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किसान के अच्छे दिन कैसे आएंगे

गिरिराज किशोर चौबीस फरवरी को जिस दिन भूमि अधिग्रहण अध्यादेश की जगह लाया गया विधेयक संसद के सामने कानून बनाने के लिए रखा जाना था, उस दिन किसानों की ललकार सुन कर संसद सोचने को विवश हो गई। इस सुरक्षित परिसर में यह दहाड़ कैसी! प्रधानमंत्री चौंके, यह चक्र उलटा किसने घुमाया। अभी तक तो […]
Author February 28, 2015 17:23 pm

गिरिराज किशोर

चौबीस फरवरी को जिस दिन भूमि अधिग्रहण अध्यादेश की जगह लाया गया विधेयक संसद के सामने कानून बनाने के लिए रखा जाना था, उस दिन किसानों की ललकार सुन कर संसद सोचने को विवश हो गई। इस सुरक्षित परिसर में यह दहाड़ कैसी! प्रधानमंत्री चौंके, यह चक्र उलटा किसने घुमाया। अभी तक तो मैं दहाड़ता था तो देश कांपता था। मेरा रथ निर्बाध दौड़ रहा था। दिल्ली ने धोखा दिया और बदनसीब और नौसिखिए लोगों को राजदंड थमा दिया, जो यह तक नहीं जानते दंड किधर से सीधा होता है और किधर से उलटा।

जब सबका विकास करने का समय आया तो अण्णा दाल-भात में मूसरचंद बन कर खड़े हो गए। आखिर अकेले मैंने देश जीता, मैंने जिम्मेदारी ली, सबका साथ सबका विकास। यह साथ छोड़ने की गुस्ताखी क्यों हुई। विकास के मेरे नक्शे पर लाल निशान कौन लगा रहा है। सच कौन बताए, न मंत्री बोले न सचिव। सचिव तो उनकी अनुकंपा से सर्वाधिकार प्राप्त कर चुका है। उस पर मंत्री को गलत-सही बताने की जिम्मेदारी डाली जा चुकी है। इसी चक्कर में पांच नौकरशाह पैदल हो चुके हैं। लेकिन आज सड़कछाप भुनगे आकाश में मंडरा रहे हैं।

दरअसल, गेंद जो उछली तो भुनगों के छत्ते में जा लगी। ये भुनगे अहिंसक हैं, केवल भुनभनाते हैं। भुनभुनाने का सत्याग्रह गांधी दे गए हैं, उसी गांधी को जिसके हत्यारे को पूजे जाने पर सरकार में लंबी चुप्पी है। अंगरेजों के राज में सारी भूमि सरकार की थी। किसान बंधुआ था, जमींदार बिचौलिया था। सब कुछ किसान से वसूल करके खुद भी ऐश करते थे और गोरी सरकार को भी कराते थे। किसान ही आखिरी आदमी था। होरी तो फिर भी दो बैल वाला था। दो बैलों के बावजूद गरीब था। आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन हुआ। जमीन छीन कर किसानों में बांटी गई। किसान को पहली बार लगा हम भी भूमिधर हैं।

गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वे मुजफ्फनगर में जमींदारी उन्मूलन का श्रीगणेश करने आए थे। उनका वाक्य था जो भूमि को धारण करे वही भूमिधर। इस अध्यादेश ने सबके विकास के चक्कर में भूमिधर को पैदल करने की ठान ली है। जमीन बिना किसान की सहमति के अधिग्रहीत कर ली जाएगी, 2013 में यूपीए सरकार ने कानून बनाया था, किसान की मर्जी के बिना जमीन नहीं ली जाएगी। 2014 में प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा के बाद, जमीन की मिल्कियत सरकार ने ले ली। किसान फिर वहीं का वहीं। जिसके पास जमीन नहीं उसका क्या, मुआवजा। मुआवजा खत्म, क्या बचा, मजदूरी। मजदूरी में पर-निर्भरता, अगर बेपढ़ा तो नौकरी नहीं। मजूरी भी मिली तो मिली, नहीं तो फाकाकशी। मनरेगा भी प्रतिबंधित हो गया। दो सौ जिलों में जैसे बाकी सब समृद्ध हों।

पहले प्रावधान था अगर परियोजना पांच साल में पूरी नहीं हुई तो जमीन वापस किसान को मिल जाएगी। अब वह प्रावधान भी समाप्त कर दिया गया। सबसे विचित्र बात कि किसान अपने अधिकार के लिए कचहरी जाना चाहे तो सरकार से अनुमति लेनी पड़ेगी। यह कैसा जनतंत्र है कि किसान अपने अधिकार के लिए अदालत नहीं जा सकता। जो जमीन कब्जाए, न्याय पाने के लिए उसी से अनुमति ले। पहले मार खाए, फिर रोने की इजाजत भी मारने वाले से मांगे।

अण्णा ने कहा, जमीन कहां जाएगी, पूंजीपति या उद्योगपति के पास। अच्छे दिन किसके आए, उद्योगपति के। अभागा कौन? किसान। सुभागा कौन? सरकार और उद्योगपति। सद्गति किसकी? उद्योगपति की। दुर्गति किसकी? किसान और आम आदमी की। अभागे और सभागे के बीच तो रेखा पहले ही खिंच गई थी। सबका विकास के नारे से किसान और आम आदमी बाहर। किसान के अच्छे दिन कैसे आएंगे? वित्तमंत्री ने दूर की बात कही थी।

इस अध्यादेश (अगर कानून बन गया) के तहत किसान को अधिक दाम मिलेंगे। यानी किसान अपनी अस्मिता पैसे के लिए बेच दे। किसान की अस्मिता धरती होती है। चौबीस तारीख को पार्टी के सांसदों की बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा, यह विधेयक बहुत अच्छा है, किसान के हित में है। अपने सांसदों का आह्वान किया, डटे रहना कस के वार करना। पार्टी नेता का अपने सांसदों को यह सलाह देना ठीक है। लेकिन मूंछ के लिए किसान को बलि चढ़ाना कहां तक उचित है?

जब सवाल उठता है कि सरकार ने किसानों से बात क्यों नहीं की, तो उनके प्रवक्ता गिनाने लगते हैं कि अमुक मुख्यमंत्री ने यह कहा, ढमुक मुख्यमंत्री ने वह कहा। मुख्यमंत्री जनता का प्रतिनिधि है तो किसानों का भी है। सवाल कुछ, जवाब कुछ। मुझे याद आता है कि नेहरूजी ने कांग्रेस की महासभा में रूस की नकल पर सहकारी खेती का प्रस्ताव रखा था। वहां चौधरी चरण सिंह और चंद्रभानु गुप्ता ने यह कह कर विरोध किया कि किसान जान दे देगा पर अपनी जमीन नहीं देगा। प्रस्ताव या तो पास नहीं हुआ या वापस ले लिया गया था।

प्रधानमंत्री ने अमेरिका से लौट कर अध्यादेश जारी कर दिया। क्यों? पता चला है कि विश्व बैंक का कहना है कि चालीस करोड़ ग्रामीणों का नगरीकरण होना जरूरी है। जबकि गांधी का कहना था कि गांवों को आत्मनिर्भर बनाओ। वहां ऐसी स्थितियां बनाओ कि ग्रामीण नगरों की तरफ न भागें। विश्व बैंक का सुझाव नकारात्मक है, जबकि गांधी का कथन सकारात्मक था। जड़ों से मत उखाड़ो, जड़ों को मजबूत करो। प्रधानमंत्री लगता है विश्व बैंक के कथन को मान रहे हैं।

टीवी पर देख रहा था कि हजारों किसान और आदिवासी पदयात्रा करते हुए अण्णा के धरने में शामिल होने दिल्ली आ रहे थे। वे बीस फरवरी को चले थे। अनुशासित सिपाही की तरह अपनी-अपनी पोटलियां लिए, नाचते-गाते चले आ रहे थे। कोई साधारण यात्री नहीं थे, सत्याग्रही थे। प्रतिदिन बारह किलोमीटर चलते थे। एक समय भोजन मिलता था। सब अपनी-अपनी पंक्ति में रहते थे। हर घंटे बाद जहां भी चलते होते, वहीं दस-पंद्रह मिनट बैठ कर सुस्ताते थे। फिर चल देते थे। सबकी बोतलें पानी से भर दी जाती थीं।

जब यूपीए सरकार से समझौता हुआ था, जिसके आधार पर 2013 का कानून संसद ने पास किया था उसमें भाजपा के तीन सुझाव सम्मिलित किए गए थे। उस समय भी पीवी राजगोपाल के नेतृत्व में इतने ही अनुशासन में, देश के ये सबसे अंतिम पंक्ति के जन आए थे। उनका सवाल था कि एक साल पहले जो समझौता हुआ था, उसके तहत बने कानून को बदलने की क्या जरूरत थी। उसे व्यवहार में लाकर तो देखा होता। उस समय जब आम सहमति के आधार पर कानून बना तो इस बार इकतरफा निर्णय क्यों लिया गया। भाजपा ने अपने ही निर्णय से पीठ क्यों फेर ली। इसका कोई जवाब नहीं दे रहा।

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा ने एनडीटीवी पर, पात्रा से पूछा कि भूमिविहीन किसानों में जमीन क्यों नहीं बांट दी जाती, वे अच्छे उद्यमी बन सकते हैं। पूंजीपतियों को क्यों दी जाए? राजगोपाल पदयात्रा के दौरान रवीशजी से कह रहे थे कि भारत का सबसे बड़ा और प्राचीन उद्योग तो कृषि है। मैंने देखा है कि इसी कृषि के विकास के लिए भारत से लोगों को गिरमिटिया बना कर दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में ले जाया गया था। वे मजदूर अपने उपयोग के लिए सब्जी और सब अन्नों के बीज ले गए थे। उन्हीं की मदद से वहां उष्णकटिबंधी फसलें पैदा की गर्इं।

विश्व बैंक को लगता है कि यहां के ग्रामीण खेती के सिवाय कुछ नहीं जानते इसलिए उन्हें शहरों में बसा कर तथाकथित कौशल, जिसका मोदीजी बार-बार उल्लेख करते हैं, सिखाया जाए। खेती भारत में बहुत विकसित हुनर है। इस विकसित उद्योग को उसी तरह समाप्त करने की योजना है जैसे ढाका की मलमल बनाने वालों के अंगूठे काट कर उस कला को नष्ट किया गया था।

यूरोप और अमेरिका खेती के इस सर्वाधिक मजबूत आधार से कभी खुश नहीं रहे, आज भी नहीं हैं। जैसे आजादी के बाद अन्न की कमी हुई थी और देश के लोगों को पीएल-480 का सत निकला और सड़ा गेहूं खाना पड़ता था। अगर इंदिरा गांधी ने अमेरिका की मर्जी के खिलाफ देश में हरित क्रांति न की होती तो आज भी हम दूसरे देशों की दया पर निर्भर होते। इतने विविध अनुभवों के बाद ऐसा भूमि अधिग्रहण कानून लाना विश्व बैंक की मुराद पूरी करना है।

दो मुख्य प्रश्न हैं। क्या हमारे पास इस बात का आकलन है कि उद्योगों को कितनी कहां-कहां जमीन चाहिए, बिजली संयंत्रों के लिए कितनी भूमि चाहिए, स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय को कितनी चाहिए, घर बनाने के लिए शहर और गांव के अपने-अपने हिसाब से कितनी भूमि चाहिए, आदि। किसानों ने लाखों एकड़ जमीन पहले भी दी है, अब भी देंगे, पर अंध-विश्वासी बनकर नहीं।

आज किसी भी सरकार पर देश के किसान या आम आदमी का विश्वास नहीं। क्या यह अध्यादेश लाने से पहले, अधिग्रहण के कारण समाज और विभिन्न वर्गों पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत आकलन कराया गया? फिर, केंद्र और राज्य सरकारों का पुनर्वास और मुआवजे के भुगतान का अब तक का कैसा रिकार्ड है। बताया जाता है कि भाखड़ा, टिहरी, माताटीला आदि बांधों के कारण, विस्थापित लोगों का पुनर्वास और उनकी अधिग्रहीत जमीन के मुआवजे का हिसाब अभी तक नहीं हुआ। ये प्रश्न नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। सरकार का कानून बनाना एक यांत्रिक प्रक्रिया है। प्रधानमंत्री जानते हैं कि जमीन की खरीद-फरोख्त भी व्यवसाय है। व्यवसाय साख पर चलता है। सरकारों की साख इतनी गिर चुकी है कि कई बार बैंक भी ओवरड्राफ्ट देने से मना कर देते हैं।

अध्यादेश और संकल्पों की भाषा सकारात्मक हो तो उसका असर अच्छा पड़ता है। अधिग्रहण सकारात्मक शब्द नहीं। वितरण या समायोजन जैसा कोई शब्द सकारात्मक होता। दरअसल, अधिग्रहण का विस्तार लोगों के घरों तक होता है। दूसरे, विश्वयुद्ध के समय मुझे स्मरण है कि हमारे एक खाली मकान पर रात को नोटिस लगा दिया गया था कि इस मकान का अधिग्रहण सरकार द्वारा सरकारी उपयोग के लिए किया जाता है। तब मार्शल लॉ लागू था। भूमि अधिग्रहण का विस्तार लोगों के घरों तक पहुंचा तो लोगों की कठिनाइयां बढ़ेंगी। किसानों की रोजी-रोटी तक सरकारी हाथ पहुंचना मन में इस बात की दहशत पैदा कर सकता है। सामान्यत: अध्यादेश युद्ध या विपत्ति का सामना करने के लिए प्रयुक्त होते हैं।

मूल बात है कि सरकार जमीन के अधिग्रहण से पहले किसान की सहमति ले, यह पहली शर्त होनी चाहिए।

 

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  1. M
    mansingh choudhary
    Mar 1, 2015 at 9:38 am
    भूअधिगरन,किसानो से लेकर उद्योगपत्यो को देने वाला है , गलत है , किसान आंदोलन करेंगे , मोदी तो वेपारी निकला , अंग्रेजो से भी बड़ा वेपारी . किसान मार भी खाएंगे मोदी की और रोने का भी मोदी को पूछ के . इस कानून से किसान को न्यायपालिका की मदद भी मोदी को पूछ के लेनी पड़ेगी . किसानो से लिज पर जमीन लेनी चाहिए , ताकि उनको हर महीना किराया मिलेगा तो उसके परिवार का भरणपोसन होगा . बड़े उद्योगपतियों को मदद करने की बजाय मोदी को को-ओपरेटिव सोसाइटी को इंडस्ट्री में लागु करना चाहिए ताकि किसी की मालिकी न हो
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    सबरंग