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वैकल्पिक राजनीति का सवाल

अनुराग मोदी आम आदमी पार्टी (आप) भी लगता है, स्थापित पार्टियों की राह पर चल कर उसी तरह अरविंद केजरीवाल की पार्टी बन गई है, जैसे तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी की; एआइआइडीएमके जयललिता की; समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह यादव की; राष्ट्रीय जनता दल लालू प्रसाद यादव की और बसपा मायावती की पार्टी बन कर रह […]
Author April 9, 2015 13:48 pm

अनुराग मोदी

आम आदमी पार्टी (आप) भी लगता है, स्थापित पार्टियों की राह पर चल कर उसी तरह अरविंद केजरीवाल की पार्टी बन गई है, जैसे तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी की; एआइआइडीएमके जयललिता की; समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह यादव की; राष्ट्रीय जनता दल लालू प्रसाद यादव की और बसपा मायावती की पार्टी बन कर रह गर्इं! हालांकि राजनीति में समाज के दबे हुए तबके की भागीदारी के लिहाज से इन पार्टियों का उभार एक महत्त्वपूर्ण संकेत था। मायावती जैसी एक दलित महिला का उत्तर प्रदेश जैसे सामंतवादी राज्य का मुख्यमंत्री बनना किसी क्रांति से कम नहीं था!

आम आदमी पार्टी का विवाद तब तक मीडिया में बहस का केंद्र बना रहेगा, जब तक देश की जनता को एक बार फिर यह यकीन नहीं हो जाता कि राजनीति में स्थापित पार्टियों के तौर-तरीके ही सही हैं! 1977 में जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद जो हुआ, वही सब अब होगा!

लेकिन फिलहाल उन सैकड़ों कार्यकर्ताओं की, जो अपना करिअर छोड़ कर दो-तीन दशक से वैकल्पिक राजनीति के रास्ते तलाशने में खप रहे हैं, चिंता यह नहीं है कि ‘आप’ के विवाद में कौन सही है: अरविंद केजरीवाल या फिर उन पर आरोप लगाने वाले नेता? बल्कि चिंता यह है कि चाहे जो हो, ‘वैकल्पिक राजनीति’ बदनाम न हो- इसे किसी तरह दही के जामन की तरह बचा कर रखा जाए! हमें देखना यह है कि इन सब प्रयोगों से कोई ‘वैकल्पिक राजनीति’ क्यों नहीं निकली? और ‘वैकल्पिक राजनीति’ के मापदंड क्या होंगे?

ऐसे में दो लोग बरबस याद आ रहे हैं- एक, लोहिया के सहयोगी और 1962 में सांसद रहे किशन पटनायक, जिन्होंने आजादी के बाद सबसे पहले वैकल्पिक राजनीति की परिकल्पना को सामने रखा! उन्होंने साठ के दशक की समाजवादी और मार्क्सवादी पार्टियों को नजदीक से देखा था; वे बिहार आंदोलन में भी सक्रिय थे। मगर इसके बावजूद उन्होंने 1977 के जनता पार्टी के प्रयोग में जाने से इंकार कर दिया। दूसरे, जेएनयू से एक मेधावी छात्र के रूप में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बावजूद इस वैकल्पिक राजनीति के लिए अपना करिअर छोड़ कर गांव में रहने वाले चिंतक और कार्यकर्ता सुनील, जिन्हें लोग सुनील भाई के नाम से जानते हैं।

हालांकि ‘आप’ में जो हुआ, उसे होना ही था; इंतजार सिर्फ यह था कि वह कब होगा? क्योंकि ‘आप’ के निर्माण में ही खामी थी। जब अण्णा आंदोलन से ‘आप’ बनी और योगेंद्र यादव ने दिवगंत समाजवादी कार्यकर्ता और ‘वैकल्पिक राजनीति’ के चिंतक सुनील को ‘आप’ से जुड़ कर उसकी नीति निर्धारण के लिए बात की, तो उन्होंने कहा कि पार्टी बना कर, फिर उसे राजनीतिक धारा देने वाला सोच नहीं चलेगा; पहले नीति बनाओ, फिर पार्टी। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ, स्थापना के साथ ही ‘आप’ ने वैचारिक फैलाव की बात छोड़ कर, अरविंद केजरीवाल को भ्रष्टाचार मिटाने वाला मसीहा बना कर, जीत हासिल करना ही पार्टी का मुख्य लक्ष्य बनाया। इसलिए, जब दो बार लगातार जीत मिल गई तो स्वाभाविक तौर पर ‘आप’ अरविंद केजरीवाल की पार्टी बन गई। और अब पार्टी में नीति निर्धारिण और लोकतंत्र की बातें करना, घोड़े के आगे गाड़ी रखने जैसा लग रहा है!

योगेंद्र यादव तो शुरू में ‘आप’ के नीतिनिर्धारक थे और उन्होंने ही ग्राह्यता और दृश्यता को विचारों से ऊपर तरजीहत दी और यहां तक कहा कि ‘आप’ सिद्धांतवादी नहीं, व्यवहारवादी राजनीतिक दृष्टिकोण में विश्वास रखने वाली पार्टी है। इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख के जरिए उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि उनके राजनीतिक गुरु किशन पटनायक के समाजवादी जन परिषद के प्रयोग में सिद्धांत तो थे, लेकिन वह ग्राह्यता और दृश्यता नहीं, जो ‘आप’ में है!

वे यह जानते थे कि विचारों के बजाय महानायक को जनता तक ले जाना आसान होता है! जिस तरह भ्रष्ट्राचार के खिलाफ आंदोलन में अण्णा को आधुनिक गांधी बता कर सफलता अर्जित की गई, ‘आप’ के लिए भी उसी राह पर चलने में सफलता आसान थी। खासकर तब, जब अरब क्रांति के बाद भारतीय मीडिया भी नई राजनीति के लिए एक अदद महानायक की तलाश में था। और वाकई वही हुआ!

वैकल्पिक राजनीति का झगड़ा आजादी के समय से चल रहा है। गांधी जानते थे कि अंगरेजों के बजाय हमारे हाथ में सत्ता आने से ‘असली आजादी’ नहीं आएगी, क्योंकि असली गुलामी हमारे सोच में है! उन्होंने 1909 में लिखी ‘हिंद स्वराज्य’ में कहा था: ‘हम अंग्रेजों को भगाना तो चाहते हैं, लेकिन उनकी व्यवस्था रखना चाहते हैं; यह उसी तरह हुआ जैसे शेर को भगा कर उसका स्वभाव रखना!’ इसलिए आजादी के आंदोलन के दौरान उन्होंने सिर्फ अंगरेजों के शासन की मुखालफत नहीं की, बल्कि अंगरेजों से जुदा विकास और शासन संचालन की दिशा में लगातार प्रयास किए।

मगर विकास के पश्चिमी मॉडल को नकार कर विकास के वैकल्पिक सोच के प्रयोग को अपनाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति कांग्रेस में नहीं थी; गांधीजी को इस बात का अहसास पहले ही हो गया था। इसलिए उन्होंने इस बारे में 5 अक्तूबर, 1945 को जवाहरलाल नेहरू को एक लंबा पत्र लिखा था। पर नेहरू ने एक-दो मेल-मिलाप के बाद इस बहस को आगे नहीं बढ़ने दिया।

किशन पटनायक ने गांधी के इस सोच को वैकल्पिक राजनीति में रखने की कोशिश की। वे मानते थे कि भारत जैसे देश में, जहां जाति, धर्म, लिंग और वर्ग भेद की जड़ें इतनी गहरी हैं, वहां लोकतंत्र की सबसे बड़ी और पहली चुनौती है कि इन सभी वर्गों को बराबरी का दर्जा हासिल हो। क्योंकि, किसी भी गैर-बराबरी वाले समाज में लोकतंत्र नहीं पनप सकता! और इसके लिए जरूरी था कि देश भर में जनांदोलनों की प्रक्रिया के जरिए दबे हुए तबकों को ताकत और बराबरी हासिल हो, और तब पार्टी बने।

उन्होंने भी वैसा ही किया। खुद 1980 में समता संगठन बना कर पंद्रह साल तक काम किया; देश भर में लोगों को जोड़ा और फिर अन्य जनसंगठनों के साथ मिल 1995 में समाजवादी जन परिषद (सजप) की स्थापना की। सजप ने राजनीति में दार्शनिक दृष्टिकोण और विचारधारा पर आधारित राज्य संचालन की वैकल्पिक प्रशासनिक, आर्थिक, सामाजिक और विकास नीति को अपना मुख्य आधार बनाया। यह सही है कि गांधी के प्रयोगों की तरह इस प्रयोग को भी सिद्धांतवादी बता कर उन जनसंगठनों द्वारा नकारा जाता रहा है- जो दूसरे विचारों से आज भी सहमत हैं।

वहीं योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने अपनी छवि और आम आदमी पार्टी की चुनावी सफलता के दम पर जनसंगठनों के बड़े-बड़े नेताओं को ‘आप’ से जोड़ा। इसमें प्रमुख नाम मेधा पाटकर का रहा है- जो 1990 के दशक में केजरीवाल से ज्यादा लोकप्रिय थीं और देश में ‘वैकल्पिक विकास’ का प्रतीक बन गई थीं। लेकिन यह सफलता वाली चुनावी राजनीति की विडंबना ही कही जाएगी कि नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे अनेक जनसंगठन और उसके प्रमुख नेता, जो पिछले तीन दशक से ‘वैकल्पिक विकास’ की पुरजोर लड़ाई लड़ रहे थे, उन्होंने भी चुनावी राजनीति में कूदने के लिए अपने मुद्दों का त्याग किया! फिर लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद जब सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने का निर्णय किया गया, तो नर्मदा बचाओ आंदोलन और मेधा पाटकर अकेली ही लड़ती नजर आर्इं, इस लड़ाई में उनकी अपनी राजनीतिक पार्टी ‘आप’ उनके साथ नहीं थी!

लंबे इंतजार के बाद ‘अराजनीतिक जनसंगठनों’ में मुद्दों के लिए अपनी जिंदगी खपाने वाले कार्यकर्ताओं ने ‘आप’ के बैनर तले चुनावी राजनीति की पारी की शुरुआत करते समय अपने ‘वैकल्पिक विकास’ और वैश्वीकरण के विरोध के मुद्दे को त्याग कर एक गलत संदेश दिया कि जनसंगठनों के ये मुद्दे व्यावहारिक नहीं हैं।

आज भी देश में हजारों कार्यकर्ता हैं, जो 1980 से 2000 के बीच अपना करिअर छोड़ कर, पिछले दो-तीन दशकों से, गुमनामी में गांवों में रह कर, लोगों के साथ मिल कर जनसंगठन बना कर, बुनियादी बदलाव की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने लाखों ग्रामीण कार्यकर्ताओं को जोड़ा है, जो जेल और जमींदार से डरे बिना इस काम में लगे हैं। उन्हें यह समझना होगा कि किसी भी प्रयोग में पहले सिद्धांत स्थापित किए जाते हैं, उसी में एक पीढ़ी खप जाती है। फिर अगली पीढ़ी का कर्तव्य होता है कि वह उसे लागू करे। आजादी के बाद, नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने गांधीजी के प्रयोगों को अव्यावहारिक बता कर नकार दिया! लेकिन, इससे गांधी के प्रयोग गलत नहीं ठहराए जा सकते।

और आज जब चारों तरफ स्मार्ट सिटी और विकास का शोर मच रहा है, तब आंकड़े इस बात का खुलासा कर रहे हैं कि यह एक मृगमरीचिका से ज्यादा कुछ नहीं। बल्कि आज वैकल्पिक राजनीति की जरूरत और ज्यादा है।
जिस देश के प्रधानमंत्री- लालबहादुर शास्त्री- ने कभी जय जवान जय किसान का नारा दिया था; उस देश में जवानों की मौत पर तो खूब हल्ला मचाया जाता है, लेकिन जहां पिछले दस सालों (2001-11) में दो लाख सत्तर हजार नौ सौ चालीस किसान आत्महत्या करने को मजबूर हुए, उस पर संसद से लेकर मीडिया तक सब चुप हैं।

और आजादी के बाद गांधी को नकार कर विकास की जो रूपरेखा अपनाई गई, उसने हमें कहां पहुंचा दिया है, यह छिपा नहीं है। देश के दस प्रतिशत लोगों के हाथों में नब्बे प्रतिशत लोगों की कमाई है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार आजादी के सड़सठ सालों बाद भी: देश की आधी आबादी लगभग अनपढ़ है और 7.3 प्रतिशत लोग ही स्नातक की डिग्री हासिल कर पाए हैं। जहां 2.89 करोड़ लोग संगठित रोजगार में लगे हैं, वहीं 3.99 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। यानी विकास का यह मॉडल जितने लोगों को रोजगार देता है, उससे डेढ़ गुना लोगों को बेरोजगार रखता है। वहीं ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी की रिपोर्ट के अनुसार: 1948 से लेकर 2008 तक के साठ सालों में भारत से अट्ठाईस हजार सात सौ छत्तीस अरब करोड़ रुपए का काला धन विदेशों में गया। देश का पचहत्तर प्रतिशत काला धन विदेश जाता है। 2002 से 2011 के मुक्त व्यापार के दौर ने जैसे इसे पंख लगा दिए। इन दस सालों में कुल इक्कीस लाख बयालीस हजार तीन सौ बावन करोड़ रुपए काले धन के रूप में विदेश गए।

इसलिए बहस ‘आप’ के भविष्य पर नहीं, बल्कि इस बात पर होनी चाहिए कि वैकल्पिक विकास और शासन वाली ‘वैकल्पिक राजनीति’ कब शुरू होगी, जो हालात में आमूलचूल परिवर्तन ला सके। और क्या देश के जनसंगठन इसके लिए तैयार हैं?

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