April 28, 2017

ताज़ा खबर

 

राजस्व बनाम लोक हित

भारत में सामाजिक आंदोलनों का इतिहास और इनके माध्यम से स्वतंत्रता, समानता, न्याय, अस्मिता व सुरक्षा प्राप्त करने के लिए किया जाने वाला संघर्ष नया नहीं है।

Author April 12, 2017 05:24 am
शराब।

आशीष कुमार शुक्ला

भारत में सामाजिक आंदोलनों का इतिहास और इनके माध्यम से स्वतंत्रता, समानता, न्याय, अस्मिता व सुरक्षा प्राप्त करने के लिए किया जाने वाला संघर्ष नया नहीं है। ये संघर्ष कहीं एक वर्ग-विशेष के अधिकारों से संबंधित रहे तो कहीं संपूर्ण समाज की कुरीतियों को दूर करने से संबंधित, पर इनका अंतिम ध्येय समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन लाना ही रहा। इसी कड़ी में हम वर्तमान में उत्तर प्रदेश में चल रहे शराब-विरोधी आंदोलन को भी देख रहे हैं जिसमें समाज में सुधार का बीड़ा महिलाओं ने अपने कंधों पर लिया है। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब महिलाओं ने इस प्रकार का कोई कदम उठाया है। भारत के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जहां समाज में सुधार की सकारात्मक पहल महिलाओं ने की है। फिर, शराब विरोधी कार्यक्रमों में तो उनकी हमेशा से दिलचस्पी रही है। स्वाधीनता संग्राम के दिनों में, जब शराब की दुकानों और ठेकों को बंद कराने के लिए धरने दिए जाते थे तो उनमें महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक होती थी।

दरअसल, शराबखोरी का घरेलू बजट और घर-परिवार की सुख-शांति पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि महिलाएं शराब-विरोधी किसी भी मुहिम को अपना उत्साहपूर्ण समर्थन दें और ऐसी मुहिम में शामिल भी हों। उनके इस रुख का असर राजनीति पर भी देखा जा सकता है। नीतीश कुमार को बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में महिलाओं का भरपूर समर्थन मिला, तो इसका प्रमुख कारण राज्य में उनकी सरकार का शराबबंदी का फैसला ही था। पिछले कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश में शराब की दुकानों के विरुद्ध महिलाओं ने व्यापक स्तर पर आंदोलन चलाया है। सहारनपुर से शुरू हुआ यह आंदोलन थोड़े ही समय में पूरे प्रदेश में फैल गया, जिसने 1992 में आंध्र प्रदेश में महिलाओं द्वारा किए गए ताड़ी विरोधी आंदोलन की याद ताजा कर दी है। 1992 में आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले से शुरू हुआ ताड़ी विरोधी आंदोलन पूरे राज्य में बड़ी तेजी से फैल गया था, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने ताड़ी की बिक्री व नीलामी के विरुद्ध मोर्चा खोला तथा सरकार को बाध्य किया कि वह प्रदेश में ताड़ी की बिक्री पर प्रतिबंध लगाए। यह आंदोलन न तो किसी राजनेता से प्रभावित था और न ही किसी राजनीतिक दल से, बल्कि यह महिलाओं की स्वत:स्फूर्ति का जीता-जागता उदाहरण था जिसने इस आंदोलन को भारत के सामाजिक आंदोलनों के इतिहास में एक सफल महिला आंदोलन के रूप में दर्ज कराया।

वैसे इस प्रकार के कार्य प्रशासन द्वारा किए जाने चाहिए, पर दुर्भाग्यवश ऐसा न होने की स्थिति में पीड़ित वर्ग को स्वयं समाधान का रास्ता निकालने को बाध्य होना पड़ता है, जैसा कि आज उत्तर प्रदेश में हो रहा है। इस शराब-विरोधी आंदोलन में शामिल लगभग सभी महिलाएं एक ही तरह के तथ्य सामने ला रही हैं कि किस प्रकार शराब ने उनके परिवारों को, उनकी पीढ़ियों को बर्बाद किया है। किस तरह उनके घर का युवा पुरुष वर्ग भी इस बीमारी का शिकार होकर अपना जीवन तबाह कर रहा है। शराब के कारण कैसे उनका सामाजिक, आर्थिक व पारिवारिक जीवन प्रभावित हो रहा है। ऐसे में उनके पास अपने परिवार को बचाने का यही एक उपाय दिखाई दे रहा है।जब भी इस प्रकार के आंदोलन होते हैं तो इनके साथ उन मुद््दों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया जाता है जिन्हें सामान्य तौर पर इस दायरे से बाहर रखा जाता है, जैसे घरेलू हिंसा, घर-परिवार, कार्यस्थलों व अन्य सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं का यौन-उत्पीड़न आदि। उत्तर प्रदेश में चल रहे शराब-विरोधी आंदोलन में भी महिलाओं ने इन संवेदनशील व निजी माने जाने वाले मुद््दों की ओर ध्यान दिलाया है जिनके लिए वे पुरुषों की शराबखोरी को एक बड़ा कारण मान रही हैं।

आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में 12212 व्यक्तियों पर एक शराब की दुकान है। सूबे में शराब की अठारह हजार से अधिक दुकानें हैं। इनमें शराब के अवैध ठेके शामिल नहीं हैं जिन्हें बिना अनुमति के गांवों के अंदर चलाया जा रहा है। अब अगर इसकी तुलना प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था से की जाए तो आंकड़े बेहद निराश करने वाले हैं। प्रदेश में औसतन 2 लाख 30 हजार लोगों पर एक अस्पताल व लगभग उन्नीस हजार लोगों पर 1 चिकित्सक है। अब इसे चाहे प्रदेश का दुर्भाग्य कहें या प्रशासन की उदासीनता से उपजी विफलता, वास्तविकता यही है कि यहां चिकित्सा सुविधा के बजाय शराब की उपलब्धता अधिक है।शराबबंदी के प्रश्न को लेकर अक्सर तर्क दिया जाता है कि शराब से सरकार को सबसे अधिक राजस्व प्राप्त होता है। ऐसे में इसे प्रतिबंधित करना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा होगा। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस मुद््दे पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा कि यह संभव नहीं है क्योंकि समाज का एक बड़ा कामगार वर्ग इस व्यवसाय से जुड़ा हुआ है; यदि शराबबंदी की गई तो उन मजदूरों का क्या होगा जिनकी रोजी-रोटी इससे चलती है। सत्तासीन व्यक्तियों की इस प्रकार की प्रतिक्रिया निराशाजनक है। यदि देश के छह राज्य (पांच राज्य व एक केंद्र-शासित प्रदेश) शराबबंदी को लागू कर सकते हैं तो बाकी क्यों नहीं? संविधान का अनुच्छेद-47 भी राज्य को इस बारे में निर्देश देता है कि राज्य अपने नागरिकों के पोषाहार-स्तर और जीवन-स्तर को ऊंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य में सुधार करने का प्रयास करेगा। इस व्यवसाय में लाभ देखने वालों को यह भी देखना चाहिए कि इससे पारिवारिक व सामाजिक जीवन का ताना-बाना किस हद तक प्रभावित हो रहा है।
शराबबंदी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय स्वागत योग्य है, पर इसे लागू करने का कार्य हमारे माननीयों द्वारा ही किया जाना है। और यदि वे ऐसा करने में असफल होते हैं तो समाज का प्रभावित वर्ग ही इसकी पहल करेगा और हिंसा व अहिंसा की सैद्धांतिक बहस से परे इसी रूप में करेगा जैसा इस समय उत्तर प्रदेश में हो रहा है। यह सही है कि समाज में सुधारों की मांग व उसके लिए प्रयास समाज के भीतर से ही शुरू होने चाहिए, पर इन सुधारों को वैधानिकता तभी प्राप्त होगी जब उन्हें शासन-प्रशासन का समर्थन प्राप्त हो जिसका फिलहाल प्रदेश में अभाव दिख रहा है।

हालांकि उत्तर प्रदेश में महिलाओं द्वारा चलाया जा रहा शराब-विरोधी आंदोलन आंध्र प्रदेश के ताड़ी-विरोधी आंदोलन की भांति सामाजिक आंदोलनों के इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाएगा या नहीं, यह प्रश्न विचारणीय है। पर इतना तो तय है कि यह आंदोलन केवल शराब के विरोध में नहीं किया जा रहा है। यह विरोध है उन स्थितियों का, जो शराब के कारण परिवार व समाज में उत्पन्न हो रही हैं। इस आंदोलन में शामिल महिलाओं के पास अपना पक्ष रखने के लिए ठोस तर्क हैं जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। आज जब हम बात करते हैं एक ऐसे समाज व सामाजिक वातावरण की, जिसमें महिलाओं को सम्मान व सुरक्षा प्राप्त हो सके तथा जहां महिलाएं भयमुक्त जीवन जी सकें, तो इसके लिए उन कारणों को खोज कर उन्हें समूल नष्ट करना अनिवार्य हो जाता है जो इस लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करते हैं। और इसके लिए आर्थिक व राजनीतिक स्वार्थरहित सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है जो जनता व प्रशासन के आपसी सहयोग से ही संभव है।

कौन हैं कुलभूषण जाधव? जानिए क्या हैं उन पर आरोप

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on April 12, 2017 5:24 am

  1. No Comments.

सबरंग