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सेक्युलर भारत को डराते संकेत

सुभाष गाताडे संविधान सभा के किसी सदस्य ने यह सुझाव पेश किया था कि उसके प्राक्कथन में ‘ईश्वर की दुहाई’ दी जाए, तब संविधान सभा के कई सदस्यों ने उसकी मुखालफत की थी, जिनमें से कई आस्थावान भी थे। एक सदस्य ने कहा कि ‘विचारों, अभिव्यक्ति, आस्था, विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता की गारंटी देने […]
Author January 1, 2015 16:35 pm

सुभाष गाताडे

संविधान सभा के किसी सदस्य ने यह सुझाव पेश किया था कि उसके प्राक्कथन में ‘ईश्वर की दुहाई’ दी जाए, तब संविधान सभा के कई सदस्यों ने उसकी मुखालफत की थी, जिनमें से कई आस्थावान भी थे। एक सदस्य ने कहा कि ‘विचारों, अभिव्यक्ति, आस्था, विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता की गारंटी देने वाले प्राक्कथन के साथ ऐसा उल्लेख असंगत होगा।’

गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की मांग वाले सुषमा स्वराज के बयान को लेकर यह चर्चा भी चली कि दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की अगुआई में कायम नए निजाम में वे अपने आप को हाशिये पर पा रही हैं, इसलिए सुर्खियों में आने के लिए उन्होंने ऐसा कहा है। इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री कार्यालय में सारी सत्ता के केंद्रीकरण की मोदी-शैली ने उनकी पार्टी के अग्रणी नेताओं में ही नहीं बल्कि उनके कैबिनेट मंत्रियों में भी बेचैनी बढ़ रही है और इस शैली की अंदर ही अंदर आलोचना भी हो रही है।

दरअसल हमें सुश्री सुषमा स्वराज के उपर्युक्त बयान को संघ परिवार के अन्य दिग्गजों के उद्गारों या उनके आनुषंगिक संगठनों की हरकतों, उनके द्वारा अंजाम दी जा रही सरगर्मियों के सिलसिले में देखना चाहिए, जिनका मकसद धर्मनिरपेक्ष भारत को एक हिंदू राष्ट्र में रूपांतरित करना है। फिर चाहे आए दिन संघ सुप्रीमो द्वारा दिए जा रहे यह बयान हों कि भारत किस तरह ‘हिंदु राष्ट्र’ ही है क्योंकि यहां रहने वाले सभी हिंदू ही हैं, या मोदी सरकार की मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति द्वारा ‘रामजादा बनाम…’ के तौर पर दिया गया बयान हो या विश्व हिंदू परिषद के लोगों द्वारा ‘घरवापसी’ की मुहिम और सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने की कोशिशें हों या भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद से लेकर अन्य अकादमिक संस्थानों के शीर्ष पर तैनात किए जा रहे संघ की छाया में पले-बढ़े विद्वान हों, जो मिथक और इतिहास को आपस में घालमेल करने में माहिर हैं, या मोदी सरकार बनने के बाद से देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की खबरे ही हों।

देश के एक अग्रणी अखबार ‘द हिंदू’ में संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक द्वारा दिया गया यह साक्षात्कार कि 2025 तक- जबकि संघ अपनी जन्मशती मना रहा होगा- देश को वे हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं, उसी से उनकी तमाम सरगर्मियां स्पष्ट होती हैं। दरअसल, संघ परिवार में जो ‘कार्य विभाजन’ विद्यमान है, उसमें एक संसदीय धड़ा गोया बिल्कुल संसद की चौहद््दी तक अपने आप को सीमित रखता दिखाई देगा, और गैर-संसदीय कहा जाने वाला हिस्सा तरह-तरह के प्रगट-अप्रगट हिंसाचार में लिप्त दिखाई देगा, मगर सभी मिल कर हिंदुत्व के एजेंडे को ही आगे बढ़ाते मिलेंगे। यही तरीका यहां पर भी उद््घाटित होता दिखता है।

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जब भाजपा को अपने बलबूते पूर्ण बहुमत मिला है, प्रमुख विपक्षी पार्टी आजादी के बाद की अपनी यात्रा में सबसे खराब स्थिति में पहुंची है, वामपंथी पार्टियां भी हाशिये पर ही हैं, तो ऐसी स्थिति में संघ परिवारी संगठन भारतीय समाज में दुर्भावना पैदा करने वाले, अपने विघटनकारी लगने वाले एजेंडे के साथ इतनी तेजी से क्यों दौड़ना चाहते हैं? अगर ‘विकास’ की बात कहते हुए मोदी नए मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने में कामयाब हुए हैं, तो इतनी जल्दी क्या है संघ का एजेंडा लागू करने की!

बात स्पष्ट है कि संघ के श्रेष्ठी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस पार्टी को, तमाम गरीबोन्मुखी योजनाएं लागू करने और सामाजिक सद्भाव कायम करने की कोशिशों के बावजूद, महज कुप्रबंधन के चलते सत्ता से बाहर होना पड़ा है, उसी किस्म की स्थितियां मोदी सरकार के सामने भी जल्दी ही आ सकती है। संघ के कर्णधार यह भी जानते हैं कि मोदी सरकार बनने के पहले जहां संघ से जुड़ने वाले लोगों की तादाद काफी कम थी, उसमें आज गुणात्मक इजाफा हुआ है। और यह स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली है। वे भारतीय लोकतंत्र के इस इतिहास से भी वाकिफ हैं जहां अपूर्व बहुमत हासिल कर बनी राजीव गांधी की सरकार को या बांग्लादेश की मुक्ति में अहम भूमिका निभाने के चलते देश में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंची इंदिरा गांधी की सरकार को भी जल्दी जनाक्रोश का सामना करना पड़ा था और उसकी वैधता पर प्रश्नचिह्न भी लगे थे।

संकेत स्पष्ट हैं कि छह-सात माह के भीतर ही मोदी सरकार की छवि यही बनती दिख रही है कि वह ‘यू टर्न’ अर्थात पलटी मारने वाली सरकार है जिसने देखते ही देखते अपने तमाम नारों-वायदों पर पलटी मारने में महारत हासिल की है। दिलचस्प यह भी है कि स्वयं ‘परिवार’ के अंदर भी कैबिनेट प्रणाली को ताक पर रखने और सत्ता के केंद्रीकरण की मोदी-शैली के चलते असंतोष के स्वर प्रगट होने लगे हैं। हाल में अरुण शौरी द्वारा ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को दिया गया साक्षात्कार देंखे, जिसमें उन्होंने परोक्ष रूप से मोदी को इशारा किया है कि ‘केंद्र सरकार के संचालन और म्युनिसिपालिटी के संचालन में फर्क होता है’। अपने साक्षात्कार में अकबर इलाहाबादी को उद्धृत करते हुए उन्होंने यहां तक कहा कि ‘प्लेटों के लगने की आवाज तो आ रही है, मगर खाना नहीं आ रहा है।’

भगवद्गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग दरअसल भारतीय राजनीति और समाज के हिंदूकरण के एजेंडे को ही आगे बढ़ाने का प्रस्ताव है ताकि वैज्ञानिक चिंतन पर यकीन रखने वालों और गैर-हिंदुओं को दोयम दर्जे के लिए विवश किया जा सके। यह एक तरह से अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के नक्शेकदम पर चलने का प्रस्ताव है, जिसने अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के केंद्र में इस्लाम को प्रतिष्ठापित किया और जो आज अंत:स्फोट का शिकार होता दिख रहा है।

यह नहीं भूलना चाहिए कि गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने का प्रस्ताव एक तरह से पिछले दरवाजे से भारत के राज और समाज के संचालन में संविधान को दी गई वरीयता को खारिज करने का भी प्रस्ताव है, जिसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठन लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। दरअसल, आंबेडकर की अध्यक्षता में संविधान सभा के गठन और लंबे बहस-मुबाहिसे से चली संविधान के निर्माण की प्रक्रिया के दिनों से ही हिंदुत्ववादी जमातों के अग्रणियों ने- फिर चाहे गोलवलकर हों या सावरकर- अपनी असहमति लगातार प्रगट की है। ‘आर्गनाइजर’ के पुराने अंकों को पलटें या सावरकर के समग्र साहित्य को देखें तो वहां इसके संदर्भ मिलते हैं कि किस तरह इन लोगों ने संविधान बनाने का विरोध किया था और मनुस्मृति को ही आजाद भारत का संविधान घोषित करने के लिए दबाव डाला था। वही मनुस्मृति, जिसने शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों को सैकड़ों सालों तक तमाम मानवीय अधिकारों से वंचित रखा था।

अपने मुखपत्र ‘आर्गनाइजर’ (30 नवंबर, 1949) में संघ की ओर से लिखा गया था कि ‘‘हमारे संविधान में प्राचीन भारत में विलक्षण संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु की विधि स्पार्टा के लाइकरगुस या पर्सिया के सोलोन के बहुत पहले लिखी गई थी। आज तक इस विधि की जो ‘मनुस्मृति’ में उल्लिखित है, विश्व भर में सराहना की जाती रही है और यह स्वत:स्फूर्त धार्मिक नियम-पालन और समानुरूपता पैदा करती है। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है।’’
सदियों में विकसित हुई हिंदुओं की दार्शनिक-आध्यात्मिक परंपरा को हम देखें तो उसमें हमें एक स्थूल विभाजन ‘श्रुतियों’ और ‘स्मृतियों’ के रूप में दिखता है। वेदों, उपनिषदों, तरह-तरह के पुराणों आदि की बात होती है। हिंदू धर्म की यही खासियत समझी जाती है कि इसमें चार्वाक जैसे भौतिकवादी दर्शन से लेकर वेदांत तक शामिल हैं और इन अलग-अलग धाराओं को मानने वाले सभी अपने आप को हिंदू कहलाते हैं। फिर प्रश्न उठता है कि इसमें संघ परिवार द्वारा गीता को ही सबसे पवित्र ग्रंथ का दर्जा देने के पीछे का क्या तर्क है?

हम देख सकते हैं कि ईसाइयत या इस्लाम जैसे सामी धर्मों के बरक्स, जहां एक पैगंबर (प्रोफेट) और एक ‘पवित्र ग्रंथ’ (फिर चाहे बाइबिल हो या कुरान) का अस्तित्व दिखता है, हिंदू धर्म का स्वरूप बहुविध रहा है। मगर लंबे समय से संघ परिवार की यह कोशिश रही है कि हिंदू धर्म की भी एक पवित्र किताब हो या उसकी एक पवित्र नगरी हो। बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर निर्माण की उसकी मुहिम का फोकस ऐसे ही हिंदू धर्म को गढ़ने पर रहा है जहां अयोध्या को मक्का की तरह पवित्र घोषित किया जा सके। देशज हिंदू धर्म से बुनियादी विचलन के रूप में गढ़े जा रहे इस धर्म को देख सकते हैं जो एकाश्म (मोनोलिथिक), समरूप है और सामी धर्मों की कई विशिष्टताओं को अपने में समाहित करता है। प्रख्यात इतिहासकार रोमिला थापर इस प्रक्रिया को सिंडिकेटेड हिंदुइज्म के तौर पर संबोधित करती है।

भगवद्गीता के प्रति संघ परिवारी जनों के सम्मोहन के बरक्स हम प्रख्यात विद्धान डीडी कोसांबी के विचारों को देख सकते हैं, जब वह अपनी बहुचर्चित किताब ‘मिथ ऐंड रियलिटी’ (मिथक और यथार्थ) में गीता के सामाजिक पक्ष की विवेचना करते हैं: ‘‘गीता ने एक ऐसा ग्रंथ प्रस्तुत किया जिसे स्वीकृत ब्राह्मण पद्धतिविज्ञान (मेथोडोलोजी) से हिंसा किए बिना- ऐसी सामाजिक कार्रवाइयों के लिए प्रेरणा देने और औचित्य प्रदान करने के लिए, जिनके प्रति सत्ताधारी वर्ग की कुछ असहमति थी, जिन पर उस वक्त ब्राहमण निर्भर थे- प्रयुक्त किया जा सकता था।’’

चर्चित समाजविज्ञानी नलिनी पंडित के मुताबिक आंबेडकर का भी उसी किस्म का नजरिया था। अपने आलेख ‘आंबेडकर ऐंड गीता’ में वह लिखती हैं: ‘‘प्राचीन धार्मिक ग्रंथों का विस्तारपूर्वक अध्ययन करने के बाद, आंबेडकर इस निष्कर्ष तक पहुंचे कि बुद्धपूर्व आर्य समय के आर्य समाज में नैतिक मूल्यों का कोई विकसित बोध नहीं था। बौद्ध धर्म के आगमन ने इस समाज में एक नैतिक और सामाजिक क्रांति को जन्म दिया। जब मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया तब यह सामाजिक क्रांति एक राजनीतिक क्रांति में तब्दील हुई।

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद, ब्राह्मणों ने, जिनके हित बौद्ध राजाओं के शासन में बाधित हुए थे, उन्होंने पुष्यमित्र शुंग की अगुआई में अपनी प्रतिक्रांति की शुरुआत की। इस प्रतिक्रांति ने ब्राह्मणवाद का पुनरुत्थान किया। आंबेडकर के मुताबिक इस प्रतिक्रांति को विचारधारात्मक और नैतिक समर्थन देने के लिए गीता की रचना हुई।’’ इसके बारे में विस्तार से जानना हो आंबेडकर की अधूरी किताब ‘रेवोल्यूशन ऐंड काउंटर रेवोल्यूशन इन एन्शंट इंडिया (अध्याय 9, भाग तीन) के अध्याय ‘एस्सेज आॅन भगवद्गीता: फिलोसोफिक डिफेन्स आॅफ काउंटर रेवोल्यूशन: कृष्णा ऐंड हिज गीता’ को देख सकते हैं, जिसमें वह गीता के निर्माण-काल को ईसा की दूसरी-तीसरी सदी बताते हैं और गीता के बहुचर्चित श्लोक ‘चातुर्वर्ण्य मया सृष्टा, गुणकर्म विभागश:’ (चातुर्वर्ण्य का निर्माण मैंने गुण-दोष के आधार पर किया है) जैसी गीता की सीख के कारणों की पड़ताल करते हैं।

गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ का दर्जा देने की वकालत का मकसद क्या गीता की इसी भूमिका को महिमामंडित करना है, जो बात संघ परिवार के लिए मुफीद जान पड़ती है!

 

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