ताज़ा खबर
 

रानजनीतिः अंतिम अरण्य में जीवन

जहां यह सिखाया जाता है कि जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी, उसी देश में बुजुर्गों का अस्तित्व उपहास का विषय बन गया हो तो क्या दोष केवल बाजारवाद का है? जो लोग उन्हें तिरस्कृत करते हैं, वे अगर यह याद रखें कि कल उन्हें भी ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा, तब शायद उनके व्यवहार में कुछ अंतर आए।
Author October 15, 2016 01:57 am

हमारे आसपास बुजुर्गों का अस्तित्व हममें से अधिकांश के लिए या तो उपहास का विषय हो गया है या फिर हमें उस दिन की प्रतीक्षा है, जब उनके महाप्रयाण के बाद हमें कुछ हासिल होना होगा। मेरे रिश्ते की एक मौसी हैं। विधवा हैं। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने अध्यापिका की नौकरी कर अपने परिवार को पाला और अपने बच्चों को इतना हौसला दिया कि वे उड़ान के लिए आसमान टटोल सकें। बेटियां तो शादी करके अपने अपने घर चली गर्इं लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद बेटा न अधिक पढ़ पाया और न कोई काम सीख सका। मां तो मां होती है। बेटे की जरूरतें पूरी करती रही। लेकिन पेंशन हो जाने के बाद हाथ तंग रहने लगा। एक दिन उन्होंने बेटे की मांगों से परेशान होकर उसे अपने खर्चों में कटौती करने के लिए कहा तो इकलौते बेटे ने मन का भेद खोल दिया- ‘क्यों अपने पैसे से नागिन की तरह चिपकी हुई हो। मर जाओगी तब भी तो सब कुछ मुझे ही मिलना है।’ संवाद का यह कड़वापन सहजता से मंजूर नहीं होता, लेकिन हकीकत यह है कि समाज में अनगिनत बुजुर्ग इस तरह का अपमान रोजाना सहन कर रहे हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय में कुछ समय पहले एक मामला आया था। पचहत्तर वर्ष से अधिक उम्र वाले माता-पिता को एक पुत्र ने घर से निकाल दिया। सुनवाई के दिन जब पुत्र का वकील अदालत में आया तो न्यायाधीश ने पूछा कि वह खुद कहां है? वकील ने जवाब दिया कि उसका मुवक्किल सांई बाबा के दर्शन करने के लिए शिरडी गया हुआ है। माननीय न्यायाधीश ने तब अपना क्षोभ प्रगट करते हुए कहा कि लोगों का भक्तिभाव भी विचित्र होता है। बुजुर्ग माता-पिता को घर से निकालने का पाप करके वे मंदिरों में पुण्य कमाना चाहते हैं!
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा की गई यह टिप्पणी उस देश के आधुनिक दायित्व-बोध पर है, जहां श्रवण द्वारा बुजुर्ग और अंधे अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठा कर तीर्थ कराने की कहानी बच्चों को सदियों से सुनाई जाती रही है। माता-पिता को अपमानित कर लोग उन भगवान की राम की स्तुति कर अपने लिए जीवन के सारे सुख जुटाना चाहते हैं जिन राम ने पिता की आज्ञा पर चौदह बरस का वनवास स्वीकार कर लिया था। जिस देश में यह सिखाया जाता है कि जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी, उसी देश में बुजुर्गों का अस्तित्व उपहास का विषय बन गया हो तो क्या दोष केवल उस बाजारवाद का है जहां हर रिश्ता एक ‘डिस्पोजेबल आइटम’ में बदल गया है? या बात सिर्फ इतनी नहीं है?
सुरेंद्र वर्मा ने अपने चर्चित उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ में एक स्थान पर लिखा है कि किसी से प्रेम करने का अर्थ यह है कि आप उसके साथ रह कर बूढ़े होने के लिए तैयार हो। बुढ़ापा शारीरिक दृष्टि से ही नहीं- आत्मिक, आर्थिक और मानसिक दृष्टि से भी लाचारियों का प्रतीक है। दुनिया भर में वे लोग बिरले ही होते हैं जो बुढ़ापे में शान और सम्मान से जीने लायक नियमित धनार्जन कर पाते होंगे, वरना तो बचत या पेंशन पर ही निर्भर होना होता है। पुरानी कहावत है कि बूंद-बूंद रिसने से तो एक दिन समुद्र भी खाली हो सकता है। फिर भारतीय समाज में, जहां यह परंपरा रही है कि सेवानिवृत्ति के बाद सेवा-परिलाभों के तौर पर मिले पैसे को बेटे के व्यवसाय, मकान की मरम्मत या बेटी के ब्याह पर खर्च कर दिया जाता हो, वहां किसी बुजुर्ग के पास अपनी बचत कहने को कितना धन शेष रहता होगा?
पारिवारिक स्तर पर ही नहीं, सामाजिक स्तर पर भी बुजुर्ग उपेक्षाओं के जिस दंश को बर्दाश्त करते हैं उसे देख कर अपने आप को सभ्य समाज का बाशिंदा कहने पर भी शर्म आती है। छोटे शहरों की सड़कों पर किसी युवक की गाड़ी के आगे अचानक आ जाने वाले बुजुर्ग को देख कर ‘मरेगा क्या रे बुड््ढे’ कहने वाले लोग आसानी से देखे जा सकते हैं। महानगरों में वृद्धाश्रम बुजुर्गों के अकेलेपन की कहानी कहते हैं। हममें से कइयों ने अपने बचपन में ‘बूढ़ी काकी’ नामक वह कहानी पढ़ी होगी जिसमें एक वृद्धा अपने ही घर में उपेक्षा और अपमान को जीते हुए भी अपने बच्चों से प्रेम करने का मोह नहीं छोड़ पाती।
ऐसा नहीं है कि बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा और जलालत भरे व्यवहार का दौर आज ही शुरू हुआ है। मिस्र में करीब साढ़े चार हजार साल पुराना एक लेख मिला है जिसमें लेखक अपनी वृद्धावस्था को कोसते हुए लिखता है- ‘बुढ़ापा आ चुका है। अब दिल अपनी बातें भूलने लगा है। यहां तक कि इसे बीते हुए कल की बातें भी याद नहीं रहतीं। (लाचारियों के चलते ऐसा लगता है) मानो भगवान भी शैतान हो गया हो। सारे स्वाद गुम हो गए हैं। बुढ़ापा हर हाल में आदमी के साथ वही करता है जो एक पक्का शैतान कर सकता है।’ विद्वानों ने इसे बुढ़ापे के अयाचित तत्त्वों का उल्लेख करने वाला पहला दस्तावेज माना है। अति प्राचीन काल में यूनान और उसके आसपास तो ऐसे भी उल्लेख मिले हैं कि युवा बुजुर्गों को इतना नापसंद करते थे कि उन्हें जान तक से मार देने में नहीं हिचकिचाते थे। क्या ऐसा ही कोई कारण था कि कुछ अफ्रीकी देशों में रिवाज ही बन गया था कि पैंसठ साल के बाद जिया ही न जाए। वहां लोग अपनी जीवनलीला खत्म करने के लिए आत्मदाह तक कर लेते थे।
आज बुजुर्गों के स्मृति-लोप, रात-रात भर खांसने, बिस्तर गीला कर देने, ऊंचा सुनने, लड़खड़ाती हुई आवाज से कुछ कहने, कभी पसंद की चीज खाने या कभी पास बैठ कर बात करने की इच्छा जताने पर जो लोग झल्ला कर उन्हें तिरस्कृत करते हैं, वे यदि यह याद रखें कि कल उन्हें भी ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा, तब शायद उनके व्यवहार में कुछ अंतर आए। भारतीय मान्यताएं जब यह कहती हैं कि संतान होने के बाद ही व्यक्ति पुत्त नामक नर्क से मुक्ति पा सकता है तो उसके मूल में शायद यही सच था कि अपनी संतान को पालते हुए ही व्यक्ति को इस बात का अहसास होता है कि उसके अभिभावकों ने खुद उसे किस तरह पाला होगा।
ऐसा नहीं है कि दुनिया में वृद्धजनों को सम्मानपूर्वक जीवन का हक दिलाने के लिए प्रयास नहीं हो रहे हों, लेकिन कुछ लोग हैं कि समझते ही नहीं। चीन में 2013 में एक कानून बना, जो बच्चों को यह निर्देश देता है कि वे अपने अभिभावकों का ध्यान रखेंगे और चाहे कितनी ही दूर रहते हों, वर्ष में एक बार उनसे मिलने अवश्य जाएंगे। इसी चीन में ‘निन्यानबेवां महोत्सव’ नाम से एक समारोह होता है, जिसमें बुजुर्गों के प्रति आदर व्यक्त किया जाता है। अमेरिका और कनाडा में ‘नेशनल ग्रैंडपैरेंट्स डे’ तथा जापान में ‘रेस्पेक्ट फॉर एल्ड पीपुल डे’ धूमधाम से मनाए जाते हैं। 14 दिसंबर 1990 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित एक प्रस्ताव के बाद सारी दुनिया में एक अक्टूबर को ‘वृद्ध दिवस’ बुजुर्गों के प्रति सम्मान अभिव्यक्त करने के लिए ही मनाया जाता है।
ऐसा भी नहीं है कि नई पीढ़ी में सभी लोग बुजुर्गों के सम्मान के प्रति लापरवाह हैं। तीसरी पीढ़ी के साथ बुजुर्गों के मोहपूर्ण संबंधों के कारण ही हमारे यहां यह तक कहा जाता है कि मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है। मैंने अपनी यात्राओं के दौरान कई शहरों में युवाओं को अनजान बुजुर्ग की मदद करते हुए, उन्हें पानी पिलाते हुए, हाथ पकड़ कर सड़क पार कराते हुए, उनके हाथों का वजन अपने हाथों में लेते हुए देखा है। लेकिन एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है और यहां तो तालाब में कई मछलियां लामबंद होकर तैर रही हैं।

शायर कहता है कि ‘फल नहीं देगा न दे, साया तो देगा मुझे/ पेड़ बूढ़ा ही, सही घर में लगा रहने दो।’ एक अन्य शायर बुजुर्गों के अवदान को रेखांकित करते हुए लिखता है-‘हम सायादार पेड़, जमाने के काम आए/ जब सूखने लगे तो जलाने के काम आए।’ यह जलना अपनी अपनी किस्म का होता है। बुजुर्गों को अपनी पीढ़ियों के हिस्से की आंच को बर्दाश्त करने में कभी परेशानी नहीं होती। वे इसके प्रतिदान-स्वरूप कुछ मांगते भी नहीं। किसी कॉलोनी के पार्क में सूरज सिर पर चढ़ आने तक बतियाने के लिए बैठे हुए बुजुर्गों के घर लौटते समय उनकी चाल को देखो- उनके कदमों से लिपटा हुआ अनुभवों का पूरा इतिहास चलता है। उनकी सूनी आंखों में सार्थक अस्तित्व की चमक का सपना देने के लिये वे सिर्फ भावनात्मक सहअस्तित्व चाहते हैं। कभी किसी बुजुर्ग से दो घड़ी बात करके देखो। नमस्कार कर लेने भर से उनमें सुख के कितने सितारे झिलमिलाने लगते हैं। इन सितारों को हम रोशन रखें या बुझा दें, यह हमारे सरोकारों पर है। लेकिन याद रखें कि उस उम्र में सभी को जाना है जिस उम्र में स्वादग्रंथियां मर जाती हैं और सतत लाचारी से मुक्त न हो पाने के कारण दुआओं का अस्तित्व भी कानों को चुभने लगता है। ऐसा ही कुछ उन पर भी बीता (दुआ है कि ऐसा किसी के भी साथ न हो) जो आज अपने शारीरिक सामर्थ्य के नशे में चूर हैं, तब वे क्या करेंगे? समय को कोसेंगे या अपने आप को?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on October 15, 2016 1:55 am

  1. No Comments.
सबरंग