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शिक्षा में कब होगा मेक इन इंडिया

अच्छी शिक्षा लगातार महंगी हो रही है। सरकारी शिक्षण संस्थाओं के बजाय निजी स्कूल-कॉलेजों को तरजीह देने वाले मां-बाप हमेशा यह रोना रोते हैं कि इतनी महंगाई में शिक्षा का खर्च उठाना भारी पड़ने लगा है।
Author November 9, 2015 22:37 pm

अच्छी शिक्षा लगातार महंगी हो रही है। सरकारी शिक्षण संस्थाओं के बजाय निजी स्कूल-कॉलेजों को तरजीह देने वाले मां-बाप हमेशा यह रोना रोते हैं कि इतनी महंगाई में शिक्षा का खर्च उठाना भारी पड़ने लगा है। पर इसका एक विरोधाभास भी है। लोगबाग अपने बच्चों को विदेशी डिग्री के लिए बाहर भेजना पसंद कर रहे हैं और इसके वास्ते समान डिग्री या कोर्स के लिए दस गुना ज्यादा खर्च खुशी-खुशी उठाने को तैयार हैं। हाल में पता चला है कि इस साल जुलाई में भारतीय अभिभावकों ने विदेश में पढ़ रहे अपने बच्चों को मेंटेनेंस के नाम पर ही 11.39 करोड़ डॉलर भेजे जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। बीते एक साल में इस रकम में छह गुने का उछाल हालांकि कुछ और संदेहों को जन्म दे रहा है। जैसे, इसमें आयकर विभाग की नजर बचा कर रकम विदेश भेजने का कोई खेल हो सकता है, पर यह तो तय है कि विदेशी शिक्षा का मोह कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह एक नई चुनौती है, जो सवा साल से देश में ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम चला रहे हैं, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में तो उनके आह्वान की हवा निकालने वाली मानसिकता के ही दर्शन हो रहे हैं।

इस बारे में पिछले साल एसोचैम ने टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज के साथ मिल कर एक सर्वेक्षण किया था जिसमें विदेशी शिक्षा के प्रति बढ़ते सम्मोहन के कारणों की टोह ली गई थी। सर्वेक्षण के आधार पर एसोचैम ने ‘रीअलाइनिंग स्किलिंग टुवर्ड्स मेक इन इंडिया’ नामक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें बताया गया कि भारतीय अभिभावक हर साल अपने बच्चों को शिक्षा के लिए विदेश भेजने पर छह से सात अरब डॉलर की भारी-भरकम रकम खर्च करते हैं। सिर्फ नेता और अभिनेता नहीं, देश का विशाल मध्यवर्ग भी कर्ज लेकर ऐसा करने में पीछे नहीं है। कई विदेशी कॉलेज-विश्वविद्यालय शिक्षा के मानकों यानी रैंकिंग में बेशक हमसे आगे हो सकते हैं, पर जरूरी नहीं है कि हमारे सारे छात्र उन्हीं ऊंची रैंकिंग वाले नामी संस्थानों में दाखिला पा जाते हैं। बल्कि ज्यादातर छात्र तो ऐसे संस्थानों में जाकर पढ़ाई करते हैं, जिनसे बेहतर नहीं तो समान दर्जे की शिक्षा हमारे देश के कॉलेज-विश्वविद्यालय भी देते हैं, वह भी आठ-दस गुने कम खर्च में।

देश के भीतर ही शिक्षा के देसी और सस्ते विकल्प होने के बावजूद अभिभावक ऐसा क्यों करते हैं, यह तो विचार का विषय है, लेकिन इसके साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि आखिर विदेशी शिक्षा में ऐसा कौन-सा आकर्षण है जो भारत-चीन समेत कई और मुल्कों के छात्रों को अपनी ओर खींचता है और लोगबाग इसके लिए लाखों का कर्ज लेने में भी नहीं हिचकते।

जहां तक सवाल यह है कि विदेशी शिक्षा के मुकाबले देसी शिक्षा कितनी सस्ती है, तो इसका खुलासा वर्ष 2013 में एक अंतरराष्ट्रीय बैंक (एचएसबीसी) द्वारा कराए गए सर्वेक्षण ‘द वैल्यू ऑफ एजुकेशन: स्प्रिंगबोर्ड फॉर सक्सेस’ में हो चुका है। इस सर्वेक्षण से साबित हुआ था कि अंडरग्रेजुएट कोर्स के लिए भारत में बाहर से पढ़ने आए छात्र का विश्वविद्यालयी फीस और रहने-खाने का सालाना औसत खर्च 5643 डॉलर है जिसमें से महज 581 डॉलर फीस के रूप में चुकाए जाते हैं। इसके विपरीत, आस्ट्रेलिया में यह खर्च 42,093 डॉलर, सिंगापुर में 39,229 डॉलर, अमेरिका में 36,565 डॉलर और ब्रिटेन में 35,045 डॉलर सालाना होता है। पंद्रह देशों में साढ़े चार हजार अभिभावकों पर किए गए सर्वेक्षण में यह बात भी निकल कर सामने आई थी कि भारत में भले ही सबसे सस्ती उच्च शिक्षा मिल रही हो, लेकिन बासठ प्रतिशत भारतीय अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के उद््देश्य से आस्ट्रेलिया, सिंगापुर और अमेरिका भेजने को अहमियत देते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं, इसका एक जवाब ब्रिटिश कंपनी- क्यूएस (क्वैकुरेली साइमंड्स लिमिटेड) द्वारा प्रकाशित की गई वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में दिया गया।

इस रैंकिंग में शामिल पहले दो सौ विश्वविद्यालयों में से एक भी भारत का नहीं था। आइआइटी-मुंबई इस सूची में 222वें स्थान पर था, जबकि आइआइटी-दिल्ली 235वें स्थान पर। कानपुर, मद्रास और खड़गपुर स्थित आइआइटी की गिनती तीन सौ संस्थानों में होती है जबकि प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय को अध्ययन-अध्यापन के मामले में 420-430 के बीच में रखा गया था। इस सूची में पहले दस स्थानों पर अमेरिकी और ब्रिटिश विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों का कब्जा बताया गया था, जिसमें अमेरिका का मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी पिछले कुछ वर्षों से लगातार पहले स्थान पर आ रहा है।

मुद््दा महज रैंकिंग नहीं है। रैंकिंग के नाम पर कैसे-कैसे खिलवाड़ मुमकिन हैं- यह हर कोई जानता है। साफ है कि विदेशी शिक्षा के जादू में और भी बहुत कुछ ऐसा है जो दुनिया भर के छात्रों को अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया की ओर खींच रहा है और जिसके बल पर वहां एक शानदार शिक्षा-उद्योग पनप गया है। मसलन, अमेरिका में कानून और चिकित्सा, ये दो ऐसे पेशे हैं जिनमें भरपूर कमाई की संभावना होती है। इन दोनों पाठ्यक्रमों के लिए येल, हावर्ड और स्टैनफोर्ड की गणना सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में होती है। लेकिन ऐसा नहीं है कि अमेरिकी या ब्रिटिश अभिभावक अपने बच्चों को मेडिकल या एमआइटी से स्नातक कराने के लिए अपना घरबार अथवा कारोबार दांव पर लगा दें या बैंकों से कठिन शर्तों पर कर्ज लें। बल्कि शिक्षा के लिए वहां छात्रों को ही आसानी से कम ब्याज दरों पर कर्ज मिल जाता है। वे शिक्षा पर हुए कर्ज को नौकरी मिलने के बाद चुकाते हैं। मेडिकल और कानून की डिग्रियों के अलावा वहां ऐसी अनगिनत डिग्रियां और पाठ्यक्रम हैं जिनके जरिए एक अच्छा रोजगार पाया जा सकता है।
स्तर का मामला उच्च शिक्षा तक सीमित नहीं है। बल्कि अमेरिका में बच्चों की स्कूली शिक्षा की नींव को भी काफी मजबूत बनाया जाता है। प्राइमरी से लेकर हाई स्कूल तक की शिक्षा मुफ्त होती है। हालांकि वहां भी प्राइवेट स्कूल हैं, जो अपेक्षया महंगे होते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि काउंटी यानी सरकारी स्कूल से निकला बच्चा प्राइवेट स्कूल के बच्चे से किसी मामले में उन्नीस साबित हो। इसके आगे वहां कॉलेज स्तर की जो शिक्षा है, वह भारत की उच्च शिक्षा से इस मामले में अलग है कि वहां उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम का मूल उद््देश्य पूरी तरह व्यावसायिक होता है। अमेरिका में शिक्षा का मकसद भारत की तरह मात्र डिग्रियों की संख्या बढ़ाना नहीं होता, बल्कि उस पढ़ाई के जरिए छात्रों को रोजगार के लायक बनाना होता है। सरकारी और प्राइवेट, दोनों ही तरह के यूनिवर्सिटी कॉलेजों में स्नातक पाठ्यक्रमों की इतनी भरमार होती है कि छात्र अपनी शिक्षा, रुचि और आर्थिक क्षमता के अनुसार पाठ्यक्रम चुन सकते हैं।

वैश्विक पैमानों पर आमतौर पर एक शानदार विश्वविद्यालय की पहचान उसकी फीस और फैकल्टी को मिलने वाले वेतनमान से की जाती है। यह भी ध्यान रखना होगा कि अब अमेरिका, सिंगापुर और आस्ट्रेलिया में उच्च शिक्षा एक उद्योग का रूप ले चुकी है। चीन और भारत से करीब चार-पांच लाख युवा हर साल यहां उच्च शिक्षा के लिए पहुंचते हैं। दूसरे देशों से भी बड़ी तादाद में विद्यार्थी वहां हर साल जाते हैं। इसके उलट भारत में सरकारी मदद के भरोसे चल रहे आईआईटी अथवा आईआईएम या मेडिकल कालेज ढांचागत सुविधाओं में अपेक्षित सुधार करने के बजाय न्यूनतम सुविधाओं और सामान्य वेतनमान पर न्यूनतम फैकल्टी से काम चलाने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। अपने देश में प्राइवेट कॉलेजों में तो और भी खराब नजारे दिखाई पड़ते हैं जहां तदर्थ फैकल्टी के बल पर बड़े-बड़े कोर्स चलाए जा रहे हैं।

यों संख्या के आधार पर देखें तो देश में उच्च शिक्षा देने वाली संस्थाओं का अकाल नहीं है। देश में फिलहाल करीब चार सौ विश्वविद्यालय और लगभग बीस हजार उच्च शिक्षा संस्थान हैं। इनमें सात लाख से ज्यादा प्राध्यापक कार्यरत हैं। मोटे तौर पर इन शिक्षण संस्थानों में डेढ़ करोड़ से ज्यादा छात्र पढ़ाई कर रहे थे। पर देश में सैकड़ों विश्वविद्यालयों और हजारों कॉलेजों की उपस्थिति के बरक्स यह तथ्य हैरान करने वाला है कि इनमें से कोई भी विश्वविद्यालय उस स्तर की शिक्षा क्यों नहीं दे पा रहा है जिसके बल पर उसे दुनिया के अव्वल सौ विश्वविद्यालयों में शामिल किया जा सके। अच्छी शिक्षा के इसी अकाल का अंजाम है कि विदेशी विश्वविद्यालय की उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा पाने के लिए हर साल भारत से डेढ़ लाख से पौने दो लाख छात्र विदेश चले जाते हैं।

जब देश में ही विदेशी कैंपस मौजूद रहेंगे, तो इससे विदेशी शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च में कटौती से लेकर वे सारे फायदे हो सकेंगे जिनके लिए विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत लाने की वकालत होती रही है। हाल के वर्षों में खास तौर से आॅस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों के साथ हुए नस्ली बर्ताव की घटनाओं के मद््देनजर भी यह एक बड़ी राहत होगी क्योंकि तब विदेशी डिग्री के लिए बाहर जाने की जरूरत खत्म हो जाएगी। इससे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की भी संभावना बन सकती है। हो सकता है कि तब हमारे शिक्षण संस्थान इन्फ्रास्ट्रक्चर आदि के मामलों में भी उनसे होड़ लेने की कोशिश करें। अगर ऐसा हो सका तो निश्चित ही इससे उच्च शिक्षा का माहौल काफी सुधरेगा।

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