May 26, 2017

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शिक्षा संस्थानों को संभालें

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का सीधा संबंध स्कूल-शिक्षा में बच्चों को दिए गए व्यक्तित्व- विकास के परिमाण पर निर्भर करता है।

Author May 9, 2017 05:01 am
इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी चुनौती हर व्यक्ति को वह शिक्षा देना है जो उसे सम्मानपूर्ण जीवन जीने के लिए तैयार करे। (Express Photo)

जगमोहन सिंह राजपूत

प्रगति और विकास, ये दो शब्द पिछले पांच-छह दशकों में जितने प्रयोग में आए हैं उतने पहले कभी नहीं आए होंगे। विकास और प्रगति के मार्ग पर कौन देश कितना आगे या पीछे है, इसके लिए अनेक प्रकार के सूचकांक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित हैं और समय-समय पर संचार माध्यमों में इनकी चर्चा होती रहती है। सामान्य व्यक्ति का अपना नजरिया बहुधा इससे परे होता है। उसका आकलन अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के आसपास केंद्रित होता है। एक किसान के लिए महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि उसे वर्षों से बकाया गन्ना राशि कब मिलेगी, या सूखा राहत कहां बंटी, क्यों किसी को नहीं मिली, कौन ले गया! उसके लिए सेंसेक्स का उतार-चढ़ाव कोई अर्थ नहीं रखता है। भारत के अधिकतर लोगों के लिए प्रगति का अर्थ है भुखमरी, कुपोषण, बीमारी और असुरक्षा से राहत। उन्हें छत चाहिए, पीने का शुद्ध पानी चाहिए, प्रदूषित हवा से राहत चाहिए। ऐसी अनेक अन्य आवश्यकताएं भी इस सूची में जोड़ी जा सकती हैं। इनके निराकरण के लिए सामान्य रूप से सरकारों से अपेक्षा की जाती है। प्राथमिकताएं तो स्थान तथा परिस्थितियों के अनुसार बदल भी सकती हैं मगर इन सबके समाधान के मूल में है अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा की सर्व-सुलभ उपलभ्यता का प्रावधान।

किसी भी सभ्य समाज के सामने इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी चुनौती हर व्यक्ति को वह शिक्षा देना है जो उसे सम्मानपूर्ण जीवन जीने के लिए तैयार करे। साथ ही वह उन मानवीय मूल्यों को अंतर्निहित करने में सहायक हो जो जीवन जीने का संतोष और परिपूर्णता प्रदान कर सके। विकास और प्रगति के मार्ग पर सफलता इस तथ्य पर निर्भर करती है कि देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और प्रजातांत्रिक संस्थाएं किस प्रकार से और किस गुणवत्ता के साथ अपना कार्य कर रही हैं। इन सभी संस्थाओं की गुणवत्ता का आधार भी शिक्षा प्रणाली की अनुकूलता, सार्थकता और गतिशीलता पर ही निर्भर करता है। वह शिक्षा जो समय के साथ अपने को परिवर्तित करती है और व्यक्ति के प्रारंभिक वर्षों में ही नहीं, जीवन-पर्यंत उसे अपने कर्तव्य का बोध कराती रहती है। आज जीवन-पर्यंत शिक्षा की आवश्यकता सर्व-स्वीकार्य है। इसका मुख्य कारण यह है कि विश्व में हर प्रकार की जटिलताएं बढ़ रही हैं। परिवर्तन की गति की तेजी से सभी अचंभित हैं; वे भी जो उसके लिए जिम्मेदार हैं और उसे और अधिक गतिशील बनाने में कार्य कर रहे हैं।

यह सभी देशों को स्पष्ट है कि उनकी संस्थाएं विशेषकर उच्च शिक्षा संस्थान जब तक नई सोच, नए विचार और नवाचार तथा शोध को प्रोत्साहित नहीं करेंगे तब तक वे प्रगति की राह पर तेजी से आगे नहीं बढ़ पाएंगे। ज्ञान और विज्ञान को कभी राष्ट्र की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता, मगर प्रत्येक राष्ट्र को अपनी ज्ञानार्जन परंपराओं का गहन अध्ययन कर उनकी समकालीन संदर्भिता तथा भविष्य की संभावित उपयोगिता को विश्लेषित करना अति आवश्यक है। नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला जैसे संस्थानों की श्रेष्ठ ज्ञान परंपरा की निरंतरता बनाए रखने के उत्तरदायी इस देश में इस समय उच्च शिक्षा संस्थानों, विशेषकर विश्वविद्यालयों की स्थिति चिंताजनक ही कही जा सकती है।अनेक राज्य सरकारों द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालयों की चर्चा सबसे पहले उभरती है क्योंकि ये प्रारंभ से ही अनेक कमियों से ग्रसित हो जाते हैं। कोई भी नया विश्वविद्यालय तभी कार्य कर सकता है जब उसे उच्चतम श्रेणी का नेतृत्व मिले और इस नेतृत्व को किसी भी प्रकार से संसाधनों की कमी से चिंतित न होना पड़े। सभी जानते हैं कि राज्य सरकारें अनेक बार राजनीतिक कारणों से नए विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा कर देती हैं। उसके बाद वहां पर नियुक्तियों के लिए कुलपति को सचिवालय के खूब चक्कर लगाने पड़ते हैं। नौकरशाहों से अनुमति लेनी पड़ती है जो आसानी से मिलती नहीं है। विश्वविद्यालय में शोध, नवाचार और अन्वेषण तभी संभव है जब वहां पर कार्य करने वाले विद्वानों और प्राध्यापकों तथा शोधकर्ताओं को पूरी तरह से स्वायत्तता मिले, छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए उन्हें अन्य लोगों के पास जाना न पड़े। ऐसा न होने पर उनका मनोबल गिरता है और कार्यक्षमता प्रभावित होती है। लगभग दो दशक पहले विश्वविद्यालयों में प्रोन्नति के लिए जो मापदंड बनाए गए वे गुणवत्ता को ऊंचा उठाने के स्थान के बजाय बड़े पैमाने पर स्तरहीनता लाने के कारक बने।

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का सीधा संबंध स्कूल-शिक्षा में बच्चों को दिए गए व्यक्तित्व- विकास के परिमाण पर निर्भर करता है। वहीं से जीवन और कार्य-संस्कृति के प्रति अभिरुचि स्वरूप लेती है, मानवीयता के अवयवों की समझ की जड़ें प्रस्फुटित होती हैं और कुछ कर गुजरने का माद््दा ठोस रूप लेता है। यह सबकुछ कमजोर पड़ जाता है जब लगभग साठ-पैंसठ प्रतिशत स्कूल हर प्रकार की कमियों से ग्रसित हों! अधिकतर सरकारी स्कूल आज भी लगभग दयनीय स्थिति में कार्य करते हैं। वहां पर अधिकतर स्वीकृत पदों पर पूर्ण रूप से प्रशिक्षित नियमित अध्यापक नियुक्त नहीं किए जाते हैं। और ऐसा केवल आर्थिक दृष्टिकोण को ध्यान में रख कर नौकरशाही के सुझाव पर किया जाता रहा है। पिछले कई दशकों में इसके कारण सरकारी स्कूलों की साख समाप्त हो गई है। नियुक्तियों में यही व्यवस्था विश्वविद्यालयों में भी अपनाई जा रही है। यदि स्कूलों में दस लाख तथा विश्वविद्यालयों में चालीस प्रतिशत से अधिक प्राध्यापक के पद खाली हों तब वहां किस प्रकार की गुणवत्ता की उम्मीद की जा सकती है? राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पद ग्रहण करने के बाद हुई केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की पहली बैठक में इस पर चिंता प्रकट की गई थी, यानी यह मुद््दा सर्वोच्च स्तर पर उठाया गया था। राष्ट्रपति महोदय ने सभी कुलपतियों से अपेक्षा की थी कि वे सभी अकादमिक पद अगले छह महीने में भर लें! स्थिति में अब भी अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में स्थिति सही न हो, तो राज्य सरकारें भी अपने कर्तव्य-पालन में पूरी तरह शिथिल हो जाती हैं।

शिक्षा में गुणवत्ता की कमी के साथ-साथ, यह भी गौरतलब है कि शिक्षा क्षेत्र में तेजी से हुआ निजीकरण मुख्य रूप से शिक्षा के व्यापारीकरण के रूप में सामने आया है। पिछले दिनों देश के अनेक भागों में निजी स्कूलों द्वारा लगातार बढ़ाई जा रही फीस को लेकर जबर्दस्त आक्रोश फूटा है। कई दशकों से ये सभी नियमों और उप-नियमों का उल्लंघन करते रहे हैं। निजी स्कूल ऐसा खुलेआम करते हैं क्योंकि उन्हें नेताओं तथा नौकरशाहों का संरक्षण मिला होता है, उनके खुद के बच्चे भी इन्हीं स्कूलों में पढ़ते हैं। बड़ी संख्या में इन स्कूलों के मालिक या इन्हें संरक्षण देने वाले राजनीतिक ही होते हैं। भारत की सर्वग्राही संस्कृति तथा आध्यात्मिकता में उसकी समझ की श्रेष्ठता को स्वीकार करने वाले हर जगह मिलेंगे। चुनौती इस समय यह है कि बड़े पैमाने पर शिक्षा संस्थाएं अपने राष्ट्रीय तथा वैश्विक कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर रही हैं, या यों कहें कि नहीं कर पा रही हैं। यदि हमारे पढ़े-लिखे युवा मानवीय मूल्यों से, अपने कर्तव्यों से परिचित नहीं होंगे, उन्हें आत्मसात नहीं कर चुके होंगे, तो हमारे गरिमामय इतिहास का अन्य के लिए क्या महत्त्व रह जाएगा? आवश्यकता शिक्षा संस्थानों के महत्त्व को समझ कर वहां स्वच्छ तथा पारदर्शी कार्य संस्कृति स्थापित करने की है। तभी यह संभव होगा कि बच्चे और युवा अपने लिए अनुकरणीय आदर्श वहां पा सकें। नए संस्थान स्थापित करना भी आवश्यक है। अंतत: प्रगति और विकास का मूल तो सक्षम शिक्षा संस्थान ही होते रहेंगे।

 

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First Published on May 9, 2017 5:01 am

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