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पश्चिमी विज्ञान की दिशा

बनवारी पिछली एक शताब्दी में यूरोपीय जाति ने अपने भौतिक जीवन का कायाकल्प कर लिया है। अगर उन्नीसवीं शताब्दी में पला-बढ़ा उनका कोई पूर्वज आज अचानक अवतरित हो जाए तो उसकी आंखें विस्मय से भर जाएंगी कि उसके परिचित क्षेत्र में क्षितिज तक की दृश्यावली इतनी बदल गई है। इसका श्रेय यूरोपीय जाति द्वारा पिछली […]
Author May 21, 2015 00:17 am

बनवारी

पिछली एक शताब्दी में यूरोपीय जाति ने अपने भौतिक जीवन का कायाकल्प कर लिया है। अगर उन्नीसवीं शताब्दी में पला-बढ़ा उनका कोई पूर्वज आज अचानक अवतरित हो जाए तो उसकी आंखें विस्मय से भर जाएंगी कि उसके परिचित क्षेत्र में क्षितिज तक की दृश्यावली इतनी बदल गई है। इसका श्रेय यूरोपीय जाति द्वारा पिछली एक शताब्दी में की गई वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों को जाता है। यूरोपीय जाति की इस भौतिक प्रगति ने विश्व की अन्य सभी जातियों को आकर्षित किया है। उनके सबसे प्रतिभाशाली और कुशल स्त्री-पुरुष पश्चिमी विज्ञान को समझने, उनकी प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों की नकल करने और अपने यहां उनके जैसा भौतिक जीवन रचने की कोशिश में लगे हैं। भारत की स्थिति इससे अलग नहीं है। अपनी अत्यंत संपन्न शास्त्रीय परंपरा, प्राकृतिक जीवन के प्रति सहज अभिरुचि और भौतिक जीवन की सभी सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करने वाली उन्नत सामग्री को भूल कर हम पश्चिम जैसा बनने की होड़ में पड़े हैं।

एक सीमा तक यह होना स्वाभाविक है। पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने हमारी जीवनशैली में मूलभूत परिवर्तन कर दिया है। उसने मनुष्य के भौतिक विकास में एक नया चरण जोड़ दिया है और उसकी उपेक्षा करना संभव नहीं है। इस नई जीवनशैली में जो तड़क-भड़क है, उसका आकर्षण तो स्वाभाविक ही है। उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास ने सामरिक शक्ति को पुनर्व्याख्यायित कर दिया है। वह अब भी मूल रूप से व्यक्ति और समाज के स्वभाव और शौर्य से जुड़ी है, लेकिन व्यावहारिक रूप से सामरिक शक्ति आधुनिक आयुधों पर निर्भर है और उनकी सहायता के बिना आप आत्मरक्षा नहीं कर सकते। ये आधुनिक आयुध उस औद्योगिक तंत्र और आर्थिक तंत्र के बिना उपलब्ध नहीं हो सकते, जिसे पश्चिम ने अपने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सहारे विकसित किया है।

लेकिन पश्चिम के विज्ञान और प्रौद्योगिकी का यह विकास यूरोपीय जाति के स्वभाव की दिशा में उसके ज्ञान का विस्तार है। उसे मनुष्य मात्र के ज्ञान-विज्ञान के विकास के रूप में चित्रित किए जाने से अनेक भ्रम और अंधविश्वास पैदा हो गए हैं। उनके कारण पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के स्वरूप और उसकी दिशा के बारे में शेष विश्व में जो समीक्षण और आकलन होना चाहिए था वह नहीं हो पाया। यह सामान्य-सी बात है कि संसार की सभी सभ्यताएं अपने स्वभाव और अपनी जीवन दृष्टि के अनुसार ही आगे बढ़ती हैं। यूरोपीय जाति की भौतिक प्रगति में भी उसके स्वभाव और उसकी जीवन दृष्टि का ही योगदान रहा है और वह संसार के सभी लोगों के लिए उतनी ही उपयोगी हो, यह आवश्यक नहीं है। पिछली एक शताब्दी में पश्चिम ने स्वयं ही अपनी इस भौतिक प्रगति की एक समालोचना विकसित की है, जिसके केंद्र में प्रकृति और पर्यावरण की होती जा रही क्षति है। विश्व को भी उसने केवल इसी आलोचना में उलझा दिया है।

पश्चिम ने पिछली एक शताब्दी में ज्ञान को भौतिक जगत की प्रक्रियाओं को समझ कर भौतिक जीवन को नियंत्रित करने की कुशलता में सीमित कर दिया है। अब तक संसार भर में ज्ञान का मूल उद््देश्य परमार्थ को समझना और विशेष उद््देश्य संसार में जीवन के प्रवाह को कार्य-कारण की विधि से समझना रहा है। भारत में कार्य-कारण को केवल भौतिक घटनाओं तक सीमित नहीं रखा गया। इसलिए भारत में विज्ञान का दायरा अधिक विस्तृत और सुसंगत रहा है और उसकी दिशा अधिक संतुलनकारी रही है। इसलिए भारतीय शास्त्रीय दृष्टि में और पश्चिम की वैज्ञानिक दृष्टि में मूलभूत अंतर है।

पश्चिम के विज्ञान और प्रौद्योगिकी को आप यूरोपीय लोगों के मूल स्वभाव और इतिहास की दिशा को जाने बिना नहीं समझ सकते। उनके मूल स्वभाव पर संक्षिप्त टिप्पणी करना न संभव है, न उचित। इतना याद दिलाना पर्याप्त है कि उनकी मूल प्रवृत्ति नियंत्रणकारी है और यूरोपीय विजेता समूहों ने इसीलिए अपने ही यहां के शासित लोगों के उपनिवेशीकरण से अपनी राज्य-व्यवस्थाएं खड़ी की हैं। उनका यही स्वभाव उनके विज्ञान और प्रौद्योगिकी में दिखाई देता है, जिसका प्राथमिक उद््देश्य प्रकृति की प्रक्रियाओं का नियंत्रण है। उनकी इस प्रवृत्ति को आधुनिक पश्चिमी विज्ञान के आदि पुरुष माने जाने वाले फ्रांसिस बेकन में आप बड़ी स्पष्टता से देख सकते हैं। विश्व के अन्य सभी समाजों की वैज्ञानिक बुद्धि प्रकृति को समझ कर उसकी विधियों को अपने अनुकूल बनाने की रही है, जबकि पश्चिम की लालसा प्रकृति पर विजय पाने की रही है।

यूरोप के राज्य-तंत्रों के औपनिवेशिक चरित्र के कारण वहां के साधारण लोगों में सदा अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी और रोग व्याप्त रहे। यूरोप के मध्यकालीन लंदन और पेरिस आदि शहरों में कैसी गंदगी और गरीबी व्याप्त थी, इसकी झलक देखनी हो तो बीबीसी का ‘फिल्दी सिटी’ वृत्तचित्र देखना चाहिए, जो नेट पर उपलब्ध है। भारतीय संस्कार का कोई व्यक्ति उस पूरे वृत्तचित्र को अपनी संवेदना कुंद किए बिना देख नहीं सकता। यही कारण है कि दो शताब्दी पहले तक यूरोप आए साल प्लेग जैसी महामारी से जूझता रहा। पिछली तमाम शताब्दियों में जापान में उतनी बार भूकम्प नहीं आए होंगे जितनी बार यूरोप में प्लेग फैला होगा। 1350 का प्लेग तो इतना भयानक था कि उसके कारण यूरोप की आधी जनसंख्या समाप्त हो गई थी। यूरोप के इतिहास में ब्लैक डेथ के रूप में जानी जाने वाली यह घटना ही वास्तव में आधुनिक यूरोप की जनक है।

औद्योगिक क्रांति के जनक इंग्लैंड पर इस महामारी का जो प्रभाव हुआ, उसे समझना आवश्यक है। ग्यारहवीं शताब्दी में वहां नामंर्डी से आए दस हजार नार्मन योद्धाओं ने अपना राज्य स्थापित किया था। उनसे बने शासक वर्ग ने पाया कि भू-दासों की स्थानीय आबादी के भरोसे खेती नहीं चल सकती।

सन 1350 में इंग्लैंड की जनसंख्या लगभग साठ लाख थी। उसके आधे रह जाने से भू-दासों की उपलब्धि घट गई। मेनर के स्वामियों ने अपने स्वामित्व की भूमि के ऐसे उपयोग के बारे में सोचना शुरू किया जो बिना भू-दासों के संभव हो। उनमें काफी ने खेती छोड़ कर अपनी जमीन पर बाड़ लगा दी और उसके घेरे में भेड़ आदि पालना शुरू किया, क्योंकि उन्हें ऊन का निर्यात अधिक लाभदायक दिख रहा था। इसी से ऐसे उत्पादन तंत्र के बारे में सोचा जाना आरंभ हुआ, जिसमें लोगों की जरूरत कम हो और उत्पादन के यंत्रीकरण का मार्ग खुला। खेती से खदेड़े गए भू-दास छोटे कस्बों में पहुंचे और छोटे उद्योग-धंधों के पनपने का साधन बने।

इन्हीं परिस्थितियों ने यूरोपीय शासक वर्ग का ध्यान खेती से व्यापार की ओर खींचा। लेकिन उस समय अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अरबों का दबदबा था। दक्षिणी यूरोप में स्पेन और पुर्तगाल पर 711 ईस्वी से अरबों का शासन था और उन्हीं से यूरोपीय लोगों में व्यापारिक आकांक्षाएं और लंबी दूरी के नौकायन की कुशलता पैदा हुई। कोलंबस और वास्कोडिगामा की यात्राएं इसी का परिणाम थीं।

इन यात्राओं के परिणामस्वरूप यूरोप का अपने से ग्यारह गुने भू-भाग वाले अमेरिका पर नियंत्रण हो गया। अपने तोपखाने, जिसे चीनियों से मंगोलों और मंगोलों व तुर्कों से यूरोपियों ने सीखा था, के बल पर उन्होंने यूरोप से अधिक अमेरिका की मूल आबादी के दो तिहाई को पचास वर्ष में ही समाप्त कर दिया। 1500 तक यूरोपीय लोग विश्व के 6.7 प्रतिशत भू-भाग में ही सीमित थे। अब लगभग आधे भूगोल पर उनका नियंत्रण है। उन्हें उनके मूल क्षेत्र में लौटने को विवश करने की सामरिक शक्ति अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन प्रकृति ने विश्व की जनसंख्या में उनका अनुपात फिर से बारह प्रतिशत ला दिया है। हालांकि इनमें से आधे से अधिक लोग यूरोप के बाहर हथियाए गए भू-भाग पर फल-फूल रहे हैं। इस विशाल बाहरी क्षेत्र की उर्वर भूमि और खनिज की उनकी संपन्नता में जो भूमिका रही है, उसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

अंगस मेडिसन के अनुसार आज की विश्व की बारह प्रतिशत जनसंख्या वाली यूरोपीय जाति विश्व की तैंतालीस प्रतिशत संपदा की स्वामी है। उसकी इस संपन्नता का श्रेय विज्ञान और प्रौद्योगिकी को दे दिया जाता है। लेकिन उसके भौगोलिक, राजनीतिक और व्यापारिक विस्तार में कम से कम उन्नीसवीं शताब्दी तक आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की कोई भूमिका नहीं थी। इस विस्तार के मूल कारणों में जाना यहां संभव नहीं है। लेकिन इस विस्तार में जैसी आक्रामकता, क्रूरता और हिंसा उपयोग में लाई गई वह मनुष्य के इतिहास में अभूतपूर्व थी। यह दौर अफ्रीकी महाद्वीप के दास-व्यापार से आरंभ होकर अमेरिका-आॅस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के संहार और दुनिया के बड़े भू-भाग के औपनिवेशीकरण में परिणत हुआ। इस दौर ने ही पश्चिम में यह आकांक्षा पैदा की कि प्रकृति की प्रक्रियाओं का नियंत्रण करके एक ऐसे उत्पादन तंत्र का विकास किया जाए जो मनुष्य की जगह यंत्र आश्रित हो। इसी का परिणाम है कि पश्चिमी देशों का सारा कृषि उत्पादन एक प्रतिशत आबादी से और औद्योगिक उत्पादन बाईस प्रतिशत आबादी से हो रहा है।

पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ठीक आकलन के लिए यह समझना आवश्यक है कि उसका विकास औद्योगिक क्रांति के अंत में हुआ। 1880 के आसपास आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का दौर आरंभ हुआ और आरंभ में उसका नेतृत्व जर्मनी कर रहा था। हिटलर के कारण गैर-जर्मन वैज्ञानिकों ने जर्मनी छोड़ी तो अमेरिका इसका अग्रणी देश हो गया। इस वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय प्रगति को वास्तविक गति पहले और दूसरे महायुद्ध की तैयारी में मिली। दूसरे महायुद्ध में हुए व्यापक विनाश ने यूरोप और जापान के भौतिक कायाकल्प का रास्ता खोला। 1950 से 1973 तक के इस दौर को पश्चिम का स्वर्णयुग कहा जाता है। पश्चिमी विज्ञान प्रयोगशाला की नियंत्रित परिस्थितियों में पदार्थ के विखंडन द्वारा उसकी क्रियाओं और कार्य-कारण को समझने की कोशिश है। पश्चिम विज्ञान की इस एकांगी दिशा की सीमाएं अब प्रकट होने लगी हैं।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास ने पश्चिमी समाज को सामरिक शक्ति और प्रचुर औद्योगिक सामग्री उपलब्ध की है। लेकिन इस प्रक्रिया में विश्व के बहुत बड़े भू-भाग में प्राणी जगत और वनस्पति जगत का व्यापक विनाश हुआ है। जो उपभोक्ता सामग्री पैदा हुई है वह भी जीवन की गुणवत्ता और सौंदर्य दृष्टि क्षीण करके हुई है। विश्व की गैर-यूरोपीय अट्ठासी प्रतिशत आबादी को इसी विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने केवल सत्तावन प्रतिशत साधनों पर सीमित हो जाने के लिए विवश किया है। इसलिए शेष दुनिया को पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी की उपयोगी जानकारी आत्मसात करते हुए अपने स्वभाव और जीवन दृष्टि के अनुसार अपनी स्वतंत्र वैज्ञानिक परंपरा और प्रौद्योगिकी विकसित करनी चाहिए।

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