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किशोर शक्ति में छिपी संभावनाएं

सांस्कृतिक मानदंड और लिंग आधारित मानक तय करते हैं कि एक लड़की बड़ी होने पर किन लोगों से मेलजोल रखेगी या एक बेटी, बहन व मां के नाते उसकी क्या भूमिका होगी।
Author October 10, 2017 01:26 am
इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी चुनौती हर व्यक्ति को वह शिक्षा देना है जो उसे सम्मानपूर्ण जीवन जीने के लिए तैयार करे। (Express Photo)

रवि वर्मा- मधु देशमुख 

आज लगभग 1.20 अरब किशोर-किशोरियां बचपन और युवावस्था के दोराहे पर खड़े हैं। इनमें से 24.30 करोड़ किशोर-किशोरियां भारत में रहते हैं। इस किशोर शक्ति में अपार संभावनाएं छिपी हैं। सिर्फ हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि इस किशोर शक्ति को अपनी महत्त्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए सुगम व सकारात्मक वातावरण मिले और इसके नतीजतन, देश में असमानता व गरीबी के दुश्चक्र को भी तोड़ा जा सके। विभिन्न शोध बताते हैं कि मनुष्य के विकास में किशोरावस्था बेहद अहम पड़ाव है। किशोरावस्था में प्रवेश करते समय लड़के-लड़कियां परिपक्वता और बचपन की संधिरेखा पर होते हैं और कई तरह के शारीरिक-मनोवैज्ञानिक बदलावों से गुजर रहे होते हैं। इन बदलावों के पीछे कई तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक और लिंग (जेंडर) आधारित मानदंड व अन्य कारक जिम्मेदार होते हैं। उदाहरण के लिए, सांस्कृतिक मानदंड और लिंग आधारित मानक तय करते हैं कि एक लड़की बड़ी होने पर किन लोगों से मेलजोल रखेगी या एक बेटी, बहन व मां के नाते उसकी क्या भूमिका होगी। जबकि एक लड़के से, इसके उलट, बिल्कुल अलग तरह की अपेक्षाएं रखी जाती हैं।

इन सांस्कृतिक रूढ़ियों और सामाजिक अपेक्षाओं का प्रतिफलन कई रूपों में सामने आता है। जैसे, लड़कियों का कम उम्र में स्कूल छोड़ देना, कम उम्र में लड़के-लड़कियों की शादी कर दिया जाना, शादी के बाद कम उम्र में ही बच्चे पैदा करने के सामाजिक दबाव; लड़कियों की सुरक्षा और उनके कौमार्य को लेकर चिंताओं के चलते उनके घर से बाहर आने-जाने पर लगने वाली बंदिशें और अन्य कई तरह की हिंसा व अपनी बात खुलकर कहने की आजादी नहीं मिलना आदि। किशोर-किशोरियां अपनी क्षमताओं व संभावनाओं का अधिकतम उपयोग कर सकें, इसके लिए हमें देखना होगा कि उनकी विशिष्ट जरूरतें पूरी हो पाएं और और बचपन से युवावस्था में पहुंचने की उनकी यात्रा सहज तरीके से पूरी हो। इस जटिल समस्या का हालांकि कोई सीधा-सरल समाधान नहीं है लेकिन कुछ तरीके और हल हैं जिनसे किशोर-किशोरियों के लिए स्थितियों को बेहतर बनाया जा सकता है।

विभिन्न सेवाओं में तालमेल की जरूरत है ताकि इन्हें आसानी से मुहैया कराया जा सके। अलग-अलग क्षेत्रों की सेवाओं में तालमेल और उनमें समन्वय करना कोई नई अवधारणा नहीं है। उदाहरण के लिए, भारत सरकार की ओर से राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर मातृत्व, नवजात व शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में तालमेल, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग और महिला व बाल विकास विभाग में समन्वय; या महिलाओं के लिए स्व सहायता समूहों के प्रयासों में तालमेल के उद््देश्य से महिला व बाल विकास विभाग और पंचायती राज संस्था विभाग में समन्वय किया जाता है। पहले कदम के तौर पर सेवाओं में समन्वय के लिए उन सभी संबद्ध क्षेत्रों में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना जरूरी है जिन क्षेत्रों द्वारा किशोरावस्था से जुड़ी सेवाएं प्रदान की जाती हैं। जैसे, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण से संबंधित मंत्रालय, महिला व बाल विकास, समाज कल्याण, मानव संसाधन विकास, शिक्षा, पंचायती राज संस्थाएं और युवा मामले व खेल मंत्रालय आदि।
अक्सर होता यह है कि हर मंत्रालय के लिए प्राथमिकताएं और लक्ष्य अलग-अलग तय किए जाते हैं। इनकी पहुंच सीमित होती है और किशोर-किशोरियों की जरूरतों को भी एकांगी व संकीर्ण नजरिए से देखा जाता है। इसलिए जब दूसरे मंत्रालयों या विभागों से तालमेल किया भी जाता है तो भी यह काम किसी एक मंत्रालय के लक्ष्यों को पूरा करने के उद््देश्य से ही किया जाता है। जैसे, या तो सिर्फ स्वास्थ्य के नजरिए से, या सिर्फ शिक्षा के नजरिए से। इस वजह से जनसंख्या का एक विशेष हिस्सा (और संभवत: बहुत बड़ा हिस्सा) पूरी तरह अलग-थलग रह जाता है और कई महत्त्वपूर्ण विषय भी छूट जाते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि हम कम उम्र में लड़कियों के गर्भवती होने के मुद््दे को छोड़ देते हैं तो इससे कई अन्य मुद््दों से निपटने के कार्यक्रमों पर बुरा असर पड़ता है, जैसे कि यह मुद््दा कि लड़कियां किस तरह अपनी शिक्षा जारी रख सकती हैं। या अगर हम लड़कियों की पढ़ाई अधबीच छूट जाने के मुद््दे पर ध्यान नहीं देते तो इससे लड़कियों के स्वास्थ्य संबंधी लक्ष्यों पर भी खराब असर पड़ता है। इसी तरह यदि हम, स्कूलों के जरिए लड़कियों के स्वास्थ्य के मुद््दे पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो ऐसी लड़कियों का एक बड़ा वर्ग छूट जाता है जो अपनी पढ़ाई अधबीच ही छोड़ देती हैं या वे लड़कियां जो कभी स्कूल में दाखिला ही नहीं ले पातीं। इसलिए यह जरूरी है कि संबंधित मंत्रालय और विभाग समन्वित दृष्टिकोण विकसित करें। यह दृष्टिकोण किशोर-किशोरियों के सामने आने वाली चुनौतियों और उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर तैयार किया जाना चाहिए और इसी आधार पर इन मंत्रालयों के लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए। ऐसा होने पर ‘राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम’, ‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ’, ‘अपनी बेटी अपना धन’ जैसी विभिन्न योजनाओं को लागू करने के तौर-तरीकों में बदलाव आएगा और बेहतर नतीजे मिल सकेंगे।

एक समन्वित दृष्टिकोण विकसित होने के बाद संबंधित सरकारी विभागों को राज्य व जिला स्तरों पर ‘परियोजनाओं को लागू करने वाले एक समान कार्यक्रम’ तैयार करने होंगे। संसाधनों में समन्वय के काम में सरकारी संगठनों और निजी क्षेत्र के संगठनों को भी शामिल किया जाना चाहिए। परियोजनाएं लागू करने के लिए साझा योजनाएं बनाते समय ध्यान रखा जाना चाहिए कि गतिविधियों व क्रियाकलापों की निगरानी के लिए सक्षम तंत्र मौजूद हो और योजनाओं की समय-समय पर समीक्षा हो ताकि गलतियों और खामियों को समय रहते दुरुस्त किया जा सके और योजनाएं सिर्फ संसाधनों व बजट आबंटन तक सीमित न रह जाएं।
किन संस्थाओं में सेवाओं का समन्वय किया जा सकता है? उदाहरण के तौर पर, स्वास्थ्य केंद्र। स्वास्थ्य केंद्रों में सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा किशोर-किशोरियों को मनोवैज्ञानिक व सामाजिक मसलों पर सलाहकार सेवाएं दी जा सकती हैं। आंगनवाड़ी केंद्रों के जरिए कई सेवाएं दी जा सकती हैं, जिनमें मिड-डे मील के जरिए पोषाहार दिया जाना शामिल है। स्कूल ऐसे केंद्रों के रूप में इस्तेमाल हों जो जागरूकता तो बढ़ाएं ही, साथ ही स्वास्थ्य, जेंडर, समानता और व्यवहार संबंधी सिद्धांतों के बारे में किशोर-किशोरियों को सोचने विचारने के योग्य भी बनाएं। स्व सहायता समूह किशोर- किशोरियों की माताओं तथा अन्य महिलाओं को बाल विवाह व कम उम्र में गर्भवती होने के खतरों से अवगत करा सकते हैं और लड़कियों को शिक्षित करने का महत्त्व समझा सकते हैं।
इनके अलावा कार्यकर्ता समूह (आशा, आंगनवाड़ी केंद्र), अध्यापक वर्ग और समुदाय के उन नेताओं की भी मदद ली जा सकती है जो पहले से ही आम लोगों के संपर्क में रहते हैं और उनसे मिलते-जुलते रहते हैं।

विभिन्न क्षेत्रों व पक्षों को एक मंच पर लाने वाले समन्वित दृष्टिकोण से एक समान संकेतक विकसित करने में मदद मिलती है और विभिन्न विभागों द्वारा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को बेहतर करने के लिए इन संकेतकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। टेक्नोलॉजी के विकास और विभिन्न क्षेत्रों व पक्षों तक आसान पहुंच बन जाने का लाभ यह है कि हम वास्तविक आंकड़े प्राप्त कर सकते हैं जिससे न सिर्फ योजनाएं बनाने में मदद मिलती है बल्कि समय-समय पर इन योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा भी होती रहती है। इससे यह पता चलता है कि सेवाएं किन लोगों तक पहुंच रही हैं और किन लोगों तक नहीं। इन वास्तविक आंकड़ों से सेवाओं को लागू करने में आ रही अड़चनें दूर करने के लिए की जाने वाली चर्चाओं में भी मदद मिलती है और कार्यक्रमों की गलतियों को समय रहते दुरुस्त किया जा सकता है।

 

 

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