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समग्र विकास के लिए

अनिल बलूनी हिटलर के प्रचार-मंत्री गोयबल्स का मानना था कि एक झूठ को बार-बार बोलने से वह सच का स्थान ले लेता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस गोयबल्स को अपना आदर्श मान चुकी है। कम से कम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कांग्रेस का दुष्प्रचार तो यही बयान करता है। कांग्रेस ने […]
Author May 2, 2015 08:12 am

अनिल बलूनी

हिटलर के प्रचार-मंत्री गोयबल्स का मानना था कि एक झूठ को बार-बार बोलने से वह सच का स्थान ले लेता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस गोयबल्स को अपना आदर्श मान चुकी है। कम से कम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कांग्रेस का दुष्प्रचार तो यही बयान करता है। कांग्रेस ने जैसे यह ठान लिया है कि वह मोदी सरकार पर अमीरों की हितैषी और गरीब-विरोधी होने का ठप्पा लगा कर रहेगी। जब से भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार बनी है, कोई दिन ऐसा नहीं गया होगा जब कांग्रेस के लोगों ने सरकार पर कॉरपोरेट समर्थक होने का आरोप न लगाया हो। लेकिन वे बड़ी भूल की पुनरावृत्ति कर रहे हैं। उन्हें याद होगा कि गुजरात में भी उन्होंने यही रणनीति अपनाई थी और वहां एक नहीं, तीन-तीन बार मुंह की खानी पड़ी। जब-जब उन्होंने नरेंद्र मोदी पर यह आरोप लगाया कि वे पूंजीपतियों के समर्थक हैं, तब-तब मोदी और ज्यादा वोटों से जीत कर आए और कांग्रेस को विपक्ष में बैठने को विवश होना पड़ा।

इधर लगभग छह महीनों की शीत-निद्रा के बाद कांग्रेस खुद को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है। उसका हर नेता, हर प्रवक्ता एक सुर में यही राग अलाप रहा है कि मोदी सरकार गरीब-विरोधी है, किसान विरोधी है और उसका विकास मॉडल पूंजीपति समर्थक है। लेकिन दस माह के कार्यकाल में वे एक भी ऐसा उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर सके जो प्रदर्शित करता हो कि सरकार कॉरपोरेट के पक्ष में और गरीबों के खिलाफ है। हालांकि कॉरपोरेट जगत का देश के विकास में अपना महत्त्व है यह एक अलग से बहस का विषय हो सकता है।

वास्तव में नरेंद्र मोदी की समूची राजनीति के केंद्र में गरीब और आम भारतीय है। अगर गरीब न चाहता तो क्या भाजपा चुनाव जीत सकती थी? अमीरों की संख्या है ही कितनी? सचमुच के अमीर तो एक प्रतिशत भी नहीं हैं। उनमें से भी अधिकतर वोट डालने नहीं जाते हैं। जबकि 2014 के चुनाव में भाजपा को किसी एक वर्ग, जाति, संप्रदाय या धर्म का ही समर्थन नहीं मिला, उसे समर्थन देने वालों में हरेक वर्ग और धर्म के लोग शामिल थे। इसीलिए नरेंद्र मोदी ने नारा दिया, ‘सबका साथ, सबका विकास’। यह नारा सरकार की विचारधारा का केंद्रबिंदु है, और इसको साकार करने के लिए पूरी सरकार प्रयासरत है।

मोदी कभी भी कांग्रेस की तरह लोकलुभावन नारे या लालीपॉप वाली योजनाएं नहीं बनाते, जिनसे कि बाद में देश का ही नुकसान होता हो। उनकी योजनाएं दूरगामी हैं जिनका असर थोड़े समय बाद दिखाई पड़ेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि वे इस समय राष्ट्र को मजबूत कर रहे हैं। आजादी से वर्तमान समय तक कांग्रेस सरकारों द्वारा कुप्रबंधन की शिकार अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है।

यूपीए ने जो विकास दर 4.4 फीसद पर छोड़ी थी वह 7.4 फीसद तक आ गई है, देश में विश्वास का माहौल बना है, विश्वपटल पर देश की प्रतिष्ठा बढ़ी है। कांग्रेस और उसके मैनेजरों ने देश के चिंतन की दिशा उलट कर रख दी थी। वह फिर से सही दिशा की ओर मुड़ रही है।
प्रधानमंत्री मोदी देश की समस्याओं का इलाज फौरी तौर पर नहीं करना चाहते हैं। वे विकास के पश्चिम से आयातित मॉडल के अनुसार नहीं, अर्थव्यवस्था के अवरोधों का स्थायी समाधान करना चाहते हैं। मोदी सरकार का सबसे बड़ा लक्ष्य इस देश से भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकना है। यह भी सही है कि यह एक दिन में नहीं होगा।

मगर शासन में शुचिता की जो लक्ष्मणरेखा उन्होंने खींच दी है, उसे लांघने की हिम्मत अब किसी में नहीं है। उन्होंने शुरू में ही बोल दिया था, न खाऊंगा न खाने दूंगा। सचमुच मोदी सरकार भ्रष्टाचार को बिल्कुल बर्दाश्त न करने की रणनीति पर चल रही है। इसी का परिणाम है कि दस माह के कार्यकाल में भ्रष्टाचार का एक भी दाग सरकार के दमन पर नहीं लगा। उनके कड़े फैसलों के चलते अब प्रशासन के सोच में बदलाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। नरेंद्र मोदी राजनीति को ‘मिशन’ बनाना चाहते हैं। जब वे सत्ता में आए तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि वे प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक हैं। वे राजनीति को करियर नहीं, देश-सेवा का जरिया बनाना चाहते हैं। कांग्रेस वाले गुजरात में उनके तेरह वर्ष के शासन पर भ्रष्टाचार के कोई आरोप तो नहीं लगा सके, लिहाजा अमीर समर्थक कह कर अपनी ही फजीहत करवा रहे हैं।

सच यह है कि मोदी सरकार न अमीरों के लिए है और न ही गरीब विरोधी। मोदी सरकार का बजट इस बात की तसदीक करता है कि उनकी नजर में भविष्य का भारत है। कांग्रेस के तदर्थवाद से देश का बहुत नुकसान हो चुका है। वे देश में स्वच्छता अभियान चला रहे हैं। क्या वह अमीरों के लिए है? उन्होंने जीरो बैलेंस वाला जन धन खाता शुरू करके इस देश के गरीबों के लिए बैंकों के दरवाजे खोले, बारह करोड़ से अधिक लोगों के खाते खोले गए, क्या यह भी अमीरों के लिए है?

इसी तरह ग्रामीण बेरोजगार युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम, अटल पेंशन योजना, सुरक्षा बीमा योजना, जीवन ज्योति बीमा योजना (सरकार प्रत्येक नागरिक को बीमा कवर देना चाहती है), 2022 तक बेघर लोगों को घर देने की योजना हो या स्कूलों में शौचालय बनाने की योजना, इन सबका संबंध गरीबों के उत्थान से ही है। सरकार ने लघु और कुटीर उद्यमियों के लिए मुद्रा बैंक की शुरुआत की है जिसके माध्यम से पांच हजार से दस लाख रुपए तक का सस्ता ऋण उपलब्ध किया जा सकेगा।

प्रधानमंत्री ने आर्थिक रूप से संपन्न लोगों से आह्वान किया है कि स्वेच्छा से एलपीजी सबसिडी छोड़ दें। उनके आग्रह के बाद लाखों लोगों ने गैस सबसिडी छोड़ दी है; यह संख्या रोज बढ़ रही है। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया है कि जो धनराशि बचेगी उसका उपयोग जरूरतमंदों के लिए ही होगा। यह गरीब की सेवा में महत्त्वपूर्ण सहयोग है। मोदी चाहते हैं कि गांवों में भी विकास की किरणें पहुंचें। यह समग्र विकास का लक्ष्य है। कम से कम भूमि से अधिक से अधिक पैदावार कैसे ली जाए, इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों को भी आगे आना होगा और किसानों को भी नई तकनीकें अपनाने के लिए तत्पर रहना होगा। मिट्टी की सेहत (साइल हेल्थ कार्ड) का परीक्षण इस दिशा में उठाया गया एक छोटा-सा कदम है। सरकार का प्रयास है कि आने वाले समय में गांव तक आधुनिक सुविधाएं मिलें और गांवों का चेहरा बदल जाए।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस अपनी कमजोरियों को छिपाने और देशवासियों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए भूमि अधिग्रहण विधेयक का इस्तेमाल कर रही है। इस विधेयक के बारे में भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं। वास्तव में आजादी के बाद किसानों के पक्ष में नारे तो खूब गढ़े गए, अपने को किसानों का मसीहा साबित करने की होड़ लगी रही, लेकिन किसानों के भले के लिए कोई दूरगामी नीति नहीं बनाई गई। हमारे पूर्वज कहते थे कि उत्तम खेती मध्यम बान निकृष्ट चाकरी, लेकिन वर्तमान में यह कहावत अप्रासंगिक हो गई है। खेती करके पेट भरना संभव नहीं रहा। पिछले कई दशकों में अन्य व्यवसायों में तो गुणात्मक सुधार आया, पर कृषि की दशा जस की तस बनी रही। जोत निरंतर घट रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है, गांव से पलायन बढ़ता ही जा रहा है।

सर्दी, धूप और बरसात में अपने को गलाने वाला किसान, मजदूर बन रहा है। 2013 के कानून में ग्रामीण इलाकों में रोजगार सृजन के बारे में सोचा नहीं गया, ग्रामीण ढांचागत विकास के बारे में नहीं सोचा गया। शहरों में तो विकास हो रहा है, मगर गांव अब भी विकास से कोसों दूर हैं। गांवों में विकास की अधिक जरूरत है, लेकिन 2013 केकानून से गांवों में विकास प्रभावित होने, बेरोजगारी बढ़ने की आशंका है। नए कानून से अगर सबसे अधिक कोई लाभान्वित होगा तो वह किसान है।

भूमि अधिग्रहण को लेकर कांग्रेस के लोग मिथ्या प्रचार कर रहे हैं। ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है कि सरकार किसानों की जमीन छीनने पर आमादा है। कहा जा रहा है कि 2013 के कानून में सत्तर प्रतिशत सहमति की जो बात थी सरकार उसे समाप्त करने जा रही है।

यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि नया कानून बनने पर सरकार बिना पूछे ही किसानों की जमीन अधिग्रहीत कर लेगी। जबकि वास्तविकता इससे अलग है। 2013 के कानून में जिन तेरह विषयों को सहमति के प्रावधान से बाहर रखा गया था, नए कानून में पांच विषयों को और जोड़ा गया है ताकि ग्रामीण क्षेत्र का ढांचागत विकास हो सके। गरीबों को घर मिल सकें। अन्य विषयों में सत्तर प्रतिशत सहमति का प्रावधान बना रहेगा।

नए कानून में मुआवजे की राशि चार गुना कर दी गई है। जिनकी जमीन ली जाएगी उन्हें समय पर मुआवजा मिलेगा। जिस किसान की जमीन ली जाएगी उसके एक परिजन को नौकरी देने का प्रावधान भी नए कानून में किया गया है।

सरकार की प्राथमिकता है कि ग्रामीण क्षेत्र में लैंड बैंक बनाया जाए और कोशिश की जाएगी कि कोई भी योजना सरकारी जमीन पर ही बने। दूसरी प्राथमिकता बंजर भूमि का उपयोग करने की है। अगर अनिवार्य हुआ तभी कृषियोग्य भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा।

कांग्रेस 2014 की हार की हताशा से निकलने की कोशिश कर रही है, वह अपने नेता के अज्ञातवास से लौटने के बाद ‘री-लांच’ करने का प्रयास कर रही है। उनका जनाधार पूरी तरह से खिसक चुका है। ऐसे में खोए जनाधार को फिर से पाने के लिए वे ऊलजलूल आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं। अब उनके पास कुछ कहने के लिए तो है नहीं। इसलिए गरीब-विरोधी और अमीर-समर्थक का झूठा आरोप लगाया जा रहा है। यह अंतत: ‘बूमरैंग’ ही करेगा।
(लेखक भारतीय जनता पार्टी से संबद्ध हैं।)

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