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अब यूबीआइ का झुनझुना

हमारे देश में अभी तक सरकारी सहायता केवल जरूरतमंद जनता को दी जाती रही है। नकदी या सामान के बतौर दी जाने वाली मदद पर सरकार हर साल अरबों रुपए खर्च करती है।
खेत में काम करता किसान।

यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआइ) की बाबत यों तो सरकार ने अभी कोई स्पष्ट निर्णय नहीं किया है, पर बजट से एक रोज पहले संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा में यूबीआइ को विचारणीय जरूर कहा है। क्या इसलिए कि नोटबंदी से पीड़ित जनता के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए सरकार कुछ करना चाहती है? जो हो, सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम इस योजना के प्रबल पैरोकार हैं। यूबीआइ से वित्तमंत्री अरुण जेटली कितने मुतमइन हैं और योजना को बजट का हिस्सा बनाते हैं या नहीं, इसका पता तो एक फरवरी को यानी बजट वाले रोज ही चलेगा। हां, विचार नया है, इसलिए इसे जानना और समझना जरूरी है।

हमारे देश में अभी तक सरकारी सहायता केवल जरूरतमंद जनता को दी जाती रही है। नकदी या सामान के बतौर दी जाने वाली मदद पर सरकार हर साल अरबों रुपए खर्च करती है। नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक फाइनेंस एंड पब्लिक पॉलिसी के अनुसार भोजन, रोजगार, खाद, तेल, गैस, बिजली, पानी पर मिल रही सबसिडी तथा बेरोजगारी-भत्ते व वृद्धावस्था पेंशन पर केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर प्रतिवर्ष जो धन खर्च करती हैं, वह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 14 फीसद है। फिलहाल कृषि, स्वास्थ्य और जन-कल्याण से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों पर हर साल 25 से 30 खरब रुपए के बीच व्यय आता है। आजादी के तीस साल तक सरकार का सबसिडी बिल सीमित था, लेकिन पिछले कुछ साल में मतदाताओं को रिझाने के लिए हर राजनीतिक दल ने सरकारी खजाने को दोनों हाथ से लुटाया है।

आज केंद्र के बजट का 88 फीसद धन राजस्व व्यय (रिवेन्यू एक्सपेंडिचर) यानी वेतन, भत्ते, सबसिडी, उधारी व ब्याज चुकाने पर होने वाले खर्च) की श्रेणी में है और मात्र 12 प्रतिशत पैसा पूंजीगत व्यय (कैपिटल एक्सपेंडिचर) यानी रेल, सड़क, पुल, बांध बनाने पर होने वाले खर्च की श्रेणी में। पिछले दस सालों में राजनीतिक दलों की ‘मेहरबानी’ से पूंजीगत व्यय लगातार घट कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.6 प्रतिशत रह गया है। इसी तथ्य की आड़ में जन-कल्याण से जुड़ी समस्त सरकारी योजनाओं को समाप्त कर यूबीआइ को लागू करने का तर्क दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इससे गरीबों के साथ-साथ मध्यवर्ग को भी लाभ होगा। जनता के हाथ में पैसा होगा तो मांग बढ़ेगी, जिससे बाजार में रौनक आएगी। लेकिन इस तर्क के पीछे छिपा खतरनाक सच यह है कि यदि खाद्य सुरक्षा कानून और ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को समाप्त कर दिया गया तो लाखों कंगाल (गरीबी रेखा के नीचे की आबादी) बर्बाद हो जाएंगे। उनके मुख का कौर छिन जाएगा और भीषण बेकारी के मौजूदा दौर में उनके आधे-अधूरे रोजगार का सहारा भी जाता रहेगा।

अर्थशास्त्री विजय जोशी ने अपनी पुस्तक ‘इंडियास लांग रोड: द सर्च फॉर प्रोस्पर्टी’ में यूनिवर्सल बेसिक इनकम के विचार पर विस्तृत चर्चा की है। उनके अनुसार यदि सरकार प्रति परिवार प्रतिवर्ष 17,500 रुपए दे तो जीडीपी के महज 3.5 फीसद धन से गरीबी को समाप्त किया जा सकता है। इससे निवेश को भी बल मिलेगा। एक दूसरे अर्थशास्त्री प्रणव बर्धन के अनुसार यूबीआइ पर जीडीपी का करीब दस प्रतिशत पैसा लगेगा। मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के आठ गांवों में 2011 में यूनिसेफ की मदद से यूबीआई का परीक्षण किया गया, जो सफल बताया जा रहा है। अब उत्साह में इस योजना को पूरे देश में लागू करने की बात की जा रही है, लेकिन इसका संतोषजनक जवाब किसी के पास नहीं है कि मध्य और अमीर वर्ग, जिसे सरकारी मदद की बिल्कुल जरूरत नहीं है, उसे यूबीआइ की जद में क्यों लाया जाए?

आज भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मुकाबले कुल कर-संग्रह का अनुपात सत्रह फीसद है। इसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी लगभग दस प्रतिशत है। घरेलू बचत लगभग 7.6 फीसद है। ऊपर से बजट घाटे को तयशुदा सीमा (3.5 प्रतिशत) में रखने का दबाव भी रहता है। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। सरकार की आय का करीब चालीस फीसद पैसा उधार और ब्याज चुकाने में चला जाता है। साथ ही कर-आय का करीब 5.8 लाख करोड़ रुपया मुकदमों के कारण फंसा पड़ा है, जिसे उगाहने के लिए छूट देने की चर्चा है। दूसरी ओर कॉरपोरेट-टैक्स घटाने की बात चल रही है। वित्तमंत्री दो साल पहले बजट भाषण में इसका वायदा कर चुके हैं। सरकार गरीब और किसान के कल्याण के बड़े-बड़े दावे जरूर करती है, पर दावों और हकीकत में भारी अंतर है। ऐसे में यूनिवर्सल बेसिक इनकम का विचार कितना व्यावहारिक है?

वैसे भी यूबीआइ का विचार विकसित देशों की उपज है। यूरोपीय मुल्क, अमेरिका, कनाडा और जापान आज आॅटोमेशन के भय से कांप रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट कहती है कि अगले कुछ साल में आॅटोमेशन के कारण वहां लाखों कामगार सड़कों पर आ जाएंगे। तेजी से बढ़ती आर्थिक विषमता, वेतन वृद्धि की कछुआ चाल और शरणार्थियों के दबाव में अमीर देशों में लगातार सामाजिक तनाव बढ़ रहा है। विडंबना यह है कि अपना वजूद बचाने के लिए ये पूंजीवादी देश यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसी घोर समाजवादी परिकल्पना पेश कर रहे हैं। मतलब यह कि वे मुनादी पीट रहे हैं कि हम रोजगार तो नहीं दे सकते, हां जिंदा रहने के लिए प्रत्येक नागरिक को हर महीने कुछ खैरात जरूर बांट सकते हैं। परीक्षण के तौर पर फिनलैंड में यूबीआइ पर अमल शुरू हो गया है। कनाडा और हालैंड इसे लागू करने पर विचार कर रहे हैं। हां, स्विट्जरलैंड की जनता समझदार है, जिसने पिछले साल जनमत संग्रह में प्रबल बहुमत से यूबीआइ को ठुकरा दिया था।

वैसे रोजगार के मोर्चे पर हिंदुस्तान के हालात भी अच्छे नहीं हैं। वर्ष 2015 में केवल 1.35 लाख नई नौकरियां आर्इं। 2013-15 के बीच रोजगार बाजार के हालात बहुत खराब रहे। काम के लायक देश के एक तिहाई लोग बेकार बैठे थे। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार अगले दशक में आॅटोमेशन की बदौलत भारत में 69 फीसद नौकरियां जाती रहेंगी। बेरोजगारी की मार गरीब ही नहीं, मध्यवर्ग पर भी पड़ रही है, बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे नौजवान घर बैठे हैं। इसीलिए सरकार को सब मर्जों की एक दवा यूबीआइ नजर आ रही है। नोटबंदी के कारण लघु और मध्यम उद्योगों में काम-धंधा ठप हो जाने से बहुत-से इलाकों से मजदूर अपने-अपने गांव लौट गए हैं। इसी कारण 2016-17 में मनरेगा का खर्च 58,000 करोड़ रुपए (2016-17 का बजट प्रावधान था 38,500 करोड़ रुपए) पहुंच जाने का अनुमान है। मानसून सामान्य होने के बावजूद नवंबर-दिसंबर में बिहार, राजस्थान और महाराष्ट्र में मनरेगा के तहत काम मांगने वाले मजदूरों की तादाद खासी बढ़ी है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) की रिपोर्ट से भारत में गरीबी और बेरोजगारी का कच्चा चिट्ठा खुलता है। ‘वर्ल्ड एम्प्लॉयमेंट एंड सोशल आउटलुक’ (वैश्विक रोजगार और सामाजिक दृष्टिकोण) नामक इस रिपोर्ट को पढ़ने पर पता चलता है कि आज भी हिंदुस्तान में 23 करोड़ लोग घोर गरीब हैं। उनकी प्रतिदिन की आय 1.90 डॉलर (127 रुपए) से कम है। अंतरराष्ट्रीय मापदंड के मुताबिक गरीबी की एक दूसरी श्रेणी में भारत के 68 करोड़ लोग हैं, जिनकी रोज की आमदनी 3.10 डॉलर (208 रुपए) से कम है। मतलब यह कि सवा अरब की आबादी वाले हमारे देश में 91 करोड़ लोग (73 प्रतिशत) अब भी घोर गरीबी या गरीबी के चंगुल में हैं। विकास का कोरा नारा उछाल कर उनका पेट नहीं भरा जा सकता और न ही यूबीआइ जैसे शोशे से उन्हें संतुष्ट किया जा सकता है।

 

 

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा- “GST और नोटबंदी देश की अर्थव्यवस्था को करेंगे मज़बूत”

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