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अबलावाद को नया बढ़ावा

मृणाल पाण्डे गए हफ्ते रेडियो पर प्रसारित अपनी वार्ता में प्रधानमंत्री ने कुछ इस आशय की बात कही कि बेटियों, बहनों आदि की सुरक्षा बेहतर बनाने का काम हम सबका नेक उत्तरदायित्व है। आइए, हम लोग इस रक्षाबंधन पर्व पर हर बहन को जीवन सुरक्षा बीमा भेंट करें। महिलाओं की दशा सुधारने के लिए, उनकी […]
Author July 1, 2015 17:22 pm

मृणाल पाण्डे

गए हफ्ते रेडियो पर प्रसारित अपनी वार्ता में प्रधानमंत्री ने कुछ इस आशय की बात कही कि बेटियों, बहनों आदि की सुरक्षा बेहतर बनाने का काम हम सबका नेक उत्तरदायित्व है। आइए, हम लोग इस रक्षाबंधन पर्व पर हर बहन को जीवन सुरक्षा बीमा भेंट करें। महिलाओं की दशा सुधारने के लिए, उनकी सुरक्षा का कवच बेहतर बनाने के लिए सामने रखे गए इस नेक विचार से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। पर फिलहाल इसमें चार कमियां नजर आती हैं।

पहली कमी यह, कि महिलाओं की बेहतरी के लिए पुरुष संरक्षण की व्यवस्था करने का नजरिया मूलत: अबलावादी है। ऐसा सोच, हमारे मीडियॉकर साहित्य से लेकर बचावभरी संसदीय बहसों तक में (मैं तो उनको बहन मानता हूं जी, यह बात राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है) कई बार छलकता दिखता है। मूलत: हर लड़की को रक्षणीय बहन-बेटी कहने वाला यह सोच एक पुरुष वर्चस्ववादी दर्शन की उपज है, जो सारी महिला प्रजाति को उसके सार्थक रूप में भी ‘आंचल में दूध और आंखों में पानी’ भरे डगर-डगर ठोकरें खाती कमजोर प्रजाति मानता है। रक्षाबंधन का पर्व टीवी और फिल्मी परदे तक में इसी सोच को एक सौम्य घरेलू विस्तार देता है।

वस्तुस्थिति भाई-बहनों के बीच की तमाम टकराहटों, अप्रिय कहासुनी से कितनी ही भरी-भराई क्यों न हो, हमारी अदालतें भले ही संपत्ति या दहेज को लेकर कई मुकदमों की काली परछाइयों से क्यों न गूंज रही हों, लेकिन इस सोच के अलमबरदार उनकी अनदेखी करते हैं। फिर हर बरस हर रक्षाबंधन पर किसी कोमल बहना द्वारा भाई की कलाई पर बांधा गया धागा, उनको भाई की पौरुषभरी शक्ति द्वारा हर बहन का सनातन त्राता बनना प्रतीत होता है। साल भर तरह-तरह के महिला उत्पीड़न की पहले से कहीं अधिक कहीं गहरी रिपोर्टिंग करने वाला हमारा मीडिया भी हर साल जाने क्यों, रक्षाबंधन पर रंगारंग पुलआउट तैयार करते समय इस पर्व को भारतीय परंपरा में महिलाओं के आदर का प्रमाण साबित करने बैठ जाता है।

रक्षाबंधन को महिला रक्षण पर्व के रूप में धुकाने वाले इस नजरिये की दूसरी कमी यह है कि इसके तहत राजकीय संरक्षण पा सकने के लिए पहले देश भर की महिलाओं का रक्षाबंधन जैसे प्रतीकात्मक पर्व के तहत बहनों या बेटियों की श्रेणी में लाया जाना जरूरी बन जाता है। सहज सवाल उठता है, जो महिलाएं इस तरह के पारिवारिक संबोधनों के खांचे में फिट नहीं होतीं या होना चाहतीं, उनका क्या? क्या उनकी उपेक्षा या उनके साथ बदसलूकी जायज बन जाती है?

क्या स्त्री-पुरुष के बीच बहन या बेटी या मां या भाभी से इतर सहज प्रेम और मित्रता का कोई नामहीन सख्यत्व का रिश्ता नहीं बन सकता? तीसरी खामी: यह नुस्खा मानता है कि महिला के सदियों पुराने और अनेक जड़ों वाले अबलापन को सिर्फ आर्थिक सबलता (वह भी बीमे की मदद से?) द्वारा पूरी तरह मिटाया जा सकता है। पूछा जा सकता है कि अव्वल तो नियमित रूप से रकम भरना कोई हंसी-खेल नहीं। फिर ऐसे धन-निवेश और उससे सालों बाद मिली पूंजी पर नियंत्रण की क्षमता की कमी और रोग-शोक के खर्चे में महंगाई की उछाल के चलते कोई निखट्टू या शराबी या जुआड़ी पति-बेटे वाली ग्रामीण या शहरी गरीब महिला इससे कितनी दूर तक ले जाने वाली किस तरह की शक्ति पा सकेगी?

चौथी और एक बहुत बड़ी कमी यह है, कि (शायद अनजाने ही सही) रक्षाबंधन पर्व के बहाने से हर बहन-बेटी के सशक्तीकरण का यह आह्वान कहीं न कहीं बहुसंख्यक आबादी की सांस्कृतिक परंपराओं को सबके लिए शिरोधार्य मानने-मनवाने की जिद से ग्रस्त है।

इसका एक तो सीधा फलादेश यह निकलता है, कि जो महिलाएं किसी वजह से बहुसंख्य लोगों की परंपराओं या पारिवारिक रिश्तों की परिभाषा में फिट नहीं होतीं, उनकी रक्षा इस योजना का सरदर्द नहीं। दूसरे, इसमें कहीं न कहीं यह मान लिया गया है कि हमारी तमाम माताए, बहनें और बेटियां ऐसी निपट ठस अबलाएं हैं, जिनका पुरुषों सरीखा सहज सशक्तीकरण धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं की तहत संभव ही नहीं। और इसलिए हर बहन-बेटी के लिए किसी ऐसे आर्यपुरुष का सहारा अनिवार्य बताया जा रहा है, जो अपनी कलाई में बंधे रक्षासूत्र की आन तले लंबी कतार में लग कर अपनी उस प्यारी बहना के नाम बीमा कागजात बनवा ही नहीं लाएगा, ताउम्र उनकी इएमआइ भी भरता रहेगा।

अरे, अगर आजादी के करीब सत्तर साल बाद भी हमारे उच्चतम लीडरान में अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं की ताकत और औरतों की क्षमता पर यह मानने लायक भरोसा नहीं बन पाया कि बहुमत से सत्ता में आई उनकी सरकार कालांतर में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-राज्य के औजारों के कुशल ईमानदार प्रयोग से हर स्त्री या पुरुष को विकास और सुरक्षा का समान हक दिलवा सकेगी, तो यह तो हम सबके लिए जिन्होंने उनको राज-काज सौंप रखा है, घोर चिंता की बात है। दुख का विषय तो यह है ही।
कोई भी नई योजना समसामयिक माहौल की पृष्ठभूमि में ही अपना असली रूप दिखा सकती है।

आइए इस प्रस्ताव को भी हम पिछले सप्ताह के खुलासों के संदर्भ में जांचें। जिन कथित घोटालों के जितने दमदार प्रमाण मीडिया में सामने आए हैं, और उनसे शासक वर्ग के अलग-अलग लोगों के बीच लाभ-लोभ और पारिवारिक लूट-खसोट के निहायत अप्रिय सूत्र साफ दिखाई देते रहे हैं, उनसे यह स्पष्ट हुआ है कि भारत आज भी पुराने सामंती सोच को नहीं त्याग सका है। इस सोच के तहत सच्चा लोकतांत्रिक सामाजिक न्याय असंभव है क्योंकि इसके तहत कमजोर वर्गों में नौकरियां और सबसिडी एक हक की तरह नहीं, बतौर किसी रहमदिल शासक की इनायत सिर्फ तात्कालिक तकलीफ मिटाने को ही फौरी तरह से बांटी जाती हैं। राशि में से कितना महिलाओं या कमजोर वर्गों को मिला कितना नहीं, सार्वजनिक संपत्तियों का सालों से ताकतवर नेताओं और उनके उद्योगपति दोस्तों द्वारा चोरी-छिपे लूटना किस तरह होता रहा है, इस पर लगता नहीं कोई खास ध्यान दिया गया।

हमको कहा गया था कि मेक इन इंडिया इस कमजोरी को मिटाएगा। लेकिन यह नहीं हुआ। विदेशी पूंजी क्रिकेट से लेकर पर्यटन तक हर पटल पर सरपरस्तों की मंडली द्वारा एक क्लब बना कर की जाती रही इस तरह की लूट और सरपरस्ती को और भी पुष्ट करती गई है। नई योजनाओं ने विकास किया हो न किया हो, नेता-बाबुओं और ठेकेदारों के तंत्र को निश्चित तौर से अधिक भ्रष्ट, अधिक मुनाफाखोर बनाया है। चुनाव में राजनीति में परिवारवाद पर कितना नजला झाड़ा गया। लेकिन वह तो मिटा नहीं, अलबत्ता जिन दलों की खासियत उनकी जमीनी आम आदमी के बंधुत्व की थी, उनको भी यह रोग लगा दिखता है। इस तमाम हलचल ने शहरी मध्यवर्ग की महत्त्वाकांक्षी नई पीढ़ी को भी मेहनत और आदर्शवादी समाजसेवा से हटा कर उसे समझौतापरस्ती सिखाई है।

पहले कटु युवा विरोध हर कैंपस को एक तरह की आभा और उनके जत्थों को लेकर मुख्यधारा की राजनीति को एक तरह का बचावी तेवर देता रहता था। अब सारे युवा नेता उन दलों के टिकट पाकर खुश हैं और प्रतिरोध का मुंह सोने के ढक्कन से कस कर बंद है। युवा खून के बावजूद बड़ी पार्टियां चुनाव लड़ने की और टीवी चैनल चुनाव लड़वाने की खर्चीली मशीनें बनते जा रहे हैं और प्रचार का काम इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों के हवाले है। पैसे की मदद से वोट हासिल करने की कला को दलों ने और दलों से मनमानी विज्ञापनी मदद पाना टीवी के खबरचियों ने इतनी बारीकी से सीख लिया है कि उनके चुनावी घोषणापत्र और पैनल चर्चाएं सत्यनारायण कथा की कलावती कन्या के भाग्य की ही तरह अप्रासंगिक बन गए हैं। उसके अनवरत वाचन के बीच लोगों का ध्यान और बातचीत का प्रवाह कहीं और बहता रहता है। और जब आरती का वक्त आता है तब अकड़ी पीठ सीधी करता श्रोता समुदाय चरणामृत लेने और आरती गाने को उठ खड़ा होता है।

प्रस्ताव पास करने में इन तकरीरों और नेताओं का कोई जवाब नहीं। किसान से लेकर कन्या-शिशु को बचाने और पढ़ाने तक को लेकर बड़े-बड़े क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं और नए नारे तथा सरकारी टीवी पर कार्यक्रम जारी भी हो चुके हैं। लेकिन सचमुच की सामाजिक सरकारी सजगता की कमी बनी रहने से पुरानी विकृतियां तो कम नहीं हुर्इं, नई-नई आ गई हैं। जब देश को लड़कियों की राज्य-दर-राज्य तेजी से कम हो रही आबादी रोकने के लिए गंभीरता से कदम उठाने चाहिए, देश में न्यूनतम कन्याओं वाले राज्य से सुझाव आता है कि माता-पिता बेटियों के साथ सेल्फी खींच कर बेटियों को बहुत स्वीट रूप में दिखाने वाली फोटो प्रतियोगिता में हिस्सा लें। बेहतरीन छवि को इनाम दिया जाएगा। भारत में बेटी के बीमे का मतलब है एक अकाल ध्वंस हो सकने वाली फसल का बीमा करना। अगर भारत में किसी संस्था के पास इतनी पूंजी है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर इतने बड़े आबादी ध्वंस का बीमा कर सके तो यकीन मानें उसकी कुल आर्थिक साख सारे भारत की आर्थिक साख से कहीं बड़ी निकलेगी।

महिलाओं-बच्चियों के खिलाफ दुर्व्यवहार किसी गहरे नए मनोवैज्ञानिक कारण से नहीं हो रहा। वह इसलिए हो रहा है कि देश भर के अनेकानेक घरों, दफ्तरों और शिक्षण संस्थाओं और सड़कों पर उसे दुनियादारी के तहत सहन किया जा रहा है। परिवार उसे सह रहे हैं क्योंकि अधिकतर औसत पारंपरिक परिवारों को उनके पुरुष कर्ता सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकृति से किए गए महिला शक्ति के अन्यायपूर्ण दोहन से प्राप्त र्इंधन से चला रहे हैं। उस र्इंधन का हठात विलोप उनकी गाड़ी की गति को रोक दे यह न तो राज चाहेगा न समाज। और शासन भी महिला शक्ति का नाजायज अवमूल्यन सहता है क्योंकि लोकतंत्र और संविधान के नाम हलफ उठाने के बावजूद उसे अपनी पुलिस या निगरानी संस्थाओं पर भरोसा नहीं, और न ही वह तमाम नागरिक संस्थाओं के शीर्ष पर विराजमान पुरुषों की नाराजगी मोल लेकर महिला शक्ति की उफनाती भागीरथी को सहज किनारे काटने को छोड़ कर किसी बड़े भूस्खलन का खतरा उठाना चाहता है।

महिलाओं को सच्ची ताकत देनी हो, तो उसका एक ही पैमाना है कि शासक के अपने मन में चुनावी लाभ-लोभ से परे इस बात को अंजाम दिलाने का पक्का संकल्प हो। दूसरे इस बिंदु पर खुद शासक में इतना भारी नैतिक बल हो, कि गांधी की तरह वह उद्दंड और आक्रामक परंपरा की दुहाई देने वालों के आगे कतई व्यग्र न हो और उनको नए शक्ति-समीकरण सहजता से स्वीकार करने पर मजबूर कर सके। यह न हुआ तो अराजक हिंसा देर-सबेर सारी टीमटाम को निरर्थक बना डालेगी। कोई भी शासक दल और नेता बिना धर्म या जाति की मदद लिए यह काम अगर देशव्यापी पैमाने पर कर सके, तो महिलाओं की दशा के अलावा देश में और भी बहुत कुछ है जो सुधरने लगेगा।

अभी तो रक्षाबंधन के नाम पर महिलाओं ही नहीं, देश को भी ‘तू दयालु दीन हौं’ शैली में जो डगर दिखाई जा रही है, वह उनको स्वाश्रयी स्वाभिमानी नागरिक बनाने के बजाय अपने लिए अल्हड़-नादान अदा से किसी उदार तानाशाह संरक्षण की गोद तलाशने की तरफ ही ले जाएगी।

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