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दमघोंटू समय और हवा में बातें

पर्यावरण मंत्री ने कहा कि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों का अध्ययन स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा शीघ्र ही कराया जाएगा। एक स्वाभिमानी देश हमेशा अपने अध्ययन पर भरोसा करता है।
Author March 9, 2017 05:39 am
प्रतीकात्मक चित्र

हम विकास के इस दौर में एक अनदेखे संहार के समय से गुजर रहे हैं। यह संहार ऐसा है, जिसमें किसी अस्त्र-शस्त्र का उपयोग नहीं किया जा रहा है। इस समय जहरीली गैसों से बड़े पैमाने पर लोग मर रहे हैं। हिटलर ने अलग से गैस चैंबर बनवाए थे और उनमें विरोधियों को भर कर जहरीली गैस प्रवाहित करवाता था। उसे इतिहास हमेशा आततायी तानाशाह के तौर पर याद करता है। पर आज तो लगभग हर शहर एक बड़े गैस चैंबर में परिवर्तित हो गया है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग मर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से ‘स्टेट आॅफ ग्लोबल एयर/ 2017’ नामक रिपोर्ट की लगातार चर्चा की जा रही है। देश में चुनावों के मौसम में बहुत सारी खबरें दब जाती हैं, पर इस रिपोर्ट को चुनावों के बाद भी अच्छी-खासी जगह दी गई। रिपोर्ट को हेल्थ अफेक्ट इंस्टीट्यूट और युनिवर्सिटी आॅफ वाशिंगटन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवेल्यूशन ने संयुक्त तौर पर तैयार किया है। यह रिपोर्ट पूरी तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों पर आधारित है और केवल घरों के बाहर के प्रदूषण के संदर्भ में है। इस रिपोर्ट में हवा में मौजूद अति सूक्ष्म कण (पीएम 2.5) और ओजोन से होने वाली मृत्यु के आंकड़े हैं। रिपोर्ट के अनुसार पीएम 2.5 के कारण दुनिया में बयालीस लाख व्यक्ति असमय मौत का शिकार होते हैं, जिसमें हमारे देश का योगदान दस लाख नब्बे हजार है। हम केवल चीन से पीछे हैं, जहां ग्यारह लाख छह हजार लोगों की मौत पीएम 2.5 के कारण हुई।
ओजोन की अधिक सांद्रता से दुनिया भर में 2015 में दो लाख चौवन हजार व्यक्तियों की मौत हुई, जिसमें एक लाख आठ हजार भारतीय थे। ओजोन के संदर्भ में रिपोर्ट के अनुसार भारत का पहला स्थान है, चीन बहत्तर हजार मौतों के साथ दूसरे स्थान पर है।इस तरह यह रिपोर्ट बताती है कि पीएम 2.5 और ओजोन के कारण वर्ष 2015 के दौरान हमारे देश में कुल ग्यारह लाख सत्तानबे हजार आठ सौ व्यक्तियों की असामयिक मृत्यु हुई। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि हवा में बहुत सारी और गैसें होती हैं, जिनसे धीरे-धीरे मृत्यु हो सकती है, पर उनका जिक्र नहीं है। इसी तरह रिपोर्ट के शुरू में ही स्पष्ट किया गया है कि सभी आंकड़े घरों के बाहर के प्रदूषण से संबंधित हैं, जबकि घरों के अंदर का प्रदूषण भी एक गंभीर समस्या है। अनेक वैज्ञानिकों के अनुसार घरों के अंदर के प्रदूषण से घरों के बाहर के प्रदूषण की तुलना में अधिक लोग मरते हैं। इसका सीधा-सा मतलब है कि बड़ी संख्या में वायु प्रदूषण के कारण लोगों की असमय मृत्यु होती है।
हमारे देश में ऐसी किसी भी रिपोर्ट को बिना वैज्ञानिक आधार दिए सीधे नकारने की लंबी परंपरा है। वैसे तो यह छोटा और नगण्य कारण दिखता है, पर अगर ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यह एक प्रमुख कारण है देश में प्रदूषण के लगातार बढ़ते रहने का। इस बार भी ऐसा ही हुआ। पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे ने कहा कि वायु प्रदूषण की समस्या तो है, पर वे आंकड़ों को नहीं मानते। दूसरी तरफ हर्षवर्धन ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों को गंभीरता से लेना चाहिए। हमारे प्रधानमंत्री भी ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अंतर्गत लगातार विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों को उद्धृत करते हैं। यह विचित्र नहीं तो और क्या है कि प्रधानमंत्री जिस संस्थान के आंकड़ों को स्वीकार करते हैं, पर्यावरण मंत्री उसी संस्थान के आंकड़ों को नकारते हैं!

पर्यावरण मंत्री ने यह भी कहा कि उनकी योजनाएं देश के संस्थानों के आंकड़ों पर आधारित होती हैं और यह रिपोर्ट विदेशी है। वे शायद भूल गए कि पिछले वर्ष ही इंस्टीट्यूट आॅफ ट्रापिकल मेटेरियालॉजी, पुणे के वैज्ञानिकों की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि दिल्ली में लोगों की छह वर्ष उम्र केवल वायु प्रदूषण के कारण कम हो गई है। यह संस्थान सबसे प्रतिष्ठित सरकारी संस्थानों में एक है, पर इस रिपोर्ट को तत्कालीन पर्यावरण मंत्री ने गलत करार दिया था, साथ ही इसे प्रधानमंत्री के विरुद्ध साजिश भी बताया था। तीन वर्ष पहले आइआइटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने बताया था कि दिल्ली में लगभग बाईस हजार व्यक्ति वायु प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष मरते हैं। इस रिपोर्ट को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अस्वीकार किया था।पर्यावरण मंत्री ने कहा कि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों का अध्ययन स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा शीघ्र ही कराया जाएगा। एक स्वाभिमानी देश हमेशा अपने अध्ययन पर भरोसा करता है। हम भारतीयों की यह विशेषता है कि विदेशी रिपोर्टों से प्रभावित हो जाते हैं, जबकि भारतीय रिपोर्टें हमें प्रभावित नहीं करतीं। अब मंत्रीजी को कौन समझाए कि जब इस संदर्भ में अनेक भारतीय रिपोर्टों को आपका मंत्रालय खारिज कर चुका है और पर्यावरण मंत्रालय की कोई रिपोर्ट है ही नहीं, तब हम देशवासी किस रिपोर्ट से प्रभावित हों? एक तथ्य यह भी है कि अगर प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित कार्य योजना तैयार करनी हो तब भी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मंत्रालय को महीनों लग जाते हैं, पर किसी रिपोर्ट को खारिज करने में दो-तीन दिन से अधिक समय नहीं लगता। पर्यावरण मंत्री तो इतनी गहन जानकारी रखते हैं कि उनकी राय में इस तरह की अधिकतर रिपोर्टें वैज्ञानिक तथ्यों को बिना परखे तैयार की जाती हैं।

‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर- 2017’ के संदर्भ में पर्यावरण मंत्री का सबसे विचित्र बयान है, ‘वायु प्रदूषण को काबू में रखना कोई रॉकेट साइंस नहीं है।’ उन्हें इतना तो अंदाजा होगा कि वर्तमान सरकार के लगभग तीन वर्षों के भीतर ही इसरो ने रॉकेट साइंस में कितनी तरक्की कर ली और दूसरी तरफ हम प्रदूषण के संदर्भ में कितना पीछे पहुंच गए। वायु प्रदूषण का नियंत्रण तो कभी एजेंडा में नहीं था, पर गंगा की सफाई तो था। गंगा सफाई को ‘नमामि गंगे’ नाम देने के अलावा तो कुछ काम ही नहीं हुआ। गंगा पहले से अधिक प्रदूषित हो चुकी है।जब सरकारें वैज्ञानिकों रिपोर्टों को बिना तथ्य दिए नकारती हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें अपने मुताबिक आंकड़ों वाली रिपोर्ट की जरूरत है। यह निश्चित तौर पर देश के विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए एक भयानक स्थिति है। विदेशी रिपोर्ट आप इसलिए नहीं स्वीकार करेंगे, क्योंकि वे विदेशी हैं और देशी रिपोर्ट इसलिए नहीं स्वीकार करेंगे, क्योंकि आंकड़े आपके अनुकूल नहीं हैं। पर्यावरण मंत्री के अनुसार उन्हें देश के वैज्ञानिक संस्थानों पर उतना ही भरोसा है, जितना भारतीय सेना पर। अब इसका मतलब तो वही बता सकते हैं।
चलिए मान भी लें कि सभी रिपोर्टें गलत हैं, सरकार को बदनाम करने के लिए बनाई गई हैं और हमारे यहां वायु प्रदूषण जैसी कोई समस्या नहीं है। पर मंत्रीजी आप तो आंकड़े बताइए, प्रदूषण है या नहीं है। प्रदूषण से लोग प्रभावित होते हैं या नहीं और प्रदूषण से कोई मरता भी है या नहीं। कम से कम एक रिपोर्ट तो जनता तक पहुंचाइए। वैसे भी पीएम 2.5 के आंकड़े तो संभवत: पर्यावरण मंत्रालय के पास होंगे, पर ओजोन के आंकड़े तो कुछ शहरों को छोड़ कर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास भी नहीं हैं।वायु प्रदूषण की भयानक स्थिति को देख कर तो यही कहा जा सकता है कि मंत्रीजी हवा में बातें करना छोड़िए, कुछ हवा की बातें कीजिए।

महेंद्र पांडेय

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