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चीन का विस्तारवाद

एशिया का अकेले नेतृत्व करने की इच्छा रखने वाला चीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत के बढ़ते कद से परेशान है।
Author July 18, 2017 10:53 am
अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर भारतीय और चीनी सैनिक बात करते हुए। (फाइल फोटो)

एशिया का अकेले नेतृत्व करने की इच्छा रखने वाला चीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत के बढ़ते कद से परेशान है। वर्तमान में चीन, भारत को एक प्रतिद्वंद्वी की तरह देख रहा है, चूंकि भारत विश्व की तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है। ऐसे में जहां एक तरफ भारत संपूर्ण विश्व का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल हुआ है तो दूसरी ओर चीन अपनी नीतियों के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अलग-थलग नजर आ रहा है। चीन की नीतियों के संदर्भ में देखें तो उसने हमेशा विस्तारवाद को अपनी विदेश नीति के केंद्र में रखा है।
यही कारण है कि बीसवीं सदी से इक्कीसवीं सदी तक चीन अपने भूभाग को बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों की धज्जियां उड़ाते भी बाज नहीं आता है। जम़ीन के प्रति चीन की भूख के कारण 1959 में तिब्बत जैसे शांतिप्रिय राष्ट्र को अपना स्वतंत्र अस्तित्व खोना पड़ा और वहां के नागरिकों को चीन के अत्याचार के कारण दूसरे देशों में शरणार्थी बनने पर मजबूर होना पड़ा।

तिब्बत पर कब्जा करने के बाद चीन ने एक तो भारतीय सीमा के निकट पहुंचने में सफलता प्राप्त कर ली, और दूसरे, पाकिस्तान जैसे अपने सदाबहार मित्र का वह पड़ोसी बन गया, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के माध्यम से। पीओके से ही चीन की सीमा पाकिस्तान से मिलती है, जिसे लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद है। तिब्बत को हड़पने के साथ ही जल नियंत्रण की शक्ति भी चीन ने हासिल की। यहां जल नियंत्रण से तात्पर्य है कि भारत में बहने वाली तीन सदानीरा नदियों (ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज) का उद््गम स्थल तिब्बत में है। गौरतलब है कि चीन ने बह्मपुत्र नदी पर बांध बनाया है। उसके माध्यम से गर्मियों में पानी की कमी के समय भारत का पानी रोकने में वह सक्षम है जिससे पूर्वोत्तर को सूखे का सामना करना पड़ सकता है।

दूसरी ओर, वर्षा के दिनों में अत्यधिक जल की स्थिति में बांध का फाटक खोलने पर पूर्वोत्तर जलमग्न हो सकता है। सतलुज का उद््गम स्थल भी तिब्बत (राक्षस ताल) ही है। ऐसे में सतलुज नदी पर बने भाखड़ा बांध पर बनी जलविद्युत परियोजनाओं (करचम वांगटु हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट और नाथपाझाकड़ी) को भी चीन प्रभावित कर सकता है। भारत पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद से लंबे समय से पीड़ित है। इसी कारण पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए सिर्फ कहा गया था कि हो सकता है सिंधु नदी जल समझौते की समीक्षा कर भारत अपने हिस्से के जल का इस्तेमाल करे। फिर क्या था, पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन ने ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी का पानी रोक कर पाकिस्तान के साथ मित्रता बखूबी निभाई। यहां तक कि चीन ने आतंकवाद के प्रति दोहरा रवैया अपनाते हुए संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित होने से भी बचाया। जबकि चीन स्वयं भी उइगर प्रांत में आतंकवाद से पीड़ित है।

चीन ने पाकिस्तान के माध्यम से भारत की सुरक्षा के समक्ष काफी चुनौतियां खड़ी कीं। इसके बावजूद भारत, पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के मसले पर अलग-थलग करने में कामयाब रहा। यही कारण है कि विश्व के कई देश जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, इजराइल, जापान, अफगानिस्तान, यूरोपीय संघ के देश, आसियान के देश आदि भारत के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। हाल में भारतीय प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा के दौरान अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने हिजबुल के सरगना सैयद सलाहुद्दीन को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया। घोषित करने में कश्मीर में हो रही आतंकवादी गतिविधियों को आधार बनाया गया है। इस पर चीन ने कहा था कि अमेरिका को दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए।

इस प्रकार मसूद अजहर और सैयद सलाहुद््दीन के मुद््दे पर आतंकवाद के प्रति चीन के दोहरे रवैये से संपूर्ण विश्व परिचित हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि एशिया में भारत को प्रतिद्वंद्वी मान क र चीन भारत की विकास यात्रा को पाकिस्तान के माध्यम से बाधित करता है। चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के दावे का भी विरोध करता हदक्षिण चीन सागर के संदर्भ में चीन की नीति से सारी दुनिया अवगत है। चीन अपनी विस्तारवादी नीति के तहत दक्षिण चीन सागर पर अपने एकाधिकार का दावा करता है। लेकिन दक्षिण चीन सागर किसी एक देश की धरोहर न होकर एक प्रमुख वैश्विक व्यापारिक मार्ग है, साथ-साथ दक्षिण चीन सागर के तटवर्ती देश इस पर प्राकृतिक तेल, गैस, ऊर्जा, मत्स्य संपदा आदि के लिए निर्भर हैं। ऐसे में विवादित द्वीपों पर कब्जा और कृत्रिम द्वीपों के निर्माण और उन पर नौसैनिक अड््डा बनाने के चीन के रवैए के कारण दक्षिण चीन सागर के तटीय देश (विएतनाम, फिलीपींस, ब्रूनेई, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि) चीन से नाराज हैं।

इसलिए ये देश चीन से दूरी बना रहे हैं और भारत के साथ निकटता महसूस करते हैं। ऐसे में चीन की विस्तारवादी मानसिकता के कारण तटवर्ती देश चीन के विरुद्ध लामबंद हो रहे हैं। इस प्रकार दक्षिण चीन सागर में चीन की दबंगई उसे उसके पड़ोसियों से भी दूर कर रही है।

अमेरिका ने 3 जुलाई 2017 को दक्षिण चीन सागर में चीन के कृत्रिम द्वीपों से महज 22 किलोमीटर की दूरी से अपना शक्ति प्रदर्शन करते हुए स्टेथम को गुजारा था। इससे पूर्व 24 मई को अमेरिकी युद्ध पोत डेवे मिसचीफ रीफ से बारह समुद्री मील से गुजरा था। दक्षिण चीन के मसले पर इसके तटीय देशों के अलावा अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान, भारत आदि से भी चीन के मतभेद हैं। चीन के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए भारत ने 2018 केअपने गणतंत्र दिवस के अवसर पर आसियान देशों के दस राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया है। यदि वे आमंत्रण स्वीकार करते हैं तो पहली बार ऐसा होगा कि भारत की गणतंत्र दिवस परेड में एक साथ दस देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल होंगे। चूंकि दक्षिण चीन सागर के तटीय देश चीन की दादागीरी से परेशान हैं, ऐसे में आसियान देश दक्षिण चीन सागर में भारत की भूमिका में और वृद्धि चाहते हैं। सिक्किम सीमा पर भारत, चीन और भूटान के त्रिकोणीय मिलन बिंदु (ट्राई जंक्शन) के नजदीक डोकलाम में गतिरोध जारी है।

ऐसे में डोकलाम क्षेत्र में तनाव को ध्यान रखते हुए भारत भी अपनी ऐक्ट ईस्ट नीति को नई धार देने में जुट गया है। दरअसल, आसियान में ज्यादातर वही देश शामिल हैं जिनका दक्षिण चीन सागर के संदर्भ में चीन से विवाद है। हैम्बर्ग में जी-20 के सम्मेलन (7-8 जुलाई 2017) के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने जापान और विएतनाम के प्रधानमंत्रियों तथा दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति से मुलाकात की। तीनों ही देश भारत की ऐक्ट ईस्ट नीति के अहम साझेदार हैं।

डोकलाम को अपना बताने वाले चीनी नक्शे को जारी कर चीनी सरकार ने अपनी मंशा जाहिर कर दी है। चूंकि भूटान का भारत के साथ सुरक्षा समझौता है, ऐसे में भूटान की सुरक्षा का दायित्व भारत सरकार का है। इसीलिए भूटान के अनुरोध पर भारतीय सैनिकों ने डोकलाम में चीन के सड़क निर्माण-कार्य को रोक दिया। तब से भारत और चीन के बीच तनाव जारी है। चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में एक विशेषज्ञ के हवाले से लिखे गए लेख के अनुसार, अगर भारत ऐतिहासिक सबक सुनने से इनकार करता है तो चीन फौजी कार्रवाई करने पर मजबूर हो जाएगा। धमकी के साथ चीन के सैनिकों ने 5100 मीटर की ऊंचाई पर युद्धाभ्यास भी शुरू कर दिया। इसमें चीन का आधुनिकतम टी-96 टैंक भी शामिल हुआ। लेकिन भारत ने भी 1962 के धोखे से सीख लेते हुए अपनी सैन्य-क्षमता को लगातार और सुदृढ़ किया है। इसलिए चीन को किसी गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए।

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First Published on July 18, 2017 4:44 am

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