December 09, 2016

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पानी में सियासत की आग

अगर यमुना का पानी पंजाब को नहीं मिला तो फिर पंजाब के रावी और ब्यास का अतिरिक्त पानी हरियाणा को कैसे मिलेगा।

Author November 15, 2016 02:55 am
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पंजाब चुनाव से ठीक पहले पंजाब में राजनीतिक भूचाल आया है। सतलुज यमुना लिंक नहर को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के कारण तमाम राजनीतिक दलों की परेशानी बढ़ गई है। न्यायालय ने अपने फैसले में माना है कि 2004 में तत्कालीन पंजाब सरकार द्वारा नदी जल समझौता रद््द करना असंवैधानिक था। इस समझौते को पंजाब की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने रद््द कर दिया था, जिसके मुखिया कैप्टन अमरिंदर सिंह थे। न्यायालय ने साफ कहा है कि विगत में एसवाईएल को लेकर दिए गए सारे फैसले प्रभावी होंगे। इस फैसले का जोरदार विरोध पंजाब के राजनीतिक दलों ने किया है। लेकिन संकट राष्ट्रीय दलों का ज्यादा है। अकाली दल पंजाब की राजनीति करता है। इसलिए समस्या ज्यादा नहीं है। पर समस्या कांग्रेस और भाजपा के लिए अधिक है। कांग्रेस पंजाब में सत्ता में आने के लिए लड़ रही है तो हरियाणा में सत्ता से बाहर है। हरियाणा कांग्रेस हरियाणा के हक की मांग कर रही है तो पंजाब कांग्रेस पंजाब के हक की। संकट केंद्रीय नेतृत्व के सामने है। भारतीय जनता पार्टी का संकट भी कम नहीं है। भाजपा पंजाब में अकाली दल के साथ सरकार में भागीदार है। वहीं हरियाणा में भाजपा की अपनी स्वतंत्र सरकार है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का संकट भी कांग्रेस की तरह ही है।

पंजाब में पानी पर सिर्फ राजनीति हो रही है। आम जनता की राय राजनीतिक दलों से अलग है। खुद पंजाब के किसान संगठनों के नेताओं का मानना है कि पंजाब में नदियों के पानी को लेकर लड़ने के बजाय भूजल की चिंता राजनीतिक दल करें। राजनीतिक दल भूजल के स्तर को बढ़ाने के बजाय नदियों के पानी के लिए लड़ रहे हैं। पंजाब में आज भी सत्तर प्रतिशत सिंचाई भूजल से होती है। लेकिन ज्यादातर जिलों में भूजल की स्थिति काफी शोचनीय है। राज्य के सौ से ज्यादा प्रखंड (ब्लॉक) भूजल के मामले में ‘डार्क जोन’ में चले गए हैं। डार्क जोन का मतलब वहां भूजल का भंडार समाप्त हो जाना या उसका स्तर इतना नीचे चले जाना है कि उसे निकाला नहीं जा सकता। यही नहीं, बहुत सारे इलाकों में भूजल काफी खराब हो चुका है। यह पानी पीने के लिए तो क्या, सिंचाई के लिए भी उपयुक्त नहीं है।

पानी पर राजनीति करने वाले दोहरा खेल खेल रहे हैं। वे सहूलियत से अपना रुख तय करते हैं। राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह एक समय सतलुज-यमुना संपर्क नहर (एसवाइएल) का जोरदार समर्थन कर चुके हैं। जब पटियाला के पास नहर की नींव तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रखी थी तो कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इसका जोरदार स्वागत किया था। उस समय के अखबारों में कैप्टन अमरिंदर सिंह का स्वागत भरा विज्ञापन छपा था। लेकिन 2004 में विधानसभा में विधेयक लाकर खुद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने हरियाणा के साथ हुए जल समझौते को रद््द कर दिया। लेकिन इस मुद््दे पर राजनीति वर्तमान मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल भी खूब कर रहे हैं। वे कहते हैं कि हरियाणा को एक बूंद पानी नहीं देंगे। लेकिन उनसे कोई पूछे कि आखिर एसवाईएल के लिए पंजाब में जमीन अधिग्रहण किसने करवाया था।

यह सच्चाई है कि 20 फरवरी 1978 को प्रकाश सिंह बादल सरकार ने ही एसवाईएल के लिए जमीन अधिग्रहण की अधिसूचना जारी की थी। इसका धन्यवाद हरियाणा विधानसभा में चौधरी देवीलाल ने किया। उन्होंने कहा था कि बादल से उनके निजी संबंधों के कारण जमीन अधिसूचित करना संभव हो पाया। पंजाब में सुरजीत सिंह बरनाला के कार्यकाल में भी एसवाईएल का काम तेजी से हो रहा था। बरनाला अगर चार-पांच महीने और मुख्यमंत्री रहते तो पंजाब के हिस्से में बाकी का बचा काम पूरा हो जाता। लेकिन नहर के काम में लगे मुख्य इंजीनियर समेत तीस मजदूरों की हत्या हो गई। उधर बरनाला सरकार की विदाई हो गई।

हरियाणा से पानी के विवाद को लेकर पंजाब का पक्ष भी जानने की जरूरत है। हरियाणा हालांकि एक समय पंजाब का ही भाग था। वर्ष 1966 में पंजाब से अलग होकर हरियाणा राज्य का गठन हुआ। हरियाणा के पानी मांगने का एक आधार यह भी है। पंजाब का तर्क है कि हरियाणा नदी तटवर्ती (राइपेरिएन) राज्य नहीं है। लेकिन यह भी सच्चाई है कि हरियाणा की स्थिति राजस्थान की तरह नहीं है। हरियाणा 1966 तक पंजाब का भाग था। पंजाब की दलील है कि पंजाब पुनर्गठन अधिनियम की धारा 78 के प्रावधान गलत हैं। इस धारा के अनुसार, दो राज्यों के बीच पानी के झगड़े को सुलझाने के लिए केंद्र दखल दे सकता है। लेकिन जिस राज्य से नदी ही नहीं गुजरती, उसे कैसे पानी दिया जा सकता है? पंजाब का तर्क है कि पानी राज्य का विषय है। अगर दो नदी तटवर्ती (राइपेरियन) राज्यों के बीच पानी का झगड़ा है तो उसे न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) ही सुन सकता है।

पंजाब का यह भी कहना है कि अगर यमुना का पानी पंजाब को नहीं मिला तो फिर पंजाब के रावी और ब्यास का अतिरिक्त पानी हरियाणा को कैसे मिलेगा। जबकि हरियाणा का तर्क है कि हरियाणा 1966 में बना। हरियाणा उससे पहले पंजाब का ही हिस्सा था। इसलिए पंजाब से गुजरने वाली नदियों पर हरियाणा का भी हक एक सीमा तक है। पंजाब का तर्क है कि हरियाणा की दावेदारी की तर्ज पर यमुना का पानी भी पंजाब के हिस्से में आना चाहिए। क्योंकि हरियाणा बनने से पहले यमुना भी पंजाब की सीमा से ही गुजरती थी। लेकिन हरियाणा को आवंटित 55 लाख एकड़ फुट पानी में से पंजाब को एक बूंद भी पानी नहीं मिला।

अगर सतलुज-यमुना संपर्क नहर बन कर चालू होती है तो पंजाब को 13 लाख एकड़ फुट पानी हरियाणा को और देना पड़ेगा। पंजाब का कहना है कि अब उसके पास 13 लाख एकड़ फुट पानी हरियाणा को देने के लिए नहीं है। क्योंकि दशकों से न्यायालय में पानी का विवाद विचाराधीन है और इधर खराब मानसून और अन्य कारणों से पंजाब की नदियों में जल की कमी हो गई है। पंजाब का तर्क है कि उसकी नदियों में पहले के मुकाबले इस समय 40 लाख एकड़ फुट पानी कम हो चुका है। पंजाब का यह भी कहना है कि जब संबंधित राज्यों में 1981 में पानी के बंटवारे का समझौता हुआ तो उस समय यह मान कर चला गया था कि कुल पानी 171 लाख एकड़ फुट है। लेकिन अब पानी कम हो चुका है। पंजाब का तर्क है कि अगर वर्तमान में एसवाईएल के माध्यम से हरियाणा को पानी दिया गया तो मालवा इलाके की नौ लाख एकड़ जमीन बंजर हो जाएगी। अगर अभी नहर बनाई भी जाएगी तो कम से कम पंद्रह सौ करोड़ रुपए का खर्च आएगा। क्योंकि नहर का बना हुआ हिस्सा भी खराब हो चुका है। हरियाणा का तर्क है कि नहर निर्माण नहीं होने के कारण उसे हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। नहर के लिए हरियाणा ने अपने इलाके में पंद्रह सौ एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। लेकिन नहर में न पानी आया न ही इस जमीन पर खेती हो सकी।

विशेषज्ञों की राय है कि नदियों के पानी के विवाद पर राज्यों से राय लेकर केंद्र को एक सर्वमान्य हल निकालना चाहिए क्योंकि कई राज्यों के बीच दशकों से जल विवाद चल रहा है। हिंसा भी होती रही है। हजारों करोड़ का नुकसान भी हुआ है। विवादों को निपटाने के लिए तमाम अधिकरण (ट्रिब्यूनल) बनाए गए। लेकिन उनके फैसले लागू नहीं होते, संबंधित राज्य मानते नहीं हैं। यही नहीं, अक्सर अधिकरण के फैसलों के बाद तनाव बढ़ जाता है। कुछ अधिकरण आज तक नदी जल विवाद का हल भी नहीं सुझा पाए। कुछ अधिकरणों ने फैसले दिए तो उन्हें लागू नहीं किया जा सका। कावेरी नदी जल विवाद अधिकरण ने अपना फैसला सुना दिया। लेकिन सही तरीके से फैसला आज भी लागू नहीं है। हाल ही में कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी के पानी को लेकर काफी तनाव पैदा हो गया। हिंसा की भी घटनाएं हुर्इं। हजारों करोड़ का नुकसान हुआ। वहीं पंजाब-हरियाणा के जल विवाद को सुलझाने के लिए इराडी ट्रिब्यूनल का गठन किया गया। राजीव-लोंगोवाल समझौते के तहत न्यायमूर्ति बालाकृष्णन इराडी के नेतृत्व में ट्रिब्यूनल बना। ट्रिब्यूनल ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट 1987 में दे दी। लेकिन अंतिम रिपोर्ट आज तक नहीं आई। इस बीच 2010 में न्यायमूर्ति इराडी का निधन हो गया।

कई देश पानी के लिए झगड़ रहे हैं। सिंधु नदी बेसिन की नदियों के पानी को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच जब-तब तनाव उभर आता है। मेकांग के पानी को लेकर चीन, थाईलैंड, विएतनाम, लाओस के बीच तनाव है। ब्रह्मपुत्र के पानी को लेकर चीन और भारत के बीच तनाव है। नील नदी के पानी को लेकर अफ्रीका के कई देशों के बीच तनाव है। दजला और फरात के पानी को लेकर पश्चिम एशिया के देशों में तनाव है। देशों के भीतर भी झगड़े हैं। जबकि दुनिया में एक सौ बीस करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है। भूजल का भंडार तेजी से कम हो रहा है। अनुमान है कि 2025 तक एक सौ अस्सी करोड़ लोग पानी की कमी के बुरी तरह शिकार होेंगे। ऐसी स्थिति में, अंतर-राष्ट्रीय और अंतर-राज्यीय जल विवादों का हल नहीं निकाला गया, तो दुनिया में बड़े पैमाने पर हिंसा फूट सकती है।

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First Published on November 15, 2016 2:55 am

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