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बंददिमागी के विरुद्ध बोलने की सजा

एक ऐसे समाज के बारे में क्या कहेंगे, जहां लेखकों को बंदूक की गोलियों का सामना करना पड़ता है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर पत्थर या बम बरसाए जाते हैं? दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने..
Author नई दिल्ली | September 8, 2015 16:27 pm

एक ऐसे समाज के बारे में क्या कहेंगे, जहां लेखकों को बंदूक की गोलियों का सामना करना पड़ता है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर पत्थर या बम बरसाए जाते हैं? दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाले भारत में दो साल के अंदर तीन तर्कशील विचारकों, कार्यकर्ताओं की हत्या ऐसे ही सवाल खड़े करती है। दो साल पहले पुणे में तर्कशील आंदोलन के कार्यकर्ता और लेखक नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई। इस साल फरवरी में कोल्हापुर में पानसरे की हत्या और अब कर्नाटक में वामपंथी विचारक और कन्नड भाषा के विद्वान एमएम कलबुर्गी की हत्या कर दी गई।

बीजापुर जिले के किसान परिवार में जन्मे प्रोफेसर मल्लेशप्पा माडिवालप्पा कलबुर्गी ने अपनी मेधा और लगन से कन्नड भाषा को समृद्ध किया, लिंगायत संप्रदाय पर मौलिक अनुसंधान किया, जिसका बाईस भाषाओं में अनुवाद हुआ, एक सौ तीन किताबें और सैकड़ों लेख लिखे, अंधश्रद्धा और अतार्किकता के खिलाफ जिंदगी भर आवाज बुलंद करते रहे। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इस तरह उनके जीवन का अंत होगा। 30 अगस्त को ‘सर’ से मिलने के नाम पर अंदर घुसे एक अतिवादी की गोली का वे शिकार हुए।

तीनों हत्याओं में एक समानता यह है कि उन्हें सांप्रदायिक ताकतों, जनद्रोही शक्तियों की तरफ से, जो लोगों के दिमागों पर ताले रखना चाहती हैं, लगातार धमकियां मिलती रहीं। मूर्तिपूजा की मुखालफत करने के लिए कुछ समय पहले प्रोफेसर कलबुर्गी के घर पर हिंदुत्ववादी संगठनों के कार्यकतार्ओं ने पथराव भी किया था। अतिवादियों के बढ़ते मनोबल के चलते उन्हें सुरक्षा प्रदान की गई थी, मगर कुछ समय पहले प्रोफेसर कलबुर्गी ने उसे लौटा दिया था। उनका कहना था कि विचारों की रक्षा के लिए संगीनों की जरूरत नहीं होती।

गौरतलब है कि तीनों हत्याओं का तरीका एक था- मोटरसाइकिल पर सवार दो हमलावर और उनमें से एक का गोली चलाना। भारत के पश्चिमी हिस्से में सक्रिय एक अतिवादी संगठन के कार्यकर्ताओं की तरफ से, जो इसके पहले भी आतंकी घटनाओं में शामिल हो चुके हैं, संदेह प्रकट किया जा रहा है, मगर अब भी आधिकारिक तौर पर न दाभोलकर के हत्यारे पकड़े गए हैं और न पानसरे के। क्या प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या में भी यही सिलसिला दोहराया जाएगा? प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या के विरोध में धारवाड़ ही नहीं, कर्नाटक के तमाम हिस्सों में प्रदर्शन हुए हैं। बंगलुरू के टाउन हाल के सामने एकत्रित प्रदर्शनकारियों में कार्यकर्ताओं और आम जनों के अलावा कन्नड भाषा में तमाम अग्रणी हस्ताक्षर मौजूद थे। वहां एक प्रदर्शनकारी का बैनर सभी के आकर्षण का केंद्र बना था ‘कल बसवन्ना और आज कलबुर्गी।’

गौरतलब है कि बारहवीं सदी के महान समाजसुधारक बसवन्ना- जो लिंगायत संप्रदाय के संस्थापक समझे जाते हैं, जिन्होंने तत्कालीन कन्नड़ समाज की कुप्रथाओं के खिलाफ जबर्दस्त आवाज बुलंद की, जातिप्रथा को शिकस्त देने की कोशिश की, उन्हें अपने वक्त के रूढ़िवादी तत्त्वों से लगातार जूझना पड़ा- के दौर के साहित्य को लेकर प्रोफेसर कलबुर्गी ने मौलिक अनुसंधान किया है। कई मायनों में वे बसवन्ना की तरह ही थे, जो समाज की अतार्किकता, बंददिमागी के खिलाफ खुल कर बोलते-लिखते, मूर्तिपूजा की आलोचना करते थे। शायद यही वजह थी कि लगातार रूढ़िवादी ताकतों के निशाने पर वे रहे।

एक विद्वान लेखक के विचारों से निपटने के बजाय उन्हें बंदूक की गोलियों से समाप्त कर दिया। शायद हमलावर भूल गए थे कि विचार कभी मरते नहीं हैं। ‘अगर सत्ताधारी ताकतें गलत हों, तो सही होना खतरे से खाली नहीं होता’। फ्रांस के क्रांतिकारी दार्शनिक वॉल्तेयर के इस कथन से बखूबी परिचित प्रोफेसर कलबुर्गी की अस्वाभाविक मौत पर लिखे अपने लेख में इंडियन रेशनलिस्ट एसोसिएशन के प्रमुख सनल एरमाकुदू, जो खुद ईसाई कट्टरपंथियों की कार्रवाइयों के चलते पिछले कुछ सालों से आत्मनिर्वासन में यूरोप में हैं, ने लिखा है कि ‘किस तरह विगत सदियों में तमाम हिंदू सुधारकों ने मूर्ति पूजा की जबर्दस्त आलोचना की थी। क्या हिंदू धर्म की वह सहिष्णु धारा अपना असर खोती जा रही है, जिसने विचारों की बहुविध परंपराओं का लगातार सम्मान किया, जिसमें ‘वेदनिंदक’ कहे गए चार्वाक और लोकायत भी शामिल थे?

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह धारा पीछे ढकेली जा रही है और असहिष्णुता ने सिर उठाया है और ऐसे आलोचक जिनका जवाब नहीं दिया जा सकता, उन्हें गोलियां चला कर खामोश किया जा रहा है।… कल्पना करें कि आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती, जिन्होंने मूर्तिपूजा की मुखालफत की और धार्मिक कर्मकांडों की आलोचना की, हमारे समय में जीवित रह रहे होते! क्या मोटरसाइकिल पर सवार इन अपराधियों ने उनके जैसे सुधारक को भी बख्शा होता!’

आखिर ऐसी क्या बात थी कि साहित्य अकादेमी से लेकर तमाम प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजे गए कन्नड भाषा के विद्वान प्रोफेसर कलबुर्गी, जिन्होंने हंपी विश्वविद्यालय का कुलपति रहने के दौरान कई अनुसंधानों की शुरुआत की और प्रकाशन किए थे, जो वचन साहित्य में प्राधिकार समझे जाते थे, कट्टरपंथियों के निशाने पर आए थे।

दरअसल, पहला विवाद 1980 के दशक में हुआ था, जब वे कर्नाटक की प्रभावशाली लिंगायत समुदाय के निशाने पर आए थे। उनकी किताब ‘मार्ग 1’ में लिंगायत संप्रदाय के संस्थापक बसवेश्वर के बारे में उनके अनुसंधान के जरिए निकाले गए निष्कर्षों से लिंगायतों के एक तबके की ‘भावनाएं आहत होने’ की बात की गई थी। मामला इस कदर बढ़ा था कि किसी लिंगायत पीठ के सामने उन्हें बाकायदा बुलाया गया और उन्हें अपने नजरिए के लिए खेद प्रगट करना पड़ा था, जिसे उन्होंने अपनी ‘बौद्धिक आत्महत्या’ घोषित किया और कहा था कि अपने परिवार को बचाने के लिए उन्होंने यह किया था। 2014 में वे एक बार अन्य विवादों में घेरे गए, जब कन्नड के चर्चित लेखक यूआर अनंतमूर्ति द्वारा मूर्तिपूजा का विरोध किए जाने का उन्होंने भी समर्थन किया था और हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा की उन्होंने आलोचना की थी। इसके बाद दक्षिणपंथी हिंदूवादी संगठनों ने उनके घर के सामने प्रदर्शन किए और घर पर पत्थर फेंके गए थे।

गौरतलब है कि प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या के चंद घंटों बाद ही उनकी हत्या को अपने ट्वीट के जरिए औचित्य प्रदान करने और हिट लिस्ट पर अगला नाम प्रोफेसर भगवान का लिखने के लिए एक अतिवादी हिंदू को गिरफ्तार किया गया है। तर्कशील स्वतंत्रमना विचारकों, जो हर किस्म की यथास्थिति को चुनौती देते रहते हैं, की हत्या का सिलसिला यहीं नहीं रुकने वाला है। यह इससे भी स्पष्ट है कि उनकी हत्या के एक दिन बाद कर्नाटक की दो चर्चित शख्सियतें- केएस भगवान (मैसूर विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर) और निदुमामीदी मठ के बीरभद्र चेन्नामल स्वामी- को भी हिंदू कर्मकांडों की आलोचना करने के लिए धमकियां मिली हैं।

प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या ऐसे समय में हुई है, जब दक्षिण एशिया के इस हिस्से में बहुसंख्यकवादी ताकतें अपने-अपने इलाकों में कहीं धर्म, तो कहीं समुदाय के नाम पर स्वतंत्रमना आवाजों को खामोश करने में लगी हैं। कलबुर्गी की हत्या के चंद रोज पहले ढाका में निलय चक्रवर्ती नामक ब्लॉगर के घर में घुस कर इस्लामवादी अतिवादियों ने बर्बर ढंग से हत्या की थी।

गौरतलब है कि यह विगत दो साल में सेक्युलर मानवतावादी ब्लॉगरों में शुमार पांचवें ब्लॉगर की हत्या है, जिसका सिलसिला फरवरी, 2013 में अहमद राजिब हैदर नामक ब्लॉगर की ढाका की सड़क पर हत्या के साथ शुरू हुआ था। दो साल पहले बांग्लादेश में जब युद्ध अपराधियों को सजा दिलाने और युद्ध अपराधों में शामिल जमाते-इस्लामी के कर्णधारों को दंडित करने के लिए खड़ा हुए ऐतिहासिक शाहबाग आंदोलन की लामबंदी में इन सेक्युलर मानवतावादी ब्लॉगरों ने अविस्मरणीय भूमिका अदा की थी, जिसके चलते वे इस्लामवादियों के निशाने पर लगातार हैं। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी स्वतंत्रमना, तर्क की बात करने वाले, न्याय, प्रगति और समावेशी समाज की बात करने वाले कट्टरपंथ के निशाने पर हैं। ईशनिंदा के नाम पर जेल में बंद आसियाबी का समर्थन करने पहुंचे पंजाब प्रांत के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर, जिन्होंने ईशनिंदा कानून का विरोध किया था और वहां के मंत्री शाहबाज बट्टी इसी तरह अतिवादी इस्लामवादियों के हाथों मारे गए थे।

श्रीलंका में वातारकिया विजिथा थेरो जैसे विद्रोही बौद्ध भिक्खु पर, जिन्होंने बोंडु बाला सेना जैसे बौद्ध उग्रवादी समूहों के निर्देशों को मानने से इनकार किया, हमले हुए हैं। म्यामां में अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने में विराथू जैसे बौद्ध संत आगे हैं। उधर पंजाब में पशौरा सिंह और हरजोत ओबेरॉय जैसे सिख विद्वानों को सिख परंपरा के ‘रखवालों’ की तरफ से प्रताड़ित किया जा रहा है।

प्रोफेसर कलबुर्गी और दक्षिण एशिया के इस हिस्से में सक्रिय ऐसे तमाम तर्कशीलों, स्वतंत्रमना, प्रगतिकामी बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं के लिए श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हमें इस बात पर अवश्य सोचना चाहिए कि आखिर किसी लोकतंत्र में ऐसे कानूनों की क्या जरूरत है, जो किसी की धार्मिक भावनाओं की हिफाजत की बात करते हैं। ईशनिंदा के नाम पर बने ऐसे तमाम कानून या अधिनियम, जो अस्पष्ट भाषा में बने होते हैं, ऐसे तमाम स्वतंत्रमना लोगों पर कार्रवाई करने के लिए अतिवादी तत्त्वों को औचित्य प्रदान करते हैं, जो धारवाड़ में कलबुर्गी और ढाका में निलय चक्रवर्ती के घर पर दस्तक देकर पहुंच जाते हैं। क्या ऐसा समाज कभी आजाद हो सकता है, जहां संदेह करने, सवाल उठाने की आजादी पर ताले लगे हों!

(सुभाष गाताडे)

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  1. R
    raj deol
    Sep 8, 2015 at 11:21 pm
    बहुत ा हुआ . कट्टरता हमेशां आज़ाद विचारो को पनपने से रोकती आई है.
    (0)(0)
    Reply