May 26, 2017

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राजनीतिः घाटे की खेती और खुदकुशी की फसल

सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया है कि किसानों की आत्महत्याएं रोकने के लिए तीन हफ्ते में रोडमैप बनाएं।

Author March 17, 2017 02:38 am
खेत में काम करता किसान।

जाहिद खान

जमीनी स्तर पर आज किसानों की हालत बेहद खराब है। उन्हें तमाम परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। किसान टीवी चैनल, मृदा स्वास्थ्य कार्ड आदि ठीक योजनाएं हैं, लेकिन किसानों की खुदकुशी को रोकने के लिए ये नाकाफी हैं। किसान खुदकुशी के जानिब यदि सरकार वाकई संजीदा है, तो वह जल्द से जल्द एक ऐसी योजना बनाए, जिसमें किसानों के हितों का खास खयाल रखा जाए।  

सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया है कि किसानों की आत्महत्याएं रोकने के लिए तीन हफ्ते में रोडमैप बनाएं। बड़े ताज्जुब की बात है कि सरकार ने किसानों की खुदकुशी की वजहों पर गौर करने के लिए अभी तक कोई वाजिब कार्रवाई नहीं की है। सुनवाई कर रहे पीठ का इस बारे में साफ कहना था कि अगर मामला सही रास्ते पर बढ़ता, तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता था। यह पहली मर्तबा नहीं है जब अदालत ने किसानों की खुदकुशी के मामले में सरकार से जवाब तलब किया हो। इससे पहले भी, जनवरी में हुई सुनवाई के दौरान, केंद्र और राज्य सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए उसने कहा था कि किसान आत्महत्या की दो खास वजहों- कर्ज और मौसम की मार से पैदा हुए हालात- से निपटने के लिए सरकारों के पास कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है। केंद्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर अदालत ने उस वक्त फसल बीमा योजना और किसानों के कल्याण के लिए किए गए दूसरे उपायों का ब्योरा देने को कहा था।

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय किसानों की दुर्दशा और उनकी खुदकुशी पर एनजीओ ‘सिटिजंस रिसॉर्स एंड एक्शन एंड इनीशिएटिव’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है। साल 2014 में दायर इस याचिका में दावा किया गया है कि गुजरात में 2003 से 2013 के बीच 619 किसानों ने आत्महत्या की है। याचिकाकर्ता की अदालत से मांग थी कि इन किसानों के परिवारों को पांच-पांच लाख रुपए का मुआवजा दिलवाया जाए। मामले में जब सुनवाई शुरू हुई, तो अदालत ने इसका दायरा बढ़ाते हुए पूरा देश कर दिया। अदालत का इस बारे में कहना था कि चूंकि यह समस्या पूरे देश में है, लिहाजा इसका समाधान निकलना बेहद जरूरी है। अदालत में सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता पीएस नरसिम्हा ने सरकार का बचाव करते हुए पीठ से कहा कि ‘‘साल 2015 में शुरू की गई फसल बीमा योजना से किसानों को बड़ी राहत मिलेगी। इससे आत्महत्या के मामलों में गिरावट की उम्मीद है। यही नहीं, दूसरी योजनाओं के जरिए भी किसानों को यह यकीन दिलाने की कोशिश की जा रही है कि सूखे जैसे हालात में भी सरकार उनके साथ है।’’ सरकारी वकील की इस दलील पर अदालत ने अपनी नाखुशी जतलाते हुए कहा, ‘‘समस्या कई दशक से चली आ रही है। अभी तक इसकी वजहों से निपटने के लिए सरकार ने कोई ठोस एक्शन नहीं लिया है। आप हमें सिलसिलेवार तरीके से बताएं कि सरकार क्या करना चाहती है।’

अदालत ने इस मामले में जैसे तेवर अख्तियार किए हैं उससे लगता है कि अब वह सरकार को कोई रियायत देने को तैयार नहीं है। अदालत का यह रवैया सही भी है। आज किसान बेहद परेशान हैं। खाद, बीज, कीटनाशक और डीजल की कीमतें बढ़ने से कृषि उत्पादों के लागत मूल्य में जिस औसत से वृद्धि हुई है, उसके अनुपात में उन्हें फसलों के दाम नहीं मिल पा रहे हैं। उनके लिए खेती घाटे का धंधा बन गई है। उन्हें अक्सर अपनी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता है। सत्ता में आने से पहले हर सियासी पार्टी किसानों की बेहतरी की बात करती है, लेकिन सत्ता में आते ही सब भूल जाती है। यह सिलसिला अरसे से चला आ रहा है। अफसोस, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कृषि विकास तथा किसानों की आमदनी दोगुनी करने के तमाम दावों और वादों के बावजूद किसानों की हालत में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में वादा किया था कि वह सत्ता में आई, तो सुनिश्चित करेगी कि किसानों को उनकी पैदावार का लागत से डेढ़ गुना दाम मिले। भाजपा को केंद्र की सत्ता में आए ढाई साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन उसने किसानों से किए वादे पूरे करने की दिशा में कुछ नहीं किया है। उलटे आलम यह है कि हर चौबीस घंटों में बावन किसान आत्महत्या करते हैं।

‘एक्सीडेंटल डेथ ऐंड सुसाइड इन इंडिया’ शीर्षक से प्रकाशित राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में जहां आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 5,650 और कृषि मजदूरों की संख्या 6,710 थी, वहीं 2015 में यह आंकड़ा और भी बढ़ गया। इस साल 8,007 किसानों ने जबकि 4,595 कृषि मजदूरों ने खुद को खत्म कर लिया। एक लिहाज से देखें, तो किसान आत्महत्या के मामले में एक साल के अंदर बयालीस फीसद का इजाफा हुआ, जो कि बेहद चिंताजनक है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस राज्य में किसानों की आय दो गुनी होने की बात करते हैं। जबकि एनसीआरबी के आंकड़े कुछ और ही हकीकत बयां करते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक किसानों की आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं महाराष्ट्र में ही हुई हैं। यह कुल कृषक-आत्महत्या का 37.8 फीसद है।

किसानों के लिए बाकी प्रदेशों में भी हालात ठीक नहीं। मध्यप्रदेश विधानसभा में एक सवाल के जवाब में शिवराज सरकार ने हाल ही में यह बात स्वीकार की है कि 16 नवंबर, 2016 से इस साल फरवरी तक यानी कुल साढ़े तीन महीने में 106 किसानों और 181 कृषि मजदूरों ने खुदकुशी की है। वहीं विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान एक सवाल के जवाब में सरकार ने जानकारी दी थी कि 1 जुलाई, 2016 से 15 नवंबर, 2016 तक राज्य में 531 किसानों और कृषि मजदूरों ने खुदकुशी की। इस तरह पिछले साल एक जुलाई से अब तक राज्य में कुल 818 किसानों और कृषि मजदूरों ने खुदकुशी की है। कभी हरित क्रांति में आगे रहे राज्य पंजाब में भी आज किसान परेशान हैं। एक अध्ययन के मुताबिक पंजाब के करीब 95 फीसद ग्रामीण परिवार कर्ज में डूबे हैं।

अब सवाल उठता है कि कृषि क्षेत्र की गुलाबी तस्वीर पेश करने की सरकारों की तमाम कोशिशों के बावजूद किसानों की खुदकुशी की ये आंकड़े घटने के बजाय क्यों बढ़ रहे हैं? इस सवाल का जवाब ज्यादा मुश्किल नहीं है। किसान खुदकुशी का यह बढ़ता सिलसिला, सरकार की दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों का नतीजा है। ऐसी नीतियां, जिनके चलते गरीब और गरीब हो रहे हैं, जबकि अमीर और अमीर। किसानों की सबसे ज्यादा आत्महत्याएं, कर्ज में डूबने की वजह से होती हैं। कर्ज चुकाने का उनके ऊपर इस कदर दबाव होता है कि वे परेशानी में आत्महत्या कर लेते हैं। कर्ज ज्यादातर सरकारी बैंकों के होते हैं, न कि साहूकारों के। फसल की बर्बादी की वजह से भी किसान आत्महत्या कर लेते हैं। जबकि सरकार यह दावा करती है कि ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ आने के बाद किसानों की खुदकुशी की घटनाओं में कमी आई है। यदि फसल बीमा योजना का फायदा किसानों को मिल रहा होता, तो वे क्यों आत्महत्या करते?

किसानों की बेहतरी के लिए सरकारों ने अभी तककई समितियां बनार्इं। इन समितियों ने अच्छी सिफारिशें भी प्रस्तावित कीं, फिर भी किसानों के हालात में कोई सुधार नहीं आया है। जमीनी स्तर पर आज किसानों की हालत बेहद खराब है। उन्हें तमाम परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। किसान टीवी चैनल, मृदा स्वास्थ्य कार्ड आदि ठीक योजनाएं हैं, लेकिन किसानों की खुदकुशी को रोकने के लिए ये नाकाफी हैं। किसान खुदकुशी के जानिब यदि सरकार वाकई संजीदा है, तो वह जल्द से जल्द एक ऐसी योजना बनाए जिसमें किसानों के हितों का खास खयाल रखा जाए। किसानों के सामने ऐसी नौबत ही न आए कि वे खुदकुशी की सोचें।

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First Published on March 17, 2017 2:38 am

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