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लंदन में गांधी

महेंद्र राजा जैन लंदन के ‘इंडिपेंडेंट’ अखबार में छपे एक समाचार से पता चलता है कि पिछली जुलाई में भारत के साथ ब्रिटेन के पच्चीस करोड़ पौंड के सैन्य उपकरण समझौते के तुरंत बाद जब दिल्ली में ब्रिटेन के चांसलर (वित्तमंत्री) जार्ज ओस्बोर्न ने घोषणा की थी कि अब समय आ गया है कि भारतीय […]
Author January 22, 2015 18:14 pm

महेंद्र राजा जैन

लंदन के ‘इंडिपेंडेंट’ अखबार में छपे एक समाचार से पता चलता है कि पिछली जुलाई में भारत के साथ ब्रिटेन के पच्चीस करोड़ पौंड के सैन्य उपकरण समझौते के तुरंत बाद जब दिल्ली में ब्रिटेन के चांसलर (वित्तमंत्री) जार्ज ओस्बोर्न ने घोषणा की थी कि अब समय आ गया है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेता और दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र के पिता के रूप में मान्य महात्मा गांधी की एक विशाल मूर्ति लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में रखी जाएगी। इस पर ब्रिटेन के सिखों के संगठनों ने यह कह कर विरोध किया कि गांधी जातिवादी, वर्ण-व्यवस्था के पक्षधर थे और इस सबसे बढ़ कर वे विचित्र यौनिक हरकतें करने वाले थे। इसी प्रकार बीबीसी के चैनल-4 पर कैथी न्यूमेन ने भी कहा कि दुनिया भर में स्त्रियों के संबंध में गांधी की छवि बहुत अपमानजनक है। भारत सरकार को चाहिए कि पहले वहां की महिलाओं की सुरक्षा, उन्हें सम्मानपूर्वक जीने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए।

इंडो ब्रिटिश हेरिटेज की कुसुम वदगामा ने भी बहुत कड़े शब्दों में इस पूरे आयोजन का यह कह कर विरोध किया है कि अपने यौन प्रयोगों के लिए गांधीजी ने लड़कियों का उपयोग किया, इसका शायद ही कोई समर्थन करेगा। ब्रिटेन में रहने वाले कुछ लोगों के साथ ही गांधीजी के पड़पोते तुषार गांधी ने भी कहा है कि ब्रिटिश सरकार को चाहिए कि वह पहले ‘ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों की समस्याओं से निपटे।’ यह पूरा ताम-झाम ब्रिटेन में होने वाले आगामी आम चुनाव के लिए भारतीय मतदाताओं को लुभाने की तैयारी है।

आजकल किसी भी बात का विरोध शुरू हो जाता है। गूगल की कृपा से अब हम प्राय: सभी के विषय में इतना अधिक जानते हैं कि सभी स्मारकों और मूर्तियों के- चाहे वे संगमरमर की हों, तांबे की या कंक्रीट की- पैर मिट्टी के ही बने साबित होंगे। पहले ऐसी कोई बात नहीं थी। सभी राजा, रानियां, सम्राट, शहंशाह और सरकारें अपने संभावित मित्र राष्ट्रों की खुशामद और चाटुकारी करने में किसी भी सीमा तक जा सकती थीं। आजकल तो सांस्कृतिक कूटनीति एक ऐसा महत्त्वपूर्ण अकादमिक विषय हो गया है कि उसकी अपनी पत्रिकाएं, जर्नल और वार्षिकी भी प्रकाशित होने लगी हैं। वार्षिक अधिवेशन और बैठकें तो होती ही हैं, भले यह इतिहास का अंग है, पर अब भी प्रासंगिक है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

पूरी अठारहवीं सदी में एक के बाद एक अमेरिकी शासकों ने चीन के सम्राटों को तरह-तरह के रत्न, पेंटिंग्स और घोड़े तक उपहार में देकर मसाले, सिल्क और कपड़ों के व्यापार का एकाधिकार बनाए रखा। इसी प्रकार मिस्र में मुमुलकों ने दूसरे देशों को मसाले और कपड़े ही नहीं, हाथी, जिराफ, गुलाम आदि उपहार देकर यही कुछ किया। वेनिस भी इस मामले में पीछे नहीं रहा। वहां के शासक जानते थे कि मुसलमान शासकों को पारमेजान चीज (पनीर) बहुत पसंद है। इसलिए उन्होंने भूमध्यसागरीय क्षेत्र में ‘चीज’ से ही प्रभाव जमाया, क्योंकि उस समय मुसलमान शासक बहुत कम यात्रा पर निकलते थे।
पीटर पाल रूबेंस को आज हम भले नामी चित्रकार/ कलाकार के रूप में जानते हैं, पर यह भी एक प्रकट बात है कि वे एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। गियोवानी बेलिनी भी अपने समय का प्रसिद्ध चित्रकार था, रूबेंस से भी अच्छा- उसे इटली के शासक ने तुर्की के शासक को खुश करने के लिए इस्तांबुल भेज दिया था, क्योंकि उसके अपने चित्रकार बेलिनी की तुलना में कहीं नहीं ठहरते थे। बाद में तुर्की के शासक ने खुश होकर उसे तुर्की के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा।

आदान-प्रदान के मामले में मुसलमान शासक भी कम नहीं थे। उन्होंने अपने राजनीतिक संबंध सुधारने के लिए अन्य देशों के तत्कालीन शासकों को उपहार दिए। इस प्रकार के राजनीतिक उपहारों के आदान-प्रदान की बातों से तो मुसलिम साहित्य भरा पड़ा है, जिसे ‘हादिया’ कहा जाता है। हादिया का अर्थ होता है किसी की कृपा दृष्टि प्राप्त करने के लिए किया गया प्रयत्न। वैसे पेंटिंग और अन्य दृश्यात्मक कलाकृतियां- रत्नाभूषण, फर्नीचर, चांदी के सामान आदि स्थायी महत्त्व की चीजें स्वीकार्य होती हैं, लेकिन संगीत एक अन्य कला-माध्यम था, जो क्षणजीवी प्रकृति के बावजूद अनिच्छुक संभावित मित्रों का हृदय पिघलाने के लिए बहुत कारगर उपाय माना जाता था। वैसे कुछ राजदूत अपने पूरे आर्केस्ट्रा के साथ अन्य देशों में गए, पर इस मामले में दाद देना पड़ती है इटली के उस राजदूत की, जो खुद संगीतज्ञ और स्वर लिपिकार था। 1894 में मोंतेनोगिरो के शासक के लिए उपहार स्वरूप उसने एक पूरा आॅपेरा लिख डाला था।

पर हमेशा ऐसा नहीं होता था। यद्यपि जापान पर कभी किसी अन्य देश का शासन नहीं रहा, पर डच ईस्ट इंडिया कंपनी के लोग अपने साथ जब जापान में धार्मिक कलाकृतियां लाए तो जापान के शासक उन्हें शुरू से ही संदेह की दृष्टि से देखते रहे। इसके लिए उन्होंने एक नया शब्द गढ़ा था ‘इ-फूमी’, जिसके अनुसार अगर किसी जापानी पर ईसाई धर्म परिवर्तन का शक होता था, तो उसे ईसाई धार्मिक कलाकृतियों, खासकर जीसस और मेरी के चित्रों पर पैर रखने को बाध्य किया जाता था। इससे पता चलता है कि वे कितने विमुख प्रकृति के थे।

यह सब पहले भले आनंददायक रहा हो या जान पड़ता हो, पर क्या आजकल भी यह सब चलेगा? मुझे तो इसमें संदेह है। क्या आजकल पारमेजान चीज से किसी देश के शासक तो क्या, किसी व्यक्ति को भी खुश किया जा सकता है? क्या आज इसे विलासिता की वस्तु माना जाएगा? आज दुनिया इतनी छोटी हो गई है, दुनिया भर के देशों की विशेषताओं के संबंध में हम इतना अधिक जानने लगे हैं कि दूसरे देशों की विलासितापूर्ण चीजों से कोई हमें प्रभावित नहीं कर सकता। लुइ वित्तन, कार्टियर, बरबेरी, लेक्सस, मांट ब्लांक, चैनल आदि नाम या इनसे संबंधित उत्पाद इतने सर्वव्यापक और हर किसी की पहुंच तक हो गए हैं कि हम भारतीयों के साथ ही चीनी, रूसी आदि को भी किसी प्रकार प्रभावित नहीं करते, खासकर इसलिए कि ये सभी चीजें अब आसानी से सभी को सुलभ हैं।

शायद यही कारण है कि लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में महात्मा गांधी की मूर्ति की बात भले ब्रिटिश शासन की सोची-समझी नीति रही हो, पर इसे कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए। यह महात्मा गांधी को औरों से अलग एक विशेष व्यक्ति को महत्त्व नहीं देती, बल्कि उन्हें इसी प्रकार के या कहें अलग-अलग क्षेत्रों में उन्हीं के समतुल्य अलग-अलग देशों और अलग-अलग समय के कुछ अन्य लोगों के समकक्ष रखती है। पार्लियामेंट स्क्वायर में महात्मा गांधी की मूर्ति लगने के बाद महात्मा गांधी एकमात्र भारतीय ही नहीं, ऐसे राजनेता होंगे, जिन्होंने कभी कोई पद नहीं लिया, बाकी सभी लोग प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति रहे हैं।

महात्मा गांधी जितने भारतीय इतिहास, उससे कम ब्रिटेन के इतिहास के अंग नहीं हैं। ब्रिटेन का आधुनिक इतिहास महात्मा गांधी के उल्लेख के बिना अधूरा ही रहेगा। यहां यह भी याद रखने की बात है कि लंदन में ही टेविस्टाक स्क्वायर (जो सेंट्रल लंदन में ही लंदन विश्वविद्यालय के पास है) में महात्मा गांधी की एक मूर्ति पहले से है। यह मूर्ति मई, 1968 में रखी गई थी और इसका अनावरण तत्कालीन प्रधानमंत्री हेरोल्ड विल्सन ने किया था। पालथी मार कर बैठे हुए महात्मा गांधी की यह मूर्ति पोलिश मूर्तिकार फ्रेदा बिलियेंट ने कुछ इस प्रकार बनाई है कि दर्शक श्रद्धांजलि के रूप में पालथी में फूल डाल सकें।

लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में इस समय जो दस मूर्तियां हैं, उनमें ब्रिटिश राजनेताओं की प्रमुखता है, यह स्वाभाविक ही है। लायड जार्ज और नेल्सन मंडेला की मूर्तियां 2007 में रखी गई थीं। क्या अब वहां और मूर्तियां रखे जाने, खासकर महात्मा गांधी की मूर्ति रखे जाने का औचित्य है? क्यों नहीं? चूंकि ब्रिटेन विश्व को स्वतंत्रता का साहित्य देने वाला माना जाता है, इसलिए अगर यह पार्क ‘मूर्ति शिल्प पार्क’ या राजनीतिक स्वातंत्र्य का ‘देवालय’ बना दिया जाता है, तो इसमें कोई हानि नहीं है। इस स्क्वायर में अभी एक नहीं, कई मूर्तियां रखने की पर्याप्त जगह है। अगर वहां ऐसे अधिक से अधिक लोगों की मूर्तियां रखी जाएं, जिन्होंने किसी भी क्षेत्र में एक उदाहरण के रूप में कार्य किया है, जिनका जीवन अपने-अपने क्षेत्र में अनुकरणीय रहा है, तो यह विश्व के लिए प्रेरणादायक ही रहेगा।

मगर इस संबंध में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह याद रखने की है कि राजनेताओं की मूर्तियों के लिए दुनिया के किसी भी देश में लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर से अधिक उपयुक्त और कोई स्थान नहीं हो सकता- यानी दुनिया भर की संसदों की ‘मां’ के सामने। यहां महात्मा गांधी की मूर्ति लगने से आशा की जानी चाहिए कि भारत और ब्रिटेन के संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी, यह भी कि आजादी के लिए प्राण न्योछावर करने वालों को सम्मानित करने की ब्रिटिश तरीके की लंबी शृंखला में यह नवीनतम कड़ी होगी।

नौ फुट ऊंची इस विशाल प्रतिमा को बनाने में अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त शिल्पकार फिलिप जैक्सन ने त्रिआयामी कलाकृति में भावनाओं को दर्शाने के लिए चामत्कारिक कार्य किया है। मूर्ति इतनी सुंदर और प्रभावी है और गांधीजी की छवि दर्शाने के लिए इस प्रकार बनी है कि और कुछ नहीं, तो केवल इसी मूर्ति के शिल्प के कारण वे भविष्य में उसी प्रकार याद रखे जाएंगे, जिस प्रकार रिचर्ड एटेनबरो अपनी अन्य फिल्मों की अपेक्षा ‘गांधी’ फिल्म के कारण।

गांधीजी की मूर्ति की इस परियोजना के लिए लगभग छह लाख पौंड की जरूरत होगी, जिसके लिए प्रवासी भारतीय उद्योगपति रामी रांगर ने एक लाख पौंड का दान दिया है। पहले ब्रिटिश सरकार ने भी इसके लिए काफी रकम देना स्वीकार किया था, पर बाद में कहा कि इसके लिए देश-विदेश में फैले गांधीजी के प्रशंसकों से ही धन प्राप्त करना चाहिए। अब प्रयास यही है कि दुनिया भर के निजी स्रोतों से अधिक से अधिक राशि एकत्र की जाए। इस परियोजना के लिए लंदन में गांधी मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना हुई है, जिसके ट्रस्टियों में रामी रांगर के साथ ही लार्ड मेघनाथ देसाई और गांधीजी के पोते गोपालकृष्ण गांधी भी हैं। ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रिटेन यात्रा के दौरान उन्हीं के हाथों इस मूर्ति का अनावरण तीस जनवरी को कराया जाए।

 

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