December 06, 2016

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कैसे रुकेंगे रेल हादसे

भारत सरकार के रेलवे के नीति नियामकों को इस दुर्घटना के वास्तविक कारणों को खोजने का प्रयास करना चाहिए।

Author November 30, 2016 01:55 am
कानपुर देहात के नजदीक दुर्घटनाग्रस्त इंदौर-पटना एक्सप्रेस ट्रेन का डिब्बा। (PTI Photo/20 Nov, 2016)

बीस नवंबर 2016 का दिन देश में रेल दुर्घटनाओं के लिए याद किया जाएगा। ऐसा नहीं है कि रेल दुर्घटनाएं इसके पहले नहीं हुई, पर 20 नवंबर 2016 के दिन एक साथ तीन बड़ी रेल दुर्घटनाएं हुर्इं। हालांकि कानपुर के पुखराया की रेल दुर्घटना को छोड़ शेष दोनों दुर्घटनाओं- मंडार (छत्तीसगढ़) तथा झांसी (उत्तर प्रदेश)- की चर्चा अखबारों में, कम से कम राष्ट्रीय मीडिया में नगण्य थी। कानपुर के पास इंदौर-पटना एक्सप्रेस की दुर्घटना में लगभग डेढ़ सौ लोग मौत के शिकार हो गए और तीन सौ के आसपास लोग गंभीर रूप से घायल हैं। कई लोग अब भी खतरे से बाहर नहीं हैं। इस बड़ी रेल दुर्घटना ने शेष दोनों दुर्घटनाओं को राष्ट्रीय मीडिया से दृष्टि ओझल कर दिया। लेकिन अगर जन-हानि के अलावा देखें, तो इन दुर्घटनाओं की स्थिति भी गंभीर है। रायपुर में मांडर के पास मालगाड़ी के सत्रह डिब्बे पटरी से उतर गए और एक से डेढ़ किलोमीटर का रेल ट्रैक पूर्णत: क्षतिग्रस्त हो गया। झांसी के पास भी मालगाड़ी के डिब्बे पटरी से उतरे और काफी दूर तक तक पटरी क्षतिग्रस्त हुई। इन दोनों दुर्घटनाओं की वजह से बहुत सारी गाड़ियों को पांच-पांच छह-छह घंटे तक विलंबित (लेट) करना पड़ा तथा कुछ के मार्ग भी बदलना पड़े। हजारों यात्री इन दुर्घटनाओं से परेशान हुए। वे मौत के शिकार तो नहीं हुए, पर उनके जीवन का अमूल्य समय अवश्य जाया हुआ।

एक ही दिन में तीन बड़ी और गंभीर दुर्घटनाएं किस बात का संकेत देती हैं? इंदौर-पटना एक्सप्रेस की दुर्घटना के बाद मीडिया के माध्यम से जो समाचार प्राप्त हुए हैं उनमें से एक स्थानीय यात्री श्री शर्मा जो इंदौर से बैठे थे और उज्जैन उतरे थे, उन्होंने मीडिया को कहा था कि मैंने बोगी के चाकों की विचित्र-सी आवाज सुनी थी और डिब्बे के टीटीई को बताया था। टीटीई ने उनसे कहा कि यह सामान्य आवाज है। दुर्घटना के बाद रेल चालक ने अपने बयान में कहा कि मेरी कोई गलती नहीं है, मैंने पहले ही खराबी की जानकारी दी थी तथा झांसी में गाड़ी को रोका भी था। रेल चालक दुर्घटना से बच गए, पर अफसरशाही के कोप से भयभीत हैं और इसलिए मुखर होकर सच्चाई बयान नहीं कर पा रहे हैं। अगर उन्हें नौकरी की सुरक्षा का पक्का आश्वासन मिल जाए तो वे उन तकनीकी खामियों को बता सकते हैं जिनके कारण दुर्घटना हुई। हालांकि अभी तो भय की वजह से उन्होंने बयान भी दर्ज नहीं कराया है।

भारत सरकार के रेलवे के नीति नियामकों को इस दुर्घटना के वास्तविक कारणों को खोजने का प्रयास करना चाहिए। रेल मंत्रालय ने हमेशा की तरह जांच की घोषणा की है और देश का हर व्यक्ति यह जानता है कि जांच के क्या परिणाम होने वाले हैं। इसके पहले भी जो दुर्घटनाएं हुई थीं उनकी जांच के बाद सरकार ने क्या कदम उठाए यह उनसे बेहतर कौन जान सकता है? दरअसल, जांच की घोषणा एक बड़ा नाटक जैसा बन गई है जो वक्ती तौर पर घटना से लोगों का ध्यान हटाने और समय गुजारने का तरीका है। जब तक अखबारों के पहले पेज पर दुर्घटना की चर्चा चलती रहेगी, सवाल जिंदा रहेगा, और उसके कुछ दिन बाद लोग भूल जाएंगे। यह हमारे समाज की मानसिक स्थिति भी है और त्रासदी भी।

इस दुर्घटना के बाद कुछ बुनियादी सवालों पर बहस व चर्चा होनी चाहिए और प्रधानमंत्री, रेलमंत्री और नौकरशाहों को विचार करना चाहिए। एक, प्रधानमंत्री की एक सदिच्छा है कि गाड़ियों की गति बढेÞ। हम सब भी यही चाहते हैं। पर गति को बढ़ाने के लिए जो बुनियादी ढांचा चाहिए, क्या वह है? अगर माता-पिता प्रेमवश या उत्साहवश अपने पोलियोग्रस्त बच्चे को तेज गति से दौड़ाने का प्रयास करेंगे तो दुर्घटना अवश्यंभावी है। दो, रेलवे के नियम यह कहते हैं कि रेलवे ट्रैक को प्रति दस वर्ष में बदला जाना चाहिए, यानी दस फीसद रेल की पटरियों को औसतन प्रतिवर्ष बदला जाना चाहिए। क्या रेलमंत्री देश के समक्ष यह तथ्य लाने का कष्ट करेंगे कि पिछले लगभग सत्तर वर्षों में कितने किलोमीटर रेल के ट्रैक का नवीनीकरण किया गया है तथा उसे 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार के लायक बनाया गया है।

तीन, भारतीय रेलवे की रेल लाइनों की लंबाई तथा रेल यात्रियों-रेलगाड़ियों और मालगाड़ियों की संख्या कितनी बढ़ी है तथा उनके परिचालन के लिए रेलकर्मियों की संख्या में कितनी वृद्धि हुई है। आजादी के बाद से अभी तक संसद के सदस्यों की संख्या में वृद्धि हुई, मंत्रियों की संख्या में वृद्धि हुई तथा रेलवे अधिकारियों की संख्या में वृद्धि हुई, रेलवे के अधिकारियों की संख्या में वृद्धि तो पांच से दस गुना तक हो सकती है, जबकि कर्मचारियों की संख्या लगभग आधी हो गई है। अफसरशाही प्रबंधन का पद है, पर परिचालन का वास्तविक काम तो कर्मचारी ही करते हैं और उनके ऊपर कितना मानसिक दबाव व बोझ है इसकी कल्पना करना कठिन है। चालकों और गार्ड के लिए लगातार कई दिनों तक ड्यूटी करना होता है, वे शारीरिक-मानसिक रूप से थके होते हैं, अपनी असमर्थता भी व्यक्त नहीं कर सकते।

चार, रेलमंत्री यह भी देखें कि पिछले दिनों हुई दुर्घटनाओं में क्या किसी उच्च अधिकारी को जिम्मेवार मान कर दंडित किया गया? होता यह है कि दुर्घटनाओं के बाद कुछ छोटे कर्मचारियों की गर्दन नापी जाती है और जांच की इतिश्री हो जाती है। रेलमंत्री जी ने डीआरएम व कुछ अधिकारियों को निलंबित कर तबादला किया है, लेकिन क्या यह कार्रवाई काफी है? डेढ़ सौ निर्दोष लोगों की मौत, एक बहुत बड़ी त्रासदी है। पर यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है कि इन मौतों को नियति मान लिया जाए। ये लोग व्यवस्था की गैर-जिम्मेदारी के चलते मारे गए हैं। इसलिए हर हाल में जवाबदेही तय होनी चाहिए, और कार्रवाई भी।  पांच, सरकार को चाहिए कि वह गति का आग्रह पीछे रखे और पहले रेल की आधारभूत संरचना पर ध्यान दे। विकास की तुलना में कर्मचारियों की संख्या पर ध्यान दे, रिक्त पद जल्दी से जल्दी भरे जाएं। छह, कुछ जिम्मेवार लोग कह रहे हैं कि दुर्घटनाएं तो सारी दुनिया में होती हैं। सही है, दुर्घटनाएं विकसित देशों में भी होती हैं और कई बार बड़ी भी होती हैं, पर तुलनात्मक रूप से उनकी संख्या बहुत कम होती है और विकसित देश दुर्घटना के बाद यह तैयारी करते हैं कि दुर्घटना की पुनरावृत्ति न हो। फिर यह दुर्घटना नहीं है, जब ड्राइवर ने झांसी में रेल खड़ी कर चलाने से इनकार किया था तो उसे बाध्य कर रवाना करना क्या मौत के मुंह में धकेलना नहीं था? रेल हादसों की वजहें अमूमन जानी प-पहचानी हैं। मसलन, सिग्नल की खराबी, रेल पटरियों का खराबी या खिसका हुआ होना, सूचना के आदान-प्रदान में कोताही और परिचालन संबंधी लापरवाहियां। अगर रेलवे ठान ले, तो ये खामियां दूर की जा सकती हैं।

नैतिकता का पहलू वैयक्तिक होता है। अत: इस्तीफे का फैसला खुद रेलमंत्री को अपनी अंतरात्मा की आवाज पर करना चाहिए। अगर रेलमंत्री इस्तीफा देंगे तो उनकी त्रुटियां ढंक जाएंगी, अच्छी छवि निर्मित होगी और रेल प्रशासन में कसावट आएगी। रेल प्रशासन को यह सोचना पड़ेगा कि सब कुछ पहले की तरह चलता नहीं रहेगा कि जांच की रस्मी कवायद की जाए, फिर सब कुछ भुला दिया जाए। आज भी लोग स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री की एक नैतिक मिसाल को याद करते हैं, जिन्होंने अपने रेलमंत्री के कार्यकाल में एक दुर्घटना की वजह से मंत्री-पद से इस्तीफा दे दिया था।

 

 

 

 

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First Published on November 30, 2016 1:55 am

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