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लोकतंत्र की उलटी गंगा

कमल नयन काबरा राजस्थान सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर आम ग्रामीणों के स्थानीय स्वशासन में सक्रिय भागीदारी के हक को बहुत कम लोगों तक सीमित कर दिया है। इस साल के शुरू में हुए पंचायत चुनावों में चंद शैक्षणिक योग्यता वाले ग्रामीण ही पदाधिकारी पदों के लिए अपनी उम्मीदवारी पेश कर पाए। चुनाव प्रक्रिया […]
Author February 9, 2015 16:28 pm

कमल नयन काबरा

राजस्थान सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर आम ग्रामीणों के स्थानीय स्वशासन में सक्रिय भागीदारी के हक को बहुत कम लोगों तक सीमित कर दिया है। इस साल के शुरू में हुए पंचायत चुनावों में चंद शैक्षणिक योग्यता वाले ग्रामीण ही पदाधिकारी पदों के लिए अपनी उम्मीदवारी पेश कर पाए। चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के कारण न्यायालय ने, इस अध्यादेश की आलोचना करने के बावजूद, इसमें हस्तक्षेप नहीं किया। सच यह है कि अब तक राजस्थान के करीब अस्सी प्रतिशत ग्रामीणों को प्राथमिक शिक्षा तक नहीं प्रदान की गई है। आठवीं-दसवीं कक्षा तक पहुंचने वालों की संख्या और भी कम है। आश्चर्य नहीं कि कहीं-कहीं तो इन शैक्षणिक शर्तों को पूरा करने वाला एक भी उम्मीदवार नहीं मिल पाया। क्या कहीं केवल एक व्यक्ति इतना शिक्षित हो तो उसे स्वत: चुन लिया जाएगा?

राजस्थान की राजनीति कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच बंटी रही है। जाहिर है कि दोनों दल इस शैक्षणिक बदहाली के दोषी हैं। राजस्थान के आम नागरिक की बाकी देश से भी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक आदि मानदंडों पर बदतर स्थिति जगजाहिर है। यह स्थिति राज्य के दोनों प्रमुख दलों और द्विपक्षीय संसदीय लोकतंत्र की बेतुकी यशोगाथा के खोखलेपन को दर्शाती है। इस परिप्रेक्ष्य में राजस्थान सरकार द्वारा 2015 के पंचायती चुनावों की पूर्व-संध्या पर राज्य में कानून बनाने की वर्तमान व्यवस्था की सामान्य प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए लोकतांत्रिक विचार-विमर्श और बहस के बिना, अध्यादेशीय रास्ते से, शैक्षणिक योग्यता को चुनाव में उम्मीदवारी की पात्रता तय करना वास्तव में राज्य की विफलता और गैर-जिम्मेदाराना नीतियों का दंड गरीब और उपेक्षित तबके पर थोपने के समान है।

यहां राजस्थान की लोकतांत्रिक व्यवस्था की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर नजर डालना इस अध्यादेश के पीछे छिपी मंशा का कुछ खुलासा कर सकता है। राजस्थान कई देसी रियासतों को मिला कर बना। यहां भी अंगरेजी शासन के तहत चलने वाले प्रदेशों के समान ही संवैधानिक व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। लेकिन यह सच्चाई है कि राजस्थान जैसी देसी रियासतों की जनता की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और नागरी सुख-सविधाओं और अधिकारों की स्थिति 1947 तक सीधे ब्रिटिश प्रशासन के तहत रहे इलाकों के मुकाबले काफी बदतर रही थी। रेगिस्तानी और सूखा प्रदेश होने की वजह से भी राजस्थान के गांवों की वंचना बढ़ जाती है। यही नहीं, आजादी के आंदोलन से उत्पन्न बहुमुखी आधुनिक राजनीतिक-सामाजिक चेतना और इसके फलितार्थों में भी राजस्थान सीधे अंगरेजी शासन वाले इलाकों के बराबर नहीं आ पाया था।

आजादी के आंदोलन में ब्रिटिश भारत में राजतंत्र और सामंतशाही दोनों के एक साथ विरोध की जरूरत नहीं रही। वहां अंगरेजी शासन भारत के अनेक राजवंशीय मध्ययुगीन शासनों को समाप्त कर चुका था। पर वहां भी गांवों में स्थानीय सामंती वर्ग का दबदबा था। साथ में तथाकथित उच्च जातियों, शिक्षितों, व्यवसायियों, महाजनों और सरकारी अमले की तूती बोलती थी।

राजस्थान में प्रजामंडल की अगुआई में फिरंगी सत्ता राजशाहियों और स्थानीय ठिकानों के खिलाफ आंदोलन शोषण-दोहन की एक तिहरी व्यवस्था के खिलाफ चलाया गया था। पर सामाजिक अन्याय और कुप्रथाओं का विरोध कमजोर था। आधुनिकता के साथ न्याय और राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष के मुकाबले राजस्थान के जन आंदोलन कम प्रभावी रहे। इन सबका नतीजा था राजस्थान के आम नागरिकों, विशेषकर ग्रामीणों की कमजोर और दयनीय स्थिति। पिछली करीब आधी सदी के दौरान राजस्थान ने भी चुनावी लोकतंत्र के कई अनुभव बटोरे हैं। हर चुनाव में राजनीतिक तबकों और गैर-गरीबों का दबदबा रहा। इस प्रक्रिया को यह अध्यादेश आगे बढ़ा रहा है।

शायद इसी सामंती-साहूकारी, उच्च जातीय प्रभुत्व से मुक्ति की विशेष जरूरत को देखते हुए विकेंद्रित लोकतंत्र की पंचायती व्यवस्था की शुरुआत राजस्थान में की गई। पंचायतों के द्वारा गरीब ग्रामीण कुछ स्वायत्तता की ओर बढ़ने की आस लगा रहे थे। पर इस अध्यादेश ने उस उम्मीद पर पानी फेर दिया है। गौरतलब है कि प्रजामंडलों में प्रमुख भूमिका निभाने वाले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1959 में राजस्थान के नागौर में पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया था। यानी जिस राज्य की सरजमीं पर पंचायती राज का बीज बोया गया, आज वहीं एक अध्यादेश के द्वारा ग्राम पंचायतों के अल्प-विकसित लोकतांत्रिक पौधे पर कुठाराघात किया गया है। राजस्थान पंचायती राज (दूसरा संशोधन) अध्यादेश-2014 को लागू करने से पहले व्यापक जन-विमर्श की बात तो दूर, विधायकों तक की राय नहीं ली गई। राज्य सरकार ने सरपंच पद (सामान्य वर्ग) के लिए आठवीं कक्षा, अधिसूचित क्षेत्र में सरपंच पद के लिए पांचवीं कक्षा और जिला परिषद की सदस्यता के लिए दसवीं कक्षा पास होना अनिवार्य बना दिया है।

सारे राजस्थान में बयासी फीसद गांववासी- खासतौर पर महिलाएं- पांचवीं कक्षा तक भी नहीं पढ़ाए जा सके हैं। महज औपचारिक सतही साक्षरता से भी उनतालीस प्रतिशत ग्रामवासी वंचित हैं। महिलाओं में 54.2 प्रतिशत निरक्षर हैं। अनुमान है कि पंचानवे फीसद बच्चियां पांचवीं कक्षा तक नहीं पहुंच पाती हैं। यानी अब महज पांच प्रतिशत महिलाएं ही पंचायतों की सदस्यता की पात्र हैं। उनके लिए इसमें पचास फीसद आरक्षण की कानूनी व्यवस्था की गई है। इसका सीधा अर्थ है कि धनी, पूर्व-शिक्षित, जमीन-जायदाद वाले परिवारों की महिलाएं ही आरक्षित पदों पर काबिज हो जाएंगी।

विभिन्न असमावेशित, सीमांत लोगों के लिए विशेष व्यवस्था की राष्ट्रव्यापी सकारात्मक पहल और प्राथमिकता की नीति ग्राम पंचायतों में भी लागू की गई थी। इस सोच का आधार यह था कि इस व्यवस्था के तहत लागू विकास संबंधी नीतियों के लिए अधिकृत संस्थानों द्वारा इनसे निर्धारण, संचालन और लाभार्थियों के चयन में गरीबों, उपेक्षितों की आवाज बुलंद हो पाएगी। निर्णय-निर्वहन प्रक्रिया में जिनकी जितनी ज्यादा भागीदारी होगी, उन्हें उतने ही लाभ की संभावना होती है। लेकिन अब पंचायतों के प्रत्याशियों की शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य कर पंचायतों के बजट, सुविधाओं और लाभों में पांच फीसद के बोलबाले और पंचानवे फीसद की उपेक्षा के पुराने संस्थागत आधार को पुनर्जीवित कर दिया गया है।

पंचायती राज व्यवस्था को 1970 के शुरू में दो संवैधानिक संशोधनों द्वारा मजबूत करके राज्य की नीति के जनपक्षीय मंसूबों को ठोस जमीन देने का प्रयास किया गया था। संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का यह एक अच्छा उपाय है। गांव-गांव में पंचायत द्वारा तृणमूल भागीदारी का मकसद था बेहतर, ज्यादा प्रभावी जवाबदेही द्वारा लाभान्वित होने की ओर अंतिम नागरिक का भी बढ़ना। आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी शिक्षा से वंचना का यह रूप शिक्षा के ध्येय के प्रति घोर उपेक्षा का संकेत है। वंचित वर्गों के अन्य लोग पंच पदों पर न पहुंचें तो स्थिति और बदतर हो सकती है। शुरुआती शिक्षा पंचायतों का कार्यक्षेत्र है। शैक्षणिक योग्यता का विस्तार विद्यमान पदासीन पंचों के लिए चुनौती बढ़ाएगी। शिक्षा का सीमित दायरा विद्यमान पंचों के ‘हित’ में होगा। क्या नई व्यवस्था इन संभावनाओं और तथ्यों से नावाकिफ है?

भाजपा का गांवों में कमजोर जनाधार इस नई तजवीज का एक खास कारण हो सकता है। इसलिए चुनावों में उम्मीदवारी का हक सीमित करके असमावेशी और अलोकतांत्रिक व्यवस्था की गई है। मगर क्या शासन को शेष नागरिकों के इन हकों पर पानी फेरने का अधिकार है?

देश के बहुत-से बुद्धिजीवियों ने इस अध्यादेश के अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक पक्षों पर चिंता जाहिर की है। समाचारपत्रों ने माननीय जजों के कई कथन प्रकाशित किए हैं। वे सब इस गैर-लोकतांत्रिक मुहिम की परतें खोलते हैं।

यह कानून राजस्थान के गांवों में कथित पंचायती राज की आड़ में रजवाड़ों के जमाने की सामंती विषमता को फिर से जीवित करेगा। सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार कम शिक्षितों या निरक्षर लोगों द्वारा किया जाता है? विधायकों-सांसदों, मंत्रियों और अन्य ताकतवर उच्च राजनीतिक पदों के लिए शैक्षणिक योग्यता की शर्तें तय नहीं की गई हैं। विधानसभाओं, विधान परिषदों, संसद, केंद्र और राज्यों के मंत्रिमंडलों में प्रथम चुनाव से आज तक सैकड़ों अल्पशिक्षित राजनीतिकों ने अपना कार्यभार बराबर कुशलता और ईमानदारी से निभाया है।

हमारी गरीबी और अशिक्षा आदि राजकीय विफलता के जीते-जागते नमूने हैं। राज्य की ऐसी विफलता के शिकार ग्रामीणों को उनके मामूली-से अधिकार से क्यों वंचित कर दिया गया है? क्या यह पंचायत चुनाव जीतने की घटिया कोशिश नहीं है? भ्रष्ट पंचायत पदाधिकारी, ठेकेदार आमतौर पर गांवों के कुंठित प्रभावशाली तबके से आते हैं। औपचारिक शिक्षा उनके काम को सुगम और प्रभावी बनाती है। अनेक उदाहरण मिलेंगे, जब उन्हें भ्रमित किया जाता रहा है। पंचों का कार्यक्षेत्र मंत्रियों-विधायकों के समान होता है जो अपने अधीनस्थ सरकारी कर्मचारियों की नकेल बेहद कुशलता से थामते आए हैं। भूस्वामी और भूमाफिया औपचारिक रूप से ही शिक्षित हैं जो भ्रष्टाचार के जनक, कर्ताधर्ता और लाभान्वितों में हैं। यानी इस कानून की बुरी मंशा साफनजर आती है।

सार्वजनिक जीवन के संचालन-नेतृत्व का हरेक ग्रामीण तक पहुंचता अनुभव लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करता है। न्याय पर आधारित इस गणतंत्र को संविधान की उदात्त भावनाएं मुखर करती हैं। उनसे छेड़छाड़ नए किस्म के कॉरपोरेटी, हवाई लोकतंत्र की पदचाप है। राजस्थान सरकार इसी दिशा में काम कर रही है। इसलिए ग्रामीण भारत के लोकतंत्र पर इन हमलों का सामना करना सच्ची, समावेशी नीतियों के हिमायतियों की जिम्मेदारी है।

इस कानून के पक्ष में कहा जा रहा है कि अब पंचायतों के वित्तीय लेन-देन चेक और इ-बैंकिंग के जरिए होने वाले हैं। निरक्षर पंच इस प्रकार के लेन-देन करने में सक्षम नहीं होंगे। इस मत के प्रचारक ‘फंक्शनल लिटरेसी’ यानी व्यावहारिक जानकारी, कौशल और कार्यक्षमता की अवधारणा से या तो अपरिचित हैं या जान-बूझ कर अनभिज्ञ बन रहे हैं। हर छोटे-बड़े आर्थिक काम, रोजगार और आजीविका अर्जन में औपचारिक शिक्षाविहीन आए दिन अपने रुपए-पैसे और बैंकों, टैक्स आदि मामलों का संचालन करना दैनिक अनुभव से सीखते हैं। कितने वित्तमंत्री, अर्थशास्त्र, वित्तीय प्रबंधन आदि की पेचीदगियों से वाकिफ होते हैं? ऐसे लोग व्यवहार के शिक्षालय से ही महारत हासिल करते हैं।

लोकतंत्र की ताकत अब सामने आ रही है। इसलिए सत्तासीन वर्चस्वशाली तबके वोट के अधिकार पर किस्तों में डाका डाल रहे हैं। अध्यादेश के जरिए राजस्थान के पंचायत निर्वाचन कानून में किया गया फेरबदल इसी का उदाहरण है।

 

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