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म्यांमा का मानवीय संकट

म्यांमा की सरकार रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या का हल निकालने को तैयार नहीं है। इसका सीधा असर भारत, बांग्लादेश, चीन, थाईलैंड, इंडोनेशिया जैसे देशों पर पड़ा है।
Author October 11, 2017 05:10 am
बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में रोहिंग्या मुस्लिम के सर पर सोया बच्चा (फोटो-रायटर 22-09-17)

लगभग पांच लाख रोहिंग्या मुसलमानों को शरणार्थी बनने को विवश किया गया है। फिलहाल संकट खत्म नहीं हो रहा है, बल्कि इसके और बढ़ने के संकेत हैं। रोहिंग्या संकट को धार्मिक या सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश हो रही है। जबकि सच्चाई कुछ और है। म्यांमा की सरकार रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या का हल निकालने को तैयार नहीं है। इसका सीधा असर भारत, बांग्लादेश, चीन, थाईलैंड, इंडोनेशिया जैसे देशों पर पड़ा है। वैसे म्यांमा की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार से दुनिया को यह उम्मीद थी कि उसका रुख सैन्य शासन से अलग होगा और वह बातचीत कर रोहिंग्या लोगों की समस्या का हल निकालेगी। लेकिन वर्तमान चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार से भी दुनिया को निराशा ही हाथ लगी है। उधर विश्व की महाशक्तियां रोहिंग्या शरणार्थी समस्या पर बंटती नजर आ रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने इस समस्या को लेकर म्यांमा की सरकार को लगातार घेरा है। संयुक्त राष्ट्र म्यांमा सरकार को समस्या को गंभीरता से न लेने का दोषी मान रहा है। दूसरी तरफ चीन खुलकर म्यांमा के पक्ष में है। वह म्यांमा सेना की कार्रवाई को जायज ठहरा रहा है। इस पर तमाम सवाल उठ रहे हैं, जो कि स्वाभाविक भी है। बताया जा रहा है कि म्यांमा में ‘संसाधन युद्ध’ चल रहा है। म्यांमा के प्राकृतिक संसाधनों पर चीन की नजर काफी समय से रही है।म्यांमा में संसाधनों पर कब्जे या संसाधनों के दोहन की हवस ने युद्ध के हालात बना दिए हैं। इस ‘संसाधन युद्ध’ के शिकार अकेले रोहिंग्या मुसलमान नहीं हुए हैं। कई बौद्ध समूहों पर भी इसकी गाज गिरी है। करेन, शान और कचीन समुदायों का सीधा टकराव म्यांमा की सेना से हुआ है। उत्तरी और पूर्वी म्यांमा में रहने वाले कुछ बौद्ध जनजातीय समूहों के लाखों लोग भी शरणार्थी शिविरों में शरण लिये हुए हैं। म्यांमा में कुल एक सौ पैंतीस जनजातीय समूह हैं। इनमें बमार, शान, करेन, रखाइन, रोहिंग्या, कचीन, चीन, करेनी, मून, कोकांग चाइनीज प्रमुख हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमा ने नागरिक का दर्जा नहीं दिया है।

म्यांमा के सारे संघर्ष को यहां की विकास दर से जोड़ा जा रहा है। पिछले कुछ सालों में यहां की विकास दर सात से आठ प्रतिशत रही है। इसमें अहम भूमिका विदेशी निवेश और विदेशी कंपनियों की है। लेकिन इसी विकास दर के मूल में संघर्ष की कहानी छिपी हुई है। ऊंची विकास दर प्राप्त करने के लिए स्थानीय लोगों से संसाधनों को लेकर सत्ता का संघर्ष शुरू हुआ। आरोप लगे कि यह विकास दर स्थानीय जातीय समूहों के जीवन की कीमत पर हासिल की गई। कई जातीय समूहों ने म्यांमा की सेना द्वारा जमीनों के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष किया।म्यांमा के शान, कचीन, करेन और रखाइन राज्यों में विकास के नाम पर स्थानीय समुदायों की जमीन बड़े पैमाने पर अधिग्रहीत की गई, लेकिन सरकार ने इसके एवज में मुआवजे का भुगतान नहीं किया। यही नहीं, विस्थापित होने वाले इन समुदायों की रिहाइश और रोजी-रोटी के वैकल्पिक इंतजाम भी नहीं किए गए। दूसरी तरफ विदेशी निवेश के नाम पर चीन, जापान, कोरिया समेत कई देशों की कंपनियां यहां पहुंच गर्इं। इनके निवेश के लिए जरूरी जमीन अधिग्रहीत की गई। स्थानीय समुदायों का कहना है कि गैस पाइप लाइन बिछाने के नाम पर उन्हें उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया। लेकिन उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला। गैस पाइप लाइन के साथ हाइवे के लिए भी जमीन अधिग्रहीत की गई। लेकिन शासन ने भूमि अधिग्रहण के सामाजिक प्रभाव का आकलन करने से इनकार कर दिया।

रोहिंग्या मुसलमानों और म्यांमा की सेना के बीच संघर्ष 2012 में तेज हो गया। लेकिन कई अन्य जातीय समूहों से म्यांमा सरकार का संघर्ष कई दशकों से चल रहा है। इसीलिए सवाल उठ रहे हैं कि आखिर रोहिंग्या मुसलमानों की त्रासदी को सिर्फ धार्मिक चश्मे से क्यों देखा जा रहा है, जबकि म्यांमा के कई दूसरे समुदाय भी सरकार की नीतियों के खिलाफ झंडा बुलंद किए हुए हैं। म्यांमा के विभिन्न राज्यों में सैन्य शासन ने 1990 के दशक में विकास के नाम पर जमीनों का अधिग्रहण शुरू किया था। जमीन अधिग्रहण का एक मुख्य प्रयोजन मिलिट्री अड्डा तैयार करना भी था। इस भूमि अधिग्रहण नीति के शिकार सिर्फ रोहिंग्या मुसलमान नहीं हुए; स्थानीय हिंदू और बौद्ध भी हुए। चूंकि रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या अच्छी-खासी है, इसलिए इसे धार्मिक या सांप्रदायिक रूप देने की कोशिश की गई। उधर रोहिंग्या मुसलमान म्यांमा में होने वाली हिंसा के बाद जमीन के रास्ते भाग कर भारत, थाईलैंड और बांग्लादेश पहुंचे। जबकि समुद्री रास्ते का इस्तेमाल कर उन्होंने इंडोनेशिया, मलेशिया और आस्ट्रेलिया में शरण ली।

अकेले रोहिंग्या मुसलमानों से म्यांमा सरकार की जंग नहीं हो रही है। दूसरे राज्यों में और गैर-मुसलिम जातीय समूहों पर भी म्यांमा की सेना ने कहर बरपाया है। कचीन प्रांत में 1960 से ही कचीन इंडिपेंडेंस आॅरगेनाइजेशन और सेना के बीच संघर्ष चल रहा है। कचीन गैर-मुसलिम हैं; इनमें बौद्ध और ईसाई दोनों शामिल हैं। 2011 में सेना और कचीन जाति के बीच दुबारा शुरू हुआ संघर्ष तेज हो गया। इसके बाद लगभग एक लाख कचीनों ने शरणार्थी शिविरों में शरण ली। कचीनों के लगभग चार सौ गांव पूरी तरह से खाली हो गए। इस संघर्ष के मूल में प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे का सवाल था। कचीनों के शरणार्थी शिविरों पर भी म्यांमा की सेना ने कई बार हमला किया। म्यांमा की सेना पर कचीन महिलाओं से बलात्कार के आरोप भी लगे। करेन राज्य में करेन जातीय समूह और सेना के बीच संघर्ष लगातार जारी है। करेनों में ईसाई और बौद्ध दोनों है। करेनों और म्यांमा की सेना के बीच चले संघर्ष के फलस्वरूप लाखों करेन शरणार्थी बन गए। बड़ी संख्या में करेन शरणार्थी थाईलैंड की सीमा में शरण लिये हुए हैं।

2011 में म्यांमा में ‘आर्थिक सुधार’ और तेज किया गया। विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए नई नीति अपनाई गई। इसके बाद म्यांमा में हिंसा और तेज हो गई। रखाइन राज्य में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ सेना ने अभियान छेड़ दिया। उत्तरी और पूर्वी म्यांमा में गैर-मुसलिम जातीय समूहों से भी म्यांमा की सेना का संघर्ष तेज हो गया। रखाइन में दो कोरियाई और चीन की कुछ कंपनियों की परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण के बाद स्थानीय लोगों और सेना के बीच टकराव बढ़ा।म्यांमा प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से काफी संपन्न है। लकड़ी के अलावा रबर के लिए भी मशहूर है। रखाइन में प्राकृतिक गैस का विपुल भंडार है। कई विदेशी कंपनियों की नजर यहां के प्राकृतिक संसाधनों पर है। इनमें चीन की कंपनियां सबसे आगे हैं। चीन ने रखाइन राज्य में खासा निवेश किया है। चीन की नेशनल पेट्रोलियम कंपनी ने एक गैस पाइपलाइन बिछाई, जो रखाइन की राजधानी सित्वे को चीन के कुनमिंग से जोड़ती है। रखाइन के सित्वे गैस फील्ड की गैस चीन इसी पाइपलाइन से लेकर जा रहा है। इसके समानांतर एक और गैस पाइपलाइन बिछाई जा रही है। लेकिन इसके लिए अधिग्रहीत जमीन का मुआवजा स्थानीय लोगों को नहीं मिला, न अधिग्रहण के सामाजिक प्रभाव का आकलन किया गया। जबकि ‘न्यूट्रल एडवाइजरी कमीशन आॅन रखाइन स्टेट’ ने सरकार से प्रभाव-आकलन की सिफारिश की थी। रखाइन में भारी निवेश करने वाले चीन ने अपने निवेश के कारण ही रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ म्यांमा शासन की सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया है।

 

 

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