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विकास नारायण राय किरण बेदी ने अपनी आत्मकथा ‘आइ डेयर’ को एक खुली किताब कहा है। लगता है, अब यह किताब बंद की जा रही है। या इसमें एक चमकते हुए आइकन के अस्त होने का अध्याय दर्ज करने की तैयारी है? भारतीय पुलिस सेवा की प्रथम महिला अफसर किरण बेदी दिल्ली की मुख्यमंत्री बनेंगी […]
Author January 31, 2015 16:30 pm

विकास नारायण राय

किरण बेदी ने अपनी आत्मकथा ‘आइ डेयर’ को एक खुली किताब कहा है। लगता है, अब यह किताब बंद की जा रही है। या इसमें एक चमकते हुए आइकन के अस्त होने का अध्याय दर्ज करने की तैयारी है? भारतीय पुलिस सेवा की प्रथम महिला अफसर किरण बेदी दिल्ली की मुख्यमंत्री बनेंगी या नहीं, इस गरमाती बहस के बीच उनकी आइकॉनिक छवि का अवसान निश्चित ही एक संभावना है। अचानक, दिल्ली चुनाव में राजनीतिक समझौतेबाजी की चुनावी बिसात पर खुल कर उतरने से उनकी खरी चमक का धुंधलाना स्वाभाविक है।

एक पुलिस अफसर के रूप में बेदी की पेशेवर साख चाहे कुछ खास न रही हो, पर निर्विवाद है कि आजादी के पचीस वर्ष बाद भारतीय पुलिस सेवा में जिद के साथ प्रवेश करने वाली यह महिला हजारों भारतीय महिलाओं के लिए खाकी वर्दी धारण करने की प्रेरणा का स्रोत बनी। घोर पितृसत्तात्मक भारतीय समाज के लिए वरिष्ठ पुलिस अफसर के वेश में किरण बेदी को अपराध नियंत्रण जैसे पारंपरिक ‘मर्दाने’ क्षेत्र में सैकड़ों पुलिसकर्मियों का नेतृत्व करते हुए देखना, स्त्री की कमजोर फितरत का सामाजिक तिलिस्म दरकने जैसा अनुभव रहा होगा। लेकिन आज समाज के सामने अलग ही तस्वीर आ रही है, इस आइकन के एक आरोपित चुनावबाज के बिंब में कायांतरण की!

जाहिर है कि अगर भाजपा नेतृत्व ने दिल्ली में बेदी को पार्टी पर थोपने की सोची-समझी कवायद की है तो यह घटनाक्रम बेदी के उनके प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण के बिना संभव नहीं हो सकता था। इसके बीच यह पाखंड गले से उतारना मुश्किल हो जाता है कि बेदी एकाएक प्रधानमंत्री मोदी के किसी ‘सबका विकास’ एजेंडे से प्रभावित होकर राष्ट्रसेवा करने राजनीति में उतरी हैं। क्योंकि आज तक तो देशवासियों के सामने मोदी शासन का कॉरपोरेट हितों के पोषण का इकतरफा एजेंडा ही सामने आया है। दूसरी तरफ, जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी संकीर्ण हिंदुत्ववादी भाव-भंगिमा में रत्ती भर दिखावटी फेरबदल नहीं किया है, उसे भी बेदी ने एक ही सांस में राष्ट्रीय एकता का पहरेदार घोषित कर दिया। यह महज अवसरवादिता नहीं, आत्मसमर्पण है।

अण्णा के लोकपाल मंच की आभा से आलोकित बेदी के लिए भाजपाई सहयोगियों के भ्रष्टाचार पर तो बगलें झांकने के सिवा और कोई रास्ता बचता ही नहीं। इस समर्पण क्रम में उनका चालीस सालों के प्रशासनिक अनुभव का दावा भी एक निहायत खोखला तर्क लगता है। अपने लंबे सेवाकाल में, उन्हें पुलिस विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के खात्मे को लेकर किसी पहल के लिए नहीं जाना जाता। न ही भ्रष्ट पुलिस प्रणाली से समाज को राहत दिलाने वाले किसी बुनियादी बदलाव को चिह्नित करने के लिए ही। आश्चर्य नहीं कि भाजपा में प्रवेश के साथ वे संसद में सरकारी नौकरशाही पर केंद्रित लोकपाल बिल पारित होने मात्र को ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ अभियान का सफल समापन कहते नहीं थक रहीं। राजनीतिक सत्ता और कॉरपोरेट पूंजी के भ्रष्ट याराने पर उनकी चुप्पी मोदी और जेटली की आर्थिक प्राथमिकताओं को ही तो ध्वनित करती है, न कि आम जन के पक्ष में ‘आइ डेयर’ को।

महिला सुरक्षा और मादक पदार्थों के मोर्चों पर भी किरण बेदी की सफलता के दावे प्रशासनिक आंकड़ा पद्धति के अनुरूप हैं, न कि जन-कसौटी के धरातल पर। स्त्री विरुद्ध अपराधों को कम दर्ज करके पुलिस बेहतर महिला सुरक्षा का खोखला दावा पेश करती आई है। वर्ष 2014 में दिल्ली के नए पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी ने जैसे ही मुक्त रूप से मुकदमे दर्ज करने की सही रणनीति अपनाई, इन अपराधों में अभूतपूर्व वृद्धि तुरंत सामने आ गई।

दिल्ली पुलिस की वार्षिक मीडिया प्रस्तुति में बस्सी ने इनकार नहीं किया कि जमाने से इन अपराधों का आंकड़ा ‘प्रबंधन’ ही किया जा रहा था। क्या यह सवाल नहीं बनेगा कि किसी किरण बेदी का इस ‘प्रबंधन’ के समांतर या विरोध स्वरूप अपना ट्रैक रिकार्ड क्या रहा है?

इसी तरह नारकोटिक्स ब्यूरो में तैनाती के दौरान मादक पदार्थों की बरामदगी के मात्र बढ़े-चढ़े आंकड़े किरण बेदी की पीठ थपथपाने के लिए काफी नहीं माने जा सकते, जबकि समाज में इनकी आपूर्ति का चक्र निर्विघ्न चलता रहा हो। ब्यूरो में उनसे बेहतर आकड़े दिखाने वाले भी रहे हैं और कौन नहीं जानता कि आंकड़ों का खेल तमाम सरकारी प्रवर्तन एजेंसियां कैसे खेलती आई हैं।

पंजाब के संदर्भ में, जहां भाजपा के सहयोग से राज करने वाले अकाली दल का मुखिया परिवार ही इस चक्र को लेकर संदेह के ‘बादलों’ से भरा है, क्या इस विषय में पूछताछ करने वाले अफसर के तबादले को लेकर आज ‘आइ डेयर’ करने की हिम्मत बेदी में है? यह बेमौसम तबादला मोदी के खास जेटली के केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने किया।
बेदी का महिला सुरक्षा का ब्लू प्रिंट, जिसे उनके लेखन में देखा जा सकता है, पारंपरिक राजनेताओं के तौर-तरीकों से हट कर, आधुनिक संदर्भों में महिला सशक्तीकरण की चुनौती के सवाल जरूर उठाता है। लेकिन उनके बताए कानूनी या प्रशासनिक हल भी नौकरशाही और योजनाकारों के जाने-पहचाने ढर्रे के माफिक ही हैं, जिनसे राज्य अपनी पीठ बेशक थपथपा ले, स्त्री फिर भी असुरक्षित रह जाती है।

बेदी के नवीनतम नायक मोदी ने इसी बाईस जनवरी को पानीपत में महिला सशक्तीकरण की राष्ट्रीय कार्य-योजना ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ के नारे में समेट कर रख दी। इस अवसर पर मोदी की बड़ी चिंता थी कि अगर कन्या भ्रूण हत्या चलती रही तो विवाह के लिए लड़कियां कहां से आएंगी। उनकी एक मंत्री का रोना था कि बेटी न होने से वे कन्यादान का पुण्य नहीं उठा पा रही हैं। यह महिला सशक्तीकरण का सोच हुआ या उसे व्यक्तित्वविहीन रखने का? भाजपा और मोदी की कृपा से मुख्यमंत्रित्व पाने के बाद क्या बेदी इस सोच के मुकाबले ‘आइ डेयर’ कर सकती हैं?

सही है कि दिल्ली चुनाव की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में बेदी को जांचने-परखने का पैमाना असाधारण रूप से कसा रखा जा रहा है। सिर्फ इसीलिए नहीं कि चुनावी रंगमंच पर उनका प्रवेश असाधारण तौर पर हुआ, बल्कि एक तरह से यह उनके आइकॉनिक व्यक्तित्व की नियति भी रही है। बंदिशों से भरे पुलिस विभाग के वरिष्ठों और समकक्षों से भी उनका रिश्ता बहुत सहज नहीं कहा जा सकता।

दरअसल, चालीस वर्षों के प्रशासनिक अनुभव के दावों के बावजूद, कड़वी सच्चाई यह भी है कि केंद्र सरकार में वे एडिशनल डीजी पद की पात्रता के लिए भी उपयुक्त नहीं ठहराई गर्इं; हालांकि बाद में शीर्ष राजनीतिक दखल के चलते गृह मंत्रालय को उनके नाम को एडिशनल डीजी और डीजी पदों की चयनित सूची में जगह देनी पड़ी। भारत सरकार ने उन्हें पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो जैसे महत्त्वपूर्ण संगठन का मुखिया भी बनाया। तो भी, प्रचार से कटे रह कर काम करने की यह भूमिका उन्हें रास नहीं आई और अंतत: दिल्ली का पुलिस कमिश्नर न बनाए जाने पर उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

समयपूर्व इस्तीफे को बेदी कैंप काफी महिमामंडित कर रहा है। जबकि इसमें सिद्धांतों के लिए त्याग जैसा कुछ भी नहीं था। वे उस समय केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर होती थीं। इसलिए दिल्ली पुलिस में पूर्ण पात्रता वाले उनसे कनिष्ठ अधिकारी को पुलिस कमिश्नर बनाया जाना न प्रशासनिक रूप से अप्रत्याशित कहा जा सकता है और न नियम विरुद्ध।

इससे पहले और इसके बाद भी सारे देश में ऐसे ही पचासों मामले देखे जा सकते हैं। बल्कि तमाम ऐसे भी उदाहरण हैं, जहां कैडर में ही कार्यरत वरिष्ठ को पुलिस प्रमुख न बना कर अन्य समकक्ष पद पर लगाया गया। यहां तक कि कितने ही मामलों में तो योग्यतम अधिकारियों की भी राजनीतिक कारणों से अनदेखी की गई।
बेदी को अगर वास्तव में सैद्धांतिक विरोध करना था, तो उन्हें इन मामलों में भी आवाज उठानी चाहिए थी या कम से कम इस्तीफा देते समय इनका भी हवाला देना चाहिए था। उस समय तक प्रकाश सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय का पुलिस सुधार को लेकर फैसला भी आ चुका था, जिसके अनुसार सरकार कैडर के तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से पुलिस प्रमुख चुन सकती थी। बेदी का मामला इस मानदंड के अनुसार ही तय हुआ था।

यह जानना दिलचस्प होगा कि बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री खुद मोदी का वरिष्ठता और योग्यता को लेकर अपना रवैया क्या रहा? उस दौर में गुजरात में लगभग तीन वर्ष तक राज्य के पुलिस प्रमुख पद पर नियमित तैनाती ही नहीं की गई, क्योंकि वरिष्ठतम योग्य अफसर मोदी के माफिक नहीं बैठता था।

तब बेदी सरकारी सेवा में भी नहीं थीं और आसानी से इस घोर अनियमितता के विरुद्ध आवाज उठा सकती थीं। बशर्ते अपने इस्तीफा प्रकरण में उनका विरोध किन्ही सिद्धांतों पर आधारित रहा होता। सच्चाई यह है कि उन्होंने तब भी व्यक्तिगत महात्त्वाकांक्षा को ही सर्वोपरि रखा।

यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि किरण बेदी के व्यक्तित्व से पुलिस महकमे की बदनाम छवि में कोई फर्क नहीं पड़ा, हालांकि पुलिस की वर्दी से उनके आइकन बने रहने का मार्ग जरूर प्रशस्त रहा। बेदी के पेशेवर काम-काज की एक बड़ी ख्याति ‘के्रन बेदी’ के रूप में रही है, जिसके पीछे भी लोगों में खाकी वर्दीधारी एक तेज तर्रार महिला को देखने का अचंभा ही ज्यादा शामिल था; अन्यथा सड़कों से गाड़ियां उठवाने का यह काम कोई भी पुलिस इंस्पेक्टर बखूबी निभा सकता है। हां, पुलिस विभाग से बाहर तिहाड़ जेल का स्वतंत्र प्रभार मिलने पर बेदी की नेतृत्व क्षमता को प्रचार उड़ान भरने का मौका मिला, जिसे उन्होंने भुनाया भी खूब। मेगसैसे पुरस्कार, संयुक्त राष्ट्र में बड़े वेतन पर तैनाती, मोटे अनुदानों पर पलते दो एनजीओ, अण्णा का लोकपाल आंदोलन- स्वीकारना होगा कि किरण बेदी की आइकॉनिक छवि को इस चकाचौंध भरी यात्रा में ज्यादा खरोंचें नहीं लगीं। चुनावी दांव पर कुर्बान किए जाने को बेदी की यही छवि है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर उनचास दिन शासन करने वाली पार्टी दिल्ली चुनाव में जनपरस्ती की नई राजनीतिक भाषा न बोल पा रही होती तो भाजपा को मोदीपरस्ती के फलक पर किरण बेदी को उतारने की मजबूरी न होती। यानी केजरीवाल बनाम किरण बेदी के शोर के बावजूद दिल्ली में टक्कर वास्तव में जनपरस्ती बनाम मोदीपरस्ती के बीच है।

 

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  1. भारत भूषण
    Feb 2, 2015 at 4:26 pm
    किरण वेदी तो मात्र अपनी मत्वाकांक्षा को पूर्ण होते दिख रहा है परंतु उन्हें पता नहीं की उनको हथियार बना बीजेपी और आरएसएस देश में आरंभ हो रही एक संभावित नई व्यवस्था का भ्रूण-हत्या करना चाहता है।यदि ऐसा हुआ तो देश के अधिकांस जनता किरण वेदी को छमा नहीं करेगा।
    Reply
  2. धीरेश सैनी
    Feb 2, 2015 at 6:13 am
    सटीक
    Reply
  3. S
    Siddharth Pandya
    Feb 3, 2015 at 1:47 pm
    पत्रकार महोदय कम से कम लेख लिखने से पहले अध्ययन तो करें....अधूर ज्ञान घातक होता है...और आपके इस आर्टिकल से यही झलक रहा है...आप भी भावुक होकर बिना किसी जानकारी के किरण बेदी को देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी घोषित कर रहे हैं,,,,महोदय कम से कम अपने पाठकों को भ्रमित न करें....देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी नहीं बल्कि १९५६ बैच की सुरजीत कौर थीं....
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  4. विकास नारायण
    Feb 6, 2015 at 9:18 am
    हर तरह से पुनः देख लिया है| किरण बेदी ही प्रथम महिला अधिकारी हैं जो सीधे भारतीय पुलिस सेवा में आयीं| बतौर निर्देशक राष्ट्रीय पुलिस अकादमी काम करते हुए भी मुझे कोई अन्यथा रिकार्ड नहीं मिला था| इस विषय में जो अखबार की कतरन प्रचारित की जा रही है, वह बनाई हुई लगती है|
    Reply
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