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ट्रंपवाद के मायने

ट्रंपवाद अमेरिकी फंसावट का दूसरा नाम है। इस ट्रंपवाद की भी एक सीमा है और जोखिम हैं लेकिन उसके पालित उदारतावाद की भी सीमाएं हैं।
Author January 31, 2017 04:15 am
अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। (फाइल फोटो)

ट्रंप एक मुसीबत हैं। वे ‘अनप्रेडिक्टेबिल’ हैं यानी अगले पल क्या करेंगे किसी को नहीं मालूम। वे पगलेट हैं। वे ‘उन्माद’ हैं। वे अमेरिका के उदारतावादी बहुवचनवादी मिजाज के दुश्मन हैं। वे दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से चली आती अमेरिकी पहचान को बदल रहे हैं। वे स्त्री-द्रेही (मिसोजिनिस्ट) हैं। वे इस्लाम के घोर विरोधी हैं। वे अल्पसंख्यकों के विरोधी हैं। ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा देकर वे अमेरिका को ‘दीवारों में बंद एक समाज’ बनाने पर तुले हैं। वे मीडिया के शत्रु हैं। आजादी के दुश्मन हैं।! ये और ऐसे ही बहुत-से विशेषणों से ट्रंप चुनाव से पहले नवाजे जा रहे थे अब और खुलकर नवाजे जा रहे हैं। उनके खिलाफ तीस लाख महिलाओं ने जुलूस निकाला है जो अमेरिका के स्त्रीत्ववादी इतिहास के चरम दिनों तक में नहीं दिखा था। ट्रंप आज दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी के ‘अन्य’ हैं यानी ‘सबसे बड़े खलनायक’ हैं!

अपना अंग्रेजी मीडिया और विदेश नीति मर्मज्ञ, थिंक टैंक आदि ट्रंप को दो तरह से समझ-समझा रहे हैं। एक वर्ग मानता है कि वे मोदीजी के स्वघोषित ‘मित्र’ हैं यानी भारत-मित्र हैं और दूसरा मानता है कि ट्रंप से सावधान रहा जाए! उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ में बहिरागतों को जगह नहीं है। उनकी ‘एच-1 वीजा’ संबंधी नई घोषणा ने कैलिफोर्निया की ‘सिलिकॉन वैली’ और बंगलुरु और हैदराबादी सिलिकॉन वैलियों को ठंडा कर दिया है। लगता है कि तकनीकी क्रांति और सूचना क्रांति का ‘ज्वार’ जल्द ही ‘भाटे’ में बदलने वाला है और भूमंडलीकरण का दौर नए सिरे से राष्ट्रवाद और अंध राष्ट्रवाद की लहर पैदा कर रहा है जो इंग्लैंड के ब्रेक्जिट से शुरू हुआ और बाकी यूरोप को सिकोड़ने वाला है।

हमारा बौद्धिकवर्ग अमेरिका को दो तरह से देखता आया है। एक के अनुसार अमेरिका एक साम्राज्यवादी, युद्धवादी, कम्युनिस्ट विरोधी और दूसरे देशों में सीआईए आदि की मदद से सत्तापलट कराने वाला रहा है तो दूसरे के अनुसार वह अतिविकसित पंूजीवादी, उदारवादी, बहुवचनवादी, बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक और सहनशील और खुला जनतांत्रिक समाज है जिसमें श्रम की, ज्ञान की और प्रतिभा की कद्र होती है! और अब जब यह सिकुड़ रहा है तो लग रहा है कि वह अमेरिका अब नहीं बचेगा जिसमें हम सब बचे हुए थे! और इन दिनों तो दोनों तरह के बौद्धिक एक ही तरह की चिंता करते दिखते हैं कि वह अमेरिका न बदले जो अब तक उनके लिए एक फिक्स्ड फ्रेम में था।सवाल है कि सिर्फ ट्रंप अमेरिका को बदल रहे हैं, कि अमेरिका ट्रंप को बदल रहा है? यानी क्या अमेरिका को बदलने की वस्तुगत स्थितियां तैयार हैं, या कि समकालीन अमेरिकन पलटी सिर्फ ट्रंप का षड्यंत्र है?

इसे समझने के लिए हमें उस दौर को याद करना होगा जब दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया दो ध्रुवों में बंटी। चर्चिल की ‘फुल्टन स्पीच’ के बाद अमेरिका और मित्र देशों और सोवियत संघ के बीच लगभग पैंतालीस बरस लंबा जो शीतयुद्ध चला जिसका बढ़ता बोझ न उठा पाने के कारण सबसे पहले सोवियत संघ टूटा, उसके टूटने के बाद समाजवाद का एक ध्रुव गायब हो गया लेकिन दूसरा ध्रुव अमेरिका और यूरोप जस का तस बचा रहा!सोवियत समाजवाद तो निपट गया लेकिन अमेरिका अपने उन्हीं तौर-तरीकों के साथ चलता रहा जो उसने दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनने के लिए पिछले पैंतालीस साल में अपनाए थे।
तभी समाजवाद के शून्य को पैन इस्लामवादी विचारों ने भरा और उत्तर आध्ुनिक दौर की दुनिया मध्यकालीन जेहादों के दौर में प्रविष्ट हो गई। अमेरिका प्रेरित तालिबान अचानक अलकायदा के अवतार में आ गए और अलकायदा ने पहला बड़ा प्रहार खुद को दुनिया का चौधरी समझने वाले अमेरिका पर ही किया। उसके लोगों ने अमेरिकी अभिमान के प्रतीक दो टॉवरों को ध्वस्त कर उसे जड़ से हिला दिया। यह एक अनबूझा और अनपहचाना खतरा था जिसके लिए अमेरिका तैयार नहीं था। दुश्मन बदल गया लेकिन अमेरिका के सामरिक तरीके नहीं बदले! वह अफगानिस्तान, इराक, लीबिया आदि पर सैन्य हमला कर उनको ध्वस्त करने में ही लिप्त रहा आया।

इधर चीन ने समाजवाद में ग्लोबल पंूजी का पानी मिलाया और भूमंडलीकरण का सबसे ज्यादा लाभ उठाया और दुनिया भर के बाजारों को अपने अच्छे और खराब उपभोक्ता सामान से पाट दिया। ‘आउटसोर्सिंग’ के कारण अमेरिकी नौजवान बेकार होने लगे। इन खर्चीले युद्धों से उसकी इकोनॉमी को भी क्षति पहुंची। इसीलिए ओबामा जीते क्योंकि वे इन युद्धों को ठंडा करने का इरादा लेकर आए। अमेरिका पहली बार ओबामा के कार्यकाल में ही सिकुड़ा और मोरचों से पीछे हटा! एक समाज में रूप में अमेरिका दो-चित्ता होने लगा। एक ओर आहत अभिमान, दूसरी ओर ‘अमेरिका महान’ का फिर से दावा, बार-बार व्यक्त होने लगा! आइएसआइएस के उभार ने दुनिया का दादा होने के अमेरिकी अहंकार को फिर से चुनौती दी, लेकिन आइएसआइएस को रोकने, खत्म करने का एजेंडा एक खर्चीला एजेंडा बनने लगा! अब उसे इस्लामिक स्टेट के मुकाबले इस्लामी समाजों में जनतंत्र को एक्सपोर्ट करना था लेकिन यह और भी टेढ़ा और खर्चीला काम था। इसलिए अमेरिका ने सिकुड़ना शुरू किया। ट्रंपवाद इसी सिकुड़न का नाम है जो सारे उदारतावादी मीडिया और संगठनों के विरोध के बावजूद जीत के आया है! दुनिया को हांकने की पुरानी आदत से मुक्त कर ट्रंप एक राष्ट्र के रूप में पहले उसे फिर से ताकतवर बनाना चाहते हैं और दुनिया की पिक्र करने की जगह पहले अपने घर की फिक्र करना चाहते हैं। इसीलिए ‘इंडिया फर्स्ट’ की तर्ज पर उन्होंने भी ‘अमेरिका फर्स्ट’ किया है!

इससे उदारतावादी लोग व्याकुल हैं और उसी उदारतावादी, बहुलतावादी अमेरिका की वापसी चाहते हैं जिसकी गोद में वे पले-बढेÞ हैं! ऐसे लोगों को आजकल वह अमेरिकी उदारतावाद भी बड़ा क्रांतिकारी नजर आता है जिसके दबाव ने सोवियत समाजवाद को धराशायी किया!शीतयुद्ध की जिस मानसिकता से उसे बहुत पहले निकल आना था अब वह मार खाकर निकल रहा है। विचार से विचार को काटा जा सकता था लेकिन धर्म और सांस्कृतिक अस्मिताओं की कट्टरताओं से कैसे निपटें, यह एक नई चुनौती है और ये अस्मितावादीप्रतिसत्तात्मक विमर्श उन्हीं समाजशास्त्रों से वैधता प्राप्त करते हैं जो अमेरिकी थिंक टैंकों ने समाजवाद को ठिकाने लगाने के लिए बनाए थे!

ट्रंपवाद अमेरिकी फंसावट का दूसरा नाम है। इस ट्रंपवाद की भी एक सीमा है और जोखिम हैं लेकिन उसके पालित उदारतावाद की भी सीमाएं हैं। इसे भी उदारतावादियों को समझना होगा। जिन अतिपूंजीवादी व्यवस्थाआें और पूंजीपतियों ने श्रम, उत्पादन, स्वत्व, नस्ल, धर्म, जाति और राष्ट्र के प्रश्नों को नए उत्तर-औद्योगिक समाज में निपटा हुआ मान लिया था वे निपटे नहीं थे, न आसानी से निपटने वाले हैं। उदारतावादी दिमागों ने जिन कट्टरताओं को हिटलर के खात्मे के साथ खत्म हुआ मान लिया था ऐसे उदारतावादियों को अपनी कट्टरताएं भी देखनी होंगी और यह भी मानना होगा कि कट्टरताओं और अंधताओं के बीज तकनीकी क्रांति से खत्म नहीं हो जाते बल्कि वे और तेज होकर तिरछे कुल्ले देने लगते हैं। सो निंदा, भर्त्सना और बायकाट की जगह अब भी संवाद की जरूरत है! आखिर रावण तक से राम ने संवाद किया था!ट्रंप-पूर्व के दिन वापस आएंगे और हमारी वही अमेरिकी दुनिया हमें मिलेगी, ऐसे सपने हवा हुए। समाज की सिकुड़न, पंूजी के मिजाज की सिकुड़न हर कहीं हैं। ट्रंपवाद कहां नहीं है? छोटे-छोटे ट्रंप इन दिनों गली-गली नजर आते हैं। अपने यहां भी तो एक तरह का ट्रंपवाद ही चल रहा है!स्पष्ट है कि नई चुनौतियां बहुत जटिल हैं। वे रोकर या गाली देकर नहीं उड़ाई जा सकतीं! उनसे संवाद के लिए पुरानी भाषा और पुराने मुहावरे नाकाफी हैं और नई भाषा नए मुहावरे एक दिन में बनते!

 

 

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