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रोजगार का टूटता आधार

अफलातून खेती के बाद सबसे अधिक रोजगार देने वाले हथकरघा उद्योग, कुटीर उद्योग, लघु उद्योग और जंगल पर आश्रित रोजगार के अवसरों को समाप्त करने का खुला खेल शुरू हो चुका है। विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल को […]
Author May 27, 2015 10:35 am

अफलातून

खेती के बाद सबसे अधिक रोजगार देने वाले हथकरघा उद्योग, कुटीर उद्योग, लघु उद्योग और जंगल पर आश्रित रोजगार के अवसरों को समाप्त करने का खुला खेल शुरू हो चुका है। विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल को पूरी तरह लाचार बना दिया गया। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। यह नीति विश्व व्यापार संगठन की कई शर्तों के आड़े आती थी इसलिए 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। विदेशी मुद्रा के फूलते गुब्बारे और भुगतान संतुलन के ‘सुधार’ के साथ यह शर्त जुड़ी थी कि उत्पादन में मात्रात्मक प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकेंगे। विश्व व्यापार संगठन की इस शर्त के कारण 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं।

इस वर्ष दस अप्रैल को जिन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म किया गया था उन पर गौर कीजिए- अचार, पावरोटी, सरसों का तेल, मूंगफली का तेल, लकड़ी का फर्नीचर, नोटबुक या अभ्यास पुस्तिका और रजिस्टर, मोमबत्ती, अगरबत्ती, आतिशबाजी, स्टेनलेस स्टील के बरतन, अल्युमिनियम के घरेलू बरतन, कांच की चूड़ियां, लोहे की अलमारी, लोहे की कुर्सियां, लोहे के टेबल, लोहे के सभी तरह के फर्नीचर, रोलिंग शटर, ताले, कपड़े धोने का साबुन और दियासलाई। बड़ी पूंजी, आक्रामक विज्ञापन, मानव-श्रम की जगह मशीन को तरजीह देने वाली तकनीक से लैस देशी-विदेशी खिलाड़ी अधिक रोजगार देने वाले इन छोटे उद्योगों को लील जाएंगे।

इस प्रकार के छोटे और कुटीर उद्योगों के उत्पादों की खपत को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय एवं राज्य-स्तरीय सरकारी क्रय संस्थाओं द्वारा लघु और कुटीर उद्योगों से ही सामान खरीदने की नीति को भी निष्प्रभावी बनाने की दिशा में काम हो रहा है। इससे ठीक विपरीत स्थिति पर गौर करें। बड़े उद्योगपतियों को बढ़ावा देने के लिए नियम-कानून बदल देने का भी इतिहास रहा है। सरकार द्वारा नियम कानून बदल कर अपने प्रिय औद्योगिक घराने को बहुत बड़े पैमाने पर लाभ पहुंचाने के प्रमुख उदाहरणों में अंबानियों के उदय को प्रायोजित करने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा सिर्फ उन्हें ही सिंथेटिक धागे के उत्पादन के लिए कच्चे माल के आयात की इजाजत देने के साथ-साथ हथकरघा द्वारा तैयार की जाने वाली कपड़ों की किस्मों की आरक्षित सूची को निष्प्रभावी बना देना है। गौरतलब है कि कपड़ा और उद्योग नीति के इन नीतिगत फैसलों के द्वारा अंबानी को देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बनाने के पहले तक सूती कपड़े कृत्रिम धागों से बने कपड़ों से सस्ते थे। कृत्रिम धागों से पावरलूम पर बने कपड़ों की इजाजत के साथ-साथ लाखों हथकरघा बुनकरों की आजीविका छिन गई है। पहले पावरलूम पर सिर्फ ‘कोरे कपड़े’ और हथकरघे पर बिनाई की विविध डिजाइनों के कपड़ों को बनाने की इजाजत थी।

यह कानून 1985 में बन गया था। तब बाईस किस्म के कपड़े इस कानून के तहत हथकरघे के लिए संरक्षित किए गए गए थे। पावलूम लॉबी ने कानून को 1993 तक मुकदमेबाजी में फंसाए रखा और 1993 में जब यह प्रभावी हुआ तब संरक्षित किस्मों की संख्या ग्यारह रह गई। एक प्रामाणिक अध्ययन के अनुसार हथकरघे पर बने होने के दावे वाले सत्तर फीसद कपड़े दरअसल मिलों या पावरलूम पर बने होते हैं।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तीस लाख लोगों को काम मिला है जबकि हथकरघा से दो करोड़ लोग जुड़े हैं। अठारहवीं सदी के फ्रांसीसी यात्री फ्रैन्कोए पिरार्ड डी लावाल ने अपने यात्रा विवरण में बताया है कि अफ्रीका के दक्षिणी छोर से चीन तक लोग भारतीय हथकरघे पर बने कपड़ों से अपना शरीर ढंकते थे। उनके अनुसार भारत के पूर्वी तट के सिर्फ एक बंदरगाह से सालाना पचास लाख गज कपड़े का निर्यात होता था।

वर्ष 2002 के गुजरात जनसंहार के बाद कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज के राहुल बजाज, अजीम प्रेमजी और गोदरेज जैसे उद्योगपतियों ने इसकी निंदा की थी। इसके मुकाबले कुछ गुजराती उद्योगपतियों ने रीसर्जेंट गुजरात नामक एक समूह बनाया और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का बचाव किया। रिसर्जेंट गुजरात का नेतृत्व अडाणी समूह के गौतम अडाणी और टोरेन्ट नामक दवा कंपनी के सुधीर मेहता कर रहे थे। प्रावधानों का दुरुपयोग करते हुए पिछले साल अगस्त में सर्वप्रथम मेहता की कंपनी को दाम नियंत्रण से पांच साल की छूट प्रदान की गई।

दुनिया के प्रमुख बैंक गौतम अडाणी को आॅस्ट्रेलिया में कोयला खदान के लिए कर्ज देने से इनकार कर चुके थे, तब भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख बैंक स्टेट बैंक आॅफ इंडिया ने उन्हें इस कार्य के लिए छह हजार करोड़ रुपए का ऋण दिया। किसी भी विदेशी परियोजना के लिए यह सबसे बड़ा ऋण है। अडाणी समूह पर 55,364.94 करोड़ रुपए लंबी अवधि का कर्ज है और तीस सितंबर, 2014 को 17,267.43 करोड़ रुपए का लघु-अवधि का कर्ज था। अडाणी समूह सन 2002 में 3,741 करोड़ रुपए का था, यह 2014 में बढ़ कर 75,659 करोड़ रुपए का बन गया है।

कच्छ के मुंद्रा में बंदरगाह बनाने के लिए गुजरात सरकार द्वारा अडाणी को एक रुपए से सोलह रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से जमीन मुहैया कराई गई, जो बाजार दर से बहुत ही कम थी। पिछले साल गुजरात विधानसभा में पेश की गई नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक की रपट के अनुसार राज्य सराकार द्वारा पच्चीस हजार करोड़ रुपए की अनियमितताएं की गई थीं। इनमें अडाणी, अंबानी और एस्सार समूह को डेढ़ हजार करोड़ रुपए का अनुचित लाभ शामिल था। गुजरात के बड़े शहरों में पाइपलाइन से रसोई गैस की आपूर्ति और पूरे प्रदेश में सीएनजी पंप अडाणी समूह द्वारा संचालित हैं।

पर्यावरण मंत्री ने राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब में बताया है कि 2004 और 2013 के बीच विभिन्न परियोजनाओं के लिए 3 लाख 43 हजार हेक्टेयर जंगल समाप्त कर दिए गए। इससे जुड़ा प्रश्न बनता है कि इन जंगलों पर कितने परिवार आश्रित थे?
मौजूदा सरकार व्यापक जनसमुदाय द्वारा उत्पादन नहीं चाहती है; वह उत्पादन का ढेर लगाना चाहती है। ‘जनसमुदाय’ और ‘ढेर’ के लिए अंगरेजी में एक ही शब्द ‘मास’ होने के कारण यह नीति गांधीजी की ‘प्रोडक्शन बाय मासेस, नॉट मास प्रोडक्शन’ वाली नीति का विलोम है। वैश्वीकरण के दौर की सरकारें (चाहे वे यूपीए की रही हों, या राजग की) इस मामले में भिन्न नहीं हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में आकर उत्पादन करने के लिए इस सरकार ने जो ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया है उसके लिए यह जरूरी है कि जनता द्वारा उत्पादन के अवसरों को योजनाबद्ध तरीके से समाप्त किया जाए। इस सरकार द्वारा श्रम कानूनों में संशोधन भी गैर-मानवीय है और इसका एकमात्र उद््देश्य श्रमिकों के ज्यादा शोषण द्वारा उत्पादन को बढ़ाना है। ऐसा प्रतीत होता है कि श्रम कानूनों में प्रस्तावित ‘सुधार’ भारत के मजदूरों की हालत चीन के जैसी कर देंगे।

विकास दर की स्पर्धा में चीन से मुकाबला करने के लिए श्रमिकों के काम की परिस्थितियों को चीन जैसा बनाया जा रहा है। चीन में लगातार तीन-चार दिनों तक कारखाने से न निकलने देने की व्यवस्था है।

इस अवधि में मजदूरों को कारखाना परिसर में ही निर्धारित अवधि तक आराम, भोजन, नित्यकर्म के अलावा बाकी समय कारखाने में जुते रहना पड़ता है। इन परिस्थितियों में चीन में मजदूरों की आकस्मिकमौत की घटनाएं काफी बढ़ गई हैं। अमेरिका की बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने श्रमिकों के ज्यादा शोषण के अवसरों को ध्यान में रख कर अपने कारखाने चीन में स्थापित किए हैं। कंप्यूटर और मोबाइल बनाने वाली प्रसिद्ध कंपनी एपल के चीन में स्थापित एपल को आपूर्ति देने वाली फॉक्सकॉन कंपनी के कारखाने के चौदह श्रमिकों ने काम की परिस्थिति से आजिज आकर 2010 में आत्महत्या कर ली थी। बीबीसी ने बीते दिसंबर में इसी कंपनी और इस कंपनी को आपूर्ति करने वाले कंपनी में अपने रिपोर्टरों को श्रमिक के भेष में भेजा। लगातार अठारह दिनों तक सोलह-सोलह घंटों की पाली, तेरह-चौदह वर्ष के बच्चों को श्रमिकों के रूप में लगाना और ओवरटाइम के स्वैच्छिक न होने के तथ्य प्रकाश में आए।

श्रम कानूनों में प्रस्तावित सुधारों की दिशा बड़ी कंपनियों को चीन जैसे नियम-कानून और माहौल प्रदान करने के प्रति आश्वस्त करने वाली है। सरकार ने जिन श्रम कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव किया है वे ऐसे कानून हैं जिनके तहत श्रमिक छह दशक से भी अधिक समय से अपने नियोजन से संबंधित सुविधाएं और लाभ प्राप्त करते आ रहे हैं। कारखाना अधिनियम, 1948 के प्रस्तावित संशोधनों को देखें तो वर्तमान कानून के अनुसार सामान्यतया किसी भी वयस्क श्रमिक से एक दिन में नौ घंटों से अधिक काम नहीं कराया जा सकता और इस अवधि में भी पांच घंटों के बाद आधे घंटे का विश्राम दिया जाना आवश्यक है।

1948 के कानून में इन्हीं तथ्यों पर विचार कर सीमित ओवरटाइम के प्रावधान किए गए थे, पर अब मजदूरों के स्वास्थ्य की कीमत पर इस तरह के कथित श्रम सुधार करना कतई उचित नहीं कहा जा सकता। वर्तमान में एक तिमाही में ओवरटाइम की अधिकतम अवधि पचास घंटे है जिसे सरकार सौ घंटे करना चाहती है। इसका एक परिणाम यह भी होगा कि कम से कम श्रमिकों से अधिक से अधिक कार्य कराया जा सके।

अभी तक कारखानों में महिला श्रमिकों और किशोरों को जोखिम भरे काम पर नहीं लगाया जा सकता, पर अब संशोधन के द्वारा यह प्रावधान करने का प्रस्ताव किया गया है कि केवल किसी गर्भवती महिला या विकलांग व्यक्ति को जोखिम भरे काम पर न लगाया जाए। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार का इरादा महिलाओं और किशोर श्रमिकों को भी जोखिम भरे कार्यों में लगाने का है।

आर्थिक विकेंद्रीकरण और सामाजिक न्याय के परखे हुए विश्वास का स्थान ‘मेक इन इंडिया’ के प्रति अंध-विश्वास ले रहा है। बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट हित की बुनियाद रखने के लिए हथकरघा, लघु, कुटीर उद्योग और श्रमिक हितों की कब्र खोदने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

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