June 24, 2017

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मजदूर स्त्री की आवाज

नवउदारवाद की संस्कृति ने पुरुष वर्चस्ववाद और जेंडर-आधारित उत्पीड़न के साथ ही स्त्री-विरोधी अपराधों के नए-नए बर्बर और वीभत्स रूपों को जन्म दिया है।

Author March 16, 2017 03:45 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कात्यायनी 

नवउदारवाद की संस्कृति ने पुरुष वर्चस्ववाद और जेंडर-आधारित उत्पीड़न के साथ ही स्त्री-विरोधी अपराधों के नए-नए बर्बर और वीभत्स रूपों को जन्म दिया है। समस्या यह है कि स्त्री-उत्पीड़न, चूल्हे-चौकठ की गुलामी और पुरुष स्वामित्ववादी रूढ़ियों-परंपराओं के विरुद्ध जो सर्वाधिक उग्र स्वर हैं, वे अधिकतर अकादमिक विमर्शों और साहित्यिक लेखन तक सीमित हैं। नवउदारवाद के भूमंडलीय घटाटोप में अस्मिता-राजनीति आधारित ‘नव-सामाजिक आंदोलन’ के अंग के तौर पर स्त्री आंदोलन की एक नई धारा फूटी है, उसके एक बड़े हिस्से को एनजीओ सुधारवाद ने खा-पचा लिया है, और बचा-खुचा हिस्सा सेमिनारों-सम्मेलनों-वर्कशॉपों के कर्मकांडी अनुष्ठानों में व्यस्त रहता है। नारीवाद की पारंपरिक और नई-नई धाराएं अपनी अलग-अलग भाषा और मुहावरों के साथ या तो समूचे पुरुष समुदाय को या पितृसत्ता, परिवार या विवाह जैसी संस्थाओं को स्त्री का शत्रु बताती हैं या जैविक पुनरुत्पादन के प्राकृतिक कार्य को ही स्त्री दासता की जड़ बताती हैं। और अब ‘एलजीबीटीक्यू’ का नया सिद्धांत भी आ गया है, जो अस्मीभूत रूढ़ियों और जेंडर-उत्पीड़न आधारित संस्थाओं के विरुद्ध व्यक्तिगत विद्रोह के रूप में ‘विचलनशील सेक्सुअल व्यवहार’ का अनोखा मार्ग सुझाती हैं। फेमिनिज्म की ये धाराएं स्त्री-उत्पीड़न और पुरुष-वर्चस्ववाद की ऐतिहासिक जड़ों और सामाजिक-आर्थिक कारणों की लगभग पूरी तरह अनदेखी करती हैं और इसलिए दिशाहीन विद्रोह से आगे स्त्री-मुक्ति की कोई सांगोपांग और व्यावहारिक परियोजना प्रस्तुत कर पाने में पूरी तरह से विफल रहती हैं।  अकर्मक विमर्शवादी नारीवादी और एनजीओ सुधारवादी स्त्री संगठनों से भिन्न, ऐसे भी स्त्री संगठन बेशक हैं, जो स्त्री मुक्ति के प्रश्न को सामाजिक मुक्ति और पूंजीवाद-विरोधी संघर्षों से जोड़ कर देखते हैं, लेकिन इन संगठनों में भी, निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम के रूप में मजदूर स्त्रियों के ज्वलंत आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे नेपथ्य में धकेल दिए जाते हैं या फिर बहुत चलताऊ ढंग से उनकी चर्चा करके छोड़ दिया जाता है।

यह सही है कि पुरुष वर्चस्ववादी पारिवारिक-सामाजिक संरचना में एक मध्यवर्गीय स्त्री भी आधुनिक घरेलू गुलाम ही होती है, और अगर वह आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो, तो भी घर के भीतर और बाहर सड़क पर वह बराबर की नागरिक नहीं होती। लेकिन सस्ती मजदूरी और कठिन काम के साथ-साथ एक मजदूर स्त्री स्त्रीत्व की जो कीमत चुकाती है और यौन उत्पीड़न के जिन रूपों का सामना करती है, उनसे मध्यवर्गीय स्त्री समुदाय का सामना कभी नहीं होता। यही कारण है कि रैडिकल नारीवादी संगठनों और संसदीय वामदलों के स्त्री संगठनों के चार्टर में भी मजदूर स्त्रियों के मांगों-मसलों की मौजूदगी या तो होती ही नहीं है या महज रस्म अदायगी के तौर पर होती है। बहुतेरे वामपंथी स्त्री संगठनों में अगर मजदूर स्त्रियों की भागीदारी होती भी है, तो ऐसे संगठनों पर अधिक मुखर और पढ़ी-लिखी मध्यवर्गीय स्त्रियों का ही आधिपत्य होता है और रैडिकल वर्गीय चेतना के बावजूद मजदूर स्त्रियों की पहलकदमी प्राय: खुल ही नहीं पाती। अक्सर वे ‘दीदी जी’, ‘बहन जी’ के पीछे चलने वाली, नारे लगाने वाली भीड़ बन कर रह जाती हैं। सच यह है कि जो मध्यवर्गीय स्त्रियां समूचे स्त्री समुदाय के उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष की बात करती हैं, उनमें भी वर्गीय पूर्वाग्रह जड़ीभूत होकर गहराई तक धंसे होते हैं, जो मजदूर स्त्रियों के प्रति उनके नजरिए को निर्धारित करते हैं। बौद्धिक स्त्रियों की मजदूर स्त्रियों से वही दूरी बनती है, जो बौद्धिक श्रम करने वालों की शारीरिक श्रम करने वालों से बनती है।

समस्या यह है कि वर्गीय आधार पर संगठित ट्रेड-यूनियनों में, यहां तक कि संसदीय वामदलों से संबद्ध ट्रेड यूनियनें भी स्त्री मजदूरों और उनके मुद्दों को हाशिए पर ही जगह मिल पाती है। स्वयं शोषित-उत्पीड़ित आम मजदूर आबादी में भी पुरुषवादी पूर्वाग्रह कूट-कूट कर भरे होते हैं। ‘समान काम के लिए समान वेतन’ की मांग अधिकतर पुरुष मजदूर दिल से नहीं पचा पाते। स्त्री मजदूरों को वे अलग जेंडर के नाते कुछ विशेष स्थिति और कुछ विशेष मांगों वाले मजदूर के रूप में नहीं, बल्कि मजबूरी में या घरेलू कामकाज से फाजिल समय में, कुछ कमा लेने वाली मां-बहन-बेटी के रूप में देखते हैं। यानी उनके दिमाग में मजदूर स्त्री की उत्पादक कार्रवाई नहीं, बल्कि मात्र जैविक पुनरुत्पादक कार्रवाई रेखांकित होती है।
मजदूर स्त्री की आवाज वर्गीय पूर्वाग्रहों के कारण स्त्री संगठनों के भीतर दबा दी जाती है, जबकि जेंडर-संबद्ध पूर्वाग्रहों के चलते ट्रेड यूनियनों में उसकी अनसुनी कर दी जाती है। बात कुछ यों कही जा सकती है कि जेंडर के प्रश्न पर केंद्रित स्त्री संगठनों के, और वर्गीय शोषण के प्रश्न पर केंद्रित ट्रेड यूनियनों के मंच जब लगते हैं, तो स्त्री मजदूर अपने मुद्दों सहित इन दोनों मंचों के बीच के ‘स्पेस’ में जा गिरती है। जब जेंडर केंद्रित उत्पीड़न का सवाल उठता है तो वह वर्गीय वर्चस्ववाद का शिकार हो जाती है और जब वर्गीय उत्पीड़न का सवाल उठता है, तो वह अपने ही वर्ग के पुरुषों के जेंडर-वर्चस्ववाद का शिकार हो जाती है। अब जब भूमंडलीकरण के दौर में स्त्री-उत्पीड़न के नए रूपों और उनके कारगर प्रतिरोध की रणनीति और अधिशेष निचोड़ने के नए तौर-तरीकों और मजदूर प्रतिरोध के नए रूपों के विकास की बात की जा रही है और ‘श्रम के स्त्रीकरण’ की चर्चा आज के दौर की एक प्रमुख आभिलाक्षणिकता के रूप में की जा रही है, तो भारत में स्त्री मजदूरों को अलग से संगठित करने के प्रश्न पर सोचना बेहद जरूरी है।

आज भी कुल स्त्री श्रम का तकरीबन पैंसठ फीसद खेती और ग्रामीण कुटीर उद्योगों, पशुपालन आदि में लगा है, लेकिन कृषि के मशीनीकरण के साथ ही वहां स्त्री श्रम के घटने की प्रवृत्ति भी देखने में आ रही है। उद्योगों में स्त्री मजदूरों की इतनी बड़ी आबादी पहले कभी नहीं खट रही थी। लेकिन औपनिवेशिक काल में जो स्त्रियां जूट, टेक्सटाइल, खदान आदि क्षेत्रों में काम करती थीं, वे भारी तादाद में कार्यस्थलों पर दिखाई पड़ती थीं। आज जो स्त्रियां उजरती मजदूर हैं, अधिकतर वे अदृश्य श्रमशक्ति हैं। उनकी आबादी बड़े-बड़े कारखानों की असेंबली लाइन पर काम नहीं करती, बल्कि सबसे बड़े पैमाने पर पीस रेट पर घंटों काम करती है, छोटे-छोटे वर्कशापों में ठेके पर काम करती है या फिर सबसे निचले स्तर के ‘कैजुअल वर्कर’ या ‘वाउचर वर्कर’ और बदली मजदूर के रूप में कारखानों में काम करती है। श्रम कानूनों से इन स्त्री मजदूरों को कोई संरक्षण प्राप्त नहीं होता और नियोक्ताओं के रिकार्ड्स पर आधारित श्रम सांख्यिकी से श्रम में इनकी भागीदारी की या इनकी संख्या की सही तस्वीर भी सामने नहीं आती। लेकिन ज्यादातर उनकी मजदूर पहचान न सामाजिक रूप से स्पष्ट है, न ही स्वयं उनकी नजरों में। वे श्रम शक्ति का सबसे सस्ता ही नहीं, बल्कि सबसे लचीला हिस्सा हैं, जिन्हें मंदी के किसी हल्के दौर में भी सबसे पहले बेकार कर दिया जाता है।
भूमंडलीकरण ने स्त्रियों की उजरती गुलामी का पहले से भिन्न, ऐसा नया तरीका ईजाद किया है, जिसमें घरेलू गुलामी से मुक्त हुए बिना वे उजरती गुलाम बना दी गई हैं। हालांकि पूंजी की अपनी अंतर्विरोधी गति भी है और तेज सर्वहाराकरण के चलते उन्नत चेतना वाली ऐसी युवा मजदूर स्त्रियों की संख्या भी बढ़ रही है, जो पारिवारिक जकड़बंदी से मुक्त होकर शहरों में आकर काम कर रही हैं। दूसरी ओर, कारखाना मालिकों की यह सचेतन कोशिश होती है कि ज्यादातर मजदूरों की घरेलू औरतों से ही सस्ता से सस्ता काम करा लिया जाए। आश्चर्य नहीं कि आज मुख्यधारा का मीडिया बड़े पैमाने पर घरेलूपन और पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों को महिमामंडित करने का काम कर रहा है। नवउदारवाद के दौर की उपरोक्त विशिष्टता स्त्री मजदूरों को अलग से संगठित करने की जरूरत को रेखांकित करती है और इस काम की चुनौतियों को भी।

 

 

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First Published on March 16, 2017 3:45 am

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