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किसानों का संकट क्या है

गिरिराज किशोर दिल्ली में, जहां दो सरकारें शासन करती हैं, राजस्थान के किसान गजेंद्र सिंह राजपूत ने पेड़ से लटक कर उस समय आत्महत्या की, जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल किसानों की रैली को संबोधित कर रहे थे। ‘आप’ के सब बड़े नेता वहां मौजूद थे। 2005 से लगभग प्रतिदिन देश में औसतन चालीस […]
Author May 6, 2015 09:12 am

गिरिराज किशोर

दिल्ली में, जहां दो सरकारें शासन करती हैं, राजस्थान के किसान गजेंद्र सिंह राजपूत ने पेड़ से लटक कर उस समय आत्महत्या की, जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल किसानों की रैली को संबोधित कर रहे थे। ‘आप’ के सब बड़े नेता वहां मौजूद थे। 2005 से लगभग प्रतिदिन देश में औसतन चालीस किसान आत्महत्या करते आ रहे हैं। किस सरकार ने सोचा है कि इस आत्महत्या की बढ़ती महामारी को कैसे रोका जाए?

किसान कौन है, वह व्यक्ति जो बिना अपनी जमीन हुए भी दूसरे के खेत में जाकर अन्न उगाता है, दूसरा वह किसान है जिसके पास दो से दस बीघे जमीन है, वह और उसका परिवार जीवन की सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उस जमीन पर खेती करता है। अपने उपभोग से जो बचता है वह आधे-पौने दाम पर, दूसरे खर्चे चलाने के लिए, बाजार में बेच आता है। खाली समय में दूसरों के खेतों में काम करता है या मजूरी करता है। उससे बच्चों की पढ़ाई और कपड़ों आदि का खर्च चलाता है। तीसरा किसान, बीस से पचास बीघे जमीन में खेती करता है। वह छोटे-मोटे उपकरण खरीद कर उनकी सहायता लेता है। दो बैल और एक हल भी रखता है।

गांवों में पुरानी परंपरा थी कि बैल-हल मांगे पर मिल जाते थे। एक बैल हो तो दूसरा बैल मांग-तांग कर काम चल जाता था। न जाति का विचार था, न धर्म और सामाजिक स्तर का। चौथा किसान, दो हलों की या चार हलों की खेती करने वाला बड़ा किसान होता है जिसके पास हलवाहे काम करते हैं। अधिकतर ऐसे किसान खेती को व्यावसायिक स्तर पर लेते हैं। उससे भी बड़े किसान तकनीकी माध्यमों से खेती करते हैं। वे फॉर्महाउस वाले नव-किसान हैं। राजनेता और सरकारी अधिकारी खेती का लाभ रिश्वत का पैसा छिपाने में इस्तेमाल करते हैं। खेती की आमदनी अब तक कर-मुक्त है। वे भारी उपज दिखा कर काले धन को सफेद कर लेते हैं। किसानी जैसे श्रमसाध्य और पवित्र काम का इस्तेमाल राजनीतिक और नौकरशाह अनैतिक कामों में भी करने से नहीं चूकते।

आज छोटे और मध्यम श्रेणी के किसानों के सामने दो बड़े संकट हैं। एक कर्ज, और दूसरा संसाधन की कमी। कुछ दिन हुए एनडीटीवी की ओर से रवीशजी, सोनीपत की मंडी में, चिलचिलाती धूप में, किसानों और आढ़तियों से उनकी कठिनाइयों के बारे में जानकारी ले रहे थे। ओलावृष्टि और अत्यधिक वर्षा के कारण कितनी फसल बरबाद हुई है और कितनी बची है। अस्सी से नब्बे प्रतिशत फसल नष्ट हो गई और बाकी जमीन में लेट गई। एक सरकार-भक्त ने फेसबुक पर लिखा है कि नब्बे फीसद फसल कट कर बाजार में आ गई है।

जो फसल जमीन से ऊपर है उसे काटना संभव है, लेटी हुई फसल का भूसा ही बन सकता है। सबसे ज्यादा फसल ओलों की मार और पानी की बौछार से लेट गई है। बची फसल का अनाज जब वे मंडी में बेचने लाते हैं तो आढ़ती उसे अपने हिसाब से समायोजित करता है और वही सरकारी एजेंसियों को ले जाकर बेचता है। किसान को कच्ची पर्ची पकड़ा देता है।

आढ़ती का कहना है कि सरकारी एजेंसी उसमें से सूख काटती है। सरकार से निर्धारित शायद 1440 रुपए प्रति क्विंटल की जगह किसान को लगभग 1200 रुपए प्रति क्विंटल मिलता है। ये एजेंसियां किसान से सीधे नहीं लेतीं। क्यों? उनकी बातों से लगता है कि आढ़ती और सरकारी एजेंसियों के बीच मिलीभगत है। न कंपनियां किसान को बताती हैं कि कितनी कटौती हुई, क्यों हुई, न आढ़ती बताता है।

जब किसानों ने कच्ची पर्चियां रवीश को दिखार्इं तो आढ़ती लड़ने लगा। जब पूछा गया कि सरकार की घोषणा है कि गेहूं लेते वक्त कोई कटौती नहीं की जाएगी, तो किसानों ने एक स्वर से कहा कि सरकार झूठ बोल रही है। बहुत बड़ा सवाल है कि सरकार किसानों से सीधे क्यों गल्ला नहीं खरीदती? जैसे किसान कांटे पर फैक्ट्रियों के लिए गन्ना स्वयं देने जाता है। सरकार बिचौलियों को तरजीह क्यों देती है? भारत के कृषि राज्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश में कहा कि उप्र सरकार बिचौलियों के हित में चलती है। सोनीपत तो उत्तर प्रदेश में नहीं है। वहां भाजपा की सरकार है। मंत्रीजी भी खांटी किसान हैं। फिर इतने अनजान क्यों?

दूसरी बात जो और भी भयानक है, हर किसान किसी न किसी आढ़ती का बंधुआ है। इसका कारण है कर्ज। पुश्त-दर-पुश्त किसान अपने निर्धारित आढ़ती से उधार लेते आ रहे हैं। इसका एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण कारण है। बैंक किसान को खेती के लिए कर्ज नहीं देते। देते हैं तो जमीन पर।

एक किसान ने बताया कि उसे एक करोड़ की जमीन पर बैंक ने ढाई लाख रुपए छह महीने के लिए दिए हैं। उसके बाद नीलामी का नोटिस लगा देंगे या फिर दुगुना सूद लेंगे। आखिर बैंक जमीन के बाजार-भाव पर कर्ज क्यों नहीं देते, इतनी कम अवधि के लिए क्यों देते हैं? किसान बैंक क्यों नहीं खोले जाते?

किसानों और आढ़तियों के बीच हिंदू-विवाह का सा रिश्ता है। हर किसान किसी न किसी आढ़ती से पीढ़ियों से बंधा है। जब उसे व्यक्तिगत कारण से रुपए की जरूरत होती है तो आढ़ती उसे बिना लिखे-पढ़े रुपया दे देता है। फसल पर आधा रुपया काट लेता है। आधा उस पर बना रहता है। अगर मैंने ठीक सुना तो साढ़े आठ प्रतिशत सूद लेता है। हर किसान की अपने आढ़ती से बंधे रहना बाध्यता है। सरकार चाहे तो बाध्यता का कोई तोड़ निकाल सकती है।

बैंक लंबे समय के लिए कर्ज दें। खेती के लिए कम सूद पर रुपया दें। और व्यक्तिगत आवश्यकता के लिए कुछ अधिक सूद लें। उसके लिए जमीन का बाजार में प्रचलित भाव कर्ज का आधार हो। छठे महीने और तीसरे महीने की बाध्यता न हो। नीलामी कोई समाधान नहीं है। बेचने का अधिकार किसान को हो। उसकी सहमति से उसकी जमीन बेची जाए। जबकि प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून में सरकार किसान की जमीन लेने के लिए बैंकों की तरह ही कटिबद्ध है।

अगर किसान अनुबंध के अनुसार छमाही सूद की राशि बैंक को देता रहता है तो बैंक किसान को अपना अच्छा ग्राहक समझ कर अपना संबंध बनाए रख सकता है। किसान कॉरपोरेट जगत के लोगों की तरह नहीं। वे लोग बैंकों का अरबों रुपया वर्षों देने का नाम नहीं लेते। बाद में समझौते के तहत बैंकों को बहुत-सा रुपया छोड़ देना पड़ता है। उसके बावजूद उन लोगों को सरकार के दबाव में न्यूनतम सूद पर कर्ज देने के लिए सरकारी बैंक को बाध्य होना पड़ता है। किसान बिना लिखा-पढ़ी का रुपया भी हाथ जोड़ कर आढ़ती को वापस करता है, तो बैंक का रुपया वापस क्यों नहीं करेगा?

दुर्भाग्य से हमारी सरकारें गरीब को अविश्वसनीय मान कर चलती हैं। किसान मेहनत से कमाता है। अपने लिए जरूरत के अनुसार बचा कर, शेष बेच कर न्यूनतम लाभ पर जनता का पेट भरता है। इस बार तो उसके द्वारा बोए बीज, खाद और आबपाशी की कीमत भी नहीं निकली। फिर भी वह बची हुई उपज न्यूनतम मूल्य पर बेचने के लिए निकल पड़ा। कहां-कहां नहीं लूटा जा रहा है! उसी अन्नदाता की आत्महत्या के बारे में आश्वस्त हो जाने पर, वही सरकार जो आत्महत्या करने वाले किसानों को झूठा मानती है, रुपए की बारिश करती नजर आती है। आजादी के बाद से इन्हीं कठिन परिस्थितियों में किसान जीता आ रहा है।

सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश से किसानों की अनिश्चितता दो कारणों से और बढ़ गई, एक तो सरकारों के सरोकारों पर उनका अविश्वास, और दूसरा, इस तबाही को लेकर सरकारों और जनप्रतिनिधियों का अमानवीय व्यवहार। प्रधानमंत्री राहत कोष आपातकालीन स्थितियों से निबटने के लिए होता है। सांसदों और विधायकों की विवेकाधीन निधि, प्रदेशों के मुख्यमंत्री-कोष आदि इतने स्रोत उपलब्ध हैं, पर किसान के लिए कुछ नहीं। इन सब माननीयों ने गांवों को गोद लिया हुआ है, गोद लिए गांवों पर भी सांसद और विधायक अपनी विवेकाधीन राशि खर्च नहीं कर रहे।

हर वित्तीय वर्ष के बाद पता चलता है कि अधिकतर सांसद और विधायक अपनी निधि खर्च नहीं कर पाते। शायद जनहित के लिए आबंटित धनराशि को खर्च न करके, अपने अधीन इतना सरकारी धन होने के सुख से लाभान्वित और स्फुरित होते रहते हैं। जब वे लोग जनहित में व्यय नहीं करते तो इतनी धनराशि को जड़ बनाने से बेहतर है कि सरकार स्वत: जनहित में उसका उपयोग करे।
इतने आर्थिक संसाधनों के बावजूद हजारों किसान आत्महत्या कर चुके, यह देश के लिए शर्म की बात है। प्रधानमंत्री किसानों की हानि होते नहीं देख सकते, फिर भी ऐसा क्यों हो रहा है? किसी के पास कोई जवाब नहीं।

कॉरपोरेट के धुरंधर अरबों का व्यवसाय बैंकों के सहारे चलाते हैं। अधिक से अधिक मुनाफा कमाते हैं। वे इसलिए वरेण्य हैं! वे नौकर बना कर, योग्य से योग्य व्यक्ति से अधिक से अधिक काम लेने की कला जानते हैं। सरकार उसी नौकर संस्कृति को पुनर्स्थापित करने को विकास का महत्त्वपूर्ण अंग मान रही है। कॉरपोरेट जगत उसे अपनी शक्ति मानता है। पहले से ही यह देश रोजी-रोटी की तलाश में भटकता रहा है। पहले बेसहारा अनपढ़ लोग परदेस जाते थे। अब शिक्षित समाज अपनी संतान को पैकेट्स के लिए विदेश भेज कर सुर्ख-रूह होता है। फिर वह जीवन भर रोता है। कम लोग जानते हैं यहां से पलायन कर जाने वाले इंजीनियर, डॉक्टर आदि वहां सस्ते तकनीकी श्रमिक के रूप में प्रचारित हैं।

एक बड़ा विरोधाभास है कि विकास के नाम पर सरकार उद्योग के क्षेत्र में ‘स्व-रोजगार’ की पक्षधर है। उसका नारा है कि अपने को नहीं, दूसरों को नौकरी दो। लेकिन कृषि तो इस देश की प्राचीनतम आजीविका है। उसे उत्तम माना गया है, बान यानी व्यवसाय को मध्यम, और चाकरी को निकृष्ट कहा गया है। खेती से बड़ा स्व-रोजगार कोई नहीं रहा और न है। उसका विकास करने की जगह सब खेतिहर को नौकरी-पेशे में बदलने की जुस्तजू में लगे हैं। जबकि खेती सदियों से आत्मनिर्भरता का एकमात्र आदर्श माध्यम रही है।

लालबहादुर शास्त्री का नारा जय जवान जय किसान बदल कर कहीं जय जवान जा.. किसान न हो जाए?

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