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गांधी-चर्चा में असत्य के प्रयोग

गिरिराज किशोर गांधीजी की निंदा करने वालों में अल्पज्ञ राजनीतिक, कट््टरवादी दल सम्मिलित हैं। इससे गांधी की प्रतिष्ठा पर कोई खास प्रभाव न पहले पड़ा है और न आगे पड़ने वाला है। गांधीजी विश्वगुरु नहीं तो मार्ग-दर्शक के रूप में स्वीकृत होते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने फ्रांस जाकर सुरक्षा परिषद में स्थान पाने के […]
Author April 25, 2015 08:07 am

गिरिराज किशोर

गांधीजी की निंदा करने वालों में अल्पज्ञ राजनीतिक, कट््टरवादी दल सम्मिलित हैं। इससे गांधी की प्रतिष्ठा पर कोई खास प्रभाव न पहले पड़ा है और न आगे पड़ने वाला है। गांधीजी विश्वगुरु नहीं तो मार्ग-दर्शक के रूप में स्वीकृत होते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने फ्रांस जाकर सुरक्षा परिषद में स्थान पाने के लिए, भारत को शांति के लिए मर-मिटने वाला देश बताया और गांधी और बुद्ध का देश होने की दुहाई दी। जर्मनी में गांधी की मूर्ति की स्थापना के समय विश्व-शांति और पर्यावरण के लिए गांधी की अनिवार्यता पर बल दिया। भले ही वे इतनी प्रमुखता के साथ भारत में गांधी का उल्लेख न करते हों। सबसे अधिक उनका उल्लेख स्वच्छता के संदर्भ में हुआ है।

लेकिन मैं उन महानुभावों की बात कर रहा हूं, जो बुद्धिजीवियों की श्रेणी में आते हैं। पिछले महीने संसद ने, न्यायमूर्ति काटजू द्वारा गांधी और सुभाषचंद्र बोस को अंगरेजों और विदेशों का क्रमश: एजेंट कहे जाने की निंदा की थी। काटजू ने कहा कि उनको सुने बिना, संसद द्वारा उनके वक्तव्य की भर्त्सना करना न्यायोचित नहीं था। यह क्या कम है कि संसद ने उनके वक्तव्य का संज्ञान लिया। उनसे पहले अंगरेजी लेखिका अरुंधति राय भी गांधीजी को शायद कॉरपोरेट का एजेंट करार दे चुकी थीं। लेकिन संसद को शायद ही उस वक्तव्य का पता चला हो या उसका संज्ञान लेना आवश्यक न समझा हो।

काटजूजी के वक्तव्य का संज्ञान लिए जाने के दो कारण थे। एक वे भारत की न्यायपालिका के महत्त्वपूर्ण सदस्य रहे हैं, दूसरा गांधी के अनुयायी डॉ केएन काटजू के पौत्र हैं। वही क्यों, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सर तेज बहादुर सप्रू आदि इलाहाबाद के सभी शीर्ष व्यक्ति गांधीजी के साथ थे।

जहां तक अरुंधति राय का प्रश्न है, वे अंगरेजी की लेखिका रही हैं, जन की भाषाओं से उनका संभवत: न्यूनतम परिचय है। स्वाभाविक है जन से जुड़े गांधी के बारे में वे वही वाक्य उद्धृत करती हैं, जो उन्होंने गांधी के संदर्भ में संभवत: पुराने साम्यवादियों से सुने होंगे। भारतीय साम्यवादी वही जानते रहे, जो गांधी के बारे में उनको केंद्रीय काउंसिल से निर्देश मिलते रहे। भारतीय किसान को भी तब तक सामंतवादियों का एजेंट मानते रहे, जब तक माओ ने किसानों को क्रांति से नहीं जोड़ा था। अब भी किसान दोयम दर्जे पर हैं। किसानों के साथ इतनी बड़ी त्रासदी हुई, पर सिवाय वाक्युद्ध के कहीं कुछ नहीं किया।

अगर किसी फैक्टरी या कॉरपोरेट संस्थान का मामला होता है तो कुछ समय तक क्रांति की आवाजें सुनाई पड़ती हैं, कुछ समय के बाद ओम शांति शांति…। मजदूर कहां गए, क्या हुआ, उनको भी शायद पता न हो। यही कारण है कि धीरे-धीरे साम्यवादी आंदोलन इतिहास की वस्तु होता जा रहा है। इसी तरह के नारे वामपंथी सुभाष के बारे में लगाते थे। तोजो का कुत्ता जैसे भद्दे नारे। प्रेस काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति काटजू उन्हीं नारों की पुनरावृत्ति, सब पदों से अवकाश ग्रहण करने के बाद, गांधी और सुभाष के बारे में अब कर रहे हैं। हो सकता है ऐसा करने में उन्हें अपना भविष्य नजर आ रहा हो। यह सब भी बाजारवाद का हिस्सा है। इस तरह की बातों के खरीदार काफी मिल जाते हैं।
दक्षिण अफ्रीका में गांधी 105 पौंड की नौकरी करने, साल भर के लिए गए थे। गिरमिटिया को दस पौंड मिलते थे। गांधी को बैरिस्ट्री पास होने के कारण गिरमिटिया से साढ़े दस गुनी पगार मिली थी। बाकी सब शर्तें लगभग गिरमिटिया वाली थीं। जबकि वे लातिन और फ्रेंच के अच्छे-खासे विद्वान थे।

दूसरी बात, वे बैरिस्ट्री करने नहीं गए थे, बल्कि दादा अब्दुल्ला के चालीस हजार पौंड के मुकदमे में गोरे वकील मि. बेकर को गुजराती में लिखे दस्तावेजों को अंगरेजी में समझाने गए थे। दूसरे शब्दों में, एक सम्मानित पेशकार की भूमिका अदा करते थे।

मोहनदास करमचंद गांधी ने अंगरेज वकील मि. बेकर के आधिपत्य को चुनौती दी थी और अपनी इस मान्यता को व्यावहारिक रूप दिया था कि वकील और कचहरियां सामान्य आदमी का शोषण करती हैं। बड़े से बड़े विवादों का हल निकालने के और भी वैकल्पिक तरीके हैं। उन्होंने दादा अब्दुल्ला और विपक्षी और उनके संबंधी तैयब सेठ के बीच, दोनों की सहमति से, एक पंच हाजीजी को डाल कर फैसला करा दिया। उनका मानना था कि वकील का काम दोनों पक्षों के बीच की खाई पाटना है। इस घटना ने गांधी की प्रतिष्ठा को नेटाल में बढ़ाया।

उन्होंने दूसरा काम यह किया कि साल भर पूरा होने पर जिस दिन उनकी विदाई-सभा थी उस दिन अखबार में एक छोटा-सा समाचार पढ़ कर सब भारतीय व्यवसायियों को बताया कि जिन चंद भारतीयों को वोट का अधिकार प्राप्त है उसे भी छीनने के लिए सरकार कानून बना रही है। उन्हें इस प्रस्तावित कानून के विरोध की अगुआई की खातिर भारतीय समुदाय ने एक महीने के लिए रोका था, लेकिन अंगरेजों से भारतीय गिरमिटियों को उनके अधिकार दिलाने में बीस वर्ष लग गए। वह पूरी लड़ाई अंगरेजों के खिलाफ लड़ी गई थी। नेलसन मंडेला से जब पूछा गया कि गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका के लोगों के लिए क्या किया, उनका जवाब था, अगर गांधी न होते तो हम अंगरेजों की रंगभेद नीति के खिलाफ कभी न लड़ पाते और गुलाम बने रहते।

काटजू साहब, आप संसद के निर्णय पर सवाल उठाते हैं और यह भूल जाते हैं कि जिस व्यक्ति या व्यक्तियों के विरुद्ध आक्षेप लगा रहे हैं वह गलत है या सही? उस व्यक्ति की बुनियादी समझ क्या है? उसने दूसरे देश की धरती पर जाकर अंगरेजों के खिलाफ किसके लिए और क्यों लड़ाई लड़ी। यहां तक कि अपनी पत्नी कस्तूरबा को सत्याग्रह करके जेल जाने दिया। वह जेल जो नितांत अमानवीय स्थिति में थी।
अंगरेजों से लड़ने का जज्बा ऐसा नहीं कि दक्षिण अफ्रीका जाकर ही जनमा हो। बचपन में जब उनके मुसलिम दोस्त और एक तरह स्कूल में संरक्षक शेख मेहताब ने बालक मोहनदास से कहा कि अंगरेज तुम लोगों पर इसीलिए राज कर रहे हैं, क्योंकि वे गोश्त खाते हैं, ताकतवर हैं, तुम गोश्त खाना शुरू कर दो तो अंगरेजों का सामना कर पाओगे। वैष्णव परिवार के बच्चे ने अंगरेजों से लड़ कर देश को आजाद कराने के लिए, घरवालों से छिपा कर, गोश्त खाना शुरू किया था। सवाल उठता है भारत में तो ठीक है आजादी के लिए लड़ाई लड़ी गई हो, पर दक्षिण अफ्रीका में क्या हुआ था?

यह पूरी संघर्ष कथा मैंने दक्षिण अफ्रीका, लंदन और मॉरीशस की यात्रा करके अपने उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ में विस्तार से लिखी है। हिंदी में है इसलिए शायद देश के अंगरेजीदां बुद्धिजीवियों की नजर न पड़ी हो। अब अंगरेजी में ‘द गिरमिटिया सागा’ नाम से उपलब्ध है। बहुत-से मुद्दे हैं, जो इस संघर्ष के पीछे थे। लेकिन यहां मैं तीन मुख्य मुद्दों का जिक्र करना चाहूंगा जो गिरमिटियों की गुलामी से जुड़े थे, जिनसे मुक्त कराने में गांधी को बीस साल लगे।

जनरल स्मट्स जो आंतरिक मामलों के मंत्री थे, उन्होंने गिरमिटिया अनुबंधों की शर्तों के उल्लंघन में काला कानून बनाया, कि जो गिरमिटिया मजदूर अनुबंध के पांच साल पूरा करने के बाद भी दक्षिण अफ्रीका में रहना चाहते हैं उन्हें पांच पौंड प्रति व्यक्ति पोल टैक्स चुकाना होगा। जबकि मूल शर्त थी कि अनुबंध का समय पूरा होने पर अगर मजदूर वापस देश जाना चाहता है तो उसे और उसके परिवार को भारत जाने का किराया मिलेगा, अन्यथा उस किराए के बराबर जमीन खेती के लिए दे दी जाएगी।

सरकार ने पहले भारतीय मजदूरों को शीतोष्ण रसूम की खेती करने के लिए बुलाया, जब गोरे सीख गए तो उन्होंने इतना अधिक पोल टैक्स यह सोच कर लगाया कि ज्यादा से ज्यादा बारह पौंड सालाना पाने वाला व्यक्ति कम से कम तीन और ज्यादा से ज्यादा पांच लोगों के परिवार के लिए पंद्रह से पच्चीस पौंड नहीं दे पाएगा, तो वह जाने के लिए मजबूर हो जाएगा। भारत सरकार ने टैक्स घटवा कर तीन पौंड प्रतिव्यक्ति कर दिया था।

दूसरा मुद्दा था जस्टिस सरले के फैसले के अनुसार जो विवाह ईसाई धर्म के अनुसार नहीं हुए वे अवैध करार दे दिए गए। तीसरा मुद्दा था सरकार ने सभी भारतीयों के लिए कानून बनाया कि हर भारतीय अंगूठे और अंगुलियों के निशान देगा। गांधी ने इन दोनों कानूनों का विरोध किया। कस्तूर विवाह वाले कानून के खिलाफ सत्याग्रह करके जेल गर्इं। अंगूठे के निशान देने वाले मामले में गांधी, हरि और अन्य छब्बीस लोगों को सजाएं हुर्इं।

अंगूठे और अंगुलियों के निशान देने वाले मुद्दे पर जनरल स्मट्स ने गांधी को जेल से बुला कर कहा कि अगर भारतीय अंगुली और अंगूठे की छाप दे देंगे तो बाकी सब प्रतिबंध वापस ले लिए जाएंगे। गांधी सहमत हो गए, पर यह धोखा था। बाद में स्मट्स पलट गया। आंदोलन फिर शुरू हो गया। करीब चार हजार पहचान-पत्र जलाए गए।

वाइसराय की काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य गोपाल कृष्ण गोखले गांधी के निमंत्रण पर दक्षिण अफ्रीका आए। वहां की सरकार ने उनको भी आश्वासन दिया कि भारतीयों के विरुद्ध बनाए गए सब कानून वापस ले लेंगे, पर उस आश्वासन से भी सरकार पलट गई। अंत में आंदोलन के दबाव और रेलवे की हड़ताल के समय, गांधी के अपने आंदोलन के वापस लेने पर पुन: बात शुरू हुई उसमें भारत से आए एंड्रूज भी शामिल हुए। अंतत: दक्षिण अफ्रीका की सरकार कानूनों को वापस लेने के लिए तैयार हुई। जब सरकार ने घोषणा को क्रियान्वित कर दिया, तब गांधी भारत लौटे। अगर गांधी अंगरेजों के एजेंट होते तो वे विदेशी धरती पर जाकर भारतीयों के अधिकारों के लिए बीस साल तक न लड़े होते।

दूसरी बात अमर शहीद भगतसिंह और आजाद जैसे देशभक्तों की लड़ाई का रुख बदल कर गांधी पर अहिंसा की तरफ मोड़ देने के लांछन की है। गांधी और उनके सहयोगियों ने उस लड़ाई को अहिंसा से जोड़ कर जनसंघर्ष का रूप दिया और उनकी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया। वे दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। अहिंसा ने लोगों को घरों से निकलने के लिए सामूहिकता भी दी, खुल कर सामने आने का साहस भी दिया।

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