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अख़लाक़ अहमद उस्मानी कतर के तानाशाह तमीम बिन हम्माद अलसानी पिछले महीने सीधे दोहा से नई दिल्ली नहीं आए, बल्कि उनका हवाई जहाज पहले इस्लामाबाद और कोलंबो होता हुआ भारत पहुंचा। सपाट देखने से लग सकता है कि इसमें क्या खास बात है, लेकिन इससे भी अधिक खास बात है कि वे बांग्लादेश नहीं गए। […]
Author April 22, 2015 13:59 pm

अख़लाक़ अहमद उस्मानी

कतर के तानाशाह तमीम बिन हम्माद अलसानी पिछले महीने सीधे दोहा से नई दिल्ली नहीं आए, बल्कि उनका हवाई जहाज पहले इस्लामाबाद और कोलंबो होता हुआ भारत पहुंचा। सपाट देखने से लग सकता है कि इसमें क्या खास बात है, लेकिन इससे भी अधिक खास बात है कि वे बांग्लादेश नहीं गए। वे बांग्लादेश से नाराज चल रहे हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे वे मिस्र से नाराज हैं। कतर के तानाशाह तमीम हम्माद परिवार से पोषित दुनिया की सबसे खतरनाक वहाबी आतंकवादी नीतियों का पहले मिस्र और अब बांग्लादेश ने हिस्सा बनने से इनकार कर दिया तो उनका तिलमिलाना लाजमी है।

तमीम अपने पिता से गद््दी छीनने के बाद से कतर प्रायोजित वहाबी उर्फ सलफी उर्फ तकफीरी आतंकवाद को बढ़ावा देने में लिप्त हैं। कतर का आइएसआइएस के अलबगदादी, अल कायदा के ऐमन अलजवाहिरी और अफगानिस्तान-तालिबान को समर्थन जगजाहिर है। भारत में नरेंद्र मोदी सरकार के शपथ लेते ही अफगानिस्तान में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर तालिबानी हमले, अल कायदा के ऐमन अलजवाहिरी के भारत पर आतंकवादी हमले की धमकी और आइएसआइएस द्वारा उनतालीस भारतीयों के अपहरण की घटनाएं कतर पोषित आतंकवाद से भारत को दहलाने की तीन अलग-अलग मिसालें सामने हैं। इसके बावजूद भारत आए कतर के तानाशाह का हमने राजकीय सम्मान से स्वागत किया और छह समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

क्या यह माना जाए कि कतर में काम कर रहे छह लाख भारतीयों के रोजगार और कतर से भारत भेजी जा रही प्राकृतिक गैस हमें मजबूर करती है कि हम कतर को आंख दिखा कर या मिला कर नहीं, बल्कि आंख झुका कर संबंध रखें। सभी समझौते कतर के पक्ष में हों तब भी इन पर हस्ताक्षर कर दें। गरीब और पड़ोसी देश बांग्लादेश कतर के पाप ढोने को मजबूर नहीं है और मिस्र किसी भी नुकसान की हद तक जाकर कतरी वहाबी आतंकवाद को देश से उखाड़ फेंकने के लिए प्रतिबद्ध है, तो क्या यह भारत की राजनीतिक अदूरदर्शिता मानी जाएगी कि वह कतर की जिम्मेदारी तय करने के बजाय उसके आगे झुकने को मजबूर है।

मिस्र में कतर समर्थित मुसलिम ब्रदरहुड की सरकार बनते ही उसे वहाबी उर्फ सलफी उर्फ तकफीरी एजेंडे पर चलाया जाने लगा। मिस्र की जनता एक ही साल में सड़कों पर आ गई और मुहम्मद मुर्सी को जुलाई 2013 में गद््दी छोड़नी पड़ी। सत्ता से बेदखल मुसलिम ब्रदरहुड के कार्यकर्ताओं ने राजधानी काहिरा समेत सिकंदरिया, गिजा, फय्यूम, बेनी सुएफ, कफ्रÞ अलशेख, मिनया, दखालिया, सिनाई, सोहाग, जगाजिग, दमिता, जेफ्ता, गरबिया, अबू अलमतामिर, नील नदी किनारा, मर्सा मतरुआ, सैद बंदरगाह और देश भर में दंगे करने शुरू कर दिए। अपने आप को शांतिप्रिय संगठन कहने वाले मुसलिम ब्रदरहुड के कार्यकर्ताओं ने कई हत्याएं और लूटपाट की और करोड़ों रुपए की सार्वजनिक संपत्ति बरबाद कर दी।

मुसलिम ब्रदरहुड के अहले हदीस कार्यकर्ताओं ने नाम बदल कर, जैसे क्रांतिकारी प्रतिशोध संस्था, बलात राज्य परिवर्तन विरोधी छात्र मोर्चा, बेनाम संगठन (होशियारी देखिए नाम ही ‘अननेम्ड’ रखा), मुक्त मोर्चा और लोकप्रिय विरोध और अन्य संगठन पिछले दो साल से देश में दंगे कर रहे हैं। मुसलिम ब्रदरहुड के दो नकाबपोश कार्यकर्ताओं ने ट्विटर पर एके-47 बंदूक के साथ वीडियो डाल कर राष्ट्रपति फतह अलसीसी की सरकार को धमकाते हुए कहा कि यह सरकार सिर्फ गोलियों की भाषा समझती है।

पिछली जनवरी में ब्रदरहुड की समर्थक क्रांतिकारी प्रतिशोध संस्था ने बत्तीस आतंकवादी हमलों की जिम्मेदारी ली। तुर्की से चलने वाले मुसलिम ब्रदरहुड के ‘राबिया टीवी’ पर मिस्र से भागे मौलाना और ब्रदरहुड के सदस्य मुहम्मद सगीर और मुहम्मद अब्दुल मकसूद ने क्रांतिकारी प्रतिशोध की घटनाओं को जायज ठहराते हुए इस तरह की घटनाओं के दोहराए जाने की धमकी दी।

‘राबिया’ अरबी का शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘चार’। मुसलिम ब्रदरहुड के चार सिद्धांतों वाले इस पीले निशान के साथ भारत में राजनीतिक दल पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया यानी ‘पीएफआइ’ ने देश भर में मुर्सी के समर्थन में प्रदर्शन किया था। जमाते-इस्लामी भारत की छात्र इकाई स्टूडेंट इस्लामिक आॅर्गनाइजेशन ने भी राबिया निशान के साथ दिल्ली और अलीगढ़ में प्रदर्शन किया। नदवा मदरसे के मौलाना सलमान नदवी ने भी देश भर में मुसलिम ब्रदरहुड सरकार के पक्ष में जलसे आयोजित किए। ये वही सलमान नदवी हैं जिन्होंने आइएसआइएस के दुर्दांत सरगना अलबगदादी को बधाई पत्र लिखा था।

आइएसआइएस को कतर और तुर्की के माध्यम से धन, हथियार और प्रशिक्षण के भरपूर सबूत और खबरें मौजूद हैं। आइएसआइएस की मिस्र में सिनाई प्रांत शाखा ने पिछली जनवरी में चौवालीस लोगों को मार डाला। इसी शाखा का पहले अंसार बैतल मकदिस नाम था जिसने मुहम्मद मुर्सी की सरकार जाने के बाद मिस्र के गृहमंत्री मुहम्मद इब्राहिम मुस्तफा पर कातिलाना हमला किया था।

पिछले साल अक्तूबर में आतंकवादियों ने सिनाई में तैंतीस सैनिकों और अगस्त 2012 में सोलह सैनिकों की हत्या कर दी। पिछले पंद्रह सालों में सिनाई में सैकड़ों लोग मारे गए हैं जिनमें काफी विदेशी पर्यटक भी हैं। इब्न खलदून अध्ययन केंद्र की निदेशक दालिया जियादह ने जून 2014 में मुसलिम ब्रदरहुड के हवाले से रिपोर्ट दी कि ब्रदरहुड आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त है। उन्होंने कहा कि दस्तावेजी सबूतों से पता चलता है कि ब्रदरहुड हमास को धन उपलब्ध करवाता है और सिनाई में कई आतंकवादी संगठनों से जुड़ा है।

अमेरिका में कतर के राजदूत मुहम्मद जहम अलकुवारी ने पिछली सितंबर में आधिकारिक बयान में कहा कि ट्यूनीसिया में कट््टर इस्लामी पार्टी इनाहदा और मिस्र में मुसलिम ब्रदरहुड की अवहेलना करने और इसके सदस्यों को जेल में डालने से आइएसआइएस के उभरने की आशंका है। वे समझा रहे थे या धमका रहे थे? मिस्र की महिला एवं बाल विकास परिषद ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मुसलिम ब्रदरहुड अपनी रैलियों में बच्चों को ‘मून शील्ड’ बना कर चलते हैं जिससे कई बच्चे मारे जाते हैं। देशव्यापी दंगों और हिंसा के आरोपों के चलते मुसलिम ब्रदरहुड के नेता मुहम्मद बदी और उनके तेरह साथियों को फांसी की सजा सुनाई गई है।

बांग्लादेश में भी कमोबेश यही नजारा है। मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का साथ देने और दंगे भड़काने के आरोपित जमाते इस्लामी के नेता अब्दुल कदीर मुल्ला को दिसंबर 2013 और मुहम्मद कमरुज्जमां को अप्रैल 2015 में फांसी पर लटका दिया गया। मुल्ला पर तीन सौ चौवालीस लोगों के जनसंहार और बलात्कार के आरोप थे। जमाते-इस्लामी के कार्यकर्ताओं के देशव्यापी दंगों में पच्चीस लोग मारे गए और करोड़ों रुपए की संपत्ति बरबाद हो गई।

जमाते-इस्लामी बांग्लादेश के छात्र संगठन ‘छात्र शिबिर’ को दंगे करने में महारत है। मुल्ला की फांसी पर कतर, तुर्की और पाकिस्तान ने विरोध किया। तुर्की के प्रधानमंत्री तैयब इरदोगन ने कहा इस फांसी को इतिहास नहीं भूलेगा। कतर ने पहले ही ‘आशंका’ जता दी कि मुल्ला को फांसी दिए जाने की तीखी प्रतिक्रिया हो सकती है और वही हुआ। पिछली ग्यारह अप्रैल को जमाते-इस्लामी के राष्ट्रीय उपमहासचिव मुहम्मद कमरुज्जमां को बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान एक सौ बीस लोगों के जनसंहार, बलात्कार और लूट के आरोपों के चलते फांसी दे दी गई। दोनों नेताओं की सजा पर जमाते-इस्लामी भारत और पाकिस्तान ने विरोध दर्ज करवाया।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक प्रतिनिधिमंडल के रूप में मिले ईमान संस्था के नेता इंजीनियर मुहम्मद हामिद का मानना है कि भारत में तेजी से मुसलमानों का वहाबी फिक्र में धर्मांतरण चल रहा है जिसे रोका जाना चाहिए।

भारत के बहुसंख्यक सूफी और गैर-वहाबी विचारधारा के छात्रों ने सिमी छाप वहाबी सोच से लड़ने के लिए मुसलिम स्टूडेंट आॅर्गनाइजेशन यानी ‘एमएसओ’ का गठन किया। एमएसओ के राष्ट्रीय सचिव इंजीनियर शुजात अली कादरी का आरोप है कि जमाते इस्लामी हिंद का छात्र संगठन स्टूडेंट इस्लामिक आॅर्गनाइजेशन यानी ‘एसआइओ’ भारत के युवाओं का वहाबीकरण कर रहा है। शुजात कहते हैं कि जमाते-इस्लामी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को कतर का समर्थन प्राप्त है।

इस्लामी चिंतक और पेशे से वकील एडवोकेट मोमिन हलवासिया बताते हैं कि कुरआन और हदीस की वहाबियों ने बेहद गलत तरीके से व्याख्या की है इसीलिए वे आजकल कुरआन के सूफी मतानुसार उर्दू और हिंदी में अनुवाद और व्याख्या के कार्य में लगे हुए हैं। मोमिन हलवासिया का कहना है कि कतर और सऊदी अरब की व्यापारिक मित्रता तो ठीक है, लेकिन जैसे ही आप इन्हें अपनी वैचारिक पौध बोने के लिए जमीन देते हैं, ये उसे नाइजीरिया, सीरिया, लीबिया, इराक, पाकिस्तान और अफगानिस्तान बना देते हैं। उनका मानना है कि वहाबी आतंकवाद से सूफी मत ही लड़ सकता है और नरेंद्र मोदी की सरकार को यह बात समझनी होगी ताकि भारत वहाबी आतंकवाद की प्रयोगशाला न बन सके।

वहाबी सोच के विरुद्ध जमीन पर सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहे सदा-ए-सूफिया-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष सैयद बाबर अशरफ कतर को दुनिया का सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। कतर और सऊदी अरब प्रायोजित वहाबी आतंकवाद के विरुद्ध देश में दस से अधिक महारैलियां आयोजित कर चुके बाबर मिस्र का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि कतर प्रायोजित मुसलिम ब्रदरहुड की सरकार बनते ही पूर्व राष्ट्रपति मुहम्मद मुर्सी पूरे मिस्र को लूटने और देश को वहाबी आग में झोंकने में लग गए। तमीम जब भारत में थे, बाबर ने भारत सरकार के नाम ज्ञापन में मांग की थी कि मुसलिम ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन घोषित कर भारत सरकार इस पर प्रतिबंध लगाए। बाबर कहते हैं कि वक्फ, हज कमेटियों, अल्पसंख्यक कल्याणकारी योजनाओं और राजनीतिक पदों से वहाबियों को हटा कर ही वहाबी मुक्त भारत की कल्पना की जा सकती है। मुहम्मद बदी और कमरुज्जमां की फांसी को वे न्याय की जीत और सलफी विचारधारा की हार बताते हैं।

दुनिया में जहां भी मुसलमानों की बड़ी संख्या निवास करती है, कतर और उसे चला रहे निहित स्वार्थों की निगाह में यह एक र्इंधन के रूप में है। पूरे अरब में इकतालीस करोड़ आबादी है जिसमें सभी धर्मों के लोग हैं। अकेले भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में करीब पचपन करोड़ मुसलमान रहते हैं। गरीब और पीड़ित मुसलमानों पर आंख बंद कर भी तीर चलाए जाएंगे तो कुछ सिरफिरे मिल ही जाएंगे। यह भारत को पता करना है कि कौन उसके बगीचे में फूल बो रहा है और कौन आखेट के लिए आया है। शिकारी अक्सर दोस्त की शक्ल में लालच देकर आता है। दोहा से दोस्ती से पहले काहिरा और ढाका की शिकारगाह का मुआयना जरूरी है।

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  1. S
    saajid
    Apr 25, 2015 at 7:59 pm
    एक बेहतर आर्टिकल के लिए जनसत्ता को बधाई
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग