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पांच सौ वर्ग मीटर या आठ अपार्टमेंट तक की निर्माण योजनाओं को छोड़ कर सभी निर्माण योजनाओं को रेरा के तहत पंजीकरण कराना अनिवार्य है।
Author August 29, 2017 05:44 am
दिल्‍ली विकास प्राधिकरण द्वारा बनाए गए फ्लैट्स। (Source: Express Archive)

देखा जाए तो बिल्डर अरसे से फ्लैट खरीदारों का शोषण कर रहे हैं। इसके बरक्स परियोजना को समय पर पूरा न करना सबसे बड़ी और आम समस्या है। परियोजना को समय पर पूरा करने की स्थिति में भी ग्राहकों को जान-बूझ कर समय पर फ्लैट नहीं सौंपना, करारनामे के मुताबिक फ्लैट का निर्माण न करना, फ्लैट की गुणवत्ता के साथ समझौता करना, किस्त अदायगी में देरी न होने पर भी ज्यादा ब्याज प्रभारित करना आदि समस्याएं भी कम गंभीर नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर, जून 17 में बिल्डरों की मनमानी के कारण ग्रेटर नोएडा में छह बिल्डरों की सत्रह परियोजनाओं को रद््द कर दिया गया, जिनमें जेपी इन्फ्राटेक, गौरसंस, ओरिस ग्रुप, वीजीए डेवलपर्स और अंजारा ग्रुप शामिल हैं।

यमुना एक्सप्रेस वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) ने इन परियोजनाओं के लेआउट प्लान को मंजूरी दी थी। योजना विभाग ने बिल्डिंग प्लान में कुछ कमियां बतार्इं, लेकिन बिल्डरों ने जान-बूझ कर उनका निराकरण नहीं किया। गौरतलब है कि रद््द की गई इन सत्रह परियोजनाओं में से कई में पहले ही फ्लैट बिक चुके हैं। एक अनुमान के मुताबिक पिछले सात सालों में ग्रेटर नोएडा में विभिन्न कारणों से पैंतालीस बिल्डरों की एक सौ पांच परियोजनाएं रुकी हुई हैं। पांच हजार से अधिक लोगों ने इन परियोजनाओं में अपने फ्लैट बुक कराए हैं। अब फंसे हुए फ्लैट खरीदारों के पास अदालत जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। आमतौर पर ऐसे हालात में फ्लैट या मकान में निवेश करने वाले निवेशक भुगतान किए गए पैसों की वापसी का दावा करते हैं, लेकिन उनके दावे का निपटान वित्तीय और अन्य परिचालित ऋणदाताओं की रकम चुकाने के बाद सबसे अंत में किया जाता है। अमूमन इस प्रक्रिया में फ्लैट निवेशकों को कुछ भी हासिल नहीं हो पाता है।

इस आलोक में सरकार ऋणशोधन नियामक के जरिए एक विशेष प्रावधान लागू करने जा रही है, जिसकी मदद से जिन्हें फ्लैट का कब्जा नहीं मिला है या जिनके फ्लैट नहीं बने हैं, वे बिल्डरों से अपना पैसा वापस ले सकेंगे। नए प्रावधानों के मुताबिक अब फ्लैट खरीदार वित्तीय कर्जदाता की तरह माने जाएंगे और वे फॉर्म ‘एफ’ भरकर बिल्डरों से अपनी रकम का दावा कर सकेंगे। माना जा रहा है कि जेपी के करीब बत्तीस हजार और आम्रपाली के तीस हजार फ्लैट खरीदारों के पैसे मौजूदा समय में फंसे हुए हैं, क्योंकि इन दोनों कंपनियों की वित्तीय स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। भारतीय ऋणशोधन एवं दिवालिया बोर्ड (आइबीबीआइ) ने कहा है कि फ्लैट मालिकों को ऋणदाताओं की समिति में शामिल किया जा सकता है, और वे उतनी रकम का दावा कर सकते हैं जितना उन्होंने बिल्डरों को भुगतान किया है। उनके दावे को बैंकों या ऋणदाताओं की श्रेणी में रखा जाएगा। ज्ञात हो कि पहले केवल बैंकों या ऋणदाताओं को वित्तीय ऋणदाता की श्रेणी में रखा जाता था। चूंकि फ्लैट खरीदार की फ्लैट बुकिंग तयशुदा रिटर्न की श्रेणी में नहीं आती है, इसलिए उन्हें वित्तीय ऋणदाता नहीं माना जाता है और इसी वजह से वे रीयल एस्टेट डेवलपरों के खिलाफ दिवालिया मामला दायर नहीं कर पा रहे हैं।

जेपी इन्फ्राटेक और आम्रपाली में मकान या फ्लैट खरीदने वाले लोग भुगतान किए गए पैसे वापस करने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि अगर कंपनी दिवालिया घोषित हो गई तो अदालत में दायर उनके सभी मामले निष्प्रभावी हो जाएंगे और उन्हें अपने फ्लैटों का कब्जा नहीं मिल पाएगा। उल्लेखनीय है कि जेपी इन्फ्राटेक उन बारह बड़े कॉपोरेट कर्ज डिफॉल्टरों में शामिल है, जिसके खिलाफ भारतीय रिजर्व बैंक ने दिवालिया प्रक्रिया चलाने का आदेश दिया है। दिवालिया संहिता के मुताबिक, अगर एनसीएलटी दिवालिया याचिका स्वीकार कर लेता है तो संबंधित कंपनी के निदेशक मंडल निलंबित माने जाएंगे और अंतरिम रिजॉल्यूशन पेशेवरों को कंपनी में सुधार के लिए एक सौ अस्सी दिन का समय दिया जाएगा। निर्धारित अवधि में लक्ष्य हासिल न कर पाने पर उसे नब्बे दिनों की विस्तारित अवधि दी जा सकती है। यदि उसके बाद भी सुधार नहीं होता है तो कंपनी की संपत्तियां समापन प्रक्रिया में चली जाएंगी।

जेपी इन्फ्राटेक पर मार्च 2017 तक करीब आठ हजार करोड़ रुपए का कर्ज था। नोएडा एक्सप्रेस वे के विश टाउन में विभिन्न परियोजनाओं के तहत बत्तीस हजार फ्लैट और प्लाट विकसित कर रही जेपी इन्फ्राटेक को परियोजना में देरी करने की वजह से मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने आइडीबीआइ बैंक की ओर से कर्ज में फंसी जेपी इन्फ्राटेक के खिलाफ दायर की गई दिवालिया याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। इधर, आम्रपाली समूह के खिलाफ बैंक आॅफ बड़ौदा की दिवालिया याचिका को भी एनसीएलटी ने स्वीकार कर लिया है।अगर रीयल एस्टेट रेगुलेटरी एक्ट (रेरा) पहले अस्तित्व में आया होता तो जेपी इन्फ्राटेक और आम्रपाली के निवेशकों की ऐसी हालत नहीं होती। रेरा को 1 मई, 2016 को अमलीजामा पहनाया गया। देखा जाए तो इस अधिनियम का मकसद रीयल्टी कंपनियों की गतिविधियों में पारदर्शिता लाना, रीयल्टी क्षेत्र में निवेश बढ़ाना और फ्लैट खरीददारों के हितों का संरक्षण करना है। रेरा के तहत राज्य-स्तर पर भी रीयल एस्टेट नियामक प्राधिकरण का गठन किया गया है। इसके तहत विवादों का साठ दिनों के भीतर त्वरित न्यायाधिकरणों द्वारा निष्पादन किया जाएगा। पांच सौ वर्ग मीटर या आठ अपार्टमेंट तक की निर्माण योजनाओं को छोड़ कर सभी निर्माण योजनाओं को रेरा के तहत पंजीकरण कराना अनिवार्य है।

ग्राहकों से ली गई सत्तर प्रतिशत धनराशि को अलग बैंक खाते में रखने तथा उसका उपयोग केवल निर्माण-कार्य में करने का प्रावधान इस अधिनियम में किया गया है। माना जा रहा है कि इससे रीयल इस्टेट में व्याप्त विसंगतियों की पुनरावृत्ति पर लगाम लगेगी और आवासीय परियोजनाओं को निर्धारित समय पर पूरा करना संभव हो सकेगा। परियोजना संबंधी जानकारी जैसे, प्रोजेक्ट का ले-आउट, स्वीकृति, ठेकेदार व प्रोजेक्ट की मियाद का विवरण खरीदार को अनिवार्य रूप से देना होगा। समय-सीमा में निर्माण-कार्य पूरा न करने पर बिल्डर को ब्याज का भुगतान ग्राहक को उसी दर पर करना होगा, जिस दर पर बिल्डर भुगतान में हुई चूक के लिए ग्राहक से ब्याज वसूलता है। रीयल एस्टेट नियामक प्राधिकरण के आदेश की अवहेलना करने पर बिल्डर को तीन वर्ष की सजा दी जा सकती है, साथ ही इस संदर्भ में उस पर जुर्माना लगाने का प्रावधान भी है। इधर, बैंकों ने रिजर्व बैंक के साथ सलाह-मशविरा करके यह तय किया है कि रेरा के तहत पंजीकरण न कराने पर वे बिल्डरों को कर्ज नहीं देंगे। बैंकों के इस फैसले से बिल्डर रेरा के तहत परियोजनाओं को पंजीकृत कराने के लिये मजबूर हो जाएंगे, जिससे उनके लिए धोखाधड़ी करना आसान नहीं होगा।

परियोजना में देरी करने पर बिल्डर पर परियोजना की अनुमानित राशि से दस प्रतिशत अधिक जुर्माना लगाया जा सकता है। पंजीकृत परियोजनाओं के बिल्डरों के खिलाफ शिकायत करने का भी प्रावधान इस कानून में है। रेरा के तहत बिल्डर को अपने पांच साल के रिकॉर्ड को भी दर्ज कराना होगा, जिससे ग्राहक सही बिल्डर का चयन कर सकेंगे। रेरा से बिल्डरों को भी फायदा होगा। परियोजना के रेरा में पंजीकृत होने से बिल्डर की ब्रांड इमेज बनेगी और उन्हें बैंकों से कर्ज लेने में आसानी होगी। ग्राहक पंजीकृत बिल्डर के पास बिना हिचक मकान या फ्लैट लेने के लिए जा सकेंगे। रेरा में बिल्डरों की पूरी जानकारी होने से बैंकों को भी उन्हें कर्ज देने में आसानी होगी।

 

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