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बेटियों के गुनहगार

ग्रामीण क्षेत्रों के हिंदू समुदाय में शादी के नाम पर कई जगह लड़कियों को बेच दिया जाता है। मुसलिम समुदाय में भी शादी के बहाने कई लड़कियां खाड़ी देशों के शेखों को बेच दी जाती हैं।
Author August 9, 2017 05:31 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Source: Express Archives)

सोनल छाया 

सिर्फ बेटियों की मां होने के कारण जब एक बड़ी बहन को उसकी छोटी बहन न बताए कि वह लड़के की मां बनने वाली है और उसके इस राज में उसके माता-पिता भी शामिल हों तो बड़ी बहन का सदमे में आना स्वाभाविक है। ऐसे टोटकों की वजह यह सोच है कि यदि बेटियों के माता-पिता को गर्भ में पल रहे बालक-शिशु का पता चलेगा तो बालक का अनिष्ट हो जाएगा। बात यहीं तक सीमित रहती तो कुछ राहत की सांस ली जा सकती थी। लेकिन आज हमारा समाज कन्या से इतना डर गया है कि उसके जन्म से पहले ही उसकी हत्या कर दी जाती है। और भी शर्मनाक पहलू यह है कि इस घृणित काम को समाज का शिक्षित वर्ग अंजाम दे रहा है। हमारे देश में रोज लड़के की आस में लाखों कन्या-भ्रूण की हत्या की जा रही है।

कहने के लिए देश में लिंग-परीक्षण पर प्रतिबंध है। बावजूद इसके कुछ डॉक्टर बेखौफ इस काम को अंजाम दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें इस काम की अच्छी कीमत मिल रही है। देश की लचर कानून-व्यवस्था ऐसे लोगों का कुछ भी बिगाड़ पाने में असमर्थ है। गलती से पुलिस की पकड़ में आने के बाद भी भ्रष्टाचार के कारण वे आसानी से बरी हो जाते हैं। देश में लापरवाही के कारण या देखभाल के अभाव में बालिका-शिशु को मारने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में आज भी कई परिवारों में लड़कियों को जन्म लेते ही नमक चटाकर मार डालने का चलन है। इस वजह से इन राज्यों में लड़कियों की संख्या लड़कों से कम हो गई है और लड़कों की शादी के लिए या फिर सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, ओड़िशा, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों से लड़कियां खरीद कर लाई जा रही हैं। मौजूदा समय में अधिकांश लड़कियां अपनों के बीच ही असुरक्षित हैं। छेड़खानी, यौन शोषण या बदसलूकी आदि सहने की आदत लड़कियों को अपने घर से ही डालनी पड़ती है, जिसका क्रमश: विस्तार होता जाता है। रिश्तेदार से लेकर पहचान वाले तक रिश्तों को शर्मसार करने से नहीं चूकते हैं। इस सच्चाई की पुष्टि नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी आंकड़ों से की जा सकती है। एनसीआरबी के आंकड़ों पर भरोसा करें तो बलात्कार की घटनाओं में बराबर इजाफा हो रहा है।

एनसीआरबी की वर्ष 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में बालिकाएं और महिलाएं देश में सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। रिपोर्ट के अनुसार, देश के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कुल मिलाकर दुष्कर्म की 34,651 वारदातें हुर्इं, जिनमें सबसे ज्यादा 4391 महिलाएं मध्यप्रदेश में दुष्कर्म का शिकार बनीं। राज्य में औसतन हर रोज बारह युवतियां दुष्कर्म का शिकार बन रही हैं। एक वर्ष में राज्य में 57 मामले दुष्कर्म की कोशिश के दर्ज किए गए, वहीं यौन उत्पीड़न के 12,887 प्रकरण दर्ज किए गए। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, इसी अवधि में महाराष्ट्र में 4,144, राजस्थान में 3,644, उत्तर प्रदेश में 3,025 दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए। देश में लक्षद्वीप ऐसा केंद्रशासित राज्य है, जहां न तो दुष्कर्म का कोई मामला दर्ज हुआ और न ही दुष्कर्म के कोई प्रयास किए गए।वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में साक्षरता का प्रतिशत 74 है। महिलाओं में साक्षरता 65 फीसद है, लेकिन उनमें से बहुतों को सिर्फ अपना नाम लिखना आता है। भारत में शिक्षा अधिकार अधिनियम के जरिये शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया है। स्कूल में खाने-पीने की व्यवस्था की गई है। प्रोत्साहन के तौर पर पैसे दिए जा रहे हैं। पढ़ने में जहीन छात्राओं को वजीफा दिया जा रहा है। साइकिलें बांटी जा रही हैं। बावजूद इसके, बड़ी संख्या में लड़कियां बीच में ही पढ़ाई छोड़ दे रही हैं। स्कूल छोड़ने के कारण चौंकाने वाले हैं। अधिकतर माता-पिता लड़कियों से घर व बाहर काम कराना चाहते हैं या फिर उनसे छुटकारा पाने के लिए नाबालिग अवस्था में ही उनकी शादी कर देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के हिंदू समुदाय में शादी के नाम पर कई जगह लड़कियों को बेच दिया जाता है। मुसलिम समुदाय में भी शादी के बहाने कई लड़कियां खाड़ी देशों के शेखों को बेच दी जाती हैं। इस मामले में आंध्र प्रदेश सबसे आगे है। गौरतलब है कि शादी का झांसा देकर, प्रेम-जाल में फंसा कर या पैसों के लालच में पूरे देश में लड़कियों की खरीद-फरोख्त हो रही है और मन भर जाने पर उन्हें चकलाघरों में बेच दिया जाता है।

कभी छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत ने ‘देवी मां सहचरी सखी प्राण’ कह कर नारी की गरिमा का गान किया था। इसमें दो राय नहीं कि नारी सृष्टि का आधार है। समाज में पुरुष व नारी का समान स्थान है। दोनों को गाड़ी के दो पहिये कहा गया है। वेद-पुराणों में कहा गया है कि पत्नी के बिना कोई भी सद्कार्य संपन्न नहीं हो सकता है। फिर भी, हकीकत में, भारतीय समाज में नारी को कभी भी बराबर का दर्जा नहीं दिया गया। इक्कीसवीं सदी में भी यह सिलसिला कायम है। बेटी व बहू की भूमिका में स्त्री अक्सर भेदभाव व अत्याचार का सामना करती है, लेकिन सास की भूमिका निभाते हुए वह खुद शोषक बन जाती है। क्या इसीलिए कि तब वह पुरुष-पक्ष की ओर होती है? दरअसल, हमारे समाज में व्याप्त अधिकांश विसंगतियां महिलाओं से जुड़ी हुई हैं। दहेज, दहेज-हत्या, भ्रूण-हत्या, लैंगिक भेदभाव, छुआछूत, बाल विवाह, परदा प्रथा आदि की गाज महिलाओं पर ही गिरती है। पर इन समस्याओं को दूर करने के प्रति आज कोई गंभीर नहीं है। बीसवीं सदी तक इन मुद््दों पर चर्चा-परिचर्चा होती रहती थी। फिल्मों की कहानी इन मुद््दों पर आधारित होती थी, लेकिन आज इन विषयों पर कोई चर्चा करना नहीं चाहता। अब तो दहेज को हमारे समाज में बिजनेस के तौर पर देखा जा रहा है। जाति के मुताबिक सभी पदों के रेट निश्चित हैं। सभी जातियों में आइएएस दूल्हे का रेट एक करोड़ से ऊपर पहुंच गया है। दहेज के रूप में मोटी रकम लेना अब ‘स्टेटस सिंबल’ बन चुका है।

भारतीय समाज के नियम-कायदे पुरुषों को केंद्र में रख कर बनाए गए हैं। पुरुष को परिवार का मुखिया बनाया गया है और महिलाओं को जान-बूझ कर अबला बना कर रखा गया है। कहा जाता है कि पुत्र ही वंश को चला सकता है, पर इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। मालूम हो कि हमारे देश के ही राज्य मेघालय में निवास करने वाली खासी जनजाति में वंश कन्या चलाती है। परिवार की मुखिया मां होती है और पुरुष मां का सरनेम रखते हैं। लेकिन वहां देश के अन्य राज्यों में लड़कियों के साथ किए जा रहे भेदभाव की तरह लड़कों के साथ सौतेला बर्ताव नहीं किया जाता है। सवाल उठता है कि हमारे देश में महिलाओं के प्रति इतनी असहिष्णुता क्यों है? इस पड़ताल से स्पष्ट है कि कन्याशिशु के जन्म से किसी को एतराज नहीं है, लेकिन हमारे मन में डर समाज में व्याप्त कुरीतियों को लेकर है। पुत्री के जन्म लेते ही पिता की चिंता उसकी सुरक्षा व विवाह को लेकर होती है। बहुत-से लोग सोचते हैं कि स्त्री-सुरक्षा की समस्या चिंताजनक रूप में सामंती मूल्यों वाले ग्रामीण परिवेश में ही रहती है। पर चेन्नई, मुंबई, दिल्ली, चंडीगढ़ जैसे महानगरों में भी- जो आधुनिक व प्रगतिशील होने का दम भरते हैं- स्त्रियां अपने को असुरक्षित महसूस करती हैं। और भी दुखद यह है कि स्त्री-विरोधी अपराधों के बहुत कम मामलों में न्यायिक प्रक्रिया अपनी तार्किक परिणति तक पहुंच पाती है।

 

 

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