलग मानक समय बनाने की बजाय पूर्वी राज्यों में कामकाज का समय एक घंटा पहले करना इस समस्या का व्यावहारिक और प्रभावी समाधान हो सकता है। यह काम प्रशासनिक निर्देशों के जरिए हो सकता है। 2006 में योजना आयोग ने कामकाज में दक्षता के लिए पूर्वोत्तर इलाके के लिए एक अलग मानक समय बनाने की सिफारिश की थी। हाल में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी यह मांग उठाई थी। इससे पहले लंबे समय तक असम के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई ने भी चाय बागान मानक समय को सरकारी मानक समय बनाने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ सका। असम के जाने-माने फिल्मकार जाहनू बरुआ ने पूर्वोत्तर को होने वाले आर्थिक नुकसान के आकलन के लिए एक मॉडल भी विकसित किया था। असम के चाय बागानों में बरुआ की परवरिश हुई, जहां सुबह छह बजे अच्छे खासे उजाले के बीच काम शुरू हो जाता है। बरुआ के मुताबिक, अलग मानक समय नहीं होने की वजह से पूर्वोत्तर इलाके में बिजली के फालतू खर्च के तौर पर सालाना 94 हजार 900 करोड़ रुपए का नुकसान होता है।
2012 में नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ एडवांस स्टडीज के शोधकर्ताओं ने भारतीय मानक समय को आधे घंटे पहले करने का सुझाव दिया था। इससे रोजाना ऊर्जा की खपत 17-18 फीसद कम होगी और पूरे साल में 2.17 अरब किलोवाट बिजली बचाई जा सकती है। इसके समर्थन में एक आॅनलाइन अभियान भी शुरू हुआ था, लेकिन वह कामयाब न हो सका। अब नए सिरे से यह मांग उठने और सरकार के इस पर गंभीरता से विचार करने का भरोसा देने के बाद पूर्वोत्तर राज्यों के लिए अलग मानक समय की उम्मीदें एक बार फिर हरी हो गई हैं।

 

 

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