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बेबाक बोल- हम सब

जब हमसे कुछ ही दूर के राज्य में पत्रकार के शरीर पर गोलियां बरसा दी जाती हैं तो फिर लगता है कि थोड़ा हम भी मरे और थोड़ा हम भी जिंदा हुए।
पत्रकार गौरी लंकेश की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। (तस्वीर- फेसबुक)

मेरी दोस्त, कविता बहुत ही निसत्व हो गई है/जबकि हथियारों के नाखून बुरी तरह बढ़ आए हैं/और अब हर तरह की कविता से पहले/हथियारों के खिलाफ युद्ध करना जरूरी हो गया है/युद्ध में/हर चीज को बहुत आसानी से समझ लिया जाता है/अपना या दुश्मन का नाम लिखने की तरह…विचारों के बरक्स उठे हथियारों के आगे पाश ही याद आते हैं। आज जब आप सत्ता और बाजार के फैलाए झूठ की मुर्दनी से निकल जिंदा होने की कोशिश करते दिखेंगे तो मारे जाएंगे। जो यह बताने की कोशिश करेंगे कि हम जिंदा हैं वे ही मारे जाएंगे। हमारी सभ्यता तो उस तर्कवादी की भी गुनहगार है जिसने सबसे पहले साबित किया था कि सूरज नहीं धरती घूमती है। और, आज भी अंधविश्वास के खिलाफ खड़े होनेवाले दाभोलकर तो राजनीति और समाज के अंधियारे के खिलाफ अपने तरीके से लड़ने वाली गौरी लंकेश को गोलियों से भून दिया जाता है। प्रतिपक्ष में खड़े विचारों और कलम के कातिलों के खिलाफ इस बार का बेबाक बोल।

कानपुर में दैनिक जागरण पत्र समूह के मीडिया संस्थान में जब पत्रकारिता के बच्चों से कह रहा था कि आज सोशल मीडिया से झूठ की परतें अलग करके सच निकालना हम पत्रकारों के लिए बड़ी जंग है तो यह सोचा भी नहीं था कि उसी वक्त वहां से सैकड़ों किलोमीटर दूर बंगलुरु में मेरी हमपेशा भी ऐसा ही कुछ लिख रही थीं। फेक न्यूज पर काम करने वालीं योद्धा गौरी लंकेश ने ट्वीट किया था, ‘हम लोग कुछ फर्जी पोस्ट शेयर करने की गलती करते हैं। आइए एक-दूसरे को चेताएं और एक-दूसरे को एक्सपोज करने की कोशिश न करें’।

सीरिया से लेकर इराक और बांग्लादेश तक हमपेशा की हत्याओं की खबरें परेशान करती रही हैं। लेकिन जब हमसे कुछ ही दूर के राज्य में पत्रकार के शरीर पर गोलियां बरसा दी जाती हैं तो फिर लगता है कि थोड़ा हम भी मरे और थोड़ा हम भी जिंदा हुए। वो तो तड़प कर सांस तोड़ कर चली गई और हम कार्य-कारण संबंध में उस अमरत्व तक तड़पेंगे जब तक कि हमारे जेहन में गौरी लंकेश का नाम रहेगा।नरेंद्र दाभोलकर, डॉक्टर एमएम कलबुर्गी, गोविंद पानसरे और अब गौरी लंकेश। यकीनन ये हत्याएं एक खास विचारधारा को लेकर हुई हैं। कलम का कत्ल करनेवाले हत्यारे रात के अंधेरे में आते हैं, पुलिस दस्तावेज में उनकी पहचान अज्ञात की होती है। और ये हत्याएं एक खास क्षेत्र में एक खास वैचारिक समीकरण के तहत हो रही हैं। दाभोलकर से लेकर कलबुर्गी और पानसरे क्या लिख रहे थे और उनसे कौन डर रहा था। कौन उन्हें नापसंद कर रहा था। अंधश्रद्धा के खिलाफ दाभोलकर के आंदोलन का असर था कि महाराष्टÑ में जादू-टोना विरोधी कानून का मसविदा लागू हो गया था। इसी तरह कलबुर्गी और पानसरे भी विवेक और तर्क की बातें करते हुए सामंती व्यवस्था को चुनौती दे रहे थे और प्रतिक्रियावादी शक्तियां इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही थीं।

और, इन नामों में सबसे अहम यह है कि मारे गए ये सारे लोग क्षेत्रीय भाषा में लिख रहे थे। क्षेत्रीय भाषा में लिखने के कारण इन बुद्धिजीवियों का आम जनता से सीधा संबंध बनता था। ये दिल्ली के वातानुकूलित सभागारों में बोलने वाले अंग्रेजीदां बुद्धिजीवी नहीं थे। इनकी बातें खेतिहर मजदूरों, कामगारों, आम विद्यार्थियों और गृहणियों तक पहुंचती थीं। जमीनी भाषा में लिखने वाले ये लोग जमीन से जुड़े लोगों को तर्कवादी बनाकर वैज्ञानिक चेतना से लैस कर रहे थे। सत्ता से सवाल उठाना सिखा रहे थे। अंधश्रद्धा, जादू-टोने और चमत्कारों से निकाल कर सच का सामना करवा रहे थे।सुकरात से लेकर आज तक का पूरा वैश्विक इतिहास तर्कवादियों के खून से रंगा है। हमारे हाथों पर तो गांधी के खून के भी छीटें हैं। तो इन हत्याओं का संकेत क्या है? टीवी पर लंकेश की हत्या की खबर देखते ही मेरे एक मित्र की बेटी उन्हें फोन कर कहती है कि पापा, आप इतना तीखा मत लिखा करो, और सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करना बंद करो। कलबुर्गी से लेकर लंकेश तक की हत्याओं का मकसद यही तो है – खौफ पैदा करना।

लेकिन, इतिहास गवाह है कि यह दांव उलटा पड़ता है। शार्ली एब्दो पर हमला होने के बाद फ्रांस के साथ पूरी दुनिया के तरक्कीपसंद लोग चिल्ला उठते हैं, ‘हम सब शार्ली’। हत्या के बाद कलबुर्गी के विचार एक खास भाषा, राज्य और तबके से निकल कर पूरे देश में फैल जाते हैं। पनसारे और दाभोलकर हमारे समय के नायक बन जाते हैं। और, इस बीते मंगलवार की शाम के पहले बौद्धिक, राजनीतिक और खास क्षेत्रीय लोगों को छोड़ कर गौरी लंकेश एक चुनिंदा पाठक वर्ग तक सीमित थीं। आज देश का बच्चा-बच्चा उन्हें जान रहा है। पत्रकारिता के विद्यार्थियों के बीच वे बहस का सबब हैं। उनके ट्वीट, उनके लेख पूरा देश पढ़ रहा है। एक पूर्व पति का अपनी तर्कवादी पहली प्रेमिका की मौत को सलाम वाला प्रेम पत्र सोशल मीडिया पर करण जौहर और इम्तियाज अली वाले इश्क पर भारी पड़ रहा है।

बलात्कारी बाबा पर फैसला आने के बाद बाजार की भाषा में छोटे अखबार लेकिन इंसानियत की भाषा में बड़े हौसले वाले पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की शहादत मरती हुई पत्रकारिता को जिंदा कर गई थी। लगा कि पत्रकारिता के अंधेरे पर कोलाहल करने वालों के बीच उजाले का एक उल्का पिंड सा गिरा। छत्रपति ने ‘पूरा सच’ लिखने के बाद सरेआम एलान किया था कि उनकी जान को खतरा है। वह पत्रकार मरने से नहीं डरा तो आज पत्रकारिता जिंदा रह गई।
और, अभी सोशल मीडिया पर लोगों की प्रोफाइल तस्वीर में रामचंद्र छत्रपति ही दिख रहे थे तभी गौरी लंकेश पर गोलियां चला दी जाती हैं। गौरी लंकेश की पहचान एक पत्रकार की थी और वे एक खास विचारधारा की शक्तियों पर तीखा हमला कर रही थीं। राजनैतिक विचारधारा के कारण पत्रकार की हत्या खौफनाक है। आखिर, हत्यारे किस बात से इतने परेशान हो रहे हैं कि हत्या करने पर उतारू हैं। पत्रकारिता पर सत्ता का हावी होना कोई नई बात नहीं है। सत्ता से लेकर बाजार तक पत्रकारों को अपने कब्जे में लेने की कोशिश करता रहा है और कामयाब भी होता रहा है। लेकिन अब तक पत्रकारों को अपने हित में व्यस्त करने या अपने हिसाब से मोड़ने का ही काम होता था। संघर्ष क्षेत्र से लेकर भ्रष्टाचार तक के खेल में पत्रकार मारे जाते रहे हैं। लेकिन राजनीतिक विचाराधारा की लड़ाई में पत्रकार का खून बहने का यह मामला आखिर हो, हमारी जंग यही है।

हत्या की यह संस्कृति मध्यकालीन सामंती तरीका है। यह सबसे घटिया और वीभत्स संस्कृति है। और हम देख रहे हैं कि पहले के हत्या के आरोपी एक-एक कर छूटते चले जा रहे हैं। गौरी लंकेश के मामले में सबसे भयावह पक्ष भी सोशल मीडिया पर दिखा। हत्या की निंदा करने में भी वैचारिक विभाजन। जो लोग लंकेश की हत्या को इसलिए जायज ठहरा रहे हैं कि उनकी कन्हैया और उमर खालिद के साथ तस्वीर है, ये वही लोग हैं जो मोहम्मद अखलाक की हत्या को यह कहकर जायज ठहरा रहे थे कि उसके फ्रिज में गोमांस रखा हुआ था। ये उन हत्यारों के समर्थक हैं जो लोगों को इसलिए मारते हैं कि तुमने मेरे खिलाफ क्यों बोला, ऐसे कपड़े क्यों पहने या इससे शादी क्यों की। आज इस हत्या के खिलाफ खड़े नहीं होते हैं तो कल हम सबको इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि कोई हमें कभी भी गोलियों से भून सकता है, बम से उड़ा सकता है क्योंकि हमारा लिखा, बोला, देखा उसे पसंद नहीं आया।

अपने बेसाख होते पेशे पर उठ रहे सवालों के जवाब देने के लिए सिर उठाता हूं तो जवाब मेरे हमपेशा की शहादत में है। इन दिनों कुछ खास चैनलों को देख कर हम हाय-हाय करते हैं कि पत्रकारिता मर गई। तो रामचंद्र छत्रपति और गौरी लंकेश की मौत के साथ ही पूरी पत्रकारिता को ही जी उठा क्यों न मान लिया जाए। हम क्यों खास चैनल या अखबार समूहों को ही पत्रकारिता का पर्याय मान बैठते हैं। छत्रपति का ‘पूरा सच’ या ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ के पन्नों को हम इनके खून से भीगने के बाद ही क्यों देख पाते हैं। यह सच है कि पत्रकारिता में न्यूनतम वालों ने ही अधिकतम दिया है। आज पत्रकारिता में जिस तरह संसाधनों की बाढ़ आ रही है वैसे-वैसे सच भी दूर होता जा रहा है। आज मुख्यधारा की पत्रकारिता सोशल मीडिया से संचालित हो रही है। तकनीक और तस्वीर का याराना जमीनी सच को डस रहा है। वायरल शब्द मुझे भयभीत करता है। इस शब्द का अर्थ महामारी या जंगल की आग की तरह लेता हूं। इस वायरल की महामारी में सच मारा जाता है, जिम्मेदारी मारी जाती है, ज्ञान मारा जाता है, विवेक मारा जाता है और मारी जाती है वैज्ञानिक चेतना।

गौरी की हत्या बताती है कि ‘फेक न्यूज’ के कारखाने के औजार कितने धारदार हैं। वे जनता को सच की जमीन पर खड़े ही नहीं होने देना चाहते। गौरी लंकेश अपने आखिरी ट्वीट में लिखती हैं, ‘मुझे ऐसा क्यों लगता है कि हममें से कुछ लोग अपने आपसे ही लड़ाई लड़ रहे हैं। हम अपने सबसे बड़े दुश्मन को जानते हैं। क्या हम सब प्लीज इस पर ध्यान लगा सकते हैं’। गौरी ने हम सबको दुश्मन की पहचान करवा दी है तो देर किस बात की। शार्ली एब्दो की तरह हम सब खुद को गौरी लंकेश सा क्यों न समझें। हमपेशा की शहादत हुई है, जंग की मशाल हम सबके हाथ में है। यह हत्या न पहली है और न आखिरी होगी। लेकिन झूठ की परतों से सच को उघारने की जंग जारी रखेंगे…हम सब।

 

 

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